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        कर्म 

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     एक व्यक्ति अपने जीवन में बहुत सारी कठिनाइयों से गुज़र रहा था. अपने वृद्ध माता-पिता, बहनों के अतिरिक्त अपनी पत्नी व बच्चों का पोषण करने वाला, परिवार का वह एकमात्र अर्जक था. एक दिन वह बहुत बीमार पड़ गया और लगभग एक हफ्ते तक काम पर नहीं जा सका. इसके परिणामस्वरूप उसे नौकरी से निकाल दिया गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे और अपने परिवार का पालन कैसे करे. अपने आस-पास के अन्य सभी लोगों को सुखी व खुश देखकर वह बहुत निराश था और अक्सर सोचता था कि केवल वही कष्ट में क्यों है.

     अपनी हालत पर चिंतित होकर जब वह इस प्रकार सोच रहा था; गाँव में एक घोषणा हुई कि गाँव में एक महान संत आने वाले हैं और वह गाँव में एक महीने तक रहेंगे. भजन कीर्तन के साथ-साथ वह आध्यात्मिक प्रवचन भी देंगे. एक अमीर व्यापारी ने इस दौरान सभी गाँव वालों के लिए महीने भर के मुफ्त भोजन की व्यवस्था की है और सभी उसमें आमंत्रित हैं. 

      घोषणा सुनकर उसे राहत महसूस हुई कि कम से कम एक महीने के लिए उसे अपने परिवार के भोजन की चिंता नहीं रहेगी. इस दौरान वह न केवल एक दूसरी नौकरी की तलाश कर सकता था बल्कि उसे गुरूजी को सुनने का अवसर भी प्राप्त होगा. 

      अगली सुबह जब गुरूजी गाँव पहुँचे तो इस व्यक्ति ने उनका स्नेहपूर्वक स्वागत किया और कहा कि जब तक गुरूजी उनके गाँव में थे वह रोज़ उनकी सेवा करना चाहेगा. गुरूजी इस व्यक्ति से प्रसन्न हुए और उसे अपनी पूजा सम्बन्धी दैनिक आवश्यकताओं का ध्यान रखने को कहा. इस व्यक्ति ने अत्यंत उत्साह, प्रेम व श्रद्धा के साथ ईमानदारी से रोज़ गुरूजी की सेवा की. हर शाम वह गुरूजी का प्रवचन सुनता था. परन्तु मन ही मन वह अपने भविष्य के बारे में चिंतित था और सोचता रहता था कि वह विपत्तियों से क्यों घिरा हुआ है…..

       गुरूजी एक सिद्ध पुरुष थे और एक शाम उन्होंने कर्म पर प्रवचन दिया. उन्होंने बहुत सुन्दर तरीके से कर्म का विवरण इस प्रकार दिया-

        कर्म ४ प्रकार के हैं- 

१) प्रारब्ध कर्म- परिपक्व कर्म 

            एक पेड़ पर एक सेब की कल्पना करो. सेब के पक जाने पर उसे सही समय पर तोड़ सकते हैं वरना वह पेड़ से अलग होकर ज़मीन पर गिर जाएगा. वह हमेशा के लिए पेड़ पर नहीं रह सकता है. इसी प्रकार प्रारब्ध भी पका हुआ कर्म है. किसी समय तुमने जो पेड़ लगाया था, उसका फल आज पक कर गिरने को karm1तैयार है. कमान से निकले हुए तीर के समान, यह प्रक्रिया तुम्हारी  इच्छा या पसंद के बावजूद अपने वेग से चलती है. जब एक बार तुम कोई कर्म करते हो तो वह ब्रह्माण्ड में दर्ज हो जाता है और नियत समय में फलित होता है

इससे छुटकारा नहीं है. जीवन के वर्तमान काल में तुम जिस भी परिस्थिति से गुज़र रहे हो- यहाँ ‘वर्तमान काल’ शब्द पर ध्यान दो- इस पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं है और यह तुम्हारा प्रारब्ध है. तुमने जो भी पिछले या पिछले कई जन्मों में बोया है, उसी के अनुसार तुम अच्छा या बुरा फल भोग रहे हो. इसलिए अगर तुम सोचते हो कि तुम इतना कष्ट क्यों भोग रहे हो; यह तुम्हारे पूर्व कर्मों का परिणाम है. मनुष्य को अपने पूर्व कर्मों का परिणाम अवश्य भोगना पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तुम अपना भविष्य बदल नहीं सकते. प्रारब्ध वह है जो परिपक्व हो चुका है. भविष्य में विकसित होने वाला कर्म प्रारब्ध नहीं है, वह दूसरी श्रेणी में आता है.

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  २) संचित, संग्रहित कर्म 

           यह तुम्हारे कर्मों का भंडार है. पेड़ पर सभी फल एक ही दिन नहीं पकते हैं. अगले मौसम में पेड़ पुनः फलों से लदा होता है और ऐसा वर्ष दर वर्ष चलता रहता है. इसी कारण भारी बहुमत के लोगों के लिए जीवन चक्रीय होता है. क्यों?? अगर तुम सेब के पेड़ लगाते हो तो मौसम आने पर तुम्हारे पास ढेर सारे सेब होंगे. इसी प्रकार तुमने कितने भी आकर्षक जंगली जामुन या कितनी ही रक्षात्मक कांटेदार झाड़ियाँ लगाईं हो, अपने अनुकूल मौसम में वह अवश्य फले-फूलेंगे. इस कारण परेशानियाँ शायद ही कभी अकेलीं आती हैं, वह झुंड में आती हैं और इसी तरह अच्छा समय भी. संचित कर्म के बारे में विशिष्ट बात यह है कि इसे बदला जा सकता है. सेब या बेर के जड़ पर जाकर, अपने विवेक के प्रयोग से या तो उसका पोषण कर सकते हो या फिर उसे तबाह कर सकते हो. प्रमुख बात मूल तक जाना है.

  ३) आगामी, आने वाला कर्म

           कल्पना करो कि तुम सेब के बगीचे में गए हो. स्वेच्छापूर्वक या ज़बरदस्ती से, लेकिन बगीचे में जाने भर से ही तुमने एक कर्म किया. अब इस कर्म के आधार पर तुम कुछ अन्य कर्म करने के लिए बाध्य होगे जैसे कि सेब के पेड़ों को देखना, सुगंध का अनुभव करना और बगीचे से बाहर निकलना. एक बार संपन्न होने पर यह सभी निश्चित कर्म भी परिपक्व होने की प्रतीक्षा में रहते हैं.  किसी भी कर्म की अहमियत कम या अधिक नहीं होती है. आज तुम जो भी करने का चयन करते हो, तुम्हारे भविष्य पर उसका सीधा असर पड़ता है. तुम्हारे साथ आगे क्या होगा यह तुम्हारे वर्तमान कर्म निर्धारित करते हैं. आगामी कर्म एक अनिवार्य कर्म है और इसके बारे में तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं है. तुमने अगर बगीचे में प्रवेश किया है तो किसी न किसी समय तुम्हें बगीचे से बाहर निकलने की क्रिया भी करनी होगी. परन्तु यदि तुम अपने संचित कर्मों का ढेर बदल सकते हो या फिर अपने वर्तमान की ठीक से देखभाल कर सकते हो तो यह स्वतः ही बदल जाता है.  

   ४) वर्तमान, तत्कालीन कर्म

          इसे क्रियमान, व्यवहार्य या वर्तमान कर्म कहते हैं. यह कर्म वह है जो किया जा रहा हो. इसका एक बेहतर पारिभाषिक शब्द पुरुषार्थ कर्म है. चलो मान लेते हैं कि अब तुम्हें सेब नहीं चाहिए. तुम सेब के पेड़ों को या तो काट सकते हो या फिर पेड़ को जड़ से उखाड़ सकते हो. किसी भी हाल में तुम्हें लकड़ी, सड़े हुए सेब, हरी पत्तियाँ इत्यादि का बंदोबस्त करने का तरीका ढूँढना पड़ेगा जो कि अत्यंत मेहनत का प्रयत्न है. इसके बाद आगामी वर्षों में कोई फल नहीं होगा. अब सेब के बगीचे में तुम गेहूँ के बीज बो सकते हो और कुछ महीनों बाद फसल काट सकते हो. इस प्रकार तुम नियमित रूप से अपने कर्मक्षेत्र को साफ़ कर सकते हो.    

        इस सन्दर्भ में एक उपयुक्त सवाल यह उठता है कि तुम्हें यह कैसे मालूम पड़े कि तुम नया कर्म उत्पन्न कर रहे हो या अपने पिछले कर्मों के परिणामों से गुज़र रहे हो? इसका उत्तर बहुत सरल है.. तुम जब कुछ अपनी पसंद से करते हो तो एक नए कर्म का निर्माण करते हो और जब तुम कुछ करने के लिए बाध्य होते हो तब तुम केवल अपने कर्म का ऋण चुका रहे होते हो. पहली परिस्थिति में परिणाम, अच्छे या बुरे, की संरचना होती है और अपने संचित कर्म का सही संचालन करके दूसरे भाग का ध्यान रखा जा सकता है. यदि तुम्हें अपने किसी भी कर्म का फल नहीं चाहिए-अच्छा या बुरा- तो सभी कार्य निःस्वार्थ भाव से करके प्रभु को समर्पण कर दो.

      अतीत में किए गए चयन, स्वैच्छिक या अन्यथा, तुम्हारे आज के लिए जिम्मेवार हैं और वर्तमान में लिए गए फैसले तुम्हारा कल निर्धारित करते हैं. अतः यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि तुम अपने वर्तमान कर्मों और वर्तमान विचारों पर ध्यान दो. भविष्य में उपलब्ध विकल्पों का अनुक्रम तुम्हारे वर्तमान कार्यों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है. तुम्हारा भविष्य, वास्तविकता में तुम्हारा जीवन, वर्तमान कर्मों पर आधारित है. 

      इस प्रकार से अर्थ बताकर गुरूजी ने अपना प्रवचन संपन्न किया. अपने प्रश्नों का उत्तर पाकर यह व्यक्ति बहुत खुश था और उसने अच्छे विचार और कार्यों का अभ्यास करना शुरू कर दिया. जल्द ही गुरूजी का गाँव छोड़कर जाने का समय आ गया. गुरूजी इस व्यक्ति से बहुत खुश थे कि उसने इतनी श्रद्धा से उनकी सेवा थी और उन्होंने उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया. अमीर व्यापारी, जिसने कार्यक्रम प्रायोजित किया था, ने भी इस व्यक्ति की निष्ठा और ईमानदारी पर ध्यान दिया और उसे अपने उद्योग में एक अच्छी नौकरी का प्रस्ताव दिया. इस प्रकार वह व्यक्ति अपनी समस्त परेशानियों से चिंतामुक्त हो गया. 

     उस व्यक्ति को अहसास हुआ कि यह उसके बुरे कर्म थे जिनके कारण उसे कष्ट झेलना पड़ा था और उसके अच्छे कर्मों ने उसे गुरूजी को मिलने और उनकी सेवा करना का अवसर दिया था. यह सबक सीखकर और अपने अपने कार्यों के प्रति पूर्णतया सचेत होकर उनसे एक सार्थक जीवन जीना आरम्भ कर दिया. 

      सारांश:

   मनुष्य अपनी वासनाओं व प्रवृत्तियों को ख़त्म करने के लिए बार-बार जन्म लेता है. मार्ग और लक्ष्य की अज्ञानता और हमारा बहिर्मुख स्वभाव हमें भौतिक वस्तुओं से जुड़ने  के लिए विवश करता है. हमारे मन की कल्पनाशक्ति इन वस्तुओं को खूबसूरत और आकर्षक बनाती है. अहंकार व आत्मकेन्द्रित इच्छाओं रहित कार्यों के द्वारा हम अपनी वासनाओं को ख़त्म कर सकते हैं.

   कभी-कभी जीवन के इस बंधन में हम आनंदित महसूस करते हैं. सही जानकारी के अभाव में हम फँस जाते हैं. बोध होने के बावजूद भी, प्रेरणा और उत्साह के अभाव में जीवन रुपी जंजाल से बाहर निकलना मुश्किल होता है. 

    लेकिन यदि हम पूर्ण निष्ठा से सर्वोच्च अनुग्रह का आह्वान करेंगे तो हमें सफलता अवश्य मिलेगी.

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      अनुवादक- अर्चना 

 

      धैर्यवान भिक्षु 

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     यह कहानी एक भिक्षु की है जो एक सामान्य जीवन व्यतीत करता था. शहर के लोग उसकी सादगी के लिए उसका सम्मान करते थे और उसके विभिन्न कार्यों के कारण उसे विवेकी पुरुष मानते थे. 

    उस शहर में एक जवान अविवाहित महिला गर्भवती हो गई जो एक शर्मिंदगी थी. अपने प्रेमी को बचाने के लिए उसने शहर के ज्येष्ठ सदस्यों के सामने भिक्षु को अपनी गर्भावस्था का जिम्मेदार ठहराया. 

     जब भिक्षु का सामना किया गया तो उसने बस इतना ही कहा, “ऐसा है क्या?” 

     भिक्षु को अपराधी समझकर, उसे गर्भवती महिला के साथ शहर से बाहर निकाल दिया गया. 

     गर्भवती महिला के साथ शहर से चले जाने के बावजूद भी सन्यासी उसके असत्य कथन व स्वयं पर हुए अपमान के बारे में चुप रहा. पड़ोस के गावँ से वह अपने और गर्भवती महिला, जिसने उसके चरित्र पर कलंक लगाया था, के लिए भिक्षा माँगता रहा.

     कुछ दिनों के बाद महिला को अपने अपराध व मूर्खता का अहसास हुआ, वह अपने शहर वापस गई और सबको सच बतलाया कि उसकी गर्भावस्था के लिए वास्तव में कौन जिम्मेदार था.  शहर के बुज़ुर्ग, जिन्होंने भिक्षु को अपमानित करके देश निकाला दिया था, अपने फ़ैसले पर पश्चात्तापी थे. उन्होंने भिक्षु के पास जाकर विपुलता से क्षमा याचना की. सन्यासी ने उत्तर दिया, “ऐसा है क्या?”

    एक विद्वान व्यक्ति का कोई प्रतिरूप नहीं होता है और इस कारण वह भीतर से स्वतंत्र होता है. उसकी इस स्वाधीनता के कारण उसे एक बच्चे के समान समझा जाता है. अज्ञानी इस प्रकार की भीतरी स्वाधीनता से अनजान होते हैं.   

   सारांश :

    बुद्धिमान व्यक्ति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह होता है कि वह पूर्ण संतुष्टि अपने भीतर ही खोजता है और एक तृप्त व्यक्ति बन जाता है. वह प्रत्येक परिस्थिति को समभाव से स्वीकार करता है. वह एक ऐसे मार्ग पर चलता है जो योग्यता और त्रुटि या गुण और अवगुण से विहीन होता है. ऐसा केवल तभी हो पाता है जब हर काम अहंकार या कर्तापन की भावना से रहित होता है. 

    जिस व्यक्ति का चित्त सदैव ईश्वर पर केंद्रित रहता है और जो स्वयं के ज्ञान में दृढ़ रहता है, वही योग में स्थिरचित्त रहता है. वह हमेशा खुश रहता है- अपने चित्त की ख़ुशी में मदहोश रहता है. एक बच्चे की तरह वह हर चिंता व उत्कंठा से मुक्त रहता है. अहंकार रहित चित्त योग के रूप में उभरता है. अहंकार के विभाजित होने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हम स्वयं से अलग हैं. 

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    इस प्रकार की धारणा को पढ़कर जब हम इसे समझने की कोशिश करते हैं तो ऐसा लगता है कि इसका अनुसरण करना व अहंकार रहित होना अत्यंत मुश्किल है. परन्तु इस पथ पर अग्रसर होने के लिए, शुरुआत में हम अपने कार्यों पर ध्यान देकर यह निश्चित कर सकते हैं कि किसी परिस्थिति में हमें प्रतिक्रिया करनी चाहिए या प्रत्युत्तर देना चाहिए. इस विचार का अभ्यास आरम्भ करने पर हम मनन करना शुरू करेंगे और प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा बेहतर बनेंगे. हम अपने मार्ग पर आगे बढ़ना तब आरम्भ करेंगे जब हम अपने अहंकार को संतुष्ट करने के बजाय जन हित पर ध्यान केंद्रित करेंगे. इसके अतिरिक्त ईश्वर को कर्ता समझकर जब हम अपने विचार, कर्म और शब्द प्रभु को सौंपना शुरू करते हैं तो हमारी प्रगति और भी अधिक रफ़्तार से होती है.

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    अनुवादक- अर्चना  

कर्म क्या है

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           आदर्श: उचित आचरण 

       उप आदर्श:  सकारात्मक विचार 

     बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे. एक शिष्य ने उनसे पूछा, “कर्म क्या है?”

     बुद्ध बोले, “मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ ……..

         एक राजा हाथी पर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था. बाज़ार से गुज़रते समय अचानक वह एक दुकान के सामने रूका और अपने मंत्री से बोला, “पता नहीं क्यों लेकिन इस दुकान के मालिक को मैं फांसी देना चाहता हूँ.” 

         मंत्री चकित था. परन्तु इसके पहले कि वह राजा से कारण पूछ पाता, राजा आगे बढ़ गया. 

        अगले दिन स्थानीय निवासियों की तरह वस्त्र पहनकर मंत्री उस दुकान पर दुकानदार से मिलने गया. बातों-बातों में मंत्री ने उससे पूछा कि उसका व्यापार कैसा चल रहा था. दुकानदार, एक चन्दन व्यापारी, ने उदास मन से मंत्री को बताया कि उसके पास मुश्किल से ही कोई ग्राहक था. लोग उसकी दुकान पर आकर चन्दन को सूंघते थे पर फिर चले जाते थे. वह चन्दन की उत्कृष्टता की प्रशंसा भी करते थे परन्तु शायद ही कभी कुछ खरीदते थे. उसकी एकमात्र उम्मीद थी कि राजा जल्द ही मर जाए. तब राजा का अंतिम संस्कार करने के लिए चन्दन की भारी माँग होगी. चूँकि उस इलाके का वह एकमात्र चन्दन व्यापारी था, उसे यकीन था कि राजा की मृत्यु से उसे अप्रत्याशित लाभ होगा.      

        मंत्री को अब समझ में आया कि राजा ने उस दुकान के सामने रूक कर उस दुकानदार को मारने की इच्छा क्यों व्यक्त की थी. दुकानदार के नकारात्मक विचारों के स्पंदन ने शायद राजा को सूक्ष्म रूप से प्रभावित किया था और इसी कारण राजा ने अपने भीतर नकारात्मक विचार महसूस किए थे.

      मंत्री, राज दरबारी, ने कुछ देर इस मामले पर विचार किया. यह बताये बिना कि वह कौन था या एक दिन पहले क्या हुआ था, उसने कुछ चन्दन खरीदने की इच्छा व्यक्त की. दुकानदार प्रसन्न हुआ और उसने चन्दन लपेटकर मंत्री को सौंप दिया.

      राजमहल लौटने पर मंत्री सीधे दरबार में गया जहाँ राजा विराजमान था और उसे बतलाया कि चन्दन व्यापारी ने उसके लिए उपहार भेजा था. राजा अत्यंत चकित हुआ. उपहार खोलने पर चन्दन के श्रेष्ठ सुनहरे रंग व मनभावन सुगंध से राजा को ताज्जुब हुआ. खुश होकर उसने चन्दन व्यापारी के लिए सोने के कुछ सिक्के भेजे. राजा को मन में अफ़सोस भी हुआ कि उसके मन में दुकानदार को मारने जैसे अनुचित विचार आए थे.

     दुकानदार को जब राजा द्वारा भेजे सोने के सिक्के मिले तो वह हक्का-बक्का रह गया. वह राजा के सद्गुणों को बखान करने लगा कि राजा ने सोने के सिक्कों के माध्यम से उसे दरिद्रता के कगार से बचाया था. कुछ समय बाद उसे ध्यान आया कि राजा के प्रति उसके मन में घिनौने विचार आए थे. अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए राजा के प्रति इस प्रकार के नकारात्मक विचारों के बारे में सोचकर व्यापारी को बहुत पश्चाताप हुआ. “ 

   यदि हम दूसरे व्यक्ति के लिए अच्छे व हितकर विचार रखते हैं तो वह सकारात्मक विचार उपकारक रूप में हमारे पास वापस अवश्य आते हैं. परन्तु यदि हम बुरे विचारों को आश्रय देते हैं तो वह विचार दंड के रूप में पलटकर हमारे ही पास आते हैं. 

        “कर्म क्या है? ” बुद्ध ने पूछा.

       बहुजनों ने उत्तर दिया, “हमारे शब्द, हमारे कर्म, हमारी भावनाएं, हमारे कार्य ……..”

       बुद्ध ने सिर हिलाया और बोले, “तुम्हारे विचार तुम्हारे कर्म हैं.”

         सीख:

       हमें वही मिलता है जो हम देते हैं. सब कुछ प्रतिक्रिया व प्रतिफल के बारे में है. अच्छे विचार, कर्म व कृति को सदा अच्छा ही मिलता है.

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        छात्रों: जब ऐसे तात्त्विक सिद्धांत आपको सरल कहानियों व अनुभवों द्वारा समझाए जाते हैं तो आप सही सोचने व उचित ढंग से कार्य करने में सक्षम बनते हैं. आप अपने कार्यों के बारे में सचेत हो जाते हैं और उसी अनुसार कार्य करते हैं. यह आदर्श और शिक्षाएँ बचपन से ही मन में बिठाने से आपकी शिक्षा, काम व जीवन के सबसे अधिक नाज़ुक समय में यह आपका सहारा अवश्य बनेंगे. ऐसे लोगों का जीवन संतुलित होगा और वह स्पष्ट बूझ से भौतिक व आध्यात्मिक जीवन का आनंद लेंगे.

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       अनुवादक- अर्चना  

      जांबवान और हनुमान 

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      आदर्श: सत्य 

  उप आदर्श:  अपने वास्तविक आत्म, आंतरिक शक्ति को पहचानो 

      हम सभी जानते हैं कि रामायण की कहानी में जब भगवान राम स्वर्ण मृग की तलाश में गए थे तब रावण ने सीता देवी का अपहरण किया था. सीता को कुटिया ने न पाकर, भगवान् राम और उनके भाई लक्ष्मण, सीता देवी की तलाश में निकल पड़े. रास्ते में उनकी मुलाक़ात हनुमान से हुई और वह उन्हें अपने वानर राजा सुग्रीव के पास ले गए.

      राम ने बाली को मारने में सुग्रीव की मदद की और उसे किष्किंधा का राजा बनाया. राम की सहायता के बदले में सुग्रीव ने सीता की तलाश में अपनी वानर सेना भेजने का वचन दिया. उन्हें जटायु पक्षी के भाई, सम्पति से मालूम पड़ा कि सीता का अपहरण रावण ने किया था और वह उन्हें लंका ले गया था. अतः वानर सेना सलाह-मशवरे में जुट गई कि किस प्रकार लंका पहुँचकर सीता देवी को बचाया जाए.  

     किष्किंधा के युवराज अंगद बोले, “मैं अभी भी छोटा हूँ और लंका तक की दूरी पार नहीं कर सकता हूँ.” हनुमान अपनी क्षमता को लेकर आश्वस्त नहीं थे और इस कारण चुप बैठे रहे. ऐसे समय में जांबवान भालू, जो सेना के होशियार व पुराने सदस्य थे, हनुमान को उसकी शक्ति का रहस्य खोलते हैं.

  हनुमान अपनी युवावस्था में आसानी से उड़ सकते थे; यहाँ तक कि वह सूरज तक भी पहुँच सकते थे. वह वायु के पुत्र हैं. इतिहास कहता है कि हनुमान ने स्वयं सूर्यदेव से सभी वेद सीखे थे. छोटेपन में भी वह सुशिक्षित व शक्तिशाली थे. लेकिन वह बहुत शरारती थे और अपनी ताकत को लेकर अहंकारी भी. उनके उपद्रवी व्यवहार पर लगाम लगाने के लिए उनपर अपनी सारी ताकत भूल जाने का अभिशाप था. लेकिन इसमें एक दंडविराम था. उन्हें अपनी शक्ति का अहसास पुनः तब होगा जब दूसरे उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण कराएंगे और उनकी प्रशंसा करेंगे. जांबवान यह जानते थे और उन्होंने सही मौके पर हनुमान की ताकत और क्षमताओं का खुलासा किया. 

 

 

  एक बार अपने वास्तविक सामर्थ्य का अहसास होने पर हनुमान तुरंत उड़कर समुद्र पार करने के लिए रवाना हो गए. सभी बाधाओं पर जीत प्राप्त करके हनुमान ने रावण के साथ हुए युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

   युद्ध के दौरान कई संकटकालीन क्षणों में हनुमान ने राम और उनकी सेना को रावण पर विजय पाने में मदद की.  

                 सीख:

  प्रतीकात्मक रूप से प्रभु हनुमान निर्मल भक्ति और अहंकार रहित सम्पूर्ण समर्पण का प्रतीक हैं. एक बन्दर के रूप में वह मनुष्य के निचले आत्म को दर्शाते हैं जिसकी सोच तथा व्यवहार यह निरूपण करता हैं कि अपनी परिमितता के कारण वह एक शरीर मात्र है. लेकिन जब उसे यह याद दिलाया जाता है कि वह कौन है और उसकी क्या ताकत है; वह उच्च से जुड़ जाता है और सेवा कार्यों में लीन होकर उस उच्च में विलीन हो जाता है. हम सभी में वह भीतरी मूलभूत शक्ति व सामर्थ्य है जिसका खुलासा होने पर वह हमें भौतिक व आध्यात्मिक जगत की सफलता की ओर ले जा सकती है.

  छात्रों को इस अवधारणा को समझाते समय; हमारे भीतर दृढ़ विश्वास व आस्था होनी चाहिए जो बाहरी परिस्थितियों से भंग नहीं होती है. इसका विकास बचपन से ही सही आदर्श व निष्ठा देकर किया जाना चाहिए. अन्तर्भाग महत्वपूर्ण है और इस कारण हमारे भीतर की व्यवस्था सही होने पर बाहरी अपने आप ही सटीक रहता है. शिक्षा के दौरान व जीवन में इसका अभ्यास करने से छात्र धीरे-धीरे मन की स्पष्टता का विकास महसूस करेंगे और आतंरिक शक्ति का अहसास करेंगे. इस प्रकार निरन्तर अभ्यास करने से जब वह तैयार होंगे तो परम को साकार करने की दिशा में काम करेंगे.

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अनुवादक- अर्चना 

  नदी पार करते हुए गुरु और शिष्य 

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    एक बुज़ुर्ग गुरु और उनका युवा शिष्य हिमालय पर्वत में टहलते हुए अपने आश्रम लौट रहे थे. इलाका पहाड़ी होने के कारण आश्रम तक पहुँचने का रास्ता लम्बा था और सड़कें कठिन थीं. रास्ते में उन्हें गंगा नदी का एक हिस्सा पार करना था जहाँ पानी तेज़ लेकिन हिंसक रूप से नहीं  बह रहा था.    

   नदी के पास एक युवा कन्या बैठी हुई थी जिसका गाँव नदी के उस पार था. वह अपने आप नदी पार करने से डर रही थी अतः नदी को पार करने में मदद के लिए उसने गुरु को सम्पर्क किया.

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   “अवश्य” गुरु बोले और उसे अपनी बाहों में उठाकर सावधानीपूर्वक नदी के उस पास ले आए. समय पर मदद के लिए गुरु का धन्यवाद करने के बाद युवती अपने रास्ते चली गयी. उम्र में छोटा शिष्य गुरु के इस हाव-भाव से सहमत नहीं था और जल्द ही उसका चेहरा विषादग्रस्त हो गया.

 पहाड़ियों में लगभग दो घंटों की कठिन पैदल यात्रा के बाद वह आश्रम पहुँचे. यात्रा की थकान के बावजूद शिष्य अत्यंत व्याकुल था. शिष्य की परेशानी भांपते हुए गुरु ने उससे पूछा कि मामला क्या था.

 शिष्य शिकायत करते हुए बोला,”गुरूजी, हमने स्त्री को न छूने की शपथ ली है लेकिन आपने तो उसे बाहों में उठाया. आप हमें स्त्रियों के बारे में न सोचने को कहते हैं लेकिन आपने उसे छूआ.” 

   गुरु मुस्कुराते हुए बोले, “मैंने उसे नदी के उस पार ले जाकर छोड़ दिया परन्तु तुम अभी तक उसे उठाए हुए हो.”

    सारांश:

   गुरु द्वारा दिए गए किसी भी पाठ में हमें उसे विश्लेषण, भ्रमित या मन में गलत धारणा बनाने के बजाए उसमें निहित सन्देश को सीखना चाहिए.

   संसार में एक बाहरी दुनिया होती है और एक भीतरी. हम बाहरी दुनिया पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं परन्तु वास्तव में हमारे जीवन पर विचारों व भावनाओं की भीतरी दुनिया का प्रभाव मुख्य होता है. इसलिए आतंरिक दुनिया का बदलाव सबसे अधिक महत्वपूर्ण है . कोई बाहर से शांत होने का ढोंग कितना भी करे लेकिन जब मन अशांत होता है तो वह दुखी हो जाता है. हम दुनिया में नहीं बल्कि अपने मनस में जीते हैं और हमारा मनस अतीत में जीता है. अतः हमारा वर्तमान हमारे अतीत का विस्तारण मात्र है. ऐसा मनस कुछ भी नवीन या शाश्वत ब्रह्म को नहीं देख सकता है.

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  जो पहले से ही आध्यात्मिक पथ पर हैं; हमें यह अहसास होना चाहिए कि समय विचार की अभिव्यक्ति है और विचारों के बीच विचारहीनता है जो शाश्वतता है. विचारों के बीच जब हम उस अंतराल में प्रवेश करते हैं तब हम मनस से परे एक ऐसी अवस्था का अनुभव करते हैं जो हमें मुक्त कर सकती है. इसलिए अरे मूर्ख मन, गोविन्द की तलाश करो.

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अनुवादक- अर्चना 

        साधु और राजा 

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            एक असामान्य महात्मा किसी जंगल में एक पेड़ के नीचे साधु के रूप में रहते थे और सदा अपने साथ तीन पत्थर रखते थे. सोते समय एक पत्थर वह अपने सिर के नीचे रखते थे, दूसरा अपनी कमर के नीचे और तीसरा अपने पैरों के नीचे रखते थे और स्वयं को चादर से ढकते थे. जब बारिश होती थी तो उनका शरीर पत्थरों पर होने के कारण, बारिश का पानी उनके शरीर के नीचे से बह जाता था और जो पानी उनकी चादर पर गिरता था वह भी नीचे बह जाता था. इसलिए उनकी नींद में विघ्न नहीं पड़ता था और वह गहरी नींद सोते थे. बैठते समय तीनों पत्थरों को एक साथ चूल्हे की तरह रखकर वह उनपर आराम से बैठते थे. इस प्रकार साँप और अन्य कीड़े-मकोड़े उन्हें परेशान नहीं करते थे क्योंकि वह पत्थरों के नीचे से रेंगकर निकल जाते थे. कोई उनके लिए खाना लेकर आता था और वह भोजन  कर लिया करते थे.  इस प्रकार उन्हें किसी प्रकार की चिंता नहीं थी.      

       इस जंगल में एक राजा शिकार खेलने आया. साधु को देखकर राजा ने सोचा, “बेचारा साधु! अपने शरीर को उन पत्थरों पर व्यवस्थित करके सोने में उसे कितनी पीड़ा होती होगी? मैं इसे अपने साथ राजमहल लेकर जाऊँगा और १-२ दिन अपने साथ रखकर आराम करवाऊँगा.”

  ऐसा सोचकर राजा घर लौटा और अपने २ सैनिकों को एक पालकी और धारकों के साथ जंगल भेज दिया. सैनिकों को निर्देश था कि वह साधु को सम्मानपूर्वक आमंत्रित करके राजा के महल में लेकर आएं. राजा ने सैनिकों से कहा कि यदि वह साधु को लाने में असफल रहे तो उन्हें दंडित किया जाएगा. 

     जंगल में आकर सैनिकों ने साधु को देखा और उन्हें बताया कि राजा ने उन्हें महल में लाने का आदेश दिया है. सैनिकों ने साधु से आग्रह किया कि वह उनके साथ चलें. जब साधु ने उनके साथ चलने में अरुचि दिखाई तो सैनिक प्रार्थना करते हुए बोले कि यदि वह उनके बिना लौटेंगे तो उन्हें दंड दिया जाएगा. अतः सैनिकों ने साधु से निवेदन किया कि उन्हें परेशानी से बचाने के लिए वह उनके साथ चलें. साधु नहीं चाहते थे कि उनके कारण सैनिक किसी मुसीबत में पड़ें और वह उनके साथ चलने के लिए सहमत हो गए.        

     सामान के नाम पर साधु के पास सिर्फ एक लंगोट, एक चादर और तीन पत्थर थे. उन्होंने लंगोट को तह करके चादर में रखा और तीनों पत्थरों को भी चादर में रखकर सबको एक साथ बाँध दिया. 

      सैनिकों ने सोचा, “यह क्या? राजा के महल में जाने के लिए यह स्वामी अपने साथ इन पत्थरों को लेकर आ रहा है? यह पागल है क्या?”

      साधु अपनी गठरी के साथ पालकी में बैठे और राजमहल आ गए. 

      साधु के सामान की गठरी देखकर राजा ने सोचा कि उसमें उनका निजी सामान होगा. उचित सम्मान के साथ राजा साधु को राजमहल के भीतर ले गया और साधु को शानदार भोजन कराया. साधु के सोने के लिए रेशम के गद्दे और चारपाई की व्यवस्था की गई. विश्राम करने के समय साधु ने अपनी गठरी खोली, तीनों पत्थर निकालकर बिस्तर पर फैलाए और हमेशा की तरह चादर ओढ़कर सो गए.

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      अगली सुबह राजा साधु के कक्ष में आया, झुककर सादर प्रणाम किया और साधु से पूछा, “स्वामी, यहाँ आप आराम से तो हैं ना?”

      स्वामी: “हाँ! यहाँ क्या कमी हो सकती है? मैं सदैव खुश रहता हूँ.”

      राजा: “ऐसा नहीं है, स्वामी. जंगल में उन पत्थरों पर सोने के कारण आपको कष्ट हो रहा था. यहाँ यह घर और बिस्तर आपको ख़ुशी व आराम दे रहे होंगे. इसीलिए पूछ रहा हूँ.”

      स्वामी: “जो बिस्तर वहाँ था, वह यहाँ भी है. जो बिस्तर यहाँ है वह वहाँ पर भी है. अतः मैं हर जगह एक समान खुश रहता हूँ. मेरी नींद या ख़ुशी को लेकर कभी भी कोई कमी नहीं रहती है.”

       राजा बहुत हैरान था और उसने चारपाई की तरफ देखा. उसने देखा कि रेशम के कोमल बिस्तर पर तीन पत्थर थे. राजा ने तुरंत साधु को साष्टांग प्रणाम किया और बोला, “हे महापुरुष! मैं आपकी महानता से अनजान था और इस कारण आपको खुश करने के इरादे से यहाँ ले आया था.  मुझे पता नहीं था कि आप हमेशा ख़ुशी की स्थिति में रहते हैं और इस कारण मैंने ऐसा मूर्खतापूर्ण व्यवहार किया. कृपया मुझे क्षमा करके आशीर्वाद दीजिए.”

      इस प्रकार अपनी गलती की क्षतिपूर्ति करने के बाद राजा ने साधु को अपने रास्ते जाने की अनुमति दी. यह साधु की कहानी है.

      “तो महात्माओं की नज़र में स्वाधीन जीवन ही वास्तविक सुखी जीवन है? ” उस भक्त ने पूछा.

      “और क्या? इस तरह की बड़ी इमारतों में ज़िन्दगी कारागार के जीवन की तरह होती है. अंतर इतना है कि मैं एक “ए” श्रेणी का कैदी हो सकता हूँ. जब मैं इस तरह के गद्दों पर बैठता हूँ, मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं नागफनी पर बैठा हुआ हूँ. शांति और आराम कहाँ है?” भगवान् बोले.    

      सारांश :

   मनुष्य संसार के कारण नहीं बल्कि समाज से अपनी अपेक्षाओं के कारण कष्ट भोगता है. हमारा मन पसंद व नापसंद से भरा रहता है और यदि हम संसार को उसके अनुरूप नहीं पाते हैं तो हम निराश हो जाते हैं. हम अपने दुःख के लिए संसार को दोषी ठहराते हैं. हम समझे बिना ही संसार का त्याग कर देते हैं और यह भूल जाते हैं कि परित्याग आंतरिक है. हमें संसार के बजाय मनस का त्याग करना चाहिए, जो दुःख से पूरित है. सादगी बाहरी नहीं बल्कि भीतरी होती है. यदि हम भीतर से सरल होंगे तो हम कहीं भी खुश रहेंगे. ऐसे मनुष्य को संसार त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं है. वह सदैव खुश रहता है क्योंकि यह ख़ुशी भीतर से आती है. ऐसा व्यक्ति संसार में रहता अवश्य है पर उससे जुड़ता नहीं है. 

    हममें से अधिकांश के लिए; यह हमारा अहंकार है जो हमारे रास्ते में आता है. यद्यपि हम बाहर से त्यागने की कोशिश करते हैं; हमारे भीतर का अहंकार कायम रहता है. संसार में बहुत ज़्यादा उलझने से हम संसार से जुड़ जाते हैं और फिर स्वयं को मुक्त करना आसान नहीं होता है. बाहरी बदलावों का प्रयास करने के बावजूद, भीतर से उस ‘वैराग्य’ को विकसित करना चुनौतीपूर्ण होता है. विवेक (वास्तविक व काल्पनिक में भेदभाव करने की क्षमता) से उत्पन्न वैराग्य निर्लिप्तता है. स्वयं को जानने के लिए निरंतर आध्यात्मिक अभ्यास ही हमें अनासक्त बनाता है. अतः स्वामी हमें पुनः याद दिलाते है कि अपने चंचल व मूर्ख मनस को अपने भीतर न कि बाहर की ओर अग्रसर करो.

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source: http://www.saibalsanskaarhindi.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना              

             

  अपने उपदेश का पालन करना 

                   

          आदर्श: सत्य 

     उप आदर्श:  शब्दों, विचारों व कर्मों की एकता 

      संत हमें केवल वही सिखाते हैं जिसका उन्होंने स्वयं अभ्यास किया होता है. इसीलिए उनकी सलाह में हमारा भला करने की ताकत होती है. 

      महान गुरु रामकृष्ण परमहंस के अनुयायियों में एक गरीब महिला थी. एक दिन वह अपने बेटे के साथ गुरूजी के पास आई और बोली, “गुरुदेव, मेरा बेटा हर रोज़ मिठाई खाना चाहता है. यह आदत उसके दांत खराब कर रही है और मैं आर्थिक रूप से हर रोज़ मिठाई खरीदने में असमर्थ हूँ.  मेरी सलाह, चेतावनी और यहाँ तक कि पिटाई सब व्यर्थ रहे हैं. कृपया उसे हिदायत देकर आशीर्वाद दीजिए कि वह इस बुरी आदत को ख़त्म कर सके.

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    श्री रामकृष्ण ने लड़के को देखा लेकिन उससे बात करने के बजाए, महिला से कहा कि वह उसे दो सप्ताह के बाद वापस लेकर आए. 

   दो सप्ताह के बाद, महिला लड़के को पुनः उनके पास लेकर आई. जैसे दोनों बैठे, श्री रामकृष्ण कृपापूर्वक लड़के को देखकर बोले, “मेरे प्रिय पुत्र, क्या यह सच है कि तुम हर रोज़ अपनी माँ को मिठाई के लिए परेशान करते हो?”

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   लड़के ने सिर झुकाकर कहा, “जी, गुरूजी, ” और चुप हो गया. 

   “तुम एक बुद्धिमान लड़के हो. तुम्हें पता है कि वह मिठाइयाँ तुम्हारे दाँतों को खराब कर रहीं है. तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए चिंतित है. अगर वह हर रोज़ मिठाई पर पैसे खर्च करती है तो वह तुम्हारे लिए नई किताबें और नए कपड़ें कैसे खरीदेगी? तुम्हें नहीं लगता कि तुम गलती कर रहे हो? “           

   श्री रामकृष्ण के शब्दों ने लड़के के दिल को छू लिया. उसने श्री रामकृष्ण को देखा और बोला, “जी, महाशय” और पुनः चुप हो गया. 

    “फिर तुम आज से मिठाई माँगना बंद कर दोगे?” श्री रामकृष्ण ने प्रभावशाली स्वर में पूछा.

     इस बार लड़का मुस्कुराया और बोला, “जी महाशय, मैं आज से माँ को मिठाई के लिए परेशान करना बंद कर दूँगा और मिठाई हर रोज़ नहीं खाऊँगा.”

     लड़के के उत्तर से प्रसन्न होकर श्री रामकृष्ण सप्रेम उसे अपने पास लाए और बोले, “मेरे बच्चे, तुम एक अच्छे लड़के हो. तुम समझते हो कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है. तुम यक़ीनन बड़े होकर एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति बनोगे.”

     लड़के ने झुककर श्री रामकृष्ण को प्रणाम किया और उसे आशीर्वाद देकर, गुरूजी अन्य भक्तों की ओर चले गए. 

  लड़के के बाहर बगीचे में जाने के बाद उसकी कृतज्ञ माँ ने श्री रामकृष्ण से पूछा, “गुरुदेव, सलाह के यह कुछ शब्द देने के लिए आपने हमें दो हफ्ते इंतज़ार क्यों करवाया?”

   श्री रामकृष्ण मुस्कुराये और बोले, “देखो, आप जब दो हफ्ते पहले आईं थी तब मुझे भी भक्तों द्वारा लाई मिठाई खाने की आदत थी. मैं आपके बेटे को कुछ ऐसा न करने के लिए कैसे कह सकता था जो मैं स्वयं लगभग हर रोज़ कर रहा था? ”

    इसलिए उस दिन से मैंने मिठाई खानी बंद कर दी. इससे मुझे काफ़ी शक्ति और ताकत मिली और मैं आपके पुत्र को वह करने का उपदेश दे पाया जो मैंने स्वयं किया था. 

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    हम जो उपदेश देते हैं, उसका पालन करने पर ही हमारे शब्द ईमानदारी से परिपूर्ण होते हैं और श्रोताओं को प्रभावित करते हैं. 

    कमरे में उपस्थित सभी भक्तों ने महसूस किया कि उन्होंने भी श्री रामकृष्ण से एक महान सबक सीखा था.   

      सीख:

    जैसा कि यह कहानी दर्शाती है, दूसरों को अच्छा बनाने या एक आध्यात्मिक अभ्यास कराने का सबसे प्रभावकारी तरीका स्वयं अभ्यास करके बताना है. दूसरों को उपदेश देने से पहले हममें दृढ़ विश्वास होना चाहिए और सही मूल्यों को व्यवहार में लाना चाहिए.

    विचार, शब्द और कर्म की एकता बहुत आवश्यक है. युवावस्था से ही इन विशेषताओं का विकास करना चाहिए. माता-पिता व शिक्षकों को उदाहरण बनकर नेतृत्व करना चाहिए. जब विचारों, शब्दों और कार्यों में सामंजस्य होता है तब कोई भ्रम या दिखावा नहीं होता है. अपने सही अस्तित्व से हटकर बनावटी व दोहरी ज़िन्दगी जीना आसान नहीं होता है. यद्यपि आरम्भ में ऐसे लोगों की मीठी बात सुनकर लोग बहल जाते हैं परन्तु दीर्घावधि में ऐसे लोगों को दूसरों का भरोसा व सम्मान नहीं मिलता है. इसके अलावा  ऐसे लोग स्वयं भी भीतर से शांत नहीं होते हैं क्योंकि वह भी दिव्य स्वरुप हैं और यह उन्हें सदा याद दिलाता है कि उनका कार्य उनके विचारों और शब्दों के अनुरूप नहीं है.            

     source: saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना