अपने मालिक के प्रति प्रेम

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श : श्रद्धा, सम्मान

हज़रत अमीर खुसरो के बारे में एक अनोखी कहानी विख्यात है जो अपने पीर के प्रति उनकी असीम श्रद्धा व प्रेम को स्पष्ट करती है.

हज़रत निज़ामुद्दीन की उदारता के बारे में सुनकर एक बार भारत के दूर-दराज़ इलाके से एक गरीब व्यक्ति उनसे मिलने दिल्ली आया. वह व्यक्ति अपनी आर्थिक समस्याओं के समाधान में उनकी सहायता चाहता था. संयोग से उस दिन उनके पास देने के लिए उनके पुराने जूतों के सिवाय और कुछ नहीं था. यद्यपि गरीब व्यक्ति बहुत निराश हुआ पर फिर भी पीर का शुक्रिया अदा कर के वह वहाँ से चला गया.

वापस लौटते समय रात बिताने के लिए उसने एक सराय में आश्रय लिया. संयोगवश उसी रात हज़रत अमीर खुसरो, जो बंगाल से व्यापारिक यात्रा से लौट रहा था, भी उसी सराय में ठहरा. हज़रत अमीर खुसरो उस समय हीरे-जवाहरात में व्यापार करता था और दिल्ली का सबसे अधिक अमीर नागरिक माना जाता था. अगली सुबह जब हज़रत अमीर खुसरो उठा तब उसने . टिप्पणी की: यहाँ मुझे अपने पीर की खुशबू आ रही है.”

खुशबू का स्त्रोत ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह उस व्यक्ति तक पहुँचा और उससे पूछा यदि वह दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से मिला था. उसने हाँ में जवाब देते हुए हज़रत अमीर खुसरो को हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से अपनी मुलाक़ात की सारी कहानी सुनाई. फिर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया द्वारा दिए जूतों को दिखाकर उसने शोक प्रकट किया कि वह कितने पुराने और मूल्यहीन थे.

हज़रत अमीर खुसरो ने तुरंत अपनी सारी दौलत के बदले में उस व्यक्ति से अपने पीर के जूते माँगे. अपनी इस आकस्मिक खुशकिस्मती पर वह व्यक्ति अत्यधिक खुश हुआ. उसने हज़रत अमीर खुसरो को जूते दिए, उसका बार-बार शुक्रिया अदा किया और आनंदित होकर घर लौट गया. अमीर खुसरो आखिरकार अपने गुरु के पास पहुँचा और जूते उनके चरणों में रख दिए. जब उसने पीर को बताया कि उन जूतों के बदले में उसने अपनी समस्त दौलत प्रतिदान की है तब हज़रत निज़ामुद्दीन बोले, “खुसरो, तुम तो इन्हें बहुत सस्ते में ले आए.”

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सीख:
एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति प्रेम का यह एक अति उत्तम उदाहरण है. शिष्य के लिए उसके गुरु की पादुका सबसे अधिक पूजनीय होती है. यह हमें अपने अहम् पर पकड़ ढीली कर के आत्मसमर्पण करना सिखाती हैं.

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अनुवादक- अर्चना

प्रेम क्या होता है

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     आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : निस्स्वार्थ सेवा/ प्रतिबद्धता

सुबह के ८:३० बजे थे और हर तरफ चहल-पहल थी. सभी कर्मचारी अपने अपने काम में व्यस्त थे. एक वयोवृद्ध सज्जन, जिनकी उम्र ८० साल के लगभग थी, अपने अंगूठे के टांके कटवाने आए. उन्होंने निवेदन किया कि वह जल्दी में थे क्योंकि ९ बजे उन्हें किसी से मिलने जाना था. मैंने उनके प्राणाधार आंकड़े लिए और उन्हें बैठाया क्योंकि मुझे मालूम था कि उन्हें कम से कम एक घंटा इंतज़ार करना पड़ेगा.old3 जब मैंने उन्हें अपनी घड़ी की ओर बार-बार देखते हुए देखा तो मैंने निश्चय किया कि मैं स्वयं ही उनके ज़ख़्म का निरीक्षण करूँगा. वैसे भी मैं किसी मरीज़ के साथ व्यस्त नहीं था. निरीक्षण करने पर मैंने पाया कि उनका घाव भर चुका था. मैंने एक अन्य डॉक्टर से बात की और उनके टांके खोलने के लिए आवश्यक सामान लेकर आया. टांके खोलने के बाद मैंने दुबारा से उनके घाव पर पट्टी बाँध दी. इस दौरान मैं उनसे बातचीत करने लगा. मैंने उनसे पूछा उनके इतनी जल्दबाज़ी में होने का कारण क्या एक अन्य डॉक्टर से मिलने जाना था. उन्होंने कहा नहीं- उन्हें नर्सिंग होम जाकर अपनी पत्नी के साथ सुबह का नाश्ता करना था. उनकी पत्नी के स्वास्थ्य के बारे में पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि उनकी पत्नी काफ़ी समय से नर्सिंग होम में थी और मानसिक रोग से पीड़ित थी. कुछ समय बाद जब मैंने उनकी मरहम-पट्टी पूरी तरह से कर दी तब मैंने उनसे पूछा कि क्या थोड़ी देर से पहुँचने पर उनकी पत्नी चिंतित होगी. उन्होंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया कि अब उनकी पत्नी को पता नहीं था कि वह कौन हैं. पिछले पाँच सालों से वह उन्हें पहचानती नहीं थी. मैं आश्चर्यचकित था और मैंने उनसे पूछा, “वह आपको पहचानती भी नहीं है और आप फिर भी हर सुबह उनके पास जातें हैं?” सज्जन पुरुष मुस्कुराए और मेरा हाथ को थपथपाते हुए बोले, “वह मुझे नहीं जानती है पर मुझे अभी भी पता है कि वह कौन है.”

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सीख:

सच्चा प्रेम बिना किसी अपेक्षा का होता है. ऐसे व्यक्ति केवल इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि वे प्रेम करना चाहते हैं और बदले में कोई उम्मीद नहीं रखते हैं- ना किसी सराहना की, ना आभार की और ना ही सम्मान की. धन्य हैं ऐसे लोग जो कहानी के वृद्ध पुरुष के समान प्रेम व सेवा कर सकते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

प्रतिक्रिया या अनुक्रिया

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: आत्म विश्लेषण, परिस्थिति संभालना

अचानक एक तिलचट्टा कहीं से उड़ कर आया और एक महिला पर बैठ गया. मुझे आश्चर्य हुआ यदि ऐसा तिलचट्टों की परिचर्चा के फलस्वरूप हुआ था. वह महिला भयभीत होकर चिल्लाने लगी. घबराया हुआ चेहरा और काँपती हुई आवाज़ में चिल्लाती हुई, वह कूदने लगी और अपने दोनों हाथों से तिलचट्टे को स्वयं पर से हटाने की उग्र कोशिश करने लगी.panic4 महिला की प्रतिक्रिया से उसके समूह के अन्य सभी सदस्य भी व्याकुल और विक्षुब्ध हो गए. तिलचट्टे को स्वयं पर से हटाने की लगातार कोशिश के कारण अब वह तिलचट्टा एक दूसरी महिला पर जा बैठा. तिलचट्टे को स्वयं पर बैठा पाते ही दूसरी महिला ने सारा नाटक दोहराया और समस्त समूह में कोलाहल व अस्तव्यस्थता फैल गई. महिलओं की दशा देखकर रेस्टोरेंट का बैरा झटपट उनके बचाव के लिए आगे आया. तिलचट्टे से छुटकारा पाने की हड़बड़ी में अब वह तिलचट्टा बैरे पर जा गिरा. बैरा शांतचित्त व स्थिर खड़ा रहा और अपनी कमीज पर तिलचट्टे का व्यवहार गौर से देखने लगा. आश्वस्त और निश्चित होने पर उसने तिलचट्टे को पकड़ा और बाहर फेंक दिया.

कॉफ़ी का घूंट लेते हुए और सारा तमाशा देखते हुए मैं मन ही मन सोचने लगी कि क्या महिलाओं के नाटकीय व्यवहार के लिए वह तिलचट्टा जिम्मेवार था. और यदि ऐसा था तो वह बैरा क्यों नहीं व्याकुल हुआ? उसने तो सारे बवाल को बहुत ही निपुणता से संभाला.

वास्तव में सारी खलबली का कारण तिलचट्टा था ही नहीं. महिलाओं के समूह में अशांति की वजह तिलचट्टे द्वारा उत्पन्न बवाल को संभालने की उनकी अक्षमता थी.

इस घटना से मुझे भी यह अहसास हुआ कि मेरे परेशान होने की वजह मेरे पिता या मेरे प्रबंधकर्ता द्वारा मुझ पर चिल्लाना नहीं था. वास्तव में उनके चिल्लाने से उत्पन्न अशांति को संभालने की मेरी अक्षमता मुझे उत्तेजित करती है.

वास्तव में सड़कों पर यातायात जाम मुझे परेशान नहीं करता है बल्कि यातायात जाम से उत्पन्न अशांन्ति को संभालने की मेरी अक्षमता मुझे व्याकुल करती है.

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समस्या से अधिक उसके प्रति मेरी प्रतिक्रिया मुझे कष्ट देती है.

सीख:
इस घटना से मुझे समझ में आया कि जीवन में मुझे विरूद्ध प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए. मुझे सदा अनुकूल रहना चाहिए.
महिलाओं ने प्रतिक्रिया उत्पन्न की जबकि बैरा परिस्थिति के अनुकूल रहा.
प्रतिक्रिया सदा स्वाभाविक होती है जबकि अनुक्रिया सदा बौद्धिक….

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अनुवादक- अर्चना

दीवार के दूसरी तरफ

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: ध्यान रखना, लगातार कोशिश

एक युवा महिला थी जिसे अपने फूलों के बगीचे की देखरेख व उगाई पर बहुत गर्व था. इस महिला का लालन-पालन उसकी दादी ने किया था और उन्होंने ठीक अपनी ही तरह उसे भी पौधों की देखरेख व उनसे प्रेम करना सिखाया था.

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इस कारण उसकी दादी की ही तरह उसका बगीचा भी अत्यंत उत्कृष्ट था. एक दिन जब वह महिला अपने फूलों की तालिका को उलट-पुलट रही थी तब उसकी नज़र एक पौधे की तस्वीर पर पड़ी.

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उसने ऐसे खूबसूरत फूल पहले कभी नहीं देखे थे. उसने मन ही मन सोचा, “ऐसे फूल मेरे पास होने ही चाहिए ” और उसने तुरंत वह पौधा मंगवा लिया.

पौधे के आने से पहले ही उसने बगीचे में उसके लिए स्थान तैयार रखा हुआ था. पौधा आने पर उसने उसे अपने घर के आँगन के पीछे पत्थर की दीवार के तले लगा दिया. देखते ही देखते वह पौधा बहुत ही खूबसूरती से पनपने लगा और आकर्षक हरी पत्तियों से भर गया. पर उसमें एक भी फूल नहीं खिला. वह महिला पूरे मन व मेहनत से पौधे को नियमित रूप से पानी व खाद देती रही. यहाँ तक कि पौधे को खिलने के लिए उससे मीठी बातें भी करती थी. परंतु कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

कुछ हफ़्तों बाद एक सुबह वह फूलों की बेल के पास खड़ी होकर सोच रही थी कि उस हरी-भरी बेल में फूल न खिलने से वह कितनी निराश थी. वह इस बात पर गंभीरता से विचार कर रही थी यदि उसे उस पौधे को काटकर कोई अन्य पौधा लगाना चाहिए. तभी उसकी अपाहिज पड़ोसी, जिसके घर से वह पत्थर की दीवार सांझी थी, का फ़ोन आया. ph5
“तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद. तुम सोच भी नहीं सकती कि मैंने तुम्हारी लगाई बेल के मनमोहक फूलों का कितना आनंद उठाया है.”

पड़ोसी की बात सुनकर महिला झटपट पड़ोसी के आँगन में गई और उसने बेल अति सुन्दर फूलों से भरी पाई. ऐसे आकर्षक फूल उसने पहले कभी नहीं देखे थे. महिला द्वारा लगाया हुआ पौधा धीरे-धीरे पड़ोसी के बाड़े की तरफ फैल गया था और किसी कारण से पड़ोसी की तरफ की बेल अत्यंत ख़ूबसूरत फूलों से लदी हुई थी. सिर्फ इसलिए कि हम अपनी मेहनत का परिणाम देख नहीं सकते हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हमारा परिश्रम सफल नहीं हुआ.

सीख:
कठिन परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता है. यह आवश्यक नहीं है कि अच्छा कार्य हमेशा प्रत्यक्ष हो पर किसी न किसी रूप में उसका सकारात्मक प्रभाव ज़रूर पड़ता है. हमारा अच्छा कार्य किसी और के जीवन में अंतर ला सकता है. हमें पूरे विश्वास के साथ लगातार प्रयास करते रहना चाहिए, परिणाम अवश्य प्रत्यक्ष होगा.

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अनुवादक- अर्चना

अधिक उदार कौन है

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     आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: उदारता

एक बार कृष्ण और अर्जुन एक गाँव की ओर जा रहे थे. अर्जुन कृष्ण से बार-बार एक ही प्रश्न कर रहा था कि दान-दक्षिणा के संदर्भ में उसकी अपेक्षा कर्ण को अनुकरणीय व्यक्ति क्यों समझा जाता है. अर्जुन को सीख सिखाने के उद्देश्य से कृष्ण ने अपने हाथ की अंगुलियाँ तोड़ दीं और उनके ऐसा करते ही उनके मार्ग के आस-पास के दो पहाड़ सोने में परिवर्तित हो गए.

karn4फिर कृष्ण बोले, “अर्जुन, यह दोनों सोने के पहाड़ सभी ग्रामवासियों में बाँट दो. इस बात का ध्यान रखना कि तुम इन दोनों पहाड़ों का समस्त सोना दानस्वरूप दो.’

कृष्ण के आदेशानुसार अर्जुन गाँव में गया और उसने घोषणा की वह प्रत्येक ग्रामवासी को सोना दान में देगा. अर्जुन ने सभी ग्रामवासियों को एक पहाड़ के पास एकत्रित होने को कहा. सभी ग्रामवासी अत्यंत प्रसन्न होकर अर्जुन की प्रशंसा करने लगे और अर्जुन छाती तानकर अभिमान से पहाड़ की ओर बढ़ा. दो दिन और दो रातों तक लगातार पहाड़ खोदकर वह सोना निकाल-निकालकर ग्रामवासियों को दान देता रहा. परंतु फिर भी पहाड़ वैसे के वैसे ही थे और उनका सोना ज़रा भी काम नहीं हुआ. बहुत सारे ग्रामवासी झटपट वापस आकर दुबारा कतार में खड़े हो रहे थे. कुछ समय बाद अर्जुन को थकान व कमज़ोरी महसूस होने लगी. पर फिर भी वह अपना अभिमान छोड़ने को तैयार नहीं था और उसने कृष्ण से कहा कि कुछ देर आराम करने के बाद वह वापस काम पर लग जाएगा.

इस दौरान कृष्ण ने कर्ण को बुलाया. उन्होंने कर्ण से कहा, “कर्ण, तुम्हें इन दोनों पहाड़ों का एक-एक अंश दान देना है.” कर्ण ने तुरंत दो गाँववालों को बुलाया और उनसे बोला, “तुम वह दो पहाड़ देख रहे हो? वह दोनों सोने के पहाड़ तुम सभी ग्रामवासियों के लिए हैं. तुम उन्हें जिस प्रकार चाहो उस प्रकार इस्तेमाल कर सकते हो.” ऐसा कहकर कर्ण वहाँ से चला गया.

 

कर्ण को देखकर अर्जुन अवाक था. उसे आश्चर्य हुआ कि ऐसा विचार उसके मन में क्यों नहीं आया.

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अर्जुन की ओर देखकर कृष्ण शरारती ढंग से मुस्कुराए और बोले, “अर्जुन, अवचेतन रूप से तुम स्वयं भी सोने की ओर आकृष्ट थे. तुमने दुखी मन से हर ग्रामवासी को दान दिया और उतना ही दिया जितना तुम्हारे हिसाब से प्रचुर था.karn6 इसलिए तुम्हारे दान का माप केवल तुम्हारी कल्पना पर आधारित था. लेकिन कर्ण के साथ ऐसा नहीं था. इतना सब दान करने के बाद भी वह असम्बद्ध रहा और उसने लोगों से अपनी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं की. उसे कोई परवाह नहीं थी कि लोग उसकी पीठ पीछे उसके लिए अच्छा बोल रहें हैं या बुरा. ज्ञानोदय के पथ पर चल रहे व्यक्ति का यही प्रतीक होता है.

सीख:

सही मायने में देना या प्रेम करना वह है जो बिना किसी शर्त के किया जाए. हमें सदा सही कार्य करना चाहिए क्योंकि हमें शुरू से यही सीख दी गई है. किसी नाम, सत्कार या प्रशंसा की परवाह किए बिना सही कार्य करना ही मनुष्य की विशिष्टता है.

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अनुवादक- अर्चना

जब आंधी चलती है

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आदर्श: शान्ति
उप आदर्श: विश्वास

बहुत साल पहले अटलांटिक महासागर के तट पर एक किसान की ज़मीन थी. किसान को अपनी ज़मीन पर खेती-बाड़ी करने के लिए एक मज़दूर की ज़रुरत थी और इस कारण वह निरंतर विज्ञापन देता रहता था.storm2 परंतु उसके खेत अटलांटिक महासागर के तट पर होने के कारण कोई भी काम करने को तैयार नहीं होता था. सभी भयानक तूफानों से डरते थे जो अटलांटिक महासागर में प्रबल थे और इमारतों व फसलों को तहस-नहस कर देते थे.

जब किसान ने आवेदकों से नौकरी के लिए बातचीत करनी शुरू की तब उसे एक के बाद एक मायूसी का ही सामना करना पड़ा. अंततः एक नाटा, दुबला और मध्य आयु का व्यक्ति किसान के पास आया. किसान ने उससे पूछा, “क्या तुम एक अच्छे मजदूर हो?”

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उस मजदूर ने सबेरे से रात तक एक जुट होकर खेत पर कठिन मेहनत से काम किया और किसान उसके काम से बहुत खुश भी था. फिर एक रात समुद्र में ज़ोर से सांय-सांय करती हुई तेज़ हवा चलने लगी. हड़बड़ाकर किसान अपने बिस्तरे से निकला, झटपट लालटेन पकड़ी और मजदूर के निवास की ओर तेज़ी से दौड़ा. किसान ने मजदूर को झकझोर और चिल्लाकर बोला, “उठो! तूफ़ान आने वाला है. सारा सामान बाँधकर ठीक से रखो वरना सब कुछ उड़ जाएगा.”

मजदूर बिस्तर पर लेटा रहा और स्थिर व विश्वस्त आवाज़ में बोला, “नहीं साहब! मैंने आपसे से कहा था कि आंधी आने पर मैं सो सकता हूँ.”

मजदूर का जवाब सुनकर किसान को बहुत गुस्सा आया और उसकी बहुत इच्छा हुई कि मजदूर को नौकरी से निकाल दे. परंतु आने वाले तूफ़ान के बारे में सोचकर वह पहले उसकी तैयारी करने के लिए झटपट खेत की ओर भागा. खेत पहुँचकर किसान अचंभित था क्योंकि उसने देखा कि घास का सारा ढेर तिरपाल से भली भाँती ढका हुआ था. गायें बाड़े में थीं, मुर्गियों के बच्चे पिंजरों में थे और सारे दरवाज़े बंद थे. सारे किवाड़ कसकर बाँधे हुए थे.

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सभी कुछ इतनी अच्छी तरह से व्यवस्थित था कि किसी भी प्रकार की हानि की कोई गुंजाइश नहीं थी. तब किसान को अपने मजदूर की बात समझ में आई और वह भी आराम से सोने चला गया.

सीख:

जब हम आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होते हैं तब हमें किसी प्रकार का डर नहीं होता है. हमारी ज़िन्दगी में तूफ़ान आने पर क्या हम भी सो सकते हैं? हमारी मानसिक ताकत व सही रवैये की बुनियाद हमारा विश्वास है.

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अनुवादक- अर्चना

क्षमा करना अच्छा है

 

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: क्षमा

रमेश ने बहुत ही बड़ा और उत्कृष्ट घर खरीदा. घर के चारों ओर एक विशाल बगीचा था जिसमें कई तरह के फलों के वृक्ष थे. रमेश के घर के पास एक पुराने से घर में एक ईर्ष्यालु व्यक्ति रहता था जो सदा रमेश को तंग करने की योजना तैयार करता रहता था. कभी वह दरवाज़े के नीचे से कूड़ा करकट फेंकता था तो कभी कोई अन्य गन्दी हरकत करता था.

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एक दिन सुबह उठकर जब रमेश अपने घर के बरामदे में गया तब उसे वहाँ गंदे, मैले और बदबूदार पानी से भरी एक बाल्टी मिली.

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रमेश ने बाल्टी उठाई, उसका गन्दा पानी फेंककर बाल्टी को साफ़ किया, उसमें सबसे बड़े स्वादिष्ट व पके हुए सेब भरे और बाल्टी लेकर उस ईर्ष्यालु व्यक्ति के घर गया.

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दरवाज़े पर दस्तक सुनकर ईर्ष्यालु व्यक्ति मन ही मन मुस्कुराया और बोला, “आहा! अब मज़ा आएगा!” अपवाद और झगड़े की उम्मीद में जब उसने दरवाज़ा खोला तब सेब से भरी बाल्टी हाथ में लिए रमेश बोला, “जो अमीर होता है वह ही दूसरों में बाँटता है.”

सीख:

हमें अपना सही आचरण व आदर्श बदलने नहीं चाहिए. हमारे आदर्श ही हमें दूसरों से अलग व बेहतर बनाते हैं. हमें चोट पहुँचाने वालों को भी क्षमा करके यदि हम उनके साथ प्रेम बांटेंगें तो हमें दूसरों से और अधिक प्रेम मिलेगा.

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अनुवादक- अर्चना