Tag Archive | Moral value stories in hindi

गाय और सूअर

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: सामयिक मदद

एक बार एक बहुत धनी पर अति कंजूस व्यक्ति था. उसकी कंजूसी के कारण गाँव वाले उसे बेहद नापसंद करते थे.

गाँव वालों के रवैये से उदास होकर, एक दिन उसने उनसे कहा, “तुम मुझसे ईर्ष्या करते हो और पैसे के लिए मेरे प्रेम को नहीं समझते- केवल ईश्वर ही जानते हैं. पर मैं इतना जानता हूँ कि तुम मुझे नापसंद करते हो. जब मैं मर जाऊँगा, मैं अपने साथ कुछ नहीं लेकर जाऊँगा. मैं सब दूसरों के लिए छोड़ दूँगा. मैं एक वसीयतनामा बनाऊँगा और सब कुछ दान में दे दूँगा. तब तुम सब खुश हो जाओगे.”

उसपर भी लोगों ने उसका मज़ाक उड़ाया और उसपर हँसे. अमीर आदमी ने उनसे कहा, ” क्या बात है? मेरा धन दान में जाते हुए देखने के लिए क्या तुम कुछ वर्ष इंतज़ार नहीं कर सकते?”

गाँव वालों को उसपर विश्वास नहीं हुआ. उसने आगे बोला, “तुम्हें लगता है कि मैं अविनाशी हूँ? अन्य सभी लोगों के समान मेरी भी मृत्यु होगी और तब मेरा धन, दान में जाएगा.”

वह गाँव वालों के दृष्टिकोण पर हैरान था.

एक दिन वह घूमने निकला. अचानक मूसलाधार बारिश शुरू होने के कारण उसने एक विशाल वृक्ष के नीचे पनाह ले ली. वहाँ एक गाय और सूअर भी थे. गाय और सूअर में बातचीत शुरू हो गयी और उसने उनकी बातें सुनीं.

सूअर ने गाय से पूछा, “ऐसा क्यों है कि सभी तुम्हारी सराहना करते हैं पर मेरी प्रशंसा कोई भी नहीं करता? मरने के बाद मैं लोगों को मांस और कबाब देता हूँ. लोग मेरे बाल भी इस्तेमाल कर सकते हैं. मैं लोगों को तीन-चार चीज़ें देता हूँ जबकि तुम केवल एक चीज़ देती हो- दूध.cow1 हर समय लोग तुम्हारी ही प्रशंसा क्यों करते हैं पर मेरी नहीं?”

गाय ने उत्तर दिया, “देखो, मैं जीवित रहते हुए दूध देती हूँ. लोग देखते हैं कि मेरे पास जो भी है मैं उसमें उदार हूँ. पर तुम अपने जीवनकाल में लोगों को कुछ नहीं देते. तुम अपनी मृत्यु के बाद ही उन्हें मांस इत्यादि देते हो. लोग भविष्य में विश्वास नहीं करते हैं ; वे वर्त्तमान में विश्वास रखतें हैं. अगर तुम जीवित रहते हुए दोगे तो लोग तुम्हें भी सराहेंगे. यह साधारण सी बात है.”

उस पल से वह अमीर व्यक्ति दानशील बन गया और अपने गाँव के गरीब व ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करने लगा करने लगा.

        सीख:

समय पर की गई छोटी सी मदद भी, अनावश्यक या व्यर्थ में की गई सहायता से बेहतर है. सामयिक सहायता किसी ज़रूरतमंद की ज़िन्दगी में सचमुच अंतर ला सकती है.

Courtesy- http://timyrna.com/tpedrosa/lessonfromcowandpig.htm

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Tanslation- Archana

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मेरा हाथ पकड़ो

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: विश्वास, भरोसा

एक बार एक छोटी सी लड़की अपने पिता के साथ पुल पार कर रही थी. पिता कुछ डरे हुए थे कि उनकी बेटी कहीं गिर न जाए. अतः उन्होंने अपनी नन्ही बेटी से कहा, “बेटी, तुम मेरा हाथ पकड़ लो. वरना तुम नदी में गिर सकती हो.” hold hand2

छोटी लड़की ने कहा, “नहीं पिताजी. आप मेरा हाथ पकड़िए.”

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हैरान पिता ने पूछा, “दोनों में क्या अंतर है?”

“बहुत अंतर है,” नन्ही बालिका ने उत्तर दिया.

“अगर मैं आपका हाथ पकड़ूंगी और मुझे कुछ हो गया तो संभवतः मैं आपका हाथ छोड़ दूँगी. पर अगर आप मेरा हाथ पकड़ेंगें तो मुझे निश्चित रूप से मालूम है कि चाहे कुछ भी हो, आप मेरा हाथ कभी नहीं छोड़ेंगें.”

 सीख:

अगर हम ईश्वर को छोड़ना भी चाहे तो भी परम दयालु ईश्वर हमें कभी नहीं छोड़ेंगें.  उन्हें प्रेम व श्रद्धा से बाँधकर, कसकर पकड़कर रखो.
Courtesy:http://www.islamicthinking.info/post/6530586668/father-and-daughter

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अर्चना द्वारा अनुवादित

पशुओं के प्रति प्रेम

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 आदर्श: प्रेम

१४ नवंबर, २०१२ को हम जब अपनी साईं प्रार्थना तथा नैतिक आदर्शों की कक्षा से घर लौट रहे थे, हमें रास्ते में ‘म्याऊ’ की आवाज़ सुनाई दी. हम छान-बीन करने गए कि आवाज़ कहाँ से आ रही थी . तब हमने देखा कि एक बिल्ली पिंजरे में फसी हुई थी. हमने बिल्ली को संघर्ष करते हुए देखा. अतः हम बिल्ली को विपदा से बाहर निकालने में उसकी मदद करना चाहते थे. हमें शीघ्र ही अहसास हो गया कि किसी ने बिल्ली के लिए पिजरा रखा था. ये जाल हमारे बल्डिंग के चौकीदारों ने छोड़े थे चूँकि वे बिल्लियों को कंटक समझते थे. परन्तु हम बिल्लियों से प्यार करते थे और हमने उसे आज़ाद करने का निश्चय किया. हमें पिंजरा खोलना नहीं आता था. जल्द ही वहाँ से एक उदार सहायक गुजरी. हमने उन्हें पिंजरा खोलने में हमारी मदद करके, बिल्ली को आज़ाद करने का आग्रह किया. हमने उनके साथ मिलकर बिल्ली को मुक्त कर दिया. हम बहुत खुश थे और जब हमने बिल्ली को ख़ुशी से कूदते हुए देखा तो हमें बहुत ही अच्छा लगा. बिल्ली ने किसी को भी परेशान नहीं किया. हम प्रसन्न थे कि उस दिन हमने एक अच्छा कार्य किया था.
तब से हम ऐसे और पिंजरे, जो बिल्लियों को विपदा में डाल देेंगे, के प्रति चौकस रहते हैं.

 सीख:

१) हमने पशुओं के प्रति उदार व प्रेमपूर्ण होना सीखा.

२) हमने अपने पास-पड़ोस के प्रति उत्तरदायी होना सीखा.

 

योगदान:  कुणाल/ नंदिनी, आर्यन, किमाया

(प्रेमार्पण कक्षा के बच्चे ७-११ वर्षीय)

अनुवादन:  अर्चना

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सेवा करने वाले हाथ, प्रार्थना करने वाले होठों से अधिक पवित्र होते हैं

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : निस्स्वार्थ सेवा

बहुत लोग अपने अच्छिन्न कष्टों का बयान करते हुए ईश्वर से शिकायत करते हैं कि उन्हींने उनके प्रति कोई दया नहीं दिखाई है. ऐसे व्यक्तियों के लिए रामायण की एक घटना से सबक सीखना लाभदायक होगा.

विभीषण की हनुमान से मित्रता होने के बाद, एक बार उन्होंने हनुमान से पूछा, “हनुमान! हालाँकि तुम वानर हो, तुम प्रभु की कृपा के प्राप्तकर्ता हो.hanuman

यद्यपि मैं निरंतर भगवान राम के ध्यान में लगा हुआ हूँ, फिर भी ऐसा क्यों है कि मैंने उनकी अनुकम्पा हासिल नहीं की है?” हनुमान ने उत्तर दिया, “विभीषण! यह सत्य है कि तुम निरंतर राम नाम का स्मरण करते हो. परन्तु तुम भगवान राम के कार्य में किस हद तक जुटे हो? भगवान राम के नाम मात्र का ध्यान करने से तुम उनकी कृपा प्राप्त नहीं कर सकते. जब तुम्हारे भ्राता, रावण माता सीता को उठा ले गए थे, तब तुमने सीता देवी की क्या मदद की थी? क्या तुमने भगवान राम की परेशानी को आंशिक रूप से भी कम करने के लिए कुछ किया था?”  hanuman3

सीख:

ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिए मात्र प्रार्थना करना पर्याप्त नहीं है. हमें उनकी शिक्षा को अभ्यास में लाना है. इस कार्यप्रणाली का एक साधन ज़रूरतमंद लोगों से प्रेम व उनकी सेवा करना है. करनी कथनी से ताकतवर होती है.

अर्चना द्वारा अनुवादित

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प्रभु क्या आप हार नहीं मानने का एक कारण दे सकतें हैं

 

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : विश्वास, दृढ़ता

 

एक दिन मैंने सब कुछ छोड़ने का निश्चय किया- मैंने अपनी नौकरी, अपने रिश्ते, अपनी आध्यात्मिकता छोड़ दी- मैं अपनी ज़िन्दगी भी त्यागना चाहता था.

मैं भगवान से एक आखिरी वार्तालाप करने जंगल गया.

“भगवान”, मैंने कहा, “क्या आप हार नहीं मानने का एक कारण दे सकते हैं?” भगवान के उत्तर ने मुझे चकित कर दिया.
उन्होंने कहा, “अपने आसपास देखो. क्या तुम फ़र्न और बॉस देख रहे हो?”
मैंने उत्तर दिया, “जी” .
“जब मैंने फ़र्न और बॉस के बीज बोए थे तब मैंने उनकी बहुत अच्छी देखभाल की थी. मैंने उन्हें रोशनी दी. मैंने उन्हें पानी दिया.fern rain फ़र्न का पौधा झटपट धरती से निकल आया. उसकी उत्कृष्ट हरियाली ने धरती को ढक दिया. लेकिन अभी भी बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा. परन्तु मैंने बॉस को छोड़ा नहीं.

दूसरे वर्ष में फ़र्न का पौधा बढ़कर और अधिक आकर्षक और समृद्ध हो गया.fern और एक बार फिर, बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा. परन्तु मैंने बॉस को त्यागा नहीं.

तीसरे और चौथे सालों में भी बॉस के बीज से कुछ नहीं उपजा . लेकिन मैंने बॉस को छोड़ा नहीं.

फिर पाँचवे वर्ष में, ज़मीन से एक नन्हा सा अंकुर उभरा. फ़र्न की तुलना में वह काफ़ी छोटा व मामूली था.
लेकिन केवल छह महीने बाद, बॉस बढ़कर १०० फुट से भी अधिक ऊँचा हो गया. उसने पाँच वर्ष अपनी जड़ें बढ़ाने में बिताए थे. उन जड़ों ने उसे मज़बूत बनाया और वह सब कुछ दिया जो उसके जीवित रहने के लिए आवश्यक था. मैं अपनी किसी भी सृष्टि को ऐसी चुनौती नहीं दूँगा जो वह निभा न पाए.

“मेरे बच्चे, क्या तुम्हें पता है कि तुम जो इस समय तक संघर्ष कर रहे थे,तुम वास्तव में अपनी जड़े बढ़ा रहे थे. मैं बॉस को नहीं छोड़ूंगा. तुम्हें भी मैं कभी नहीं छोड़ूंगा.”

उन्होंने जहा, “दूसरों से अपनी तुलना मत करो. बॉस का फ़र्न से भिन्न प्रयोजन था. फिर भी वह दोनों वन को ख़ूबसूरत बनातें हैं.”

ईश्वर ने मुझसे कहा, “तुम्हारा समय आएगा. तुम ऊँचा उठोगे.”

“मुझे कितना ऊँचा उठना चाहिए?” मैंने पूछा.

“बॉस कितना ऊँचा बढ़ता है?” उन्होंने मुझसे पलटकर पूछा.

“”वह जितना ऊँचा बढ़ सकता है.” मैंने जवाब दिया .

उन्होंने कहा, “हाँ. तुम जितना ऊपर उठ सकते हो, उतना उठकर मुझे गौरवान्वित करो.”

मैं जंगल से चला आया इस विश्वास के साथ कि भगवान मुझे कभी नहीं छोड़ेगें. और वे तुम्हारा त्याग भी कभी नहीं करेंगें.

अपने जीवन में एक दिन भी पश्चाताप न करो.

अच्छे दिन तुम्हें ख़ुशी देतें हैं; बुरे दिन तुम्हें अनुभव देतें हैं. दोनों जीवन के लिए अनिवार्य हैं.

सीख:

हमें हमारा कर्त्तव्य करते रहना चाहिए और शेष उनपर छोड़ देना चाहिए. अपने कार्य में हमें समर्पित व अटल रहना चाहिए. सदा सर्वोत्तम देना चाहिए और कभी हार नहीं माननी चाहिए . दृढ़ विश्वास रखना चाहिए; सफलता निश्चित मिलेगी. हमें सर्वदा ध्यान रखना चाहिए कि हम सबका जीवन में विभिन्न उद्देश्य है और हमें उसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए. हमें दूसरों से तुलना करना छोड़कर, अपना मानदंड स्वयं बनकर, अपने लक्ष्य पर केंद्रित होकर खुद में निरंतर सुधार करना चाहिए.

 

अर्चना द्वारा अनुवादित

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ईसाह मसीह की तरह बनने की कोशिश करना- एक बड़े भाई का उपहार

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आदर्श : उचित आचरण
उप आदर्श : कर्त्तव्य, सहानुभूति

क्रिसमस का मौसम था. नौ वर्षीय जरोन एवं उसका छह वर्षीय भाई, पार्कर, उत्साहित थे. उन्होंने अपने शहर के किराने की दूकान द्वारा प्रायोजक पढ़ने की एक प्रतियोगिता में भाग लिया था. सबसे अधिक किताबें पढ़ने वाले दो विद्यार्थी एक-एक नई साइकिल जीतने वाले थे. सभी विद्यार्थियों को प्रत्येक पुस्तक पढ़ने के बाद अपने माता-पिता तथा अध्यापकों से हस्ताक्षर करवाने थे. इनाम में दो साइकिलें थीं- एक पहली से तीसरी कक्षा स्तर के बच्चों के लिए और एक चौथी से छठी कक्षा स्तर के बच्चों के लिए.

पार्कर विशेष रूप से उत्साहित था क्योंकि उसके लिए यह साइकिल जीतने का एक माध्यम था. उसे साइकिल की सचमुच इच्छा थी. उसके बड़े भाई ने बाज़ार बिक्री में काम करके एक दस-गति वाली साइकिल हासिल की थी. और पार्कर अपने बड़े भाई को उसकी नई बैंगनी साइकिल हर जगह चलाते देख थक चुका था. पार्कर ने सोचा कि अगर किताबें पढ़कर वह अपनी साइकिल स्वयं हासिल कर सकता है तो यह बहुत ही अच्छा होगा. अतः उसने जल्दी-जल्दी किताबें पढ़नी शुरू कर दीं. लेकिन वह चाहे कितनी भी किताबें पढ़ता, उसके स्तर का कोई और छात्र उससे अधिक किताबें पढ़ लेता था.

इसी दौरान, जरोन प्रतियोगिता को लेकर अधिक उत्सुक नहीं था. जब वह किराने की दूकान पर गया और उसने सभी पाठकों के नाम व हर पाठक द्वारा पढ़ी किताबों की संख्या लेखाचित्र पर देखी तब उसने पाया कि उसके छोटे भाई की प्रतोयोगिता जीतने की संभावना बहुत कम थी.

क्रिसमस के सही तात्पर्य, देने की ख़ुशी, से प्रभावित होकर उसने निश्चय किया कि वह जो अपने लिए नहीं कर सकता था, पार्कर के लिए करेगा. अतः जरोन ने अपनी साइकिल अलग रखी और हाथ में पुस्तकालय का कार्ड लेकर, पुस्तकालय की ओर चल पड़ा. उसने पढ़ा और पढ़ता गया. वह एक दिन में ८ घंटे तक पढ़ता था. इतना अद्भुत उपहार दे पाने की ख़ुशी ने संभवतः उसे प्रगति के मार्ग पर जारी रखा.

आखिर वह दिन आ गया जब अंतिम सूचियाँ समर्पित करनीं थीं. जरोन की माँ उसे दूकान पर ले गयीं और उसने अपनी सूची जमा कर दी और प्रदर्शन पर रखी पुरस्कार-विजेताओं की साइकिलों को सराहने लगा.bicycle

दूकान का प्रबंधक उसे २०” की लाल चमकदार साइकिल को सराहते हुए देख रहा था. प्रबंधक ने कहा, “मुझे लगता है कि अगर तुम मुकाबला जीत जाओगे तो तुम बड़ी वाली साइकिल लेना चाहोगे?”

जरोन ने प्रबंधक के मुस्कुराते हुए चेहरे की ओर देखा और बहुत गंभीरता से कहा, “नहीं महाशय! मैं ठीक इसी कद की साइकिल लेना पसंद करूंगा.”

“लेकिन यह साइकिल तुम्हारे लिए बहुत छोटी नहीं है?”

“नहीं महाशय- मैं इसे अपने छोटे भाई के लिए जीतना चाहता हूँ?”

वह आदमी अचंभित था. वह जरोन की माँ की तरफ मुड़कर बोला, “पूरे साल की मैंने यह सबसे अच्छी कहानी सुनी है!”

जरोन की माँ को पता नहीं था कि उसने अपने छोटे भाई के लिए इतना कठिन परिश्रम किया था. उन्होंने जरोन को अत्यधिक गर्व और ख़ुशी से देखा और प्रतियोगिता के परिणामों की प्रतीक्षा करने घर चले गए.

अंततः टेलीफोन की घंटी बजी. २८० किताबें पढ़कर जरोन जीत गया था. अपने माता-पिता की सहायता से उसने क्रिसमस की पूर्वसंध्या तक साइकिल को अपनी दादी के घर के तहखाने में छुपा दिया. वह पार्कर को उसका उपहार देने के लिए मुश्किल से इंतज़ार कर पा रहा था.

क्रिसमस की पूर्वसंध्या पर सारा कुटुंब दादी के घर पर एक विशेष पारिवारिक शाम के लिए एकत्रित हुआ. माँ ने दुनिया को अलौकिक पितामह के उपहार- उनके पुत्र ईसाह मसीह की कहानी सबको सुनाई. फिर उन्होंने एक अन्य बड़े भाई के प्यार की कहानी सुनाई. उन्होंने कहा कि हालाँकि यह उतना महान बलिदान नहीं था जोकि उद्धारक ने हम सब के लिए किया है पर फिर भी यह एक त्याग है. यह बलिदान एक बड़े भाई का अपने छोटे भाई के प्रति प्रेम को दर्शाता है. पार्कर और उसके परिवार ने एक भाई की कहानी सुनी, जिसने अपने छोटे भाई को साइकिल जितवाने के लिए २८० किताबें पढ़ीं थीं.

पार्कर ने कहा, ” मेरा बड़ा भाई मेरे लिए कुछ इस प्रकार ही करेगा.”

इस पर जरोन भाग कर दूसरे कमरे में गया जहाँ दादी ने साइकिल रखी थी. जब वह दो पहिये का खज़ाना, जो उसने अपने छोटे भाई के लिए जीता था, बाहर लेकर आया, परिवार के सभी सदस्य गर्व से मुस्कुरा रहे थे. पार्कर साइकिल की ओर दौड़ा और दोनों भाइयों ने एक दूसरे को सीने से लगा लिया.two bros

   सीख :

हममें सबसे प्रेम और सबकी परवाह करनी चाहिए. यह हमारे परिवार, माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी से शुरू होता है और फिर पड़ोसियों तथा अन्य सभी जो आपत्ति में हैं, उन तक विस्तृत होता है. ज्येष्ठ सहोदर का अपने अनुजों का ध्यान रखना और मदद करना कर्त्तव्य बनता है. छोटों को इसका प्रतिदान प्रेम और आदर से करना चाहिए.

वसुंधरा व अर्चना द्वारा अनुवादित

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ईश्वर अमीर व गरीब में भेदभाव नहीं करते

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : निष्ठा

केरल के गुर्वायुर में भगवन कृष्ण का मंदिर बहुत लोकप्रिय है और हज़ारों भक्त इस मंदिर में नियमित रूप से दर्शन के लिए आते हैं.

एक बार एक भक्त ने इस मंदिर में, अपने पैरों के दर्द से मुक्ति पाने की उम्मीद में ४१ दिनों की पूजा की. वह स्वयं चलने में असमर्थ था इसलिए उसे हर जगह उठाकर ले जाना पड़ता था. चूँकि वह अमीर था, इसलिए भाड़े पर लोग रखने में समर्थ था जो उसे ढोकर मंदिर के चारों ओर ले जाते. हर सुबह उसे नहाने के लिए मंदिर के तालाब तक उठाकर ले जाया जाता था. उसने इस प्रकार अपनी पूजा के ४० दिन पूर्ण कर लिए थे. परन्तु उसकी श्रद्धापूर्ण तथा सच्ची प्रार्थना के बावजूद उसकी पीड़ा में कोई सुधार नहीं था.

भगवान कृष्ण का एक और भक्त था जो गरीब था और उसी मंदिर में वह अपनी पुत्री के विवाह के लिए पूर्ण श्रद्धा से प्रार्थना कर रहा था. वर निर्धारित हो चुका था और उसकी बेटी की सगाई भी हो चुकी थी. पर उसके पास सोने के गहने खरीदने तथा विवाह का प्रबंध करने के लिए पैसे नहीं थे. इस भक्त के स्वप्न में भगवान आए और उसे अगली सुबह मंदिर के तालाब पर जाने का निर्देश दिया. भगवान ने भक्त को आदेश दिया कि उसे वहाँ सीढ़ियों पर एक छोटी-सी थैली मिलेगी जिसे लेकर वह पीछे देखे बिना भाग जाए.

अगला दिन अमीर भक्त के लिए ४१वां दिन था. हालाँकि उसके पैरों के दर्द में सुधार नहीं था पर फिर भी भगवान कृष्ण को अर्पण करने के लिए वह एक छोटी थैली में सोने के सिक्के लेकर आया था. स्नान के लिए जाने से पूर्व उसने थैली को मंदिर के तालाब की सीढ़ियों पर रखा. स्वप्न में भगवान के सुझाव के अनुसार वह गरीब भक्त मंदिर के तालाब पर गया और सीढ़ियों पर उसे एक छोटी सी थैली मिली. उसे उठाकर पीछे मुड़े बिना वह भाग गया. अमीर भक्त ने किसी को भगवान कृष्ण के लिए रखी थैली लेकर भागते हुए देखा. वह तत्काल पानी से बाहर निकला और उस चोर के पीछे भागने लगा. वह चोर को पकड़ नहीं पाया और निराश होकर लौट आया.

अचानक उसे यह अहसास हुआ कि चोर को पकड़ने के लिए वह दौड़ा था जबकि पहले उसे उठाकर ले जाना पड़ता था.इस चमत्कार के अनुभव से अचंभित वह खड़ा का खड़ा ही रह गया . वह अति आनंदित था कि अब वह पूर्णतया पीड़ामुक्त था. भगवान कृष्ण की इस अनंत कृपा के लिए उसने प्रभु को प्रचुर धन्यवाद दिया. इस तरह ४१वे दिन ईश्वर अपने दोनों भक्तों की श्रद्धा से प्रसन्न हुए और उन्हें उदारतापूर्वक आशीर्वाद दिया. अमीर भक्त को अपने पैर के दर्द से मुक्ति मिली और गरीब भक्त को अपनी पुत्री के विवाह हेतु थैली में पर्याप्त सोने के सिक्के मिले.

दोनों ने कृपालु भगवान कृष्ण को अपनी प्रार्थनाएं सुनने के लिए धन्यवाद दिया.

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सीख:

ईश्वर ने दोनों भक्तों को आशीर्वाद दिया और उनकी भक्ति को पुरस्कृत किया. यह कथांश मेरे मन में तब आया जब हमारे अतिप्रिय बाबा अमीर व गरीब, दोनों भक्तों को एक समान आशीर्वाद देते हैं. अमीर भक्तजन विभिन्न परियोजनाओं के लिए धन दान देते हैं जबकि गरीब भक्तजन इन परियोजनाओं को सफल बनाने के लिए निस्वार्थ सेवा करते हैं. भगवान के तौर-तरीके भिन्न हैं परन्तु वे हर उससे प्रेम करते हैं जो उनके प्रति निष्ठावान हैं.

 

स्त्रोत : http://premarpan.wordpress.com

वसुंधरा व अर्चना द्वारा अनुवादित