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शरणागति

 

एक बार यशोदा माँ यमुना नदी में दीप दान कर रहीं थीं. पत्तों में दीप रखकर जब वह उन्हें प्रवाह कर रहीं थीं तब उन्होंने देखा कि कोई भी दीप आगे नहीं जा रहा था….kri1
ध्यान से देखने पर उन्होंने पाया कि कान्हा जी एक लकड़ी लेकर सारे दीप जल से बाहर निकाल रहे थे.
यशोदा माँ ने कान्हा से पूछा, “लला, तुम यह क्या कर रहे हो……”

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कान्हा कहते हैं, “माँ, यह सब डूब रहे थे. इस कारण मैं इन्हें बचा रहा हूँ.”

कान्हा का उत्तर सुनकर माँ हँसने लगीं और बोलीं, “लला, तुम किस किस को बचाओगे?”
यह सुनकर कान्हा जी ने बहुत ही सुन्दर जवाब दिया, “माँ, मैंने सबका ठेका नहीं लिया हुआ है. पर जो मेरी ओर आयेंगें मैं उन्हें अवश्य बचाऊँगा.”

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इसलिए हमें सदा प्रभु का ध्यान करना चाहिए और उनकी शरण में रहना चाहिए.

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ईश्वर अमीर व गरीब में भेदभाव नहीं करते

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : निष्ठा

केरल के गुर्वायुर में भगवन कृष्ण का मंदिर बहुत लोकप्रिय है और हज़ारों भक्त इस मंदिर में नियमित रूप से दर्शन के लिए आते हैं.

एक बार एक भक्त ने इस मंदिर में, अपने पैरों के दर्द से मुक्ति पाने की उम्मीद में ४१ दिनों की पूजा की. वह स्वयं चलने में असमर्थ था इसलिए उसे हर जगह उठाकर ले जाना पड़ता था. चूँकि वह अमीर था, इसलिए भाड़े पर लोग रखने में समर्थ था जो उसे ढोकर मंदिर के चारों ओर ले जाते. हर सुबह उसे नहाने के लिए मंदिर के तालाब तक उठाकर ले जाया जाता था. उसने इस प्रकार अपनी पूजा के ४० दिन पूर्ण कर लिए थे. परन्तु उसकी श्रद्धापूर्ण तथा सच्ची प्रार्थना के बावजूद उसकी पीड़ा में कोई सुधार नहीं था.

भगवान कृष्ण का एक और भक्त था जो गरीब था और उसी मंदिर में वह अपनी पुत्री के विवाह के लिए पूर्ण श्रद्धा से प्रार्थना कर रहा था. वर निर्धारित हो चुका था और उसकी बेटी की सगाई भी हो चुकी थी. पर उसके पास सोने के गहने खरीदने तथा विवाह का प्रबंध करने के लिए पैसे नहीं थे. इस भक्त के स्वप्न में भगवान आए और उसे अगली सुबह मंदिर के तालाब पर जाने का निर्देश दिया. भगवान ने भक्त को आदेश दिया कि उसे वहाँ सीढ़ियों पर एक छोटी-सी थैली मिलेगी जिसे लेकर वह पीछे देखे बिना भाग जाए.

अगला दिन अमीर भक्त के लिए ४१वां दिन था. हालाँकि उसके पैरों के दर्द में सुधार नहीं था पर फिर भी भगवान कृष्ण को अर्पण करने के लिए वह एक छोटी थैली में सोने के सिक्के लेकर आया था. स्नान के लिए जाने से पूर्व उसने थैली को मंदिर के तालाब की सीढ़ियों पर रखा. स्वप्न में भगवान के सुझाव के अनुसार वह गरीब भक्त मंदिर के तालाब पर गया और सीढ़ियों पर उसे एक छोटी सी थैली मिली. उसे उठाकर पीछे मुड़े बिना वह भाग गया. अमीर भक्त ने किसी को भगवान कृष्ण के लिए रखी थैली लेकर भागते हुए देखा. वह तत्काल पानी से बाहर निकला और उस चोर के पीछे भागने लगा. वह चोर को पकड़ नहीं पाया और निराश होकर लौट आया.

अचानक उसे यह अहसास हुआ कि चोर को पकड़ने के लिए वह दौड़ा था जबकि पहले उसे उठाकर ले जाना पड़ता था.इस चमत्कार के अनुभव से अचंभित वह खड़ा का खड़ा ही रह गया . वह अति आनंदित था कि अब वह पूर्णतया पीड़ामुक्त था. भगवान कृष्ण की इस अनंत कृपा के लिए उसने प्रभु को प्रचुर धन्यवाद दिया. इस तरह ४१वे दिन ईश्वर अपने दोनों भक्तों की श्रद्धा से प्रसन्न हुए और उन्हें उदारतापूर्वक आशीर्वाद दिया. अमीर भक्त को अपने पैर के दर्द से मुक्ति मिली और गरीब भक्त को अपनी पुत्री के विवाह हेतु थैली में पर्याप्त सोने के सिक्के मिले.

दोनों ने कृपालु भगवान कृष्ण को अपनी प्रार्थनाएं सुनने के लिए धन्यवाद दिया.

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सीख:

ईश्वर ने दोनों भक्तों को आशीर्वाद दिया और उनकी भक्ति को पुरस्कृत किया. यह कथांश मेरे मन में तब आया जब हमारे अतिप्रिय बाबा अमीर व गरीब, दोनों भक्तों को एक समान आशीर्वाद देते हैं. अमीर भक्तजन विभिन्न परियोजनाओं के लिए धन दान देते हैं जबकि गरीब भक्तजन इन परियोजनाओं को सफल बनाने के लिए निस्वार्थ सेवा करते हैं. भगवान के तौर-तरीके भिन्न हैं परन्तु वे हर उससे प्रेम करते हैं जो उनके प्रति निष्ठावान हैं.

 

स्त्रोत : http://premarpan.wordpress.com

वसुंधरा व अर्चना द्वारा अनुवादित

उन्नी – एक मासूम भक्त

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आदर्श : भक्ति

उप आदर्श : निष्ठा, विश्वास

मंदिर के एक पुजारी ने एक बार अपने बारह वर्षीय पुत्र को ईश्वर को भोजन अर्पण करने का आदेश दिया. मंदिर में केवल एक ही पुजारी था और उन्हें किसी अत्यावश्यक कार्य से बाहर जाना था. पुत्र उन्नी ने प्रभु को चावल भेंट किए. अपने भोलेपन में उसे विश्वास था कि मूर्ति भोजन का सेवन करेगी. परन्तु मूर्ति हिली भी नहीं. उन्नी पड़ोस की दुकान से कुछ नमकीन आम और दही खरीद कर लाया.  उसने दही को चावल में मिश्रित किया और यह सोचकर कि भगवान को यह बेहतर पसंद आएगा, पुनः अर्पण किया.  पर मूर्ति फिर भी स्थिर रही. उन्नी ने भगवान की मूर्ति को बहुत समझाया, विनती की और धमकाया भी, पर मूर्ति वैसे ही खड़ी रही. वह रोया क्योंकि उसे आभास हुआ कि वह असफल रहा है. उसने भगवान को चिल्लाकर पुकारा और कहा कि उसके पिता उसकी पिटाई करेंगे. भगवान से और बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने भोजन अंतर्ध्यान कर दिया. वह बालक संतुष्ट होकर मंदिर से चला गया. जब उसके पिता मंदिर वापस लौटे तो भोजन की थाली खाली देख, उन्नी से बेहद नाराज़ हुए. परन्तु उन्नी ने अपने पिता से आग्रह किया कि ईश्वर ने वास्तव में भोजन स्वीकृत किया था. उन्नी के मासूम बोल सुनकर उसके पिता आगबबूला हो गए. उन्हें यकीन था कि उन्नी झूठ बोल रहा है और भोजन उसने स्वयं खाया था. वह उन्नी को मारने ही वाले थे कि तभी एक दिव्य वाणी सुनाई पड़ी, “मैं अपराधी हूँ. उन्नी निर्दोष है.”

इस प्रकार भगवान ने अपने मासूम व निर्दोष भक्त का बचाव किया.