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श्री आदि शंकर के तीन अपराध

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: शाश्वत सत्य; मनसा, वाचा और कर्मणा में सामंजस्य

श्री श्री शंकर एक बार अपने शिष्यों के साथ काशी के श्री विश्वनाथ मंदिर पहुँचे. गंगा में स्नान करने के बाद वह सीधे मंदिर गए और भगवान् विश्वनाथ के समक्ष अपने तीन अपराधों के लिए क्षमादान की प्रार्थना करने लगे. उनके शिष्य चकित थे और अचरज में थे कि उनके आचार्य अपने किन अपराधों के लिए प्रायश्चित कर रहे होंगे.

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अपने आचार्य के तीन अपराधों को जानने की अभिलाषा से एक शिष्य ने श्री श्री शंकर से उन अपराधों के बारे में पूछा. श्री श्री शंकर ने उसे सविस्तार समझाया, “यद्यपि मेरा मानना है कि परम तत्व सर्वव्याप्त हैं और मैंने अपनी कई रचनाओं में ऐसा अभिव्यक्त भी किया है, पर फिर भी उनके दर्शन करने के लिए मैं काशी नगर आया हूँ मानो वह केवल काशी नगर में ही विद्यमान हैं. मैंने अपने कथन से भिन्न आचरण करने का अपराध किया है. यह मेरा पहला अपराध है.”

“तैत्तिरिय उपनिषद् में कहा गया है ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह:’ अर्थात जहाँ से वाणी लौट आती है और जिसे समझने में मन असमर्थ है. यद्यपि मैं जानता था कि परम तत्व विवेचन व शब्दों से परे हैं पर फिर भी ‘श्री काशी विश्वनाथ अष्टकम’ में मैंने adi4शब्दों द्वारा उनकी व्याख्या करने की चेष्टा की है. एक बार पुनः मैंने अपने उपदेश पर अमल न करने का अपराध किया है. यह मेरा दूसरा अपराध है.”

“अब तीसरा अपराध- अपने ‘निर्वाण षट्कम’ में मैंने स्पष्ट लिखा है; न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम न मंत्रो न तीर्थं न वेदाः न यज्ञा:, अहं भोजनं नैव भौज्यं न भोक्ता चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम : मैं पुण्य, पाप, सुख व दुःख से विलग हूँ. मुझे न तो पवित्र मन्त्रों की आवश्यकता है, न ही तीर्थयात्रा की. मुझे उपनिषदों, संस्कारों या यज्ञ की भी आवश्यकता नहीं है. न मैं भोजन हूँ, न ही भोग का अनुभव और न ही भोक्ता हूँ. मैं शुद्ध चेतना हूँ, अनादि शिव हूँ. पर इन सब के बावजूद मैं यहाँ प्रभु के सामने खड़ा होकर अपने अपराधों के प्रायश्चित की प्रार्थना कर रहा हूँ. यह मेरा तीसरा अपराध है.”

 

सीख:

श्री श्री शंकर के जीवन की यह उपकथा हमारे विचारों, शब्दों व कार्यों में सामंजस्य की महत्ता प्रकाशित करती है. यदि हममें परम तत्व को हासिल करने की उत्सुकता है तो हमें मनसा, वाचा और कर्मणा में तालमेल लाना ही होगा. हमारे विचार कितने भी नेक क्यों न हों परन्तु संसार हमारे प्रदर्शन को महत्त्व देता है. लेकिन हमारा प्रदर्शन कितना भी अच्छा क्यों न हो, परम तत्व हमारे विचारों को महत्त्व देते हैं. कहा जाता है, मनस एकम, वाचस एकम, कर्मण एकम महात्मनं, मनस अन्यथा, वाचस अन्यथा, कर्मण अन्यथा दुरात्मनं. हमें अपने जीवन में मनसा वाचा कर्मणा के सम्पूर्ण तालमेल का निरंतर अभ्यास करना चाहिए.

 

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

 

राजा हरिश्चंद्र- सच्चाई के अभिव्यक्ति

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: ईमानदारी

हरिश्चंद्र, त्रिशंकु के पुत्र व राम के पूर्वज थे. उन्होंने अपनी पत्नी, तारामती और पुत्र रोहिताश्व के साथ अयोध्या पर राज्य किया था. वह एक न्यायी व कृपालु राजा थे और उनके राजकाल में उनकी प्रजा ने खुशहाल व शांतिमय जीवन व्यतीत किया था.

हरिश्चंद्र ने बचपन में ही सत्य की महत्ता सीख ली थी और उन्होंने कभी झूठ न बोलने तथा सदा अपना वादा निभाने का निश्चय किया था. समय के साथ वह अपनी सत्यवादिता, ईमानदारी और समेकता के लिए प्रसिद्ध हो गए. उनकी ख़्याति स्वर्ग में देवताओं तक पहुँची और उन्होंने हरिश्चंद्र को परखने का फैसला किया. हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने के लिए ऋषि विश्वामित्र का चयन किया गया और तदनुसार ऋषि अपने कार्य में लग गए.

अपने कार्य में सफल होने के लिए विश्वामित्र ने हर संभव प्रयास किया जिससे कि हरिश्चंद्र झूठ बोलें या अपने वादे से मुकर जाएं पर उनकी सभी कोशिशें व्यर्थ साबित हुईं. अपनी यथायोग्य प्रतिष्ठा के अनुरूप, हरिश्चंद्र अपने आदर्शों के प्रति पूर्णतया समर्पित थे.

अंततः विश्वामित्र ने परिस्थितियों का इस प्रकार हेर-फेर किया कि हरिश्चंद्र अपना राज्य व अपनी संपत्ति, ऋषि को देने के लिए मजबूर हो गए. इस प्रकार की धोखेबाजी के बावजूद भी हरिश्चंद्र ने मुस्कुराते हुए अपने राज्य का त्याग कर दिया और अपनी पत्नी व पुत्र के साथ जंगल की ओर निकल पड़े. हरिश्चंद्र की त्यागशीलता पर ऋषि अवाक थे पर राजा को उकसाने की अपनी अंतिम कोशिश में विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र से दक्षिणा माँगी.

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राजा अपना सब कुछ दे चुके थे और अब उनके पास दक्षिणा में देने के लिए कुछ शेष नहीं बचा था. पर वह एक ब्राह्मण को दक्षिणा न देने का पाप नहीं करना चाहते थे और इस कारण उन्होंने विश्वामित्र से कुछ समय की मोहलत माँगी. राजा बोले, “हे ऋषि, इस समय मेरे पास मेरा अपना कुछ भी नहीं है. आपकी दक्षिणा चुकाने के लिए कृपया मुझे १ महीने का समय दीजिये.” राजा का विनम्र निवेदन सुनकर ऋषि ने उन्हें १ महीने की अनुग्रह अवधि दे दी.

ऋषि को दक्षिणा देने के लिए धन कमाने हेतु राजा देशभर में इधर-उधर भटके पर उन्हें हर जगह असफलता ही मिली. अंततः वह काशी नामक शहर पहुँचे जो आजकल वाराणसी के नाम से जाना जाता है.
काशी एक ऐसा शहर था जहाँ हर जगह से भिन्न प्रकार के लोग आते थे. ज्ञानी पुरुष और अधिक शिक्षा अर्जित करने आते थे, भक्ति व निष्ठा से पूर्ण अनेकों तीर्थ यात्री आते थे और इस पवित्र शहर में मरने के बाद स्वर्ग हासिल करने की आशा में भी अनेक वृद्ध व्यक्ति यहाँ आते थे. परन्तु ऐसे जनसंकुल शहर में होने के बावजूद भी वह रोजगार ढूँढ़ने में असफल थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भगवान् भी हरिश्चंद्र से रुष्ठ थे.

जैसे जैसे अनुग्रह अवधि का अंत समीप आने लगा वैसे वैसे हरिश्चंद्र की परेशानी बढ़ने लगी. अपने वादे का उल्लंघन करना उन्हें गवारा नहीं था और अपने वादे का सम्मान रखने का कोई रास्ता भी नज़र नहीं आ रहा था. हरिश्चंद्र की पत्नी, तारामती भी उनके समान ही सदाचारी थी. अपने पति को परेशान देखकर आखिरकार उसने एक सुझाव रखा. वह बोली, “प्रिय स्वामी, कुछ ही दिनों में ऋषि अपनी दक्षिणा माँगने आ जाएंगे. अब तक हम कुछ भी हासिल नहीं कर पाए हैं. मेरे पास एक सुझाव है जो हालांकि अनुचित प्रतीत होता है परन्तु हमारे पास शायद यही एकमात्र रास्ता है. इस शहर में अमीर लोगों के लिए काम करने के वास्ते गुलामों की बहुत आवश्यकता है. कृपया मुझे बेच दीजिए और उन पैसों से ऋषि का भुगतान कर दीजिए. बाद में जब आपके पास पर्याप्त पैसे होंगे तब आप मुझे वापस खरीद सकते हैं.”king1
अपनी पत्नी का सुझाव सुनकर हरिश्चंद्र हक्के-बक्के रह गए और कड़ा विरोध करते हुए बोले, “अपनी पत्नी को बेच दूँ? उसे जिसने हर कठिनाई में मेरा साथ दिया है! असंभव!!” परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया और वह पैसे कमाने में असफल रहे उन्हें अपनी पत्नी की बात से सहमत होना पड़ा और पत्नी को बेचने, गुलामों के बाज़ार में गए.

वहाँ उन्होंने अपनी पत्नी को सबसे अधिक बोली लगाने वाले एक वृद्ध ब्राह्मण को बेच दिया. पत्नी के साथ नन्हा बालक भी होने के कारण वह ब्राह्मण और अधिक पैसे देने के लिए राज़ी हो गया. लाचार हरिश्चंद्र ने ब्राह्मण से पैसे लिए और पत्नी व बच्चे को ब्राह्मण के साथ भेज दिया. उसी क्षण विश्वामित्र वहाँ आये और हरिश्चंद्र से पुनः दक्षिणा की माँग की. ब्राह्मण से मिले सारे पैसे हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को सौप दिए पर फिर भी वह संतुष्ट नहीं हुए और बोले, “मेरी जैसी क्षमता रखने वाले ऋषि को क्या तुम ऐसी दक्षिणा दोगे? मैं ऐसा क्षुद्र पारितोषिक स्वीकार नहीं कर सकता.”

हरिश्चंद्र कोई और उपाय सोच ही रहे थे कि तभी वहाँ एक चांडाल आया. चांडाल नीची जाती के लोग होते थे जिन्हें केवल शमशान घाट पर ही रहने और काम करने की अनुमति होती थी. चांडाल ने हरिश्चंद्र से कहा कि वह एक हृष्ट-पृष्ट व्यक्ति की तलाश में है जो उसके लिए काम कर सके. चांडाल की बात सुनकर विश्वामित्र तुरंत हरिश्चंद्र की ओर देखकर बोले, “तुम मेरा भुगतान स्वयं को इस व्यक्ति को बेचकर क्यों नहीं कर देते?”king2

हरिश्चंद्र स्तंभित थे. चांडालों को अछूत माना जाता था. जहाँ अछूतों को छूना भी निषिद्ध था वहाँ एक राजा को उसके लिए काम करना पड़ रहा था. हरिश्चंद्र मन ही मन सोचने लगे कि एक राजा चांडाल के भी पद से नीचे कैसे गिर सकता है! पर तभी उन्हें अहसास हुआ कि उनके पास और कोई चारा नहीं था. अतः वह चांडाल के लिए काम करने को तैयार हो गए. चांडाल से पैसे मिलने पर जब हरिश्चंद्र ने ऋषि को पैसे दिए तब वह प्रसन्न व संतुष्ट हुए और उन्हें चांडाल से साथ छोड़कर वहाँ से चले गए.

चांडाल ने हरिश्चंद्र से शमशान घाट पर काम करवाना शुरू कर दिया. वह हरिश्चंद्र को शव जलाना, भुगतान माँगना और दाह संस्कार से सम्बंधित अन्य कार्य सिखाने लगा. हरिश्चंद्र शमशान घाट पर रहने लगे और हालांकि वह खुश नहीं थे पर फिर भी अपना काम निष्ठापूर्वक करते थे.

अपनी पत्नी व पुत्र को लेकर वह निरंतर परेशान रहते थे और सोचते थे, “वह दोनों किस अवस्था में होंगे? उन्हें तो यह भी नहीं मालूम है कि मैं स्वयं यहाँ एक दास हूँ. ”

समय के साथ हरिश्चंद्र को अपने काम की आदत पड़ गई. उसकी पत्नी व पुत्र भी ब्राह्मण के घर काम करने से दरिद्रता और कठोर परिश्रमी जीवन के अभयस्त हो गए. एक दिन लड़का बगीचे से फूल लाने गया पर उसे सांप ने डस लिया और उसकी मृत्यु हो गई. बेटे को मृत देख, तारामती बेहद परेशान व शोकाकुल थी. काफी समय तक रोने के बाद वह स्वयं को अपने पुत्र के दाह-संस्कार के लिए तैयार कर पाई. बच्चे को बाँहों में लिए वह शमशान घाट लेकर आई.

शमशान घाट पर हरिश्चंद्र काम पर थे और उन्होंने एक महिला को बच्चा बाहों में लिए आते देखा. दरिद्रता व कठिन परिस्थितियों ने सबको इतना बदल दिया था कि दोनों ने एक दूसरे को नहीं पहचाना. नियमानुसार हरिश्चंद्र ने दाह-संस्कार का भुगतान माँगा. तारामती रोने लगी और बोली, “मैं एक दास हूँ और मेरे पास मेरे शरीर पर पहने कपड़ों के अलावा और कुछ भी नहीं है. मेरी एक मात्र संतान भी मर चुकी है. मैं आपको क्या दे सकती हूँ? ” महिला की दयनीय अवस्था देखकर हरिश्चंद्र को कष्ट तो बहुत हुआ पर दाह-संस्कार का भुगतान लेने के अपने कर्त्तव्य पर वह अडिग थे.

तभी हरिश्चंद्र की निगाह महिला के मंगलसूत्र पर पड़ी जो उसके विवाह का प्रतीक था. वह बोले, “अरे महिला! तुमने झूठ क्यों बोला कि तुम्हारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है? दाह-संस्कार के भुगतान के बदले तुम मुझे अपना यह मंगलसूत्र दे सकती हो?”
तारामती आश्चर्यचकित थी. उसका मंगलसूत्र अनोखा था क्योंकि उसे केवल उसका पति ही देख सकता था. हरिश्चंद्र की बात सुनकर वह अपनी दुर्दशा पर रोने लगी और बोली, “हे नाथ, हमने अवश्य ही फिछले जीवनकालों में अनेकों कुकर्म किए होंगे जो आज हम इस दशा में हैं. मैं आपकी पत्नी हूँ लेकिन आप मुझे पहचानते नहीं. यह हमारा पुत्र है जो एक राजकुमार है- उसकी मृत्यु हो गई है पर वह अपने अंतिम संस्कार से वंचित है.”

अपनी पत्नी के कथन सुनकर हरिश्चंद्र ने उसे पहचान लिया और अपने प्रिय पुत्र और अपनी दशा पर रोने लगे. परन्तु इस सब के बावजूद वह अपने कर्त्तव्य पर अडिग थे और बोले, “दाह-संस्कार का शुल्क वसूल करना मेरा धर्म है और चाहे कुछ भी हो जाए मैं अपने कर्त्तव्य से कभी नहीं हटूँगा.”

तारामती भी अपने पति के समान धार्मिक व सच्चरित्र थी. वह बोली, “मेरे पास सिर्फ मेरे शरीर पर पहने कपड़े हैं. क्या आप इनमें से आधे कपड़े स्वीकार करके हमारे बच्चे का दाह-संस्कार करेंगे?” जब हरिश्चंद्र सहमत हो गए और वह अपने कपड़े फाड़ने लगी, उसी क्षण स्वर्ग से हर्षध्वनि उठी.

देवताओं ने दम्पति पर फूल बरसाए और विश्वामित्र साक्षात प्रकट होकर बोले, “हे राजन! सच्चाई और ईमानदारी के प्रति तुम्हारी प्रतिबद्धता की परीक्षा लेने के लिए देवताओं ने यह सारी मुसीबतें उत्पन्न कीं थीं. इन सभी परीक्षाओं में तुम न केवल विजयी साबित हुए हो बल्कि अपनी गुणवत्ता के कारण तुमने स्वर्ग में भी जगह हासिल कर ली है. तुम अपनी पत्नी व पुत्र के साथ अपने राज्य लौट सकते हो और अंतिम समय तक शासन कर सकते हो.”
ऋषि के इस प्रकार बोलते ही चिता पर मृत पड़ा नन्हा बालक उठाकर बैठ गया और आँखें मलने लगा मानो अभी नींद से उठा हो.

अपने पुत्र को जीवित देखकर हरिश्चंद्र बहुत प्रसन्न थे और उन्हें इस बात की अत्यधिक ख़ुशी थी कि उनके जीवन की परेशानियों का अंत होने वाला है. पर एक क्षण रूककर वह बोले, “हे ऋषि, हो सकता है कि यह सारी मुसीबतें आपने मेरी परीक्षा लेने के लिए उत्पन्न कीं थीं परन्तु सत्य यह है कि मैं एक चांडाल का दास हूँ और मेरी पत्नी एक ब्राह्मण की दास है. जब तक हम दास हैं तब तक हम कुछ भी स्वीकार नहीं कर सकते.”

हरिश्चंद्र की बात सुनकर ऋषि बहुत खुश हुए और बोले, ” हरिश्चंद्र, तुम वास्तव में अब तक के सर्वोच्च सत्यवादी और ईमानदार व्यक्ति हो. उधर देखो- वह रहे चांडाल और ब्राह्मण! देखो वह कौन हैं?” king3चांडाल और ब्राह्मण वास्तव में उन दोनों की ओर ही आ रहे थे पर एकाएक उनके रूप बदल गए और जैसे वह राजा के और करीब आए, उन्हें अहसास हुआ कि ब्राह्मण, इन्द्र थे और चांडाल, धर्म(यम) थे. दोनों बोले, ” हरिश्चंद्र, तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए हमने यह रूप धारण किए थे. कृपया हमें क्षमा करना और स्वयं को मुक्त समझो. जाओ और शांतचित्त से अपने राज्य पर शासन करो.

हरिश्चंद्र अयोध्या वापस लौट गए और कुछ वर्षों तक न्यायसंगत रूप से शासन किया. समय आने पर उन्होंने अपने साम्राज्य की बागडोर रोहिताश्व को सौंप दी और स्वर्गलोक सिधार गए.

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सीख:
हरिश्चंद्र का नाम सच्चाई व ईमानदारी का पर्यायवाची बन गया है. सत्यवादी राजा की कहानी ने अनेकों को प्रेरित किया है और आज भी लोगों को निरंतर विभोर करती है. राजा वास्तव में अमर है. सत्यता कार्यरत रहने योग्य सर्वोच्च कोटि का गुण है. विभिन्न कठिनाईओं के बावजूद जो सदा सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर चलते हैं, वह अवश्य ही विजयी होते हैं और सदा याद किए जाते हैं.

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अनुवादक-अर्चना

ज्ञानी पंडित

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: अभ्यास

एक दिन बहुत सारे लोग एक नाव में बैठकर नदी पार कर रहे थे. उनमें से एक व्यक्ति ज्ञानी पंडित था. उस पंडित ने समय व्यतीत करने तथा अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने के लिए एक सह यात्री के साथ हिन्दू शास्त्रों पर बातचीत करने का निश्चय किया.

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अतएव वह एक यात्री की तरफ मुड़कर बोला, “मेरे अनुमान से तुमने उपनिषद् तो पढ़ें ही होंगे? ”

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यात्री ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “नहीं महाशय! मैंने उपनिषद् नहीं पढ़े हैं.”
पंडित ने आश्चर्यचकित होकर कहा, “अच्छा! तुम्हारे जीवन का तो एक चौथाई भाग बर्बाद हो चुका है.”

“पर तुमने शास्त्रों का अध्ययन तो किया ही होगा! ” पंडित ने आगे पूछा.

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“नहीं महाशय, मैंने शास्त्रों का भी अध्ययन नहीं किया है” , यात्री ने उत्तर दिया.
यात्री का जवाब सुनकर पंडित सगर्व बोला, “फिर तो तुम्हारी आधी ज़िन्दगी बर्बाद हो चुकी है.”

“और हिन्दू दर्शनशास्त्र के ६ सिद्धांत? ” बौद्धिक बातचीत शुरू करने के अपने अंतिम प्रयास में पंडित ने पूछा.

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“महाशय! क्षमा कीजिएगा, मैंने तो उनके बारे में सुना भी नहीं है!” यात्री बोला.
“उनके बारे में सुना भी नहीं है? फिर तो मित्रवर, तुम्हारी तीन चौथाई ज़िन्दगी बर्बाद है.”

पंडित के ऐसा बोलते ही अचानक बढ़ती हुई ज़ोरदार लहरों में नाव डगमगाने लगी.boat6

नाविक चिल्लाया, “तूफ़ान आने वाला है और मैं नाव को नियंत्रित नहीं कर पा रहा हूँ. नाव उलटने वाली है. सुरक्षा के लिए सभी लोग नाव पर से पानी में कूद जायें और तैरकर नदी तट तक पहुँच जायें.”

पंडित को व्याकुल व भयभीत देखकर सह यात्री ने पूछा, “आपको तैरना नहीं आता है?”
पंडित शोक करते हुए बोला, “नहीं, मैंने कभी तैरना सीखा ही नहीं.”
“आपने तैरना नहीं सीखा! फिर तो पंडितजी, आपकी पूरी ज़िन्दगी बर्बाद है.” इस प्रकार पंडित का मज़ाक उड़ाते हुए वह यात्री डूबती नाव से पानी में कूद गया.

सीख:

केवल ज्ञान हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है. उसका व्यवहारिक प्रयोग भी अनिवार्य है. कोई कितना भी सुशिक्षित हो और उसने कितना भी ज्ञान उपार्जित क्यों न किया हो पर यदि समय पर वह काम न आए तो ऐसा ज्ञान व्यर्थ है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com
अनुवादक- अर्चना

एक मरते हुए व्यक्ति की चार पत्नियाँ

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: आध्यात्मिक रूप से सशक्त होना, अपनी वास्तविकता का अहसास होना

एक व्यक्ति की चार पत्नियाँ थीं. वह अपनी चौथी पत्नी से सबसे अधिक प्रेम करता था और उसके लिए सबसे अच्छी पोशाक खरीदता था. अपनी चौथी पत्नी के लिए वह सबसे सुन्दर और मनमोहक आभूषण खरीदता था और अपना सारा समय उसे रिझाने में व्यतीत करता था. कुल मिलाकर उसकी पत्नी उससे प्रेम करती थी और वह अपनी पत्नी से प्यार करता था.

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वह अपनी तीसरी पत्नी से भी प्रेम करता था. तीसरी पत्नी भी उसे प्रिय थी और वह उसकी भी हर इच्छा पूरी करता था. यह तीसरी पत्नी उसकी ज़िन्दगी नियंत्रित करती थी.

वह अपनी दूसरी पत्नी से भी प्रेम करता था. उसपर उसे पूरा विश्वास था और वह उससे अपनी हर व्यक्तिगत चीज़ के बारे में बात करता था. अपने जीवन के विषय में वह सदा अपनी दूसरी पत्नी से ही सलाह करता था.

लेकिन किसी कारणवश उसे अपनी पहली पत्नी से अनुराग नहीं था. इसके बावजूद उसकी पहली पत्नी उसकी मदद के लिए सदा उपस्थित रहती थी, वह बहुत सुशील थी और अपनी पति को खुश रखने की हर संभव कोशिश करती थी.

एक दिन वह व्यक्ति बहुत बीमार पड़ गया और उसे अहसास हुआ कि उसका अंत निकट है. उसने अपनी चारों पत्नियों को बुलाया और बोला, “मेरी ख़ूबसूरत पत्नियों! मेरा अंत अब निकट है पर मैं अकेला नहीं मरना चाहता हूँ. तुम में से कौन मेरे साथ आने को तैयार है? ”

उसने अपनी चौथी पत्नी को आगे बुलाया और बोला, “तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो. मैंने तुमसे हमेशा प्यार किया है और तुम्हें हर सर्वश्रेष्ठ वस्तु दी है. मेरी मृत्यु अब निश्चित है तो क्या तुम मेरे साथ आओगी? क्या तुम मेरा साथ दोगी?” पत्नी ने बिना सोचे झट से ‘नहीं’ कहा और पीछे मुड़कर चली गई. अपनी प्रियतम पत्नी का जवाब सुनकर उसका दिल टूट गया.

उदास मन से उसने अपनी तीसरी पत्नी को आगे बुलाया और बोला, “मेरा अंत निकट है, क्या तुम मेरे साथ चलोगी?” इस पर तीसरी पत्नी बोली, “बिलकुल नहीं. तुम्हारे जाते ही, मैं किसी और के साथ चली जाऊँगी.” फिर वह भी पीछे मुड़कर चली गई.

इसके बाद अपनी दूसरी पत्नी को बुलाकर उसने एक बार पुनः वही प्रश्न दोहराया. दूसरी पत्नी बोली, “मुझे दुःख है कि आपका अंत निकट है पर मैं केवल शमशान तक ही आपके साथ आ सकती हूँ. वहाँ तक मैं आपके साथ रहूँगी.” फिर पीछे मुड़कर वह भी अपनी जगह पर जाकर खड़ी हो गई.

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तभी पीछे से एक आवाज़ आई, “मैं आपके साथ आऊँगी.” उसने अपनी पहली पत्नी की ओर देखा और दुखी मन से बोला, “मेरी प्रियतमा, मैंने तुम्हारी ओर कभी ध्यान नहीं दिया, तुम कितनी कमज़ोर दिखती हो. अब जब मेरे जीवन का अंत आ गया है, मुझे अफ़सोस है कि मैं पहले समझ नहीं पाया कि तुम मुझे हर किसी से अधिक प्रेम करती हो. मुझे इस बात का बहुत खेद है कि मैंने हर समय तुम्हारी उपेक्षा की है.” ऐसा कहकर उस व्यक्ति का देहांत हो गया.

इस कहानी में चौथी पत्नी शरीर व उसकी तृष्णा का प्रतीक है जिसे मृत्यु के पश्चात हम खो देते हैँ. तीसरी पत्नी धन-दौलत का प्रतीक है जो हमारे शरीर छोड़ने पर दूसरों को मिलती है. दूसरी पत्नी हमारा परिवार व मित्र हैँ जो केवल शमशान घाट तक ही हमारे साथ आ सकते हैँ. पहली पत्नी जीवात्मा को दर्शाता है जो अप्रत्यक्ष होते हुए भी सदा हमारे साथ होती है. यद्यपि हमारी जीवात्मा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व प्रिय है परन्तु फिर भी हम उस पर ध्यान नहीं देते हैँ और इस बात का अहसास हमें जीवनकाल के अंत में होता है.

सीख:
शाश्वत सत्य यह है कि हम ‘शरीर’ नहीं जीवात्मा हैँ, जो जन्म व मृत्यु के परे है. ज़िन्दगी भर हम उन सभी अनावश्यक चीज़ों को महत्त्व देते रहते हैं जो निरर्थक व अस्थायी हैं. हमें अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान देकर अपने जीवन को श्रेष्ठतर बनाने की चेष्ठा करनी चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

श्री कृष्ण, अर्जुन और कबूतर की कहानी

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आदर्श: विश्वास
उप आदर्श : भरोसा

श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच घटित एक विख्यात उपकथा इस प्रकार से है:
“कृष्णा, मेरे लिए आपके शब्द मेरी आँखों के प्रमाण से अधिक विश्वसनीय हैं.”

श्री कृष्ण और अर्जुन एक बगीचे में घूम रहे थे जब आसमान में उन्हें एक पक्षी उड़ता दिखा.
पक्षी की ओर इशारा करते हुए श्री कृष्ण बोले,
“अर्जुन, वह पक्षी देख रहे हो…..क्या वह कबूतर है? ”

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“जी, मेरे प्रभु! वह निस्संदेह कबूतर है” ,अर्जुन ने उत्तर दिया.
“अरे रूको …..मेरा ऐसा सोचना है कि वह बाज है. देखो तो, क्या वह बाज नहीं है? “कृष्ण ने पूछा.

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“आप सही कह रहे हैं, कृष्ण. वह पक्षी निश्चित रूप से बाज ही है” ,अर्जुन बोला.
“अरे नहीं! वह बाज के समान प्रतीत नहीं हो रहा है” ,कृष्ण बोले. “वह अवश्य ही कौआ है.”
“निःसंदेह कृष्णा, वह कौआ ही है” ,अर्जुन ने उत्तर दिया.

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अर्जुन की बात सुनकर कृष्ण हँसते हैं और अर्जुन से झिड़ककर कहते हैं,
“अर्जुन, क्या तुम अंधे हो? तुम्हारी अपनी आँखें नहीं हैं, क्या? मैं जो भी कह रहा हूँ तुम उससे सहजता से सहमत होते जा रहे हो.”

अर्जुन बोला, “कृष्णा, मेरे लिए आपके शब्द मेरी आँखों के प्रमाण से कहीं अधिक विश्वसनीय हैं. आप जब कुछ कहते हैं तो उसे हकीकत में बदलने की ताकत रखते हैं- चाहे वह कौआ हो, कबूतर हो या बाज. अतः यदि आपने कहा है कि वह पक्षी कौआ है तो वह अवश्य कौआ ही होगा! ”

सीख:
इस कहानी का उद्धरण प्रायः विश्वास का दृष्टांत देने के लिए दिया जाता है. अपने गुरु व प्रभु पर हमें भी इसी प्रकार का विश्वास स्थापित करना चाहिए. श्री कृष्ण पर इस प्रकार के सम्पूर्ण व दृढ़ विश्वास के कारण ही अर्जुन अच्छाई और बुराई में हुए युद्ध को जीत पाया था.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

आधा सेर मक्खन

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: ईमानदारी

एक किसान आधा सेर मक्खन एक नानबाई(रोटी वाले) को बेचता था.

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एक दिन नानबाई ने मक्खन को तोलने का निश्चय किया. वह जानना चाहता था कि क्या किसान उसे वास्तव में आधा सेर मक्खन दे रहा था. मक्खन का वज़न करने के बाद यह निश्चित हो गया कि मक्खन का वज़न आधा सेर नहीं था. क्रोधित नानबाई किसान को अदालत में ले गया.

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न्यायधीश ने किसान से पूछा यदि वह किसी मापक यंत्र का प्रयोग कर रहा था. किसान ने उत्तर दिया, “मालिक, मैं एक साधारण सा किसान हूँ. मेरे पास आधुनिकतम मापक यंत्र नहीं हैं पर एक तराज़ू अवश्य है.”

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न्यायधीश ने पूछा, “तो फिर तुम मक्खन कैसे तोलते हो?” किसान ने उत्तर दिया, “मालिक, मुझसे मक्खन खरीदने के बहुत समय पहले से ही मैं नानबाई से आधा सेर डबल रोटी खरीदता हूँ. हर रोज़ जब नानबाई ब्रेड लेकर आता है, मैं उसे तराज़ू पर रखकर नानबाई को उसी वज़न का मक्खन देता हूँ. अगर कोई अपराधी है तो वह नानबाई है.”

सीख:
ईमानदारी व बेईमानी अभ्यास की बात है. कुछ लोगों के लिए झूठ और बेईमानी जीवन का हिस्सा बन जाते हैं और उन्हें इस बात का अहसास भी नहीं होता है. इस प्रकार के लोग अंततः स्वयं को ही धोखा देते हैं. जैसी करनी होती है वैसी ही भरनी होती है.

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Source: http://www.saibalsanskaarhindi.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

अपना अस्तित्व बनाए रखना

 

     आदर्श : सत्य
उप आदर्श: कृतार्थ, सही रवैया

एक राजा एक बगीचे में टहल रहा था और इस दौरान उसने कई कुम्हलाते और मुरझाते हुए वृक्ष, झाड़ियाँ और फूल देखे. ओक के वृक्ष ने कहा कि वह इसलिए मुरझा रहा था क्योंकि वह देवदार के वृक्ष के समान ऊँचा नहीं उग सकता था. देवदार के वृक्ष से पूछने पर राजा को ज्ञात हुआ कि देवदार इसलिए ढह रहा था क्योंकि वह अंगूर की बेल के समान अंगूर नहीं उपजा सकता था. इसी प्रकार अंगूर की बेल इस कारण कुम्हला रही थी क्योंकि वह एक गुलाब के समान खिल नहीं सकती थी.

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अंततः राजा को एक पौधा दिखा जो ताज़ा व दिलकश था और फल-फूल रहा था.

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पूछताछ करने पर राजा को निम्न उत्तर मिला:
यह तो बहुत ही प्राकृतिक सी घटना है. जब आपने मुझे बोया था तब आपको मुझसे आनंद की अपेक्षा थी. यदि आप ओक, अंगूर या गुलाब की इच्छा रखते तो आप उन पौधों को रोपते. इसलिए मेरा मानना है कि मैं जो हूँ उसके अतिरिक्त कुछ और नहीं बन सकता. और इस कारण मैं अपने विशिष्ट गुणों का विकास करने की भरपूर कोशिश करता हूँ.

सीख:
हमें अपना ध्यान स्वयं पर केंद्रित करना सीखना चाहिए. हम अपना व्यक्तित्व बदल नहीं सकते हैं. हमारे लिए किसी और की तरह बनना असंभव है. हमारा विकास और हमारी समृद्धि तभी होगी जब हम अपने व्यक्तित्व को स्वीकार करेंगें. यदि हम स्वयं से प्रसन्न नहीं होंगें तो हम कुम्हला सकते हैं. हम सभी में सामर्थ्य, योग्यता, कौशल व उद्देश्य है जिस कारण हमारा जन्म हुआ है. यदि हम इस तथ्य को स्वीकार कर लें और अपनी योग्यताओं का सर्वोत्तम प्रयोग करना सीख लें तो हम अवश्य ही प्रसन्नचित रहेंगें और दूसरों में भी खुशियाँ फैलाएंगें.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना