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कांटेदार जंगली चूहे

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आदर्श: शान्ति
उप आदर्श: एकता, धैर्य

उस साल शीतऋतु का प्रकोप कुछ ज़्यादा ही था और अत्यधिक जाड़े के कारण बहुत सारे पशुओं की मृत्यु हो गई थी.

परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वयं को गरम रखने के लिए सभी चूहों ने एक साथ समूह बनाकर रहने का निश्चय किया. एक जुट होकर रहने से उन्होंने स्वयं को संरक्षित तो कर लिया परन्तु उनके शरीर के कांटों से उनके करीबी साथी घायल होने लगे.

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कुछ समय बाद चूहों ने स्वयं को एक दूसरे से दूर करने का फैसला किया. ऐसा करने से प्रचंड सर्दी का उन्हें अकेले ही सामना पड़ा. उनका शरीर अकड़ने लगा और धीरे-धीरे चूहे मरने लगे. अब उन्हें बहुत ही सावधानी से फैसला लेना था: या तो वह अपने मित्रों के कांटों को स्वीकार करते या फिर धरती से ओझल होते.

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सभी चूहों ने आपस में विचार-विमर्श किया और एक बार पुनः एक जुट होकर रहने का फैसला किया. दूसरों से गर्माहट ग्रहण करने के लिए उन्होंने अपने साथियों से करीबी सम्बन्ध के कारण होने वाले घावों के साथ जीना सीख लिया. इस प्रकार वह जीवित रह पाए.

सीख:

सर्वश्रेष्ठ सम्बन्ध वह नहीं है जो परिपूर्ण व्यक्तियों को साथ लेकर आता है. एक सामंजस्यपूर्ण रिश्ते में प्रत्येक व्यक्ति दूसरों की त्रुटियों के साथ जीना सीखता है और दूसरों के विशिष्ट गुणों की सराहना करता है. सहनशीलता और एक दूसरे के स्वीकरण से हम किसी भी रिश्ते में सामंजस्य ला सकते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

गरीब व्यक्ति की संपत्ति

 

आदर्श: शांति
उप आदर्श: संतोष

रामचंद और प्रेमचंद पड़ोसी थे. रामचंद एक गरीब किसान था और प्रेमचंद ज़मींदार था.

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रामचंद अपने जीवन से खुश था और हमेशा निश्चिन्त रहता था. रात में वह अपने घर की खिड़कियाँ व दरवाज़े खुले रखता था और गहरी नींद सोता था. यद्यपि वह गरीब था पर फिर भी वह शांत और खुश था.

प्रेमचंद सदैव बेचैन रहता था. हर रात वह अपने घर की खिड़कियाँ व दरवाज़े अवश्य बंद करता था. पर फिर भी उसे ठीक से नींद नहीं आती थी. उसे सदा यह चिंता रहती थी कि कोई उसकी तिजोरी तोड़कर सारे पैसे चोरी कर लेगा. अपने पड़ोसी रामचंद की खुशहाल व निश्चिन्त ज़िन्दगी देखकर उसे ईर्ष्या होती थी.

एक दिन प्रेमचंद ने रामचंद को बुलाया और नकद धन से भरा एक बक्सा देते हुए बोला, “मेरे प्रिय मित्र, भगवान् की कृपा से मेरे पास प्रचुर धन-दौलत है. तुम्हें अभाव में देखकर मुझे दुःख होता है. इसलिए यह धन रखो और खुशहाली का जीवन व्यतीत करो.”

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रामचंद अत्यंत खुश हुआ. सारा दिन वह परम आनंद में था और इस कारण उसके चहरे पर मुस्कराहट थी. रात होने पर हमेशा की तरह वह सोने गया परन्तु किसी कारणवश वह सो ही नहीं पाया. उसने घर के सारे दरवाज़े व खिड़कियाँ बंद कर दीं पर फिर भी वह सो नहीं पाया. उसकी नज़र बार-बार धन से भरे बक्से पर टिकी हुई थी. रात भर वह अशांत और व्याकुल रहा.

सुबह होते ही वह धन से भरा बक्सा लेकर प्रेमचंद के पास गया और उससे बोला, “मेरे दोस्त, मैं गरीब ज़रूर हूँ पर तुम्हारे पैसों ने मुझसे मेरी शान्ति छीन ली है. मुझे गलत मत समझना पर कृपया अपने पैसे वापस ले लो.”

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सीख:

धन-दौलत से हम सब कुछ हासिल नहीं कर सकते हैं. हमारे पास जो भी है यदि हम उसमें संतुष्ट होना सीख लें तो हम सदैव खुश रहेंगें.

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अनुवादक- अर्चना

जब आंधी चलती है

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आदर्श: शान्ति
उप आदर्श: विश्वास

बहुत साल पहले अटलांटिक महासागर के तट पर एक किसान की ज़मीन थी. किसान को अपनी ज़मीन पर खेती-बाड़ी करने के लिए एक मज़दूर की ज़रुरत थी और इस कारण वह निरंतर विज्ञापन देता रहता था.storm2 परंतु उसके खेत अटलांटिक महासागर के तट पर होने के कारण कोई भी काम करने को तैयार नहीं होता था. सभी भयानक तूफानों से डरते थे जो अटलांटिक महासागर में प्रबल थे और इमारतों व फसलों को तहस-नहस कर देते थे.

जब किसान ने आवेदकों से नौकरी के लिए बातचीत करनी शुरू की तब उसे एक के बाद एक मायूसी का ही सामना करना पड़ा. अंततः एक नाटा, दुबला और मध्य आयु का व्यक्ति किसान के पास आया. किसान ने उससे पूछा, “क्या तुम एक अच्छे मजदूर हो?”

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उस मजदूर ने सबेरे से रात तक एक जुट होकर खेत पर कठिन मेहनत से काम किया और किसान उसके काम से बहुत खुश भी था. फिर एक रात समुद्र में ज़ोर से सांय-सांय करती हुई तेज़ हवा चलने लगी. हड़बड़ाकर किसान अपने बिस्तरे से निकला, झटपट लालटेन पकड़ी और मजदूर के निवास की ओर तेज़ी से दौड़ा. किसान ने मजदूर को झकझोर और चिल्लाकर बोला, “उठो! तूफ़ान आने वाला है. सारा सामान बाँधकर ठीक से रखो वरना सब कुछ उड़ जाएगा.”

मजदूर बिस्तर पर लेटा रहा और स्थिर व विश्वस्त आवाज़ में बोला, “नहीं साहब! मैंने आपसे से कहा था कि आंधी आने पर मैं सो सकता हूँ.”

मजदूर का जवाब सुनकर किसान को बहुत गुस्सा आया और उसकी बहुत इच्छा हुई कि मजदूर को नौकरी से निकाल दे. परंतु आने वाले तूफ़ान के बारे में सोचकर वह पहले उसकी तैयारी करने के लिए झटपट खेत की ओर भागा. खेत पहुँचकर किसान अचंभित था क्योंकि उसने देखा कि घास का सारा ढेर तिरपाल से भली भाँती ढका हुआ था. गायें बाड़े में थीं, मुर्गियों के बच्चे पिंजरों में थे और सारे दरवाज़े बंद थे. सारे किवाड़ कसकर बाँधे हुए थे.

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सभी कुछ इतनी अच्छी तरह से व्यवस्थित था कि किसी भी प्रकार की हानि की कोई गुंजाइश नहीं थी. तब किसान को अपने मजदूर की बात समझ में आई और वह भी आराम से सोने चला गया.

सीख:

जब हम आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होते हैं तब हमें किसी प्रकार का डर नहीं होता है. हमारी ज़िन्दगी में तूफ़ान आने पर क्या हम भी सो सकते हैं? हमारी मानसिक ताकत व सही रवैये की बुनियाद हमारा विश्वास है.

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अनुवादक- अर्चना

विश्वास की ताकत

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     आदर्श : आशावाद
उप आदर्श: आत्म विश्वास

एक व्यापारी बुरी तरह क़र्ज़ में डूबा हुआ था और उसे इससे बाहर निकलने का रास्ता समझ नहीं आ रहा था. अनेकों लेनदार उसके पीछे पड़े हुए थे और विभिन्न आपूर्तिकर्ता अपने भुगतान की माँग कर रहे थे. पार्क में एक बेंच पर बैठकर, दोनों हाथों से अपना सर पकड़कर वह सोचने लगा कि अपनी कंपनी को दिवालियापन से कैसे बचा सकता है.old3

अचानक उसके पास एक वृद्ध पुरुष आया और बोला, “मैं देख रहा हूँ कि तुम किसी बात से बहुत परेशान हो.” व्यापारी की उदासी का कारण सुनने के बाद वह वृद्ध पुरुष बोला, “मुझे लगता है कि मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ.” उसने व्यापारी का नाम पूछा, एक चेक लिखा oldऔर उसके हाथ में पकड़ाते हुए बोला, “यह कुछ पैसे रखो. आज से ठीक एक साल के बाद तुम मुझे यहीं मिलना और उस समय मेरे पैसे लौटा देना.”

ऐसा कहकर वह मुड़ा और झट से गायब हो गया. व्यापारी ने अपने हाथ में ५ लाख डॉलर का चेक देखा जिसपर जॉन डी. रॉकफेलर के हस्ताक्षर थे. रॉकफेलर उन दिनों संसार के सबसे अधिक अमीर व्यक्ति हुआ करते थे.

“इन पैसों से मैं अपनी सारी परेशानियाँ पल भर में दूर कर सकता हूँ! ” उसने सोचा. परंतु काफ़ी सोच-विचार के बाद व्यापारी ने चेक की राशि इस्तेमाल करने के बजाय तिजोरी में रखने का फैसला किया. उसे यकीन था कि चेक के होने मात्र से उसे मानसिक शान्ति रहेगी और अपने डूबते हुए कारोबार को बचाने की हर संभव कोशिश करने की शक्ति व साहस मिलेगा.

इस प्रकार मन में निश्चय करके व्यापारी ने नए जोश और आशापूर्ण भाव से विस्तरित अवधि के भुगतान निर्धारित किए और बातचीत के माध्यम से बेहतर व्यापार तय किए. उसने बहुत सारे बड़े व महत्वपूर्ण सौदे किए. शीघ्र ही वह अपने क़र्ज़ के चंगुल से निकलने में सफल हो गया और उसका कारोबार पुनः पैसे बनाने लगा.

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ठीक एक साल बाद वह चेक लेकर पार्क में वापस गया. निर्धारित समय पर वह वृद्ध व्यक्ति भी वहाँ आया. पर जैसे ही व्यापारी उसे चेक वापस लौटाकर अपनी सफलता की कहानी बताने वाला था, एक नर्स वहाँ भागती हुई आई और उसने वृद्ध व्यक्ति को पकड़ लिया.

“शुक्र है मैंने इसे पकड़ लिया! ” नर्स बोली. “मैं उम्मीद करती हूँ कि यह आपको परेशान नहीं कर रहा था. यह मानसिक संस्था से हमेशा भाग जाता है और लोगों से कहता है कि यह ज. डी. रॉकफेलर है. ” ऐसा कहकर उस बूढ़े की बाह पकड़कर वह उसे वहाँ से ले गई.

अचंभित व्यापारी वहाँ भौचक्का खड़ा ही रह गया. इस यकीन में कि उसके पास ५ लाख डॉलर थे, वह सारा साल कठिन परिश्रम करके खरीद-बेच के बड़े-बड़े सौदे करता रहा था. और अब अचानक उसे अहसास हुआ था कि उसकी ज़िन्दगी में कायापलट होने का कारण तो पैसा था ही नहीं. उसकी सफलता का असली कारण उसका हाल ही में बरामत आत्म-विश्वास था जिसने उसे हर इच्छित तमन्ना को हासिल करने की शक्ति दी थी.

सीख:
हमें स्वयं में विश्वास अवश्य होना चाहिए. आत्म-विश्वास सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. जब तक हम स्वयं में विश्वास नहीं करते तब तक कोई भी हमारी सहायता नहीं करता है.

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अनुवादक- अर्चना

एक अमीर आदमी का मानसिक शान्ति तलाशना

 

आदर्श : शान्ति
उप आदर्श: कृतज्ञता

एक बहुत ही अमीर व्यक्ति था जो अपनी जिंदगी से पूरी तरह ऊब चुका था. वह हर प्रकार की सम्पदा से संपन्न था और उसके पास वह हर खुशी थी जो पैसे से खरीदी जा सकती थी. rich1पर इन सब के बावजूद भी वह संतुष्ट नहीं था. वह अभी भी वास्तविकता की तलाश में था. वह बहुत से ऋषियों तथा महात्माओं से पूछताछ कर चुका था और उनके द्वारा सुझाये पूजन, अर्चन, उपासना तथा संस्कारों का पालन करने के बाद भी वह असंतुष्ट था.

अंततः वह अमीर व्यक्ति एक अन्य संत के पास गया और उसे सविस्तार अपनी व्यथा सुनाने लगा- “समय बीतता जा रहा है. जीवन सीमित है. तुम किस प्रकार के संत हो? तुम मुझे सही मार्ग भी नहीं rich2दिखा सकते. मैं अपने २४ घंटे समर्पित करने को तैयार हूँ- मुझे आजीविका कमाने के लिए काम करने की आवश्यकता नहीं है, मेरे बच्चे नहीं हैं और मैंने इतना पैसा कमा लिया है कि दस जन्मों के लिए पर्याप्त है.” उस महात्मा ने अमीर व्यक्ति को एक सूफी संत के पास भेज दिया. इस सूफी को लोग पागल समझते थे और कई साधु अक्सर अपने शिष्यों से छुटकारा पाने के लिए उन्हें इस सूफी के पास भेज दिया करते थे. परंतु यह सूफी पागल केवल दिखता था: वास्तव में वह बहुत ही बुद्धिमान था.

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अमीर आदमी ने एक बड़े से बोरे में हीरे-जवाहरात भरे और सूफी के पास गया. rich3सूफी एक पेड़ के नीचे बैठा हुआ था. उसने सूफी से अपनी सारी कहानी सुनाई – कि उसके पास दुनिया की वह हर चीज़ थी जो खरीदी जा सकती थी पर फिर भी वह अत्यंत दुखी था. अमीर व्यक्ति ने सूफी से कहा, “प्रमाण के रूप में मैं यह थैला लाया हूँ जिसका मूल्य करोड़ों का होगा. मुझे केवल मन की शान्ति चाहिए.” इसपर सूफी बोला, “मैं तुम्हें मन की शान्ति अवश्य दूँगा. तुम तैयार हो न?” अमीर व्यक्ति ने सोचा, “यह आदमी तो बहुत ही अजीब लगता है. इससे पहले मैं इतने सारे साधुओं के पास गया पर किसी ने भी मुझे इतनी जल्दी शान्ति का वादा नहीं दिया था. सबने किसी न किसी प्रकार के संस्कार, पूजा, प्रार्थना या चिंतन के लिए कहा या फिर मुझे इन सबसे स्वयं ही निबटने के लिए कहा. केवल यह ही ऐसा व्यक्ति है…..शायद लोग ठीक ही कहते हैं कि यह पागल है.”

कुछ हिचकिचाते हुए उसने कहा, “अच्छा, मैं तैयार हूँ.” हालाँकि वह मन की शान्ति की खोज में आया था पर अंदर ही अंदर वह डरा हुआ था. जैसे ही उसने कहा कि वह तैयार है, सूफी ने अमीर व्यक्ति के हाथ से उसका थैला लिया और वहाँ से भाग गया.

उस छोटे से गाँव की गलियाँ बहुत ही पतली और संकुचित थीं और सूफी उन सब से भली भाँती परिचित था.rich6 अमीर आदमी अपने जीवन में कभी नहीं भागा था पर अपने थैले के लिए सूफी के पीछे भागते हुए चिल्ला रहा था, “मेरे साथ धोखा हुआ है! यह आदमी कोई संत नहीं है. यह पागल भी नहीं है. यह तो बहुत ही चालू है.” पर वह सूफी को पकड़ नहीं पाया क्योंकि सूफी गाँव की विभिन्न टेढ़ी-मेढ़ी व संकरी गलियों से बहुत तेज गति से भाग रहा था. अमीर व्यक्ति मोटा था अतः उसे हांफते, रोते तथा पसीने से भरा देखकर सभी लोग उसपर हॅंस रहे थे. गाँव वालों को यह अच्छे से मालूम था कि सूफी पागल नहीं, अत्यंत बुद्धिमान था. उसका काम करने का ढंग कुछ अलग ही था.

अंततः अमीर व्यक्ति उसी पेड़ पर पहुँच गया जहाँ उसे शुरू में सूफी बैठा मिला था. सूफी वहाँ पहले से ही पहुँचा हुआ था. सूफी वहाँ थैले के साथ बैठा हुआ था. अमीर आदमी अभी भी गुस्से से चिल्ला रहा था और अपशब्द बोल रहा था. सूफी बोला, “बकवास बंद करो और अपनी थैली ले लो.”

अमीर आदमी ने झटपट सूफी के हाथ से अपनी थैली ले ली. rich5सूफी ने पूछा, “तुम्हें कैसा महसूस हो रहा है?” व्यक्ति बोला, “मुझे प्रचुर शान्ति का अनुभव हो रहा है.” सूफी ने कहा, “मैं तुम्हें यही बताना चाह रहा था कि अगर तुम तैयार हो तो मैं तुम्हें तुरंत शान्ति दे सकता हूँ. तुम्हें शान्ति मिल गई?” उसने उत्तर दिया, “हाँ, मुझे मिल गई.”

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इसके बाद सूफी ने उस व्यक्ति को सुझाव दिया, “दुबारा कभी किसी को इसके बारे में मत पूछना. तुम अपनी धन-संपत्ति का सही मूल्य नहीं समझते हो. मैंने तुम्हें तुम्हारी दौलत से एक बार अलग किया और तुम फौरन वह बन गए जो तुम वास्तव में हो- एक भिखारी. और यह अनमोल पत्थर जो पहले तुम्हें निरर्थक प्रतीत हो रहे थे, अचानक एक बार फिर अमूल्य बन गए. पर ऐसा अक्सर होता है.”

           सीख:

जो लोग महलों में रहते हैं वे उसका महत्त्व भूल जाते हैं; जो लोग अमीर होते हैं वे गरीबों के कष्ट के बारे में नहीं सोचते हैं. जिन लोगों का गुरु होता है, उनके लिए गुरु घर की मुर्गी के समान होता है. उन्हें लगता है कि वे जब चाहें गुरु से सवाल कर सकते हैं और गुरु उनके हर प्रश्न का उत्तर दे देंगें. जीवन में हमें जो भी उपहार में मिला है उसे हमें बहुमूल्य समझकर संजोकर रखना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

नन्हे मेंढकों की कहानी

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आदर्श : आशावाद
उप आदर्श : दृढ़ता

एक बार नन्हे मेंढकों के एक उत्साहशील समूह ने चढ़ाई प्रतियोगिता का आयोजन किया. प्रतियोगिता का लक्ष्य एक बहुत ऊँचें पेड़ के सिरे तक पहुँचने का था. चढ़ाई प्रतियोगिता देखने तथा प्रतियोगियों का प्रोत्साहन बढ़ाने पेड़ के इर्द-गिर्द विशाल भीड़ जमा हुई. अंततः दौड़ शुरू हुई.tf4

प्रतियोगियों को जिस पेड़ पर चढ़ना था वह वाकई में विराट था. इस कारण भीड़ में किसी को भी यह विश्वास नहीं था कि प्रतियोगियों में से एक भी नन्हा मेंढक वास्तव में पेड़ के सिरे तक चढ़ पाएगा. नन्हे मेंढकों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी और सभी चिल्ला रहे थे,

“ओह! यह तो बहुत ही मुश्किल है!!”
“ये तो कभी भी ऊपर तक नहीं पहुँच पायेंगें.”
“यह वृक्ष बहुत ऊँचा है! इनके सफल होने की कोई उम्मीद नहीं है.”

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एक एक करके कुछ नन्हे मेंढक हिम्मत हारने लगे और पेड़ से गिरने लगे. परंतु कुछ मेंढक अभी भी अटल थे और निरंतर ऊपर की ओर चढ़ते जा रहे थे. भीड़ का चिल्लाना अभी भी जारी था,

“यह बहुत ही कठिन है!! कोई भी ऊपर तक नहीं पहुँच पाएगा.”

धीरे धीरे कई और मेंढक थककर हार मानने लगे. पर इन सबमें एक बहादुर नन्हे मेंढक ने अपनी चढ़ान जारी रखी. वह लगातार दृढ़ मनोबल के साथ ऊपर चढ़ते जा रहा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह नन्हा मेंढक हार मानने वालों में से नहीं था.

अन्य सभी नन्हे मेंढक विशाल पेड़ की चढ़ाई से हार मान चुके थे सिवाय इस एकमात्र मेंढक के, जो अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अडिग था और निरंतर ऊपर की ओर चढ़ते जा रहा था. अपनी अद्भुत मेहनत के बाद वह अंततः विराट पेड़ के सिरे तक पहुँचने में सफल हो गया.tf2 भीड़ में सभी चकित थे कि जहाँ अन्य सभी मेंढक हार मान चुके थे वहाँ यह नन्हा मेंढक कैसे सफल हो पाया.

एक सह प्रतियोगी ने नन्हे मेंढक से उसके लक्ष्य तक पहुँच पाने तथा सफल होने की शक्ति का कारण पूछा.

और तब मालूम पड़ा कि विजेता बहरा था.

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सीख:

हमें सदा सकारात्मक रहना चाहिए. हमें दूसरों को हमसे हमारे सबसे अधिक ख़ूबसूरत सपने छीनने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. हमें सदा स्वयं में सम्पूर्ण विश्वास रखना चाहिए. उस नन्हे मेंढक के समान हमें दूसरों को अनसुना करके निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए- सफलता हमें अवश्य मिलेगी.

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अनुवादक- अर्चना

लापता घड़ी

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आदर्श : शांति
 उप आदर्श : ख़ामोशी, धीरज

एक किसान को अहसास हुआ कि उसकी घड़ी बाड़े में गुम गई है. watchयद्यपि घड़ी मामूली थी पर वह घड़ी किसान के लिए अत्यधिक भावनात्मक महत्ता रखती थी.

 

 

 

हर जगह ढूँढ़ने के बाद जब उसे घड़ी नहीं मिली

watch2तब किसान ने स्वयं ढूँढ़ने के बजाय बाड़े के बाहर खेल रहे बच्चों की टोली को इस कार्य पर लगा दिया. किसान ने बच्चों से वादा किया कि जो बच्चा उसे घड़ी ढूँढ़कर देगा उसे प्रचुर मात्रा में पुरस्कार दिया जाएगा.

 

watch1इनाम के बारे में सुनकर सारे बच्चे जोश में आ गए और सबने  जल्दी से बाड़े के भीतर जाकर, भूसे के ढेर की भली भाँति जाँच शुरू कर दी. पर हर जगह ढूँढ़ने के बाद भी उन्हें घड़ी नहीं मिली. किसान अपनी लापता घड़ी के लिए खोज से हार मानने ही वाला था कि एक नन्हा बालक उसके पास आया. घड़ी ढूँढ़ने के लिए उसने किसान से एक और मौके का निवेदन किया.

किसान ने बच्चे की ओर देखा और सोचा, “यह बच्चा लगता तो नेक है. इसे एक और मौका देने में कोई नुकसान नहीं है.”
अतः किसान ने बच्चे को पुनः बाड़े में भेजा. कुछ समय पश्चात वह नन्हा बालक हाथ में घड़ी लेकर बाहर आया.watch4 घड़ी देखकर किसान को ख़ुशी तो हुई पर वह आश्चर्यचकित था. उसने लड़के से पूछा कि जहाँ बाकी सब विफल रहे वहाँ वह कैसे सफल रहा.

 

 

लड़के ने उत्तर दिया, “मैंने कुछ नहीं किया. केवल ज़मीन पर बैठकर ध्यानपूर्वक सुना.

watch5 ख़ामोशी में मुझे घड़ी की टिक-टिक सुनी और उस दिशा में जाकर मैंने घड़ी ढूँढ़ ली.”

 

 

 सीख:

एक शांत मन उत्तेजित मन से कहीं बेहतर सोच सकता है. अगर हम हर रोज़ अपने मन को ख़ामोशी के कुछ पल देंगें तो पायेंगें कि अपनी अपेक्षा के अनुसार हम अपने जीवन को बहुत आसानी से सँवार सकते हैं.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना