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विश्वास की सीमा

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     आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: विश्वास, भरोसा

वह विमान में एक लम्बी उड़ान पर था. यात्रा के दौरान, आने वाली परेशानियों की पहली चेतावनी तब मिली जब विमान में संकेत प्रकाशित हुआ: “कृपया अपनी कुर्सी की पेटी बाँध लें.”

फिर कुछ समय के बाद एक स्थिर आवाज़ बोली, “मौसम खराब होने के कारण हम कुछ समय के लिए पेय पदार्थ देने की सेवा बंद कर रहे हैं. कृपया सुनिश्चित कर लें कि आपकी कुर्सी की पेटी बँधी हुई है.”

जैसे उसने विमान में अपने इर्द-गिर्द नज़र दौड़ाई, उसे अहसास हुआ कि अधिकतर यात्री चिंतित व भयभीत थे. तभी उद्घोषक की आवाज़ आई, “हमें खेद है कि इस समय हम भोजन की सेवा भी स्थगित कर रहे हैं. मौसम काफ़ी खराब है.”

और फिर अपेक्षित तूफ़ान उमड़ पड़ा. विमान के इंजन की आवाज़ के बादजूद बिजली की डरावनी कड़कड़ाहट सुनाई दे रही थी. बिजली चमकने से अंधकारमय आसमान प्रकाशित हो रहा था और पलक झपकते ही ऐसा प्रतीत होने लगा मानो विमान और उसके यात्रियों का अंत निकट था. एक क्षण प्रचंड हवा का प्रवाह विमान को ऊपर उठाता था और दूसरे ही क्षण इस प्रकार गिराता था मानो विमान ध्वस्त होने वाला हो.

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उस व्यक्ति ने स्वीकार किया कि अपने सहयात्रियों की तरह वह भी भयभीत व परेशान था. उसने कहा, “जब मैंने अपने आसपास देखा तो पाया कि लगभग सभी यात्री घबराए और डरे हुए थे. कुछ अपनी सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर रहे थे.

भविष्य निर्जन व निराशाजनक प्रतीत हो रहा था और कई यात्री अचम्भे व संदेह में थे यदि वह तूफ़ान का प्रकोप झेल पायेंगें.

तभी अचानक मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी जो तूफ़ान से ज़रा भी प्रभावित नहीं थी. उसने बहुत सहजता से अपने पैर कुर्सी पर रखे हुए थे और एक किताब पढ़ रही थी.

उसके छोटे से संसार में सब कुछ शांत व स्थिर था. कभी वह अपनी आँखें बंद कर लेती थी तो कभी पुनः किताब पढ़ने लगती थी; फिर कभी अपने पैर नीचे कर के सीधे कर लेती थी, पर चिंता या भय का कहीं नामोनिशान नहीं था. जब विमान प्रचंड तूफ़ान के कारण बुरी तरह डाँवाडोल हो रहा था, भयानक उग्रता से अचानक ऊपर उठने या नीचे गिरने के कारण इधर-उधर झटके खा रहा था; जब प्रायः सभी यात्री बुरी तरह डरे हुए थे, वह अनोखा बच्चा पूरी तरह से भयरहित व शांतचित था.

उस व्यक्ति को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. अंततः जब विमान अपने गंतव्य स्थान पर उतरा और सभी यात्री झटपट विमान से उतरने में लगे हुए थे, वह उस बच्चे, जिसे वह अचंभित होकर देख रहा था, से बात करने के लिए रूक गया.

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बातों-बातों में उसने भयानक तूफ़ान और विमान के अनियंत्रित ‘उतार-चढ़ाव’ के बारे में बात करते हुए उससे पूछा कि वह भयभीत क्यों नहीं थी? उस मासूम बच्चे ने उत्तर दिया,
“महाशय, इस विमान के चालक मेरे पिता हैं और वह मुझे घर ले जा रहे हैं.”

सीख:
जब हमें स्वयं पर पूरा भरोसा होता है और हमारा आत्मविश्वास अटल होता है, तब हम हर कार्य शांत रहकर सफलतापूर्वक करते हैं. विश्वास और निष्ठा सदा सफल होते हैं. कहानी में बच्ची सम्पूर्ण रूप से आश्वस्त थी कि उसके पिता उसे सुरक्षित रूप से घर पहुँचाएँगे. ठीक इसी प्रकार हमारे मालिक, प्रभु भी हमसे बेहद प्रेम करते हैं. यदि हमें अपने प्रभु में विश्वास व निष्ठा है तो हममें आत्मविश्वास विकसित होता है जो हमें सांसारिक यात्रा में सफल बनाता है.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक-अर्चना

 

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केवल समय ही प्रेम की कदर करेगा

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आदर्श: प्रेम

कई वर्ष पूर्व सभी भावनाएँ व जज़्बाद छुट्टी मनाने एक तटीय टापू पर एकत्रित हुए. सभी आनंदमय समय व्यतीत कर रहे थे. एक दिन अचानक आने वाले तूफ़ान की घोषणा हुई. मौसम विभाग से घोषणा सुनकर सभी जल्द से जल्द टापू से निकलने की चेष्टा करने लगे.

हर तरफ यथेष्ट तहलका मच गया और सभी टापू से बाहर निकलने के लिए अपनी नौकाओं की ओर भागने लगे; सारे कोलाहल के बावजूद विचित्र बात यह थी कि केवल प्रेम को कोई जल्दी नहीं थी. बहुत सारा अधूरा काम शेष बचा हुआ था. सारा काम समाप्त होने पर जब प्रेम के जाने का समय हुआ तब उसे अहसास हुआ कि उसके लिए कोई भी नाव नहीं बची थी. फिर भी आश्वासन रखकर उसने अपने चारों ओर देखा.

तभी सफलता अपनी उत्कृष्ट नाव में वहाँ से गुज़री. प्रेम ने उससे निवेदन किया, “कृपया मुझे अपनी नाव में ले लो.” परन्तु सफलता बोली, “मेरी नाव सोने और अन्य बेशकीमती जवाहरतों से भरी हुई है, तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है.”

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फिर अभिमान अपनी ख़ूबसूरत नाव में आया. प्रेम ने उससे पूछा, “अभिमान, क्या तुम मुझे अपनी नाव में लोगे? कृपया मेरी मदद करो.” अभिमान बोला, “नहीं, तुम्हारे पैर मैले हैं और मैं अपनी नाव गन्दी नहीं करना चाहता.”

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कुछ समय बाद शोक वहाँ से गुज़रा. प्रेम ने उसे भी मदद के लिए पुकारा पर शोक ने जवाब दिया, “मैं बहुत उदास हूँ. मैं एकांत में रहना चाहता हूँ.”

शोक की नाव वहाँ से गुजरने के जल्द बाद ख़ुशी वहाँ से गुज़री. प्रेम ने उसे भी मदद के लिए पूछा पर ख़ुशी अपने आप में इतनी प्रसन्न थी कि उसे किसी और की परवाह ही नहीं थी.

तभी अचानक कहीं से किसी ने आवाज़ दी, “प्रेम आओ, मैं तुम्हें अपने साथ लेकर चलूँगा.” प्रेम ने अपने इस रक्षक को पहचाना नहीं पर फिर भी कृतज्ञतापूर्वक झटपट नाव में बैठ गया.

सभी के सकुशल किनारे पर पहुँच जाने पर प्रेम भी अंत में नदी तट पर पहुँचा. नाव से उतरने के बाद वह ज्ञान से मिला. प्रेम ने पूछा, “ज्ञान, क्या तुम्हें पता है कि अन्य सभी द्वारा ठुकराए जाने पर किसने मेरी मदद की थी?” ज्ञान मुस्कुराया, “वह समय था क्योंकि केवल समय को ही तुम्हारा असली मोल और क्षमता मालूम है. प्रिय प्रेम, केवल तुम ही शान्ति व ख़ुशी ला सकते हो.”

सीख:
इस कहानी का सन्देश यह है कि जब हम संपन्न होते हैं तब हम प्रेम को नाकाबिल समझते हैं. जब हम स्वयं को महत्त्वपूर्ण समझते हैं तो हम प्रेम को सराहते नहीं हैं. सुख और दुःख में हम प्रेम पर ध्यान नहीं देते हैं. परन्तु समय के साथ हम प्रेम का वास्तविक महत्त्व समझते हैं. हमें अपने जीवन में प्रतिदिन प्रेम संजोकर सबके साथ बाँटना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

 

भगवान् राम से पत्र

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: अनुकम्पा, सभी में भगवान् को देखना

शिवानी की डाक पेटी में आज एक ही पत्र था. उसने पत्र उठाया और उसे खोलने से पहले लिफ़ाफ़े पर एक नज़र घुमाई. आश्चर्यचकित शिवानी ने एक बार पुनः लिफ़ाफ़े को जाँचा. लिफ़ाफ़े पर कोई भी टिकट या डाक-घर की मुहर नहीं थी. उसपर केवल शिवानी का नाम व पता लिखा हुआ था.

शिवानी ने झटपट पत्र पढ़ा:

“प्रिय शिवानी: शनिवार की दोपहर मैं तुम्हारे मुहल्ले में आने वाला हूँ और मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ.

सप्रेम, भगवान् राम.”

शिवानी ने काँपते हुए हांथों से पत्र मेज़ पर रखा और सोचने लगी, “भगवान् मुझसे मिलने क्यों आना चाहते हैं? मैं तो बहुत ही साधारण से महिला हूँ. मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है.”

मन में इस प्रकार के विचार लिए वह अपनी रसोईघर की खाली अलमारियों के बारे में सोचने लगी.

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“हे भगवान्! मेरे पास तो आपको देने के लिए वास्तव में कुछ भी नहीं है. मुझे झटपट दुकान से कुछ खाने के लिए खरीदकर लाना होगा.”

उसने अपना बटुआ खोला और पैसे गिनने लगी- २० रूपए और ५० पैसे.

“चलो, कम से कम मैं डबल रोटी और सब्ज़ी खरीद सकती हूँ.”

शिवानी ने जल्दी से कोट पहना और दुकान के लिए निकल पड़ी. एक पाव रोटी, कुछ सब्ज़ियाँ और दूध का एक डिब्बा खरीदने के बाद उसके पास मात्र ३० पैसे ही शेष बचे थे. उसे सोमवार तक इन्हीं पैसों से काम चलाना था. फिर भी वह खुश थी. अपनी खरीदारी का सामान उसने हाथ में लिया और मंद-मंद मुस्कुराते हुए घर वापस जाने लगी.

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“अरे भद्र महिला, क्या तुम हमारी मदद कर सकती हो?”
शिवानी खाने की परियोजना में इतनी तल्लीन थी कि गली में सिमट कर बैठे दो व्यक्तियों पर इसका ध्यान ही नहीं गया. एक पुरुष और एक महिला गली के एक कोने में बैठे हुए थे और दोनों ने फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे.

“महोदया, मेरे पास नौकरी नहीं है. अपनी पत्नी के साथ मैं इसी गली में रहता हूँ. सर्दी का मौसम शुरू हो गया है और हम दोनों को बहुत भूख भी लगी हुई है. अगर आप हमारी मदद करेंगीं तो हम आपका बहुत आभार समझेंगें.”

शिवानी ने दोनों को ध्यान से देखा. दोनों मलिन थे और उनके पास से गन्दी बदबू आ रही थी. शिवानी को विश्वास था कि यदि वह पति-पत्नी चाहते तो किसी प्रकार का काम करके कुछ पैसे कमा सकते थे.

“भाईजी, मैं अवश्य ही आपकी मदद करना चाहती हूँ पर मैं स्वयं भी एक गरीब महिला हूँ. मेरे पास सिर्फ कुछ सब्ज़ियाँ, पावरोटी और दूध है. आज रात मेरे घर खाने पर एक महत्वपूर्ण अतिथि आने वाला है और यह खाना मैं उसी के लिए ले जा रही हूँ. ”

“कोई बात नहीं, बहनजी. मैं समझता हूँ. आपका फिर भी धन्यवाद.”

उस आदमी ने अपनी पत्नी के कन्धों पर हाथ रखा और दोनों अपनी गली की ओर लौटने लगे. दोनों को वापस जाते देख, शिवानी के हृदय में दर्द की एक लहर सी उठी. वह भाग कर उनके पास गई और उस व्यक्ति को अपना किराने का सामान सौंप दिया.

“धन्यवाद, बहनजी. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! हम तहे दिल से आपके आभारी हैं.”
उस व्यक्ति की पत्नी को भी धन्यवाद कहते सुन, शिवानी की निगाह उस पर पड़ी. वह महिला स्पष्ट रूप से काँप रही थी.

“मेरे पास एक और कोट है. यह लो, तुम इसे रख लो.”
शिवानी ने अपना कोट उतारा और उस महिला के कंधों पर डाल दिया. फिर वह मुस्कुराते हुए मुड़ी और घर वापस लौटने लगी….. अब उसके पास न तो कोट था और न ही अपने अतिथि को खिलाने के लिए खाना.

जब तक शिवानी अपने घर के सामने वाले दरवाज़े तक पहुँची, वह ठिठुर रही थी और बेहद चिंतित थी. स्वयं प्रभु राम उसके घर पधारने वाले थे और उसके पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं था.
दरवाज़े की चाभी निकालने के लिए जब वह अपना बटुआ टटोल रही थी तब उसकी निगाह डाक-पेटी में पड़े एक लिफ़ाफ़े पर पड़ी.
“बड़ी अजीब बात है. आम तौर पर डाकिया एक दिन में एक बार ही आता है.”

शिवानी ने डाक-पेटी में से लिफ़ाफ़ा निकला और उसे खोलकर पढ़ने लगी:
“प्रिय शिवानी: तुम्हें एक बार पुनः देखकर अच्छा लगा. आनंददायक खाने के लिए तुम्हारा शुक्रिया. उस ख़ूबसूरत कोट के लिए भी तुम्हारा धन्यवाद.
सप्रेम- भगवान् राम. “

यद्यपि हवा में ठंडक थी और शिवानी ने कोट नहीं पहना हुआ था पर फिर भी उसे ठंड महसूस नहीं हो रही थी. उसकी आँखें ख़ुशी के आँसू बहा रहीं थीं और भगवान् राम का पत्र लेकर वह स्तंभित खड़ी हुई थी.

सीख:

मानव सेवा माधव सेवा होती है. ईश्वर की सृष्टि में हमें सर्वत्र ईश्वर को देखने का प्रयास करना चाहिए, सबसे प्रेम करना चाहिए और अवसर मिलने पर सबकी सेवा करनी चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

कृष्ण के प्रति द्रौपदी की भक्ति- नाम स्मरण की ताकत

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: अनुराग, श्रद्धा

द्रौपदी, पांडवों की पत्नी थी. भगवान् कृष्ण ने द्रौपदी को कई बार अपमान व निरादर से बचाया था. भगवान् कृष्ण की पत्नियाँ, सत्यभामा और रुक्मिणी, अक्सर अचंभित होती थीं कि भगवान् , द्रौपदी की इतनी मदद क्यों करते थे और उसपर इतना अनुग्रह क्यों बरसाते थे.

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उनकी शंका दूर करने के लिए एक दिन कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी से कहा कि वह दोनों उनके साथ द्रौपदी के घर चलें.

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जब वह द्रौपदी के घर पहुँचे तब द्रौपदी स्नान करने के पश्चात अपने बाल सँवार रही थी. कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को बाल बनाने में मदद करें. यद्यपि सत्यभामा और रुक्मिणी क्रुद्ध थीं पर फिर भी उन्होंने कृष्ण की आज्ञा का पालन किया. द्रौपदी के एक-एक बाल से ‘कृष्णा, कृष्णा’ का निरंतर गुणगान सुनकर दोनों को बहुत ही आश्चर्य हुआ और तब उन्हें अहसास हुआ कि द्रौपदी सही मायने में कृष्ण के अनुग्रह की अधिकारी थी. कृष्ण का नाम द्रौपदी के रोम-रोम में व्याप्त था. कृष्ण के लिए उसकी ललक और भक्ति तथा उनके प्रति प्रेम से उसका अस्तित्व पूरी तरह भरा हुआ था. अपने इस भक्त की दिली श्रद्धा को पुरस्कृत करने के लिए भगवान् कृष्ण बाध्य थे. नामजप की इस सहज साधना के माध्यम से द्रौपदी ने प्रभु के साथ निरंतर संसर्ग प्राप्त किया था.

सीख:

कलयुग में ईश्वर के नाम का सतत जाप सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक अभ्यास है. ईश्वर के नाम का निरंतर गुणगान प्रचुर अनुग्रह व प्रेम सुनिश्चित करता है. ईश्वर को प्राप्त करने का यह सबसे अच्छा तरीका है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक – अर्चना

भगवान में विश्वास

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        आदर्श: विश्वास
  उप आदर्श : भरोसा

एक नवविवाहित व्यक्ति अपनी ख़ूबसूरत पत्नी के साथ घर लौट रहा था. वह दोनों नाव से नदी पार कर रहे थे जब अचानक ही वह एक भयनाक तूफ़ान में फंस गए.

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वह व्यक्ति जो वास्तव में सैनिक था, भयरहित था पर उसकी पत्नी अत्यधिक डरी हुई व मायूस थी. उनकी छोटी सी किश्ती बड़ी-बड़ी प्रबल लहरों में डावांडोल हो रही थी और तूफ़ान की उग्रता से पत्नी को बहुत डर लग रहा था. उसे भय था कि किसी भी क्षण उनकी नाव उलट जाएगी और वह डूब जायेंगें. परन्तु वह व्यक्ति शांत, स्थिर व अव्याकुल था मानो कुछ भी न हुआ हो.

पत्नी ने कांपती हुई आवाज़ में अपने शांत पति से पूछा, “क्या आपको डर नहीं लग रहा है? यह हमारी ज़िन्दगी का आखिरी पल भी हो सकता है! हमारा तट पर पहुँच पाना असंभव सा लग रहा है. केवल एक चमत्कार ही हमें बचा सकता है; वरना हमारा अंत निश्चित है. क्या आपको डर नहीं लग रहा है? आप बावले हैं क्या? आप पत्थर के बने हैं क्या?

व्यक्ति हँसा और उसने कोष में से अपनी तलवार निकाली.trust3 पति को इस प्रकार तलवार निकालते हुए देखकर पत्नी और भी अधिक उलझन में आ गई और अचंभित थी कि वह क्या करने वाला है. तत्पश्चात पति अपनी तलवार पत्नी के गले के पास ले आया, इतनी करीब ले आया कि तलवार पत्नी के गले को करीब-करीब छू रही थी.

पति ने पत्नी से पूछा, “क्या तुम्हें डर लग रहा है? ”
पत्नी हँसने लगी और बोली, “मुझे क्यों डर लगेगा? भले ही आपके हाथ में तलवार है पर मैं क्यों डरूँ? मुझे पूरा विश्वास है कि आप मुझसे प्रेम करते हैं.”
पत्नी की बात सुनकर तलवार वापस रखते हुए पति बोला, “यही मेरा उत्तर है. मैं जानता हूँ कि भगवान मुझसे प्रेम करते हैं और यह तूफ़ान उन्हीं के हाथ में है.”

अतः जो भी होगा, अच्छा ही होगा क्योंकि सब कुछ ईश्वर के हाथ में है और वह कभी कुछ गलत नहीं कर सकते हैं.

सीख:
हमें स्वयं में दृढ़ विश्वास विकसित करना चाहिए. यह दृढ़ विश्वास ही हमारे जीवन को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखता है.

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अनुवादक- श्रीमती सरस्वती व अर्चना

निस्स्वार्थ प्रेम- लंगर के रूप में

 

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: दया भाव, अपने प्रभु के प्रति प्रेम

कई वर्ष पूर्व, गुरु गोबिंद राय सिखों के अधिनायक व उनके १०वे गुरु थे. वह जवान व सशक्त थे और अक्सर ठहाके मारकर हँसते थे. ईश्वर के प्रति उनका प्रेम अचल व प्रगाढ़ था और उनकी संगत में सभी परमानंद का अनुभव करते थे. उनके साथ जीवन सदा मनोरंजक चुनौती व गूढ़ भक्ति से भरपूर रहता था. उनके भक्त हमेशा यह जानने के लिए उत्सुक रहते थे कि उनकी अगली शिक्षा क्या होगी.

एक बार उन्होंने अपने चाहने वालों में घोषणा की, “आप सभी को अपने घरों में लंगर करना चाहिए. मेरे प्रिय सिखों, सुनो….सभी पथिकों और अतिथियों को खाना खिलाने के लिए आपका घर एक भवन होना चाहिए. ज़रुरतमंदों को भोजन कराओ.आपके घर से कोई भी भूखा या निराश नहीं जाना चाहिए.”

सबने गुरूजी की बात पर अमल करने का निश्चय किया और धीरे-धीरे सेवा भाव व दूसरों की देखभाल करने के लिए सिखों की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी. इस सब के बावजूद गुरूजी सिखों को परखना चाहते थे- क्या वह कभी-कभार सेवा के लिए तत्पर रहते थे या सदैव ही तैयार रहते थे?

एक दिन सवेरे-सवेरे एक मज़ेदार घटना घटी. वह प्रभु की दिव्य शरारत थी. गुरु गोबिंद राय ने अपना भेष बदला और एक साधारण यात्री का लिबास पहन लिया. सामान्यतः गुरूजी हमेशा उत्तम व स्वच्छ कपड़े पहनते थे. पर उस दिन उन्होंने मटमैले पुराने कपड़े पहने ताकि उन्हें कोई पहचान नहीं पाए.

वह अपने भक्तों के घर गए -उनके लंगर भवनों में. उन्होंने इस कार्य के लिए सबसे अधिक असुविधाजनक समय का चयन किया. सवेरे का समय था और सिख समुदाय के लोग सोकर उठे ही थे. वह नहा-धोकर पूजा-पाठ की तैयारी कर रहे थे. लोगों के घरों के दरवाज़ों पर दस्तक देकर गुरूजी बोले, “परेशानी के लिए माफ़ी चाहता हूँ, मैं एक साधारण पथिक हूँ. क्या आपके घर मेरे खाने योग्य रोटी होगी?”

“ओह! अभी तो बहुत सवेरे है, तुम बहुत जल्दी आ गए. माफ़ करना पर इस समय तुम्हारे लिए घर पर कुछ भी नहीं है. खाना कुछ देर के बाद पकेगा. तुम बाद में आना- तब हम तुम्हें खाना खिला सकते हैं.”

गुरु केवल अपने प्रियजनों की परीक्षा ले रहे थे. वह उन्हें अविस्मरणीय ढ़ंग से एक सहज सीख देना चाहते थे. वह उन्हें यह अहसास करवाना चाहते थे कि उनमें अभी भी स्वार्थ शेष था और वह पूरी तरह निस्स्वार्थ नहीं थे. वह अभी भी हर पल दूसरों के लिए उपलब्ध नहीं थे.

और इस कारण गुरु घर-घर गए, “इस समय आपको परेशान करने के लिए क्षमा चाहता हूँ पर मैं एक पथिक हूँ. आपके पास मेरे लिए थोड़ी दाल होगी? ” एक व्यक्ति ने उत्तर दिया, “ओह! अभी तो बहुत सवेरे है, अभी नाश्ते का समय भी नहीं हुआ है. और दाल बनाने में काफ़ी समय लगता है. आपकी सेवा करके हमें खुशी होगी…पर कृपया कुछ समय के बाद आना.”

जैसे-जैसे गुरु एक घर से दूसरे घर चलते गए, उनके चहरे पर मुस्कराहट और आँखों में चमक थी. कोई भी सिख उन्हें खाना देने के लिए तैयार नहीं था.

अंततः गुरु नन्दलाल नामक व्यक्ति के घर पहुँचे. नन्दलाल एक उत्कृष्ट कवि था और सच्चे गुरु से प्रेम करता था. उम्र में गुरु गोबिंद राय से २३ वर्ष बड़े होने के बावजूद वह उनका भक्त बना. गुरु की निगरानी में उसका हृदय विकसित हुआ और वह प्रेम तथा भक्ति का उदाहरण बना. वह सदा अपने गुरु के चरणों का ध्यान करता था.

प्रियतम नन्दलाल ने झटपट आगे बढ़कर अपने मेहमान का स्वागत किया, “स्वागत है, स्वागत है, दोस्त!”
आवृत गुरु बोले, “क्षमा कीजिए, महाशय….”
नन्दलाल ने तुरंत जवाब दिया, “आइए, आइए! कृपया बैठिए और विश्राम कीजिए.”
गुरु बोले, “मैं एक साधारण पथिक हूँ. क्या तुम्हारे पास खाना ….”
बिना संकोच किए नन्दलाल बोला, “महाराज, आपको पूछने की ज़रुरत नहीं है. खाना अभी आ रहा है.”

सेवा का अवसर मिलने पर नन्दलाल बहुत खुश था. वह झटपट घर में उपलब्ध खाना लेकर आया- कच्चा आटा, आधी पकी दाल, थोड़ा मक्खन और कुछ कच्ची सब्जियाँ. विनम्रता व सम्मान के साथ सारा खाना अपने मेहमान के समक्ष रखकर उदारतापूर्वक बोला,”तुम्हें जितना और जो भी खाना है, आराम से खाओ….लेकिन अगर तुम मुझे अनुमति दोगे तो मैं आटा गूंदकर तुम्हारे लिए गरम रोटी बना सकता हूँ, दाल को ठीक से पका सकता हूँ और स्वादिष्ट सब्ज़ी बना सकता हूँ. अपने गुरु के नाम में तुम्हारा स्वागत करना मेरा सौभाग्य है. कृपया आराम से बैठकर भोजन का आनंद लो.”

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नन्दलाल भाई को सेवा करना बहुत अच्छा लगता था. उसका आचरण देखकर गुरूजी अति प्रसन्न हुए और उन्होंने खूब आनंद लेकर भोजन किया. भोजन में प्रेम और सेवा का भाव भरपूर था. नन्दलाल ने दिल से अपने गुरु के आदेश का पालन किया, “तुम्हारे घर से कोई भी खाली पेट कभी न जाए…..” नन्दलाल के घर पर दस्तक देने वाला हर व्यक्ति सदा संतुष्ट होकर जाता था. इस प्रकार का प्रीतिमय व स्नेहमय वातावरण होने के कारण नन्दलाल के घर में भगवान् का वास था.

अगली सुबह गुरूजी ने सबसे कहा, “हमारे शहर में अतिथि सत्कार का केवल एक ही मंदिर है, केवल एक ही असली लंगर है. और वह नन्दलाल का घर है. नन्दलाल प्रेम और भक्ति की भाषा बोलता है और सभी को आशीर्वाद देता है. उसकी प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है. इस प्रकार का प्रेम ही सबका दिल जीतता है. नन्दलाल भाई का लंगर सबसे अधिक कामयाब है और सभी सिखों को इस प्रकार के लंगर को अपनाना चाहिए.”

सभी एकत्रित सिख मुस्कुराए जब उन्हें अहसास हुआ कि उनके प्रिय गुरुजी ने उनकी परीक्षा ली थी. यद्यपि वह सभी स्नेहशील थे पर फिर भी वह अभी तक पूर्णतया सफल नहीं हो पाए थे. नन्दलाल भाई सेवा हेतु सदा तैयार रहता था. वह सदा आनंदमय रहता था और सबको निःसंकोच व स्वेच्छा से ख़ुशी-ख़ुशी लंगर परोसता था. निःस्वार्थ बनने पर हम हमेशा खुश रहते हैं. नन्दलाल भाई ने अपने उदाहरण से सबको बतलाया कि मेहमानों की सेवा किस प्रकार से की जाती है.

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नन्दलाल भाई बोले, “किसी धर्मात्मा के लिए पानी लाना संसार के सबसे महान सम्राट होने के समान होता है. उनके लिए भोजन तैयार करना समस्त स्वर्गलोकों से भी अधिक प्रीतिकर होता है. गुरु के लिए लंगर तैयार करना सभी धन, संपत्ति व जादुई आलौकिक शक्तियों के बराबर होता है. धार्मिक लोग दरिद्रों की देखभाल करते हैं और उनके संपर्क में विनम्रता का अहसास होता है. गुरु के पावन बोल सबके भीतर व सर्वत्र विद्यमान होते हैं……”

सीख:
हमें स्वयं को निरंतर शिक्षित करके स्वयं में सुधार लाना चाहिए. हमारे गुरुओं ने हमें सिखाया है कि प्रेम व सेवा की कोई सीमा नहीं होती है. घर आए मेहमान को हमें प्रगाढ़ सम्मान देना चाहिए. सबमें ईश्वर को देखकर, सबसे प्रेम करना चाहिए और सबकी सेवा करनी चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

 

 

 

 

 

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आम का पेड़

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: आदर, देख-रेख

एक बार आम का एक बहुत बड़ा पेड़ था. एक नन्हा बालक हर रोज़ उस पेड़ के आस-पास खेला करता था. कभी वह पेड़ के ऊपर चढ़ता था, कभी पेड़ के पक्के आम तोड़कर खाता था और कभी पेड़ की छाया में सो जाता था. उसे आम का वह पेड़ बहुत पसंद था और पेड़ को भी उसके साथ खेलना अच्छा लगता था.

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समय बीतता रहा….. नन्हा बालक बड़ा हो गया और अब वह पेड़ के आस-पास नहीं खेलता था.

एक दिन उदास चेहरा लेकर वह लड़का पेड़ के पास वापस आया.

लड़के को देखकर पेड़ बोला, “आओ, मेरे साथ खेलो.”
“नहीं, अब मैं बच्चा नहीं रहा. मैंने पेड़ के आस-पास खेलना छोड़ दिया है,” लड़के ने जवाब दिया. “मुझे खिलौने चाहिए हैं और उन्हें खरीदने के लिए मुझे पैसों की आवश्यकता है.”aam3
“माफ़ करना, मेरे पास पैसे नहीं हैं…. पर तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बेचकर तुम्हें पैसे मिल जाएंगें.”
पेड़ का सुझाव सुनकर लड़का बहुत ही खुश हो गया. फिर पेड़ के सारे आम तोड़कर वह वहाँ से ख़ुशी-ख़ुशी चला गया. काफी समय तक वह लड़का वापस नहीं आया और पेड़ उदास था.

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एक दिन वह लड़का पेड़ के पास पुनः लौटा. इस बार वह बड़ा होकर आदमी बन चुका था. उसे देखकर पेड़ बहुत ही खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो, ” पेड़ ने कहा.
“मेरे पास खेलने का समय नहीं है. मुझे अपने परिवार के लिए काम करना है. हमें एक घर की ज़रुरत है. क्या तुम हमारी मदद कर सकते हो?”
“माफ़ करना, मेरे पास घर नहीं है. पर अपना घर बनाने के लिए तुम मेरी शाखाएँ काट सकते हो.”

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अतः युवक ने पेड़ की सारी शाखाएँ काट लीं और ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से चला गया. उसे खुश देखकर पेड़ प्रसन्न था पर उसके बाद वह युवक वापस नहीं आया. एक बार फिर पेड़ अकेला व उदास था.

कड़ी गर्मी के एक दिन वह युवक लौटा और उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो.”
“मैं उदास हूँ और वृद्ध हो रहा हूँ. अपने विश्राम के लिए मैं नौकायान पर जाना चाहता हूँ. क्या तुम मुझे एक नाव दे सकते हो?”
“तुम मेरे तने से नाव बना लो. नाव लेकर तुम लम्बी जलयात्रा पर निकल जाओ और यात्रा का आनंद लो.”

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पेड़ की बात सुनकर उस व्यक्ति ने पेड़ का तना काटा और अपने लिए एक नाव तैयार कर ली. वह जलयात्रा पर चला गया और काफी समय तक वापस नहीं आया.

अंततः कई वर्षों के बाद वह व्यक्ति वापस लौटा.
“माफ़ करना, मेरे बच्चे, पर अब मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है. तुम्हें देने के लिए आम भी नहीं बचे हैं, पेड़ ने कहा.
व्यक्ति ने उत्तर दिया, ” अब तो मेरे पास दांत भी नहीं हैं.”
“तुम्हारे चढ़ने के लिए तना भी नहीं बचा है.”
व्यक्ति बोला, “उसके लिए मैं बूढ़ा हो चुका हूँ.”
“मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है…. केवल मेरी मुरझाई हुई जड़ें ही बाकी बची हैं, ” पेड़ ने निराश होकर कहा.
“अब मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. इतने वर्षों के बाद मैं थक चुका हूँ, ” व्यक्ति ने उत्तर दिया.
“अच्छा है! टेक लगाकर आराम करने के लिए पुराने वृक्ष की जड़ें सर्वोत्तम होती हैं.”

वह व्यक्ति मुस्कुराया और वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गया.

सीख:
कहानी में पेड़ हमारे माता-पिता को दर्शाता है. जब हम छोटे होते हैं तब हम उनके साथ खेलना पसंद करते हैं. जब हम बड़े हो जाते हैं तब हम उन्हें छोड़कर चले जाते हैं और वापस तभी आते हैं जब हमें मदद चाहिए होती है. माता-पिता हमारे लिए अपने जीवन का बलिदान करते हैं. हमें उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और जब उन्हें हमारी सबसे अधिक ज़रुरत होती है, हमें उनकी मदद अवश्य करनी चाहिए. उन्हें केवल हमारे प्रेम की आवश्यकता होती है और हमारे साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना