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माँ के प्रति प्रेम

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: आदर

एक नन्हा बालक अपनी माँ के साथ रहता था. उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. बालक बहुत ही रूपवान और अत्यंत बुद्धिमान था. समय के साथ-साथ वह बालक और भी अधिक आकर्षक व तीव्रबुद्धि होता गया. परन्तु उसकी माँ हमेशा उदास रहती थी.

एक दिन बालक ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, तुम सदा उदास क्यों रहती हो?”
माँ ने उत्तर दिया, “बेटा, एक ज्योतिषी ने एक बार मुझसे कहा था कि जिनके दाँत तुम्हारे जैसे होते हैं वह जीवन में बहुत विख्यात होते हैं.”
इस पर बालक ने पूछा, “अगर मैं प्रसिद्ध हो जाऊँगा तो क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा?”
“अरे, मेरे बच्चे! ऐसी कौन सी माँ होगी जो अपने बच्चे को प्रसिद्ध देखकर खुश नहीं होगी. मैं तो यह सोचकर उदास रहती हूँ कि जब तुम प्रसिद्ध हो जाओगे तब तुम मुझे भूल जाओगे.”

माँ की बात सुनकर लड़का रोने लगा. वह कुछ देर माँ के सामने खड़ा रहा और फिर घर से बाहर भाग गया. बाहर जाकर उसने एक पत्थर उठाया और अपने दाँतों पर ज़ोर से मारकर आगे के २ दाँत तोड़ दिए. पत्थर के प्रहार से दाँत टूटने पर उसके मुँह से खून बहने लगा.

उसकी माँ भागकर बाहर आई और अपने पुत्र की हालत देखकर दंग रह गई. माँ ने पूछा, “बेटा! यह तुमने क्या किया?”
माँ का हाथ पकड़कर बालक बोला, “माँ, अगर इन दाँतों से तुम्हें कष्ट पहुँचता है और अगर यह तुम्हारी उदासी का कारण हैं तो मुझे यह दाँत नहीं चाहियें. यह मेरे किसी काम के नहीं हैं. मैं इन दाँतों से विख्यात नहीं होना चाहता. मैं आपकी सेवा करके और आपके आशीर्वाद से प्रसिद्ध होना चाहता हूँ.”

दोस्तों, यह बालक और कोई नहीं बल्कि चाणक्य था.

सीख:
माता-पिता व बड़ों का आशीर्वाद हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. हमारे माता-पिता हमसे निस्स्वार्थ प्रेम करते हैं. जो भी अपने माता-पिता से प्रेम करता है, उनका सम्मान करता है और उनकी सेवा करता है उन्हें माता-पिता का आशीर्वाद प्रचुरता में मिलता है जिसकी बदौलत वह सदा खुश रहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

नामस्मरण की ताकत

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: विश्वास, प्रार्थना की शक्ति

एक बार नारद मुनि भगवान् नारायण से मिलने गए.
भगवान ने नारद से पूछा …..nm1

नारायण: नारद, कैसे हो?
नारद : मैं ठीक हूँ, भगवन और हमेशा की तरह तीनो लोकों का भ्रमण कर रहा हूँ.
नारायण: तो तुम किस इरादे से भ्रमण करते हो?
नारद : भगवन मैं सिर्फ आपका ही ध्यान करता हूँ. मैं सतत नारायण, नारायण का गुणगान करता रहता हूँ. पर भगवन मुझे समझ में नहीं आता कि आपके नाम का भजन करने का क्या इनाम है.nm2
नारायण: नारद! तुम लगातार नामस्मरण करते हो पर फिर भी तुम्हें उसकी शक्ति की समझ नहीं है. जाओ और उस पेड़ पर बैठे कौए से पूछो.

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नारद उस कौए के पास गए और बोले, “नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
यह सुनते ही कौआ पेड़ से गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई. नारद भगवान् नारायण के पास गए और बोले,

नारद: भगवन, मैंने कौए से पूछा पर वह तो मुझे सुनते ही पेड़ से गिरकर मर गया. क्या नामस्मरण का यही इनाम है? नारायण: सत्य तक पहुँचने के लिए समय का सदुपयोग बहुत आवश्यक है. नारद, तुम उस गरीब ब्राह्मण के घर जाओ. वहाँ पिंजरे में एक ख़ूबसूरत तोता है. उसका शरीर हरे रंग का है और चोंच लाल रंग की है. तुम जाकर उससे पूछो.”

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नारद ने तोते के पास जाकर उससे पूछा, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
यह सुनते ही तोता तुरंत गिरकर मर गया.
नारद एक बार फिर भगवान् नारायण के पास गए.

नारद : मैंने तोते से पूछा. पर वह तुरंत गिरकर मर गया. क्या यही इनाम है?
नारायण : नारद, सत्य जानने के लिए सदा दृढ़ रहना चाहिए. तुम ब्राह्मण के घर जाओ. वहाँ कल ही एक बछड़े का जन्म हुआ है. जाकर उससे पूछो.

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नारद बछड़े के पास गए और बोले, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
बछड़े ने सिर उठाया, नारद को देखा और गिरकर मर गया.
नारद पुनः नारायण के पास गए.

नारद: मैं सत्य जाने बिना अब यहाँ से नहीं जाऊँगा. हे भगवन! क्या यही इनाम है?
नारायण : नारद, तुम जल्दबाज़ी मत करो. जल्दबाज़ी से काम खराब हो जाता है. हानि दुःख का कारण होती है. इस कारण तुम हड़बड़ी मत करो और धैर्य रखो. पृथवी पर राजा के घर कल ही एक पुत्र का जन्म हुआ है. राजा बहुत ही प्रसन्न है. जाकर उस नवजात से पूछो.
नारद भयभीत थे. उन्होंने सोचा, “यदि वह नवजात भी मर गया तो सिपाही मुझे गिरफ्तार कर लेंगें. मेरी भी मृत्यु हो जाएगी. क्या यही इनाम है?”

नारायण: नारद, उतावले मत हो. जाकर बच्चे से पूछो.

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नारद राजा के पास गए. जब नारद ने बच्चे को देखने की इच्छा प्रकट की तब बच्चे को सोने की थाल में लाया गया.
नारद ने राजा से पूछा,”महाराज! क्या मैं इस बच्चे से एक प्रश्न पूछ सकता हूँ?”
राजा की सहमत मिलने पर नारद ने बच्चे से पूछा, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
नारद का प्रश्न सुनकर नन्हा राजकुमार बोला:

“नारद, क्या आपने अब तक यही सीखा है? यद्यपि आप रात-दिन प्रभु के नाम का गुणगान करते रहते हैं फिर भी आपको समझ नहीं है. सबसे पहले मैं एक कौआ था. आप आए और मुझसे नामस्मरण के इनाम के बारे में पूछा. नारायण का नाम सुनते ही मेरा जीवन परिपूर्ण हो गया और मैंने जीवन त्याग दिया. फिर मेरा जन्म एक तोते के रूप में हुआ. कहाँ एक कौआ और कहाँ एक तोता? एक तोते का पोषण पिंजरे में होता है. आपने पुनः आकर मुझसे वही सवाल एक बार फिर किया. इसके बाद मेरा जन्म एक बछड़े के रूप में हुआ. यह और भी अधिक श्रेष्ठ और बेहतर जीवन है. भारतीय गाय की पूजा करते हैं. मैंने आपके माध्यम से भगवान् का नाम सुना और मर गया. और अब मेरा जन्म एक राजकुमार के रूप में हुआ है. कहाँ एक कौआ, तोता, बछड़ा और कहाँ एक राजकुमार? नामस्मरण से हमारी जागृति व सुगति होती है और इस कारण इस जन्म में मैं एक राजकुमार हूँ. नारायण के नाम का भजन करने का यही इनाम है.”
सीख:
जब हममें प्रेम, विश्वास व श्रद्धा होती है तब हमारी चेतना का विकास अवश्य होता है. भगवान् का नाम सुनने मात्र से एक कौआ तोता बना और फिर बछड़ा और अंततः राजकुमार. नारायण के नाम के श्रवण से ही उसे मनुष्य जीवन मिला जो सबसे अधिक दुर्लभ है. यदि भगवान् का नाम सुनना इतना चमत्कारिक है तो भगवान् के नाम का उच्चारण कितना शक्तिशाली होगा? इसलिए हमें अपने पूरे होशो-हवास में भरपूर श्रद्धा से नामस्मरण करना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

अपने मालिक के प्रति प्रेम

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श : श्रद्धा, सम्मान

हज़रत अमीर खुसरो के बारे में एक अनोखी कहानी विख्यात है जो अपने पीर के प्रति उनकी असीम श्रद्धा व प्रेम को स्पष्ट करती है.

हज़रत निज़ामुद्दीन की उदारता के बारे में सुनकर एक बार भारत के दूर-दराज़ इलाके से एक गरीब व्यक्ति उनसे मिलने दिल्ली आया. वह व्यक्ति अपनी आर्थिक समस्याओं के समाधान में उनकी सहायता चाहता था. संयोग से उस दिन उनके पास देने के लिए उनके पुराने जूतों के सिवाय और कुछ नहीं था. यद्यपि गरीब व्यक्ति बहुत निराश हुआ पर फिर भी पीर का शुक्रिया अदा कर के वह वहाँ से चला गया.

वापस लौटते समय रात बिताने के लिए उसने एक सराय में आश्रय लिया. संयोगवश उसी रात हज़रत अमीर खुसरो, जो बंगाल से व्यापारिक यात्रा से लौट रहा था, भी उसी सराय में ठहरा. हज़रत अमीर खुसरो उस समय हीरे-जवाहरात में व्यापार करता था और दिल्ली का सबसे अधिक अमीर नागरिक माना जाता था. अगली सुबह जब हज़रत अमीर खुसरो उठा तब उसने . टिप्पणी की: यहाँ मुझे अपने पीर की खुशबू आ रही है.”

खुशबू का स्त्रोत ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह उस व्यक्ति तक पहुँचा और उससे पूछा यदि वह दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से मिला था. उसने हाँ में जवाब देते हुए हज़रत अमीर खुसरो को हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से अपनी मुलाक़ात की सारी कहानी सुनाई. फिर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया द्वारा दिए जूतों को दिखाकर उसने शोक प्रकट किया कि वह कितने पुराने और मूल्यहीन थे.

हज़रत अमीर खुसरो ने तुरंत अपनी सारी दौलत के बदले में उस व्यक्ति से अपने पीर के जूते माँगे. अपनी इस आकस्मिक खुशकिस्मती पर वह व्यक्ति अत्यधिक खुश हुआ. उसने हज़रत अमीर खुसरो को जूते दिए, उसका बार-बार शुक्रिया अदा किया और आनंदित होकर घर लौट गया. अमीर खुसरो आखिरकार अपने गुरु के पास पहुँचा और जूते उनके चरणों में रख दिए. जब उसने पीर को बताया कि उन जूतों के बदले में उसने अपनी समस्त दौलत प्रतिदान की है तब हज़रत निज़ामुद्दीन बोले, “खुसरो, तुम तो इन्हें बहुत सस्ते में ले आए.”

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सीख:
एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति प्रेम का यह एक अति उत्तम उदाहरण है. शिष्य के लिए उसके गुरु की पादुका सबसे अधिक पूजनीय होती है. यह हमें अपने अहम् पर पकड़ ढीली कर के आत्मसमर्पण करना सिखाती हैं.

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अनुवादक- अर्चना

प्रेम क्या होता है

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     आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : निस्स्वार्थ सेवा/ प्रतिबद्धता

सुबह के ८:३० बजे थे और हर तरफ चहल-पहल थी. सभी कर्मचारी अपने अपने काम में व्यस्त थे. एक वयोवृद्ध सज्जन, जिनकी उम्र ८० साल के लगभग थी, अपने अंगूठे के टांके कटवाने आए. उन्होंने निवेदन किया कि वह जल्दी में थे क्योंकि ९ बजे उन्हें किसी से मिलने जाना था. मैंने उनके प्राणाधार आंकड़े लिए और उन्हें बैठाया क्योंकि मुझे मालूम था कि उन्हें कम से कम एक घंटा इंतज़ार करना पड़ेगा.old3 जब मैंने उन्हें अपनी घड़ी की ओर बार-बार देखते हुए देखा तो मैंने निश्चय किया कि मैं स्वयं ही उनके ज़ख़्म का निरीक्षण करूँगा. वैसे भी मैं किसी मरीज़ के साथ व्यस्त नहीं था. निरीक्षण करने पर मैंने पाया कि उनका घाव भर चुका था. मैंने एक अन्य डॉक्टर से बात की और उनके टांके खोलने के लिए आवश्यक सामान लेकर आया. टांके खोलने के बाद मैंने दुबारा से उनके घाव पर पट्टी बाँध दी. इस दौरान मैं उनसे बातचीत करने लगा. मैंने उनसे पूछा उनके इतनी जल्दबाज़ी में होने का कारण क्या एक अन्य डॉक्टर से मिलने जाना था. उन्होंने कहा नहीं- उन्हें नर्सिंग होम जाकर अपनी पत्नी के साथ सुबह का नाश्ता करना था. उनकी पत्नी के स्वास्थ्य के बारे में पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि उनकी पत्नी काफ़ी समय से नर्सिंग होम में थी और मानसिक रोग से पीड़ित थी. कुछ समय बाद जब मैंने उनकी मरहम-पट्टी पूरी तरह से कर दी तब मैंने उनसे पूछा कि क्या थोड़ी देर से पहुँचने पर उनकी पत्नी चिंतित होगी. उन्होंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया कि अब उनकी पत्नी को पता नहीं था कि वह कौन हैं. पिछले पाँच सालों से वह उन्हें पहचानती नहीं थी. मैं आश्चर्यचकित था और मैंने उनसे पूछा, “वह आपको पहचानती भी नहीं है और आप फिर भी हर सुबह उनके पास जातें हैं?” सज्जन पुरुष मुस्कुराए और मेरा हाथ को थपथपाते हुए बोले, “वह मुझे नहीं जानती है पर मुझे अभी भी पता है कि वह कौन है.”

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सीख:

सच्चा प्रेम बिना किसी अपेक्षा का होता है. ऐसे व्यक्ति केवल इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि वे प्रेम करना चाहते हैं और बदले में कोई उम्मीद नहीं रखते हैं- ना किसी सराहना की, ना आभार की और ना ही सम्मान की. धन्य हैं ऐसे लोग जो कहानी के वृद्ध पुरुष के समान प्रेम व सेवा कर सकते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

विकलांग राजा

 

     आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: सकारात्मक दृष्टिकोण

एक विकलांग राजा था जिसकी एक आँख थी और केवल एक ही पैर था.

उसने अपने राज्य के सभी चित्रकारों से उसकी एक आकर्षक तस्वीर बनाने को कहा. सभी चित्रकार परेशान थे. राजा के अपूर्ण अंगों के साथ उसकी ख़ूबसूरत तस्वीर बनाने का काम कोई भी चित्रकार सफलतापूर्वक नहीं कर पा रहा था.

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अंततः एक चित्रकार सहमत हुआ और उसने राजा की अति उत्कृष्ट छवि बनाई.

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वह एक बहुत ही शानदार तस्वीर थी और सभी देखनेवाले स्तम्भित थे.

उस कलाकार ने राजा को एक शिकार की ओर निशाना लगाते हुए चित्रित किया. चित्र में राजा एक आँख बंद करके और अपनी एक टांग मोड़कर लक्ष्य साध रहा था.

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सीख:
चित्रकार की तरह हमें भी दूसरों का वर्णन करते समय उनकी दुर्बलताओं को छिपाते हुए उनके सदगुणों को विशिष्ट रूप से दर्शाना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

हर दिन एक उपहार है

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आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: रवैया

एक महिला ९२ वर्षीय वृद्ध, संतुलित, स्वाभिमानी और छोटे कद की थी. यद्यपि वह अंधी थी, फिर भी हर सुबह अपने बालों में कंघी करके, बखूबी पूरा श्रृंगार करके ८ बजे तक वह अच्छे तरीके से तैयार हो जाती थी. आज उसे नर्सिंग होम ले जाया जा रहा था.

उसके पति ने ७० साल तक उसका साथ निभाया था और हाल ही में उसकी मृत्यु हो गयी थी. इस कारण महिला को नर्सिंग होम ले जाना ज़रूरी हो गया था.

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नर्सिंग होम के प्रतीक्षाकक्ष में काफ़ी घंटों धैर्यपूर्वक इंतज़ार करने के बाद जब उसे सूचित किया गया कि उसका कमरा तैयार है तो वह बहुत ही प्यार से मुस्कुरायी.

जब वह अपने वॉकर की मदद से लिफ्ट की ओर जा रही थी, मैंने उसके छोटे से कमरे का सविस्तार मानसिक विवरण दिया. एक आठ वर्षीय बच्चे, जिसे हाल ही में एक पिल्ला उपहार में मिला हो, के समान उत्साहित होकर वह बोली, “मुझे बहुत पसंद है.”

“मिसेज जोंस, ज़रा रूकिये…..अभी तो आपने अपना कमरा देखा भी नहीं है.”

“उससे कोई अंतर नहीं पड़ता है,” उसने उत्तर दिया. “खुशी वह होती है जिसका निश्चय हम समय से पहले ही कर लेते हैं. मुझे अपना कमरा पसंद है या नहीं, यह कमरे की सजावट पर निर्भर नहीं करता है. यह मेरी मनोदशा पर आधारित है. मैंने यह पहले से ही निश्चय कर लिया था कि मैं अपने कमरे से प्रेम करूँगी. यह एक ऐसा संकल्प है जो मैं प्रतिदिन सुबह उठने पर करती हूँ. मेरे पास २ विकल्प हैं: सारा दिन बिस्तर पर लेटकर मैं अपने उन अंगों के बारे में सोचती रहूँ जो अब काम नहीं कर रहे हैं या फिर बिस्तर से बाहर निकलकर मेरे पास जो भी है उसके लिए आभारी रहूँ. प्रत्येक दिन एक सौगात है और जब तक मैं जीवित हूँ, मैं अपना सारा ध्यान हर नए दिन व समस्त सुखद यादों पर केंद्रित करूँगी जो मैंने अपने जीवन के इन दिनों के लिए ही संजोकर रखीं हैं.”

उसने मुझे समझाया, “वृद्धावस्था एक बैंक-खाते के समान होती है, तुम अपनी जमा पूँजी में से ही राशि निकालते हो. इसलिए तुम्हें मेरी सलाह रहेगी कि अपनी यादों के बैंक-खाते में ढेर सारी खुशियाँ जमा करो. मेरे बैंक में अपनी मधुर याद जमा करने के लिए तुम्हारा शुक्रिया. मैं तो अभी भी मोहक यादों का संचय कर रही हूँ.”

और फिर मुस्कुराते हुए वह महिला बोली:

“खुश रहने के पाँच सरल सिद्धांत सदा याद रखो:
१) अपने हृदय को द्वेष से मुक्त रखो
२) अपने दिमाग को परेशानियों से दूर रखो
३) सादा जीवन बसर करो
४) दूसरों को अधिक से अधिक दो
५) कम से कम अपेक्षा रखो.”
सीख:

सब कुछ हमारे रवैये पर निर्भर करता है. खुशी कभी भी बाहरी साधनों पर आश्रित नहीं होती है. किसी भी चीज़ के प्रति हमारा दृष्टिकोण व रवैया सबसे अधिक महत्व रखता है. स्वयं को हम खुद ही खुश रख सकते हैं. हमें इस सुन्दर सत्य को सीखकर एक खुशहाल जीवन व्यतीत करने का अभ्यास करना चाहिए.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

अंधा लड़का

 

     आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: अंतर्दृष्टि

एक अंधा लड़का एक इमारत की सीढ़ियों पर बैठा हुआ था. उसके पैरों के पास एक टोपी रखी हुई थी और पास रखे एक तख़्त पर लिखा था, “मैं अंधा हूँ, कृपया मदद कीजिए.” उसकी टोपी में केवल कुछ ही सिक्के पड़े हुए थे.

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एक व्यक्ति वहाँ से गुजरा. उसने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और टोपी में डाल दिए. फिर उसने तख़्त उठाई और उसे पलटकर उसके पीछे कुछ लिखा. उसके बाद उसने उस तख़्त को वापस वहीँ रख दिया ताकि वहाँ से आने-जानेवाले सभी राही उन नए शब्दों को देख सकें.

जल्द ही टोपी भरने लगी. अब पहले से कहीं ज़्यादा लोग टोपी में पैसे डाल रहे थे. जिस व्यक्ति ने तख़्त पर नए शब्द लिखे थे, वह उस दोपहर पुनः वहाँ आया. अंधे बालक ने उस व्यक्ति के पैरों की आहट पहचान ली और उसने पूछा, “आज सुबह क्या तुमने मेरे तख़्त पर लिखे शब्दों में बदलाव किया था? तुमने क्या लिखा था?”

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वह व्यक्ति बोला, “मैंने केवल सत्य ही लिखा था. मैंने तुम्हारे ही शब्दों को ज़रा अलग ढ़ंग से लिख दिया था.”

उस व्यक्ति ने तख़्त पर कुछ इस प्रकार लिखा था, “आज एक खूबसूरत दिन है पर मैं उसे देख नहीं सकता हूँ.”

क्या दोनों वास्तव में एक ही सन्देश व्यक्त कर रहे थे?
यक़ीनन दोनों ही सन्देश लोगों को बतला रहे थे कि वह लड़का अंधा था. परंतु पहले वाला तख़्त केवल इतना ही बता रहा था कि वह लड़का अंधा था. जबकि दूसरा वाला तख़्त लोगों को यह जता रहा था कि वह कितने भाग्यशाली हैं कि वह अंधे नहीं हैं. ऐसे में क्या यह आश्चर्य की बात है कि दूसरा वाला सन्देश कहीं अधिक प्रभावशाली था?

सीख:

हमारे पास जो भी है हमें उसके लिए आभारी रहना चाहिए. हमें अभिनव व रचनात्मक बनकर कुछ अलग व सकारात्मक सोचना चाहिए. हमें अपनी बुद्धिमत्ता से दूसरों को अच्छाई की ओर प्रेरित करना चाहिए. ज़िन्दगी बिना किसी क्षमायाचना के जीनी चाहिए और दूसरों से प्रेम, बिना किसी अपेक्षा के करना चाहिए. ज़िन्दगी में दुःख के कितने भी कारण क्यों न हों, हमें सदा सबल रहकर मुस्कुराने की वज़ह ढूँढ़नी चाहिए. हमें अपने अतीत का सामना बिना किसी अफ़सोस के करना चाहिए, अपने वर्तमान का संचलन दृढ़ विश्वास से करना चाहिए और निडर होकर भविष्य के लिए तैयार रहना चाहिए. हमें सदैव विश्वासपूर्ण व निर्भीक रहना चाहिए.

महान व्यक्ति कहते हैं, “जीवन निरंतर सुधार व पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है, बुराई से हटने व अच्छाई विकसित करने की कार्यविधि है …… जीवन के सफ़र में यदि तुम निडर होकर यात्रा करना चाहते हो तो तुम्हारे पास अनुकूल अंतरात्मा की टिकेट होनी चाहिए.”

किसी व्यक्ति को मुस्कुराते देखना सबसे अधिक ख़ूबसूरत बात है- और उससे भी अधिक सुन्दर है यदि उस मुस्कराहट का कारण आप हों!!

अनुवादक- अर्चना