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लंगर- एक नि:स्वार्थ प्रेम की कहानी

आदर्श :प्रेम

उप आदर्श: कृपा,दयालुता

कई सौ सालों से पहले, गुरु गोबिंद राय सिख धर्म के दस्वें मदगुरु थे. भगवान के प्रति उनका प्यार गहरा और स्थिर था. जो भी उनके आसपास थे, वे हमेशा सुख और आनंद का अनुभव करते थे. सिख लोग हमेशा गुरु के सीख के लिए उत्सुक थे.

एक बार वे अपने प्यारे जनता से बोले ,”सभी के घरों में लंगर होना जरूरी है. आपके घर यात्रियों और अतिथियों के खानपान और खातिरदारी के लिए हमेशा तैयार रहने चाहिए. जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाइए. कोई भी आदमी आप के घर से भूखे या खाए बिना नहीं जायें “

सभी लोग गुरु के बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहे थे. सिख समुदाय सेवा के लिए मशहूर हैं . फिर भी गुरुजी उनकी परीक्षा लेकर यह जानना चाहते थे कि वे कितने तैयार हैं; हमेशा तैयार थे या कभी कभी…..

एक दिन सवेरे एक मजेदार घटना घटी.यह गुरूजी की अनोखी लीला थी. गुरु गोबिंद राय साधारण यात्री के वेष में अपने भक्तों के घर के लिए निकल पड़े.

साधारणत: गुरुजी स्वच्छ और बिना सिकुडे हुए कपडे पहनते हैं. लेकिन उस दिन सुबह वे मैले और सिकुडे कपडे पहनकर निकले ताकि कोई उन्हें पहचान न पाए.

वे अपने भक्तों के घर एक वे असुविधा जनक समय पर पहुंचे ! सूर्योदय के पहले का समय था. इसलिए कई भक्त तब ही जाग रहे थे. दिनभर के कामों जैसे नहाना,धोना और प्रार्थना करने में व्यस्थ थे. गुरूजी उनके दरवाजे पर दस्तक देकर कहते थे,”भाई,तकलीफ के लिए माफ़ करना. मैं एक यात्री हूँ. मुझे भूख लगी है. क्या आप मुझे कुछ रोटी खाने के लिए दे सकते हैं?

लोगों का जवाब था “माफ़ कीजिये आप अपने कार्यक्रम में जल्दी निकले हैं; हमारे पास इस वक्त आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है. हमारे घर खाना देर से बनती है. आप थोड़ी समय बाद आते तो ,हम आपको कुछ परोस सकते हैं.”गुरु अपने प्रियजनों की परीक्षा ले रहे थे.एक मामूली बात को वे अविस्मरणीय तरीके से दिखाना चाहते थे. वे उनको यह दिखाना चाहते थे कि वे (लोग) अभी भी थोड़े स्वार्थी हैं,पूर्ण रूप से नि:स्वार्थ नहीं थे. खुद को सुधारने के लिए उन्हें अब भी समय की जरूरत थी.

किसी घर पर अगर गुरुजी दाल के लिए पूछते वहां उन्हें जवाब मिलता; “माफ़ करना भैय्या , दाल पकने में तो बहुत समय लगता है; हमारे यहाँ तो अब तक नाश्ता भी नहीं बना है. आप को परोसने में हमें खुशी है,… मगर कृपया थोड़ी देर बाद आइये.

एक घर के बाद दूसरा घर….गुरुजी चलते गए. उनके होंठों पर एक मुस्कान और आँखों में चमक थी.

कोई भी सिख ने अब तक उन्हें खाने में कुछ नहीं दिया.

अंत में गुरुजी नंदलाल नाम के आदमी के घर आये. नंदलाल एक कवि था और सच्चे गुरुओं को प्रेम भाव से आदर करता था. गुरु गोबिंद राय से २३ वर्ष उम्र में बड़े होने के बावजूद ,वह उनका भक्त था. गुरुजी के दरबार में  उसका मन खिल जाता था. वह हमेशा प्रेम और भक्ति से गुरु की सेवा करता था.

नंदलाल ने खुशी से अपने अतिथि का स्वागत करते हुए कहा “सु स्वागत है, मेरे दोस्त “

गुरुजी के बात करने से पेहले ही नंदलाल ने कहा “अन्दर आकर बैठकर आराम कीजिये”. तब गुरु ने कहा “मैं एक मामूली यात्री हूँ. क्या आप के पास कुछ खाने के लिए है?” नंदलाल ने बेझिझक जवाब दिया, “आपको पूछने की जरूरत नहीं है. खाना अभी आ रहा है.”

खाना परोसने (सेवा) का अवसर पाकर वह बहुत खुश हुआ. वह अन्दरसे रोटी के कच्चे आटा, अध् पके दाल, सब्जियां और मक्खन ले आया.

अध् पके खाने को उसने अतिथि के सामने बड़े कृपा और गौरव के साथ रखा. नंदलाल ने कहा “आप जो चाहे, जितना चाहे खाइए. अगर आप थोड़ी प्रतीक्षा करें तो मैं आप के लिए गरम गरम रोटियाँ, स्वादिष्ट दाल और सब्जियोंको पका कर ले आऊँगा. आप की सेवा करना मेरा सौभाग्य है. यह मेरी गुरु की कृपा है. तब तक आप आराम कीजिये.

नंदलाल भाई की सेवा भाव देख, गुरुजी खुश हुए. इतने प्यार से बना खाना खाकर संतुष्ट हुए. नंदलाल अपने गुरुजी की सीख का सच्चा पालन करता था . जो कोई नंदलाल भाई के घर आता, वह बिना खाये कभी नहीं लौटता था.

अगले दिन सुबह गुरुजी ने सभी लोगों से कहा “इस गाँव में एक ही अतिथि-सत्कार मंदिर है, और वह है नंदलाल भाई का घर. नंदलाल प्रेम और भक्ति की भाषा बोलता है. हम सबको दुआएं देता है. उसकी वचन-बद्धता प्रशंसनीय है. उसका प्रेम सब के मन को जीत लेता है. ऐसे लंगर चलाने से ही सिख लोग सही माय्न्ने मे अमीर बनते हैं. इस प्रकार से नंदलाल का लंगर सफलपूर्वक है”

सभी भक्त यह सुनकर मन ही मन हसें और समझ गए कि गुरुजी ने उनकी परीक्षा ली है. स्नेहभाव से रहने पर भी ,वे सफलता न पा सके. भाई नंदलाल हमेशा सेवा केलिए तत्पर रहता था. वह खुशी से,बिना कुछ बहाने किये बेझिझक सब को लंगर परोसता था. जब हम नि:स्वार्थ बनते हैं, तब हमें कोई बहाने की जरूरत नहीं होती  है, हम हमेशा खुश रहेंगे. अतिथि-सत्कार करने के लिए भाई नंदलाल एक उदाहरण बना.

भाई नंदलाल ने कहा; “साधुओं को पानी देना संसार के बड़े बादशाह होने के समान है. उनके लिए खाना देना सभी स्वर्गों से भी आरामदायक है.गुरु के लिए लंगर बनाना सभी धन, दौलत से बढ़कर है. महान लोग जरूरतमंदों की सेवा करते हैं और उनके समक्ष रहकर दुसरे आदमी विनम्रता सीखतें हैं . गुरु की सीख इन सभी चीजों और हर जगह पर है.”

सीख :

आदमी को लगातार अच्छे कर्मों से अपने में परिवर्तन लाना चाहिए. प्रेम और सेवा की कोई सीमा नहीं होती है. अतिथि देवो भवः अतिथि भगवान का रूप होते हैं. जो भी अतिथि अपने घर आये ,उनका आदर प्रेम और सम्मान पूर्वक करना चाहिए. सभी से प्रेम करें सभी की सेवा करें.

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आम का पेड़

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: आदर, देख-रेख

एक बार आम का एक बहुत बड़ा पेड़ था. एक नन्हा बालक हर रोज़ उस पेड़ के आस-पास खेला करता था. कभी वह पेड़ के ऊपर चढ़ता था, कभी पेड़ के पक्के आम तोड़कर खाता था और कभी पेड़ की छाया में सो जाता था. उसे आम का वह पेड़ बहुत पसंद था और पेड़ को भी उसके साथ खेलना अच्छा लगता था.

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समय बीतता रहा….. नन्हा बालक बड़ा हो गया और अब वह पेड़ के आस-पास नहीं खेलता था.

एक दिन उदास चेहरा लेकर वह लड़का पेड़ के पास वापस आया.

लड़के को देखकर पेड़ बोला, “आओ, मेरे साथ खेलो.”
“नहीं, अब मैं बच्चा नहीं रहा. मैंने पेड़ के आस-पास खेलना छोड़ दिया है,” लड़के ने जवाब दिया. “मुझे खिलौने चाहिए हैं और उन्हें खरीदने के लिए मुझे पैसों की आवश्यकता है.”aam3
“माफ़ करना, मेरे पास पैसे नहीं हैं…. पर तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बेचकर तुम्हें पैसे मिल जाएंगें.”
पेड़ का सुझाव सुनकर लड़का बहुत ही खुश हो गया. फिर पेड़ के सारे आम तोड़कर वह वहाँ से ख़ुशी-ख़ुशी चला गया. काफी समय तक वह लड़का वापस नहीं आया और पेड़ उदास था.

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एक दिन वह लड़का पेड़ के पास पुनः लौटा. इस बार वह बड़ा होकर आदमी बन चुका था. उसे देखकर पेड़ बहुत ही खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो, ” पेड़ ने कहा.
“मेरे पास खेलने का समय नहीं है. मुझे अपने परिवार के लिए काम करना है. हमें एक घर की ज़रुरत है. क्या तुम हमारी मदद कर सकते हो?”
“माफ़ करना, मेरे पास घर नहीं है. पर अपना घर बनाने के लिए तुम मेरी शाखाएँ काट सकते हो.”

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अतः युवक ने पेड़ की सारी शाखाएँ काट लीं और ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से चला गया. उसे खुश देखकर पेड़ प्रसन्न था पर उसके बाद वह युवक वापस नहीं आया. एक बार फिर पेड़ अकेला व उदास था.

कड़ी गर्मी के एक दिन वह युवक लौटा और उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो.”
“मैं उदास हूँ और वृद्ध हो रहा हूँ. अपने विश्राम के लिए मैं नौकायान पर जाना चाहता हूँ. क्या तुम मुझे एक नाव दे सकते हो?”
“तुम मेरे तने से नाव बना लो. नाव लेकर तुम लम्बी जलयात्रा पर निकल जाओ और यात्रा का आनंद लो.”

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पेड़ की बात सुनकर उस व्यक्ति ने पेड़ का तना काटा और अपने लिए एक नाव तैयार कर ली. वह जलयात्रा पर चला गया और काफी समय तक वापस नहीं आया.

अंततः कई वर्षों के बाद वह व्यक्ति वापस लौटा.
“माफ़ करना, मेरे बच्चे, पर अब मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है. तुम्हें देने के लिए आम भी नहीं बचे हैं, पेड़ ने कहा.
व्यक्ति ने उत्तर दिया, ” अब तो मेरे पास दांत भी नहीं हैं.”
“तुम्हारे चढ़ने के लिए तना भी नहीं बचा है.”
व्यक्ति बोला, “उसके लिए मैं बूढ़ा हो चुका हूँ.”
“मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है…. केवल मेरी मुरझाई हुई जड़ें ही बाकी बची हैं, ” पेड़ ने निराश होकर कहा.
“अब मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. इतने वर्षों के बाद मैं थक चुका हूँ, ” व्यक्ति ने उत्तर दिया.
“अच्छा है! टेक लगाकर आराम करने के लिए पुराने वृक्ष की जड़ें सर्वोत्तम होती हैं.”

वह व्यक्ति मुस्कुराया और वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गया.

सीख:
कहानी में पेड़ हमारे माता-पिता को दर्शाता है. जब हम छोटे होते हैं तब हम उनके साथ खेलना पसंद करते हैं. जब हम बड़े हो जाते हैं तब हम उन्हें छोड़कर चले जाते हैं और वापस तभी आते हैं जब हमें मदद चाहिए होती है. माता-पिता हमारे लिए अपने जीवन का बलिदान करते हैं. हमें उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और जब उन्हें हमारी सबसे अधिक ज़रुरत होती है, हमें उनकी मदद अवश्य करनी चाहिए. उन्हें केवल हमारे प्रेम की आवश्यकता होती है और हमारे साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

माँ के प्रति प्रेम

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: आदर

एक नन्हा बालक अपनी माँ के साथ रहता था. उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. बालक बहुत ही रूपवान और अत्यंत बुद्धिमान था. समय के साथ-साथ वह बालक और भी अधिक आकर्षक व तीव्रबुद्धि होता गया. परन्तु उसकी माँ हमेशा उदास रहती थी.

एक दिन बालक ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, तुम सदा उदास क्यों रहती हो?”
माँ ने उत्तर दिया, “बेटा, एक ज्योतिषी ने एक बार मुझसे कहा था कि जिनके दाँत तुम्हारे जैसे होते हैं वह जीवन में बहुत विख्यात होते हैं.”
इस पर बालक ने पूछा, “अगर मैं प्रसिद्ध हो जाऊँगा तो क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा?”
“अरे, मेरे बच्चे! ऐसी कौन सी माँ होगी जो अपने बच्चे को प्रसिद्ध देखकर खुश नहीं होगी. मैं तो यह सोचकर उदास रहती हूँ कि जब तुम प्रसिद्ध हो जाओगे तब तुम मुझे भूल जाओगे.”

माँ की बात सुनकर लड़का रोने लगा. वह कुछ देर माँ के सामने खड़ा रहा और फिर घर से बाहर भाग गया. बाहर जाकर उसने एक पत्थर उठाया और अपने दाँतों पर ज़ोर से मारकर आगे के २ दाँत तोड़ दिए. पत्थर के प्रहार से दाँत टूटने पर उसके मुँह से खून बहने लगा.

उसकी माँ भागकर बाहर आई और अपने पुत्र की हालत देखकर दंग रह गई. माँ ने पूछा, “बेटा! यह तुमने क्या किया?”
माँ का हाथ पकड़कर बालक बोला, “माँ, अगर इन दाँतों से तुम्हें कष्ट पहुँचता है और अगर यह तुम्हारी उदासी का कारण हैं तो मुझे यह दाँत नहीं चाहियें. यह मेरे किसी काम के नहीं हैं. मैं इन दाँतों से विख्यात नहीं होना चाहता. मैं आपकी सेवा करके और आपके आशीर्वाद से प्रसिद्ध होना चाहता हूँ.”

दोस्तों, यह बालक और कोई नहीं बल्कि चाणक्य था.

सीख:
माता-पिता व बड़ों का आशीर्वाद हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. हमारे माता-पिता हमसे निस्स्वार्थ प्रेम करते हैं. जो भी अपने माता-पिता से प्रेम करता है, उनका सम्मान करता है और उनकी सेवा करता है उन्हें माता-पिता का आशीर्वाद प्रचुरता में मिलता है जिसकी बदौलत वह सदा खुश रहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

नामस्मरण की ताकत

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: विश्वास, प्रार्थना की शक्ति

एक बार नारद मुनि भगवान् नारायण से मिलने गए.
भगवान ने नारद से पूछा …..nm1

नारायण: नारद, कैसे हो?
नारद : मैं ठीक हूँ, भगवन और हमेशा की तरह तीनो लोकों का भ्रमण कर रहा हूँ.
नारायण: तो तुम किस इरादे से भ्रमण करते हो?
नारद : भगवन मैं सिर्फ आपका ही ध्यान करता हूँ. मैं सतत नारायण, नारायण का गुणगान करता रहता हूँ. पर भगवन मुझे समझ में नहीं आता कि आपके नाम का भजन करने का क्या इनाम है.nm2
नारायण: नारद! तुम लगातार नामस्मरण करते हो पर फिर भी तुम्हें उसकी शक्ति की समझ नहीं है. जाओ और उस पेड़ पर बैठे कौए से पूछो.

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नारद उस कौए के पास गए और बोले, “नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
यह सुनते ही कौआ पेड़ से गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई. नारद भगवान् नारायण के पास गए और बोले,

नारद: भगवन, मैंने कौए से पूछा पर वह तो मुझे सुनते ही पेड़ से गिरकर मर गया. क्या नामस्मरण का यही इनाम है? नारायण: सत्य तक पहुँचने के लिए समय का सदुपयोग बहुत आवश्यक है. नारद, तुम उस गरीब ब्राह्मण के घर जाओ. वहाँ पिंजरे में एक ख़ूबसूरत तोता है. उसका शरीर हरे रंग का है और चोंच लाल रंग की है. तुम जाकर उससे पूछो.”

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नारद ने तोते के पास जाकर उससे पूछा, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
यह सुनते ही तोता तुरंत गिरकर मर गया.
नारद एक बार फिर भगवान् नारायण के पास गए.

नारद : मैंने तोते से पूछा. पर वह तुरंत गिरकर मर गया. क्या यही इनाम है?
नारायण : नारद, सत्य जानने के लिए सदा दृढ़ रहना चाहिए. तुम ब्राह्मण के घर जाओ. वहाँ कल ही एक बछड़े का जन्म हुआ है. जाकर उससे पूछो.

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नारद बछड़े के पास गए और बोले, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
बछड़े ने सिर उठाया, नारद को देखा और गिरकर मर गया.
नारद पुनः नारायण के पास गए.

नारद: मैं सत्य जाने बिना अब यहाँ से नहीं जाऊँगा. हे भगवन! क्या यही इनाम है?
नारायण : नारद, तुम जल्दबाज़ी मत करो. जल्दबाज़ी से काम खराब हो जाता है. हानि दुःख का कारण होती है. इस कारण तुम हड़बड़ी मत करो और धैर्य रखो. पृथवी पर राजा के घर कल ही एक पुत्र का जन्म हुआ है. राजा बहुत ही प्रसन्न है. जाकर उस नवजात से पूछो.
नारद भयभीत थे. उन्होंने सोचा, “यदि वह नवजात भी मर गया तो सिपाही मुझे गिरफ्तार कर लेंगें. मेरी भी मृत्यु हो जाएगी. क्या यही इनाम है?”

नारायण: नारद, उतावले मत हो. जाकर बच्चे से पूछो.

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नारद राजा के पास गए. जब नारद ने बच्चे को देखने की इच्छा प्रकट की तब बच्चे को सोने की थाल में लाया गया.
नारद ने राजा से पूछा,”महाराज! क्या मैं इस बच्चे से एक प्रश्न पूछ सकता हूँ?”
राजा की सहमत मिलने पर नारद ने बच्चे से पूछा, “भगवान् नारायण के नाम का भजन करने का क्या इनाम है?”
नारद का प्रश्न सुनकर नन्हा राजकुमार बोला:

“नारद, क्या आपने अब तक यही सीखा है? यद्यपि आप रात-दिन प्रभु के नाम का गुणगान करते रहते हैं फिर भी आपको समझ नहीं है. सबसे पहले मैं एक कौआ था. आप आए और मुझसे नामस्मरण के इनाम के बारे में पूछा. नारायण का नाम सुनते ही मेरा जीवन परिपूर्ण हो गया और मैंने जीवन त्याग दिया. फिर मेरा जन्म एक तोते के रूप में हुआ. कहाँ एक कौआ और कहाँ एक तोता? एक तोते का पोषण पिंजरे में होता है. आपने पुनः आकर मुझसे वही सवाल एक बार फिर किया. इसके बाद मेरा जन्म एक बछड़े के रूप में हुआ. यह और भी अधिक श्रेष्ठ और बेहतर जीवन है. भारतीय गाय की पूजा करते हैं. मैंने आपके माध्यम से भगवान् का नाम सुना और मर गया. और अब मेरा जन्म एक राजकुमार के रूप में हुआ है. कहाँ एक कौआ, तोता, बछड़ा और कहाँ एक राजकुमार? नामस्मरण से हमारी जागृति व सुगति होती है और इस कारण इस जन्म में मैं एक राजकुमार हूँ. नारायण के नाम का भजन करने का यही इनाम है.”
सीख:
जब हममें प्रेम, विश्वास व श्रद्धा होती है तब हमारी चेतना का विकास अवश्य होता है. भगवान् का नाम सुनने मात्र से एक कौआ तोता बना और फिर बछड़ा और अंततः राजकुमार. नारायण के नाम के श्रवण से ही उसे मनुष्य जीवन मिला जो सबसे अधिक दुर्लभ है. यदि भगवान् का नाम सुनना इतना चमत्कारिक है तो भगवान् के नाम का उच्चारण कितना शक्तिशाली होगा? इसलिए हमें अपने पूरे होशो-हवास में भरपूर श्रद्धा से नामस्मरण करना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

अपने मालिक के प्रति प्रेम

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श : श्रद्धा, सम्मान

हज़रत अमीर खुसरो के बारे में एक अनोखी कहानी विख्यात है जो अपने पीर के प्रति उनकी असीम श्रद्धा व प्रेम को स्पष्ट करती है.

हज़रत निज़ामुद्दीन की उदारता के बारे में सुनकर एक बार भारत के दूर-दराज़ इलाके से एक गरीब व्यक्ति उनसे मिलने दिल्ली आया. वह व्यक्ति अपनी आर्थिक समस्याओं के समाधान में उनकी सहायता चाहता था. संयोग से उस दिन उनके पास देने के लिए उनके पुराने जूतों के सिवाय और कुछ नहीं था. यद्यपि गरीब व्यक्ति बहुत निराश हुआ पर फिर भी पीर का शुक्रिया अदा कर के वह वहाँ से चला गया.

वापस लौटते समय रात बिताने के लिए उसने एक सराय में आश्रय लिया. संयोगवश उसी रात हज़रत अमीर खुसरो, जो बंगाल से व्यापारिक यात्रा से लौट रहा था, भी उसी सराय में ठहरा. हज़रत अमीर खुसरो उस समय हीरे-जवाहरात में व्यापार करता था और दिल्ली का सबसे अधिक अमीर नागरिक माना जाता था. अगली सुबह जब हज़रत अमीर खुसरो उठा तब उसने . टिप्पणी की: यहाँ मुझे अपने पीर की खुशबू आ रही है.”

खुशबू का स्त्रोत ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह उस व्यक्ति तक पहुँचा और उससे पूछा यदि वह दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से मिला था. उसने हाँ में जवाब देते हुए हज़रत अमीर खुसरो को हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से अपनी मुलाक़ात की सारी कहानी सुनाई. फिर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया द्वारा दिए जूतों को दिखाकर उसने शोक प्रकट किया कि वह कितने पुराने और मूल्यहीन थे.

हज़रत अमीर खुसरो ने तुरंत अपनी सारी दौलत के बदले में उस व्यक्ति से अपने पीर के जूते माँगे. अपनी इस आकस्मिक खुशकिस्मती पर वह व्यक्ति अत्यधिक खुश हुआ. उसने हज़रत अमीर खुसरो को जूते दिए, उसका बार-बार शुक्रिया अदा किया और आनंदित होकर घर लौट गया. अमीर खुसरो आखिरकार अपने गुरु के पास पहुँचा और जूते उनके चरणों में रख दिए. जब उसने पीर को बताया कि उन जूतों के बदले में उसने अपनी समस्त दौलत प्रतिदान की है तब हज़रत निज़ामुद्दीन बोले, “खुसरो, तुम तो इन्हें बहुत सस्ते में ले आए.”

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सीख:
एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति प्रेम का यह एक अति उत्तम उदाहरण है. शिष्य के लिए उसके गुरु की पादुका सबसे अधिक पूजनीय होती है. यह हमें अपने अहम् पर पकड़ ढीली कर के आत्मसमर्पण करना सिखाती हैं.

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अनुवादक- अर्चना

प्रेम क्या होता है

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     आदर्श : प्रेम
उप आदर्श : निस्स्वार्थ सेवा/ प्रतिबद्धता

सुबह के ८:३० बजे थे और हर तरफ चहल-पहल थी. सभी कर्मचारी अपने अपने काम में व्यस्त थे. एक वयोवृद्ध सज्जन, जिनकी उम्र ८० साल के लगभग थी, अपने अंगूठे के टांके कटवाने आए. उन्होंने निवेदन किया कि वह जल्दी में थे क्योंकि ९ बजे उन्हें किसी से मिलने जाना था. मैंने उनके प्राणाधार आंकड़े लिए और उन्हें बैठाया क्योंकि मुझे मालूम था कि उन्हें कम से कम एक घंटा इंतज़ार करना पड़ेगा.old3 जब मैंने उन्हें अपनी घड़ी की ओर बार-बार देखते हुए देखा तो मैंने निश्चय किया कि मैं स्वयं ही उनके ज़ख़्म का निरीक्षण करूँगा. वैसे भी मैं किसी मरीज़ के साथ व्यस्त नहीं था. निरीक्षण करने पर मैंने पाया कि उनका घाव भर चुका था. मैंने एक अन्य डॉक्टर से बात की और उनके टांके खोलने के लिए आवश्यक सामान लेकर आया. टांके खोलने के बाद मैंने दुबारा से उनके घाव पर पट्टी बाँध दी. इस दौरान मैं उनसे बातचीत करने लगा. मैंने उनसे पूछा उनके इतनी जल्दबाज़ी में होने का कारण क्या एक अन्य डॉक्टर से मिलने जाना था. उन्होंने कहा नहीं- उन्हें नर्सिंग होम जाकर अपनी पत्नी के साथ सुबह का नाश्ता करना था. उनकी पत्नी के स्वास्थ्य के बारे में पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि उनकी पत्नी काफ़ी समय से नर्सिंग होम में थी और मानसिक रोग से पीड़ित थी. कुछ समय बाद जब मैंने उनकी मरहम-पट्टी पूरी तरह से कर दी तब मैंने उनसे पूछा कि क्या थोड़ी देर से पहुँचने पर उनकी पत्नी चिंतित होगी. उन्होंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया कि अब उनकी पत्नी को पता नहीं था कि वह कौन हैं. पिछले पाँच सालों से वह उन्हें पहचानती नहीं थी. मैं आश्चर्यचकित था और मैंने उनसे पूछा, “वह आपको पहचानती भी नहीं है और आप फिर भी हर सुबह उनके पास जातें हैं?” सज्जन पुरुष मुस्कुराए और मेरा हाथ को थपथपाते हुए बोले, “वह मुझे नहीं जानती है पर मुझे अभी भी पता है कि वह कौन है.”

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सीख:

सच्चा प्रेम बिना किसी अपेक्षा का होता है. ऐसे व्यक्ति केवल इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि वे प्रेम करना चाहते हैं और बदले में कोई उम्मीद नहीं रखते हैं- ना किसी सराहना की, ना आभार की और ना ही सम्मान की. धन्य हैं ऐसे लोग जो कहानी के वृद्ध पुरुष के समान प्रेम व सेवा कर सकते हैं.

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विकलांग राजा

 

     आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: सकारात्मक दृष्टिकोण

एक विकलांग राजा था जिसकी एक आँख थी और केवल एक ही पैर था.

उसने अपने राज्य के सभी चित्रकारों से उसकी एक आकर्षक तस्वीर बनाने को कहा. सभी चित्रकार परेशान थे. राजा के अपूर्ण अंगों के साथ उसकी ख़ूबसूरत तस्वीर बनाने का काम कोई भी चित्रकार सफलतापूर्वक नहीं कर पा रहा था.

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अंततः एक चित्रकार सहमत हुआ और उसने राजा की अति उत्कृष्ट छवि बनाई.

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वह एक बहुत ही शानदार तस्वीर थी और सभी देखनेवाले स्तम्भित थे.

उस कलाकार ने राजा को एक शिकार की ओर निशाना लगाते हुए चित्रित किया. चित्र में राजा एक आँख बंद करके और अपनी एक टांग मोड़कर लक्ष्य साध रहा था.

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सीख:
चित्रकार की तरह हमें भी दूसरों का वर्णन करते समय उनकी दुर्बलताओं को छिपाते हुए उनके सदगुणों को विशिष्ट रूप से दर्शाना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना