Archives

एक चोर का बदलाव

thief

आदर्श: सच्चाई, उचित आचरण
उप आदर्श: ईमानदारी

एक चोर चोरी की तलाश में था पर उसके हाथ कुछ विशेष व ठोस नहीं लग रहा था. मायूस होकर वह एक मंदिर पहुँचा जहाँ पुजारी एकत्रित लोगों को सच्चाई के विषय में भाषण दे रहा था. कुछ देर भाषण सुनने के बाद चोर को भाषण अच्छा लगने लगा और वह सच्चाई के सिद्धांत को पूरे ध्यान से एकाग्रचित होकर सुनने लगा. कार्यक्रम समाप्त होने पर सभी घर चले गए लेकिन चोर वहीँ बैठा रहा.

thief1

स्वयं को वहाँ अकेले पाकर चोर को मन ही मन चिंता होने लगी कि पुजारी कहीं यह न समझे कि वह मंदिर में कुछ गलत करने आया है. उसने पुजारी से कहा, “वैसे तो यहाँ मेरा कोई काम नहीं है पर मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि सच्चाई की महत्ता पर आपने बहुत ही गूढ़ भाषण दिया. मुझे आपका भाषण बहुत अच्छा लगा.” सत्यता के प्रभाव को लेकर चोर के मन में काफ़ी विवाद व प्रश्न थे. अतः उसने पुजारी से पूछा कि वह अपनी झूठ बोलने की आदत पर कैसे काबू पा सकता है. पुजारी ने उसे समझाया वह चाहे कहीं भी हो और उसने चाहे कैसी भी चोरी की हो पर सच्चाई के बल पर वह सदा सुरक्षित और निर्भय रहेगा. पुजारी ने चोर को विश्वास दिलाया कि चोरी करते हुए भी वह कामयाब हो सकता है. पुजारी की बातों से प्रोत्साहित होकर चोर ने संकल्प किया कि अपनी व्यवहारिक ज़िन्दगी में वह पुजारी द्वारा दी हिदायत का सदा पालन करेगा. चोर ने स्वयं से वादा किया कि उस दिन से वह हर परिस्थिति में सच्चाई व ईमानदारी के पथ पर चलेगा. उसने उसी क्षण से हमेशा सच बोलने और असलियत का साथ देने का फैसला किया.

सदा सच बोलने का संकल्प लेकर जैसे ही चोर मंदिर से बाहर निकला तभी उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई. यह व्यक्ति वास्तव में राजा था जो एक साधारण नागरिक के भेष में अपने राज्य का मुआयना करने निकला था.thief2 चोर से मिलने पर उस व्यक्ति ने चोर से पूछा कि वह कौन है. यद्यपि अपनी असलियत बताने में चोर को हिचकिचाहट हो रही थी पर फिर सदा सत्य बोलने की अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण करके चोर ने बताया कि वह एक चोर है. वह व्यक्ति बेहद खुश हुआ और उसने कहा कि वह भी एक चोर ही है. दोनों व्यक्ति आपस में गले मिले और एक दूसरे से हाथ मिलाकर जल्द ही दोस्त बन गए. नए चोर ने कुछ बहुमूल्य वस्तुएँ चुराने का सुझाव दिया और कहा कि उसे ठीक मालूम है कि ऐसे अनमोल रत्न कहाँ मिलेंगें. वह उसे एक गुप्त रास्ते से ले गया और दोनों एक शानदार राजभवन के सामने पहुँच गए. वहाँ से वह नया चोर उसे राजवंशी राजकोष ले गया और उससे तिजोरी तोड़ने को कहा. तिजोरी तोड़ने पर उन्हें उसमें पाँच बेशकीमती हीरे मिले. thief4नए चोर ने सलाह दी कि वह दोनों चार हीरे ही चुरायें ताकि दोनों बराबर का हिस्सा कर पाए. पाँचवे हीरे को आधा करने से वह हीरा मूल्यहीन हो जाएगा. दोनों ने सहमत होकर तिजोरी में से चार हीरे निकाले और एक हीरा राजकोष में ही छोड़ दिया. लूट का माल आपस में बाँट कर दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए.

अगले दिन जब राजमहल का कार्यालय खुला तो अधिकारियों ने राजवंशी तिजोरी खुली पाई. जांच करने पर शाही कोषाध्यक्ष ने पाया कि तिजोरी में से चार हीरे ग़ायब थे. thief5उपयुक्त व सटीक अवसर देखकर उसने बचा हुआ हीरा अपनी जेब में डाल लिया और राजा को बतलाया कि राजकोष के पाँचों हीरे चोरी हो गए हैं. राजा ने चौकीदारों को आज्ञा दी कि चोर को पकड़कर राजभवन लेकर आएँ. सिपाहियों ने चोर को ढूँढ़कर महाराज के सामने प्रस्तुत किया. राजा ने चोर को ग़ौर से देखा और बोला, “तो तुम ही वह चोर हो? तुमने क्या चुराया है.”

thief3
चोर ने उत्तर दिया, “मैं झूठ नहीं बोल सकता इसलिए आपको बतला रहा हूँ कि मैंने ही अपने एक दोस्त के साथ मिलकर आपके राजकोष से हीरे चुराए हैं.”
राजा ने पूछा, “तुम दोनों ने कितने हीरे चुराए थे?”
“हमने चार हीरे चुराए थे. दो-दो दोनों के लिए. चूँकि हम पाँचवे हीरे को तोड़ नहीं सकते थे इसलिए हमने उसे तिजोरी में ही छोड़ दिया था.”
राजा ने फिर कोषाध्यक्ष से पूछा, “कितने हीरे ग़ायब हैं? ”
“सभी पाँच, जनाहपनाह.”

राजा तुरंत सारी कहानी समझ गया और उसने कोषाध्यक्ष को नौकरी से निकालकर चोर को उसकी सत्यवादी के लिए राजमहल का नया कोषाध्यक्ष नियुक्त कर लिया.

सदा सच बोलने की आदत विकसित करने पर उचित रूप से पुरस्कृत होने से प्रोत्साहित होने पर चोर ने शीघ्र ही अन्य सभी बुरी आदतों का भी त्याग कर दिया. दृढ़ता और पूर्ण विश्वास के साथ व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने से हम अपनी बुरी आदतों का त्यागकर स्वयं में सुधार ला सकते हैं.

सीख:
हमें दूसरों द्वारा किए गलत व स्वयं द्वारा की गई अच्छाई को भुला देना चाहिए. अच्छा कार्य करने से नकारात्मक भाव में कमी आती है. अच्छी आदतें बुराई को निकाल बाहर करती हैं.

t7

 

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

Advertisements

सेवानिवृत्त समुद्री कप्तान

sea3

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: विश्वास, कर्तव्य भाव, विचारों में स्पष्टता

यह कहानी एक समुद्री कप्तान की है जो कार्य से निवृत्त हो चुका था. अब वह एक दिवसीय यात्रा करने वाले पर्यटकों को नाव में शैट्लैंड द्वीप पर ले जाया करता था.

ऐसी एक यात्रा के दौरान उसकी नाव युवकों से भरी हुई थी. यात्रा शुरू होने से पहले वृद्ध कप्तान को प्रार्थना करते देख सभी यात्री उस पर हँसने लगे क्योंकि उस समय समुद्र शांत था एवं आसमान साफ़ और स्पष्ट था.

मगर यात्रा शुरू होने के कुछ समय बाद ही अचानक घने बादल छा गए. शीघ्र ही काले व घने बादलों ने भयंकर तूफ़ान का रूप ले लिया और नाव हिंसात्मक रूप से डगमगाने लगी. भयभीत यात्री कप्तान के पास आए और उनके साथ प्रार्थना में शामिल होने के लिए उससे आग्रह करने लगे.

कप्तान ने उत्तर दिया, ” मैं निश्चलता व स्थिरता में प्रार्थना करता हूँ. कठिनाई व मुसीबत के समय मैं अपनी नाव पर ध्यान देता हूँ.”

sea1

सीख:

अपने जीवन के शांत व स्थिर समय में यदि हम भगवान् को नहीं पा सकते तो प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने पर ईश्वर को पाना असंभव है. संभवतः ऐसे में हम घबराये हुए होंगें. लेकिन निश्चल लम्हों में यदि हम प्रभु की तलाश और उन पर विश्वास करना सीख लेंगें तो कठिनाई का सामना करने पर हम निस्संदेह ही उन्हें ढूँढ़ लेंगें.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

दो महासागर : दो दृष्टिकोण

sea2sea3

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: सहभाजन व देखरेख

दो महासागरों से सम्बंधित एक ख़ूबसूरत लघु कथा है:

भूमध्यसागर की घाटी में विख्यात मृत सागर स्थित है. प्रत्येक विद्यार्थी को यह सच्चाई मालूम है कि मृत सागर ही पानी की एक ऐसी संरचना है जो समुद्र न होते हुए भी सागर की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है : वास्तव में यह एक सरोवर है. अब प्रश्न यह उठता है कि इसे मृतसागर क्यों कहते हैं? या फिर इसे घातक सागर का नाम क्यों दिया गया है? यद्यपि यह ६७ किलोमीटर लम्बा, १८ किलोमीटर चौड़ा और १२३७ फुट गहरा है परन्तु फिर भी इस सागर में कोई जीवन नहीं है. इस सागर का पानी पृथ्वी का सबसे अधिक खारा पानी है; तथ्यों के आधार पर इस सागर का पानी सामान्य सागर के पानी से लगभग ९ गुना अधिक खारा है. पानी में नमक की इतनी अधिकता किसी भी प्रकार के समुद्री पेड़-पौधे व जीव-जंतु को पनपने नहीं देती. पर इस सरोवर का पानी इतना खारा क्यों है? इसका उत्तर बहुत ही सरल है. मृत महासागर में जॉर्डन नदी से पानी आता है और यह सागर सारा पानी अपने पास रख लेता है. इसका पानी कभी बाहर की ओर नहीं बहता है. यह सागर औसत समुद्र तल से इतना नीचे स्थित है कि पानी के निकास का कोई माध्यम ही नहीं है. वातावरण की गर्मी से जो पानी वाष्पित हो जाता है वह वापस नमक में परिवर्तित हो जाता है और यही इस महासागर के निर्जन व निर्जीव पर्यावरण का कारण है.

sea1

इस मृतसागर के उत्तर में गलिली महासागर है. यद्यपि इसका आकार मृतमहासागर की तुलना में काफ़ी छोटा है परन्तु फिर भी यह अनोखे व विचित्र पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से संपन्न है. ऐसा कहा जाता है कि यह २० प्रकार की अलग-अलग मछलियों का वास-स्थान है. वास्तव में इस सागर ने २ हज़ार वर्षों से कई प्राणियों का भरण-पोषण किया है. इस क्षेत्र का समृद्धिशाली मछली-पालन व महासागर के आस-पास की ज़मीन पर भरपूर फ़सल का उतरना इस बात का प्रमाण है.

sea4sea5

यहाँ गौरतलब प्रश्न यह है कि गलिली महासागर, विशाल मृतमहासागर की तुलना में इतना छोटा होने के बावजूद भी सक्रीय कैसे है? एक सरल भेद: गलिली महासागर अपना पानी बाँटता है. जॉर्डन नदी का पानी गलिली महासागर में भी गिरता है पर गलिली महासागर अपने पानी को बाहर बहने की अनुमति देता है. यही इस महासागर के पानी को हितकर, उपयोगी व सक्रीय बनाता है.

sea6

सीख:
जब हम बाँटते हैं तब हम धनवान बनते हैं. इस गणित को समझकर बहुत लोगों ने अपना जीवन संवारा है. यदि हमारे पास धन, ज्ञान, प्रेम, समादर या ईश्वर से प्राप्त अन्य कोई उपहार है और हम उन्हें बाँटना नहीं सीखते तो यह सब धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं. कहा जाता है कि किसी वस्तु का संग्रह करने से उसका विकास नहीं होता है. ईश्वर की अनुकम्पा पाने के लिए यह आवश्यक है कि हम आपस में मिल-बाँटकर रहना सीखें. जब एक कटोरा खाली होने लगता है तभी उसमें स्वच्छ पानी डाल सकते हैं. अतः हमें देने की कला को अंतर्ग्रहण करना चाहिए.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

कृष्ण ,बलराम और राक्षस

krishna-and-balarama

आदर्श:उचित आचरण

उप आदर्श :आत्म विश्वास,साहस

एक पूर्णिमा की रात, कृष्ण और बलराम जंगल की ओर चल पड़े. देरी हो जाने के कारण उन्हें रात जंगल में गुजारना पड़ा. जंगल भयानक था और दोनों की सुरक्षा के लिए कृष्ण ने बलराम को सुझाव दिया की वे दोनों बारी बारी पहरा देंगे. पहला पहरा देने की बारी बलराम की थी और कृष्ण सोने के लिए तैयार हो गए.

कुछ ही समय मे कृष्ण गहरी नींद सो गए. बलराम को दूर से किसी की गुर्राने की आवाज सुनायी दी. बलराम आवाज़ की ओर बढ़ने लगे. तब  उन्होंने एक विरूप आकारवाले राक्षस को अपने ओर आते हुए देखा. वह राक्षस फिर से गुर्राया. बलराम डर से थर थर कांपने लगे.जैसे जैसे बलराम डर रहे थे, वैसे वैसे वह राक्षस दुगुना बढ़ता गया.वह राक्षस बहुत बड़ा आकार लेकर ,बलराम के बहुत खरीब आकर खडा हो गया और उसने फिर गुर्राया. बलराम उसकी आकार और दुर्गन्ध सह नहीं पाए. वे जोर से “कृष्ण,कृष्ण” चिल्लाते हुए बेहोश गिर पड़े.

बलराम की पुकार सुन कर कृष्ण जाग गए और उस आवाज़ की ओर चलने लगे. उन्हें लगा कि बलराम सो गए होंगे और पहरा देने की बारी उनकी है. इस सोच से वे आगे पीछे टहलने लगे और उन्होंने अपने समक्ष एक भयानक प्राणी खडा पाया.

राक्षस कृष्ण को देखकर गुर्राया. कृष्ण निडर होकर राक्षस से प्रश्न पूछने लगे. उन्होंने पहले उसे वहां आने की वजह पूछी. प्रश्न सुनते ही राक्षस का आकार आधा कम हो गया. कृष्ण लगातार जवाब की प्रतीक्षे में  प्रश्न पूछते गए ,और वह राक्षस सिकुड़ता गया.

अब वह राक्षस केवल दो इंच का हो गया. वह देखने में बहुत सुन्दर और प्यारा लग रहा था . कृष्ण उसे अपने जेब में रखकर बलराम की ओर चल पड़े. रात बीती और सुबह बलराम नींद से जागे.

कृष्ण को देखते ही बलराम खुशी से “कृष्ण,कृष्ण” पुकारने लगे. बलराम ने कृष्ण से कहा कि “कृष्ण, कल रात जब तुम सो रहे थे,तब एक भयानक राक्षस यहाँ आकर हम दोनों को मारने की कोशिश कर रहा था. किसी तरह हम बच गए. मुझे सिर्फ इतना याद है कि मैं बेहोश होकर गिर गया.”

कृष्ण अपने जेब से वह छोटी सी आकार वाले राक्षस को  निकालकर, बलराम से पूछे; “क्या तुम इसी राक्षस की बात कर रहे हो?”

बलराम ने जवाब दिया कि “जी हाँ. मगर वह तो बड़ा था, कैसे इस तरह सिकुड़ गया?”

कृष्ण ने कहा “जब मैं उससे प्रश्न पूछने लगा,तो वह सिकुड़ता गया, और अंत में इस तरह बन गया”. बलराम कृष्ण को यह बताने लगे कि पिछली रात को जब वे डर रहे थे ,तब वह राक्षस आकार र्में बढता गया. अंत में कृष्ण ने कहा कि “जब हम डरते हैं ,तब हमारी समस्या भयानक हो जाती हैं; मगर जब हम निडर होकर, साहस के साथ समस्या का सामना करते हैं, तब हमारा डर कम हो जाता है.

शिक्षा :

जब हम किसी समस्या को सामना करने से झिझकते या डरते हैं ,तब वह समस्या बढ़ जाता है. साहस के साथ सामना करने से हम सभी  समस्या का समाधान दूंढ़ सकते हैं. समाधान अपने अनुकूल या प्रतिकूल हो सकता है परन्तु हम समस्या का सामना तो कर चुके होंगे. परिस्तिथि का सामना करके ही हम जीवन में प्रगति पा सकते हैं. टालना प्रगति में बाधा डालता है और आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करता है.

http://saibalsanskaar.wordpress.com

एक तपस्वी का संकल्प

 

god2

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: दृढ़ निश्चय, श्रद्धा

भगवान् को प्रसन्न करने के मुख्य उद्देश्य से बहुत सारे लोग तप करते हैं. एक तपस्वी ने एक बार भगवान् को प्रसन्न करने का निश्चय किया और अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या करने लगा. उसने सोचा कि अगर वह भगवान् को प्रसन्न करने में सफल हो जाएगा तो उसे आशीर्वाद में भगवान् के दर्शन मिलेंगें. अतः वह प्रतिदिन पेड़ की परिक्रमा करता था और भोजन में रोज़ाना पेड़ के पत्ते खाता था.

एक दिन नारदजी भगवान् के धाम जा रहे थे. रास्ते में तपस्वी को देखकर वह उससे मिलने आ गए. नारदजी को देखकर तपस्वी ने तुरंत उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया. नारदजी के पूछने पर तपस्वी ने भगवान् की कृपा पाने के अपने निश्चय का वर्णन किया. तपस्वी बोला, “नारदजी, मैं कई वर्षों से तपस्या कर रहा हूँ और इस अम्बली वृक्ष के पत्तों का ही भोजन करता हूँ ताकि मुझे भगवान् के दर्शन हो सकें. आप जब भगवान् से मिलेंगें तो कृपया मेरी ओर से उन्हें मुझे दर्शन प्रदान करने के लिए कहना.” तपस्वी की कहानी सुनकर नारदजी ने निश्चय किया कि वह उसका सन्देश भगवान् तक अवश्य पहुँचाएंगें.

god3

नारद के आगमन पर भगवान् ने उनसे पूछा, “नारद! पृथ्वी से क्या समाचार लाए हो?”

तपस्वी से अपनी मुलाकात का स्मरण करते हुए नारदजी बोले, “भगवन! एक तपस्वी अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या कर रहा है ताकि उसे आपके दर्शन हो सकें. आप उसे अपने दर्शन कब देंगें?”

god4

भगवान् बोले, “उससे कहो कि मेरे दर्शन पाने के लिए उसे उतने वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने कि अम्बली पेड़ पर पत्ते हैं! ”

प्रभु का कथन सुनकर नारदजी के घुटने ठिठुरने लगे. उनकी टांगें सुन्न हो गयीं मानो वह एक कदम भी नहीं ले पाएंगीं और उनका दिल बैठ गया. उत्सुक तपस्वी को वह यह समाचार कैसे दे पायेंगें. वह तो बेचारा बिलकुल टूट जाएगा. नारदजी ने मन ही मन सोचा, “मैं उससे क्या कहूँगा? वह हिम्मत हार जाएगा और तपस्या के लिए सारा उत्साह गँवा देगा.” इस प्रकार चिंतन करते हुए नारदजी आसमान से पृथ्वी की ओर आ रहे थे जब तपस्वी ने उन्हें देखा. अपना नाम सुनकर, नारदजी तपस्वी के पास गए. तपस्वी यह सुनकर अत्यंत हर्षित हुआ कि नारदजी भगवान् से मिले थे.god

उसने नारदजी से पूछा, “मेरे लिए भगवान् का क्या सन्देश है?”
नारदजी ने उदासी से उत्तर दिया, “वह मैं नहीं बता सकता क्योंकि मेरी बात सुनकर तुम हिम्मत हार जाओगे और अपनी तपस्या त्याग दोगे.”
तपस्वी ने जवाब दिया, “भगवान् ने चाहे कुछ भी कहा हो, मैं हिम्मत नहीं हारूँगा. कम से कम मुझे प्रभु के दिव्य शब्द सुनने का अवसर प्राप्त होगा. कृपया मुझे ठीक-ठीक बताएं कि भगवान् ने क्या कहा है.”

नारदजी अभी भी अनिश्चित थे. वह सोचने लगे, “क्या मैं इसे बता दूँ? कहीं इस बेचारे का विश्वास न टूट जाए. मैं इसके साथ ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहता.”

तपस्वी ने पुनः विनती की, “कृपया मुझे भगवान् का सन्देश बताएं.”
इस पर नारदजी बोले, “भगवान् ने कहा है कि तुम्हें और कई वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी. असल में, भगवान् के दर्शन पाने के लिए तुम्हें उतने सालों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने इस अम्बली वृक्ष पर पत्ते हैं.”
तपस्वी आनंदोल्लास हो गया. वह नाचने और गाने लगा, “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. भगवान् ने अपने धाम से मेरे लिए सन्देश भेजा है. उन्होंने मुझसे वादा किया है कि वह मुझे दर्शन देंगें.यह वर्ष तो तुरंत ही बीत जायेंगें.”
तपस्वी का प्रेम और हौसला देखकर भगवान् ने तत्क्षण तपस्वी के सामने प्रकट होकर उसे अपने दर्शन दिए. तपस्वी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. वह प्रभु के चरणों में गिर पड़ा.

नारदजी अचंभित थे. उन्होंने भगवान् से पूछा, “प्रभु, आप यहाँ कैसे? आपने तो कहा था कि आप इसे कई वर्षों की तपस्या के बाद दर्शन देंगें.”

god5

भगवान् ने जवाब दिया, “इसकी हिम्मत और दृढ़ निश्चय को देखो! यह जानने के बाद भी कि इसे अभी कई और वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी, इसने हिम्मत नहीं हारी और अपना विश्वास बनाए रखा. ऐसे व्यक्ति को मैं दर्शन अवश्य देता हूँ.”

 

सीख:
अगर तपस्वी अपना विश्वास खो देता तो क्या उसे भगवान् के दर्शन प्राप्त हो पाते? नहीं! चूँकि उसने हिम्मत नहीं हारी, भगवान् ने उसे दर्शन दिए. दृढ़ संकल्पी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचता है. एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने पर हमें हार न मानने का निश्चय करना चाहिए और उद्देश्य हासिल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयास, उचित प्रवृत्ति व विश्वास से काम करना चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

नदी पार करते हुए एक गुरु और शिष्य

guru1

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: बूझ, मन पर नियंत्रण

एक वयोवृद्ध गुरु और उनका युवा शिष्य हिमालय से पैदल चलकर अपने आश्रम वापस लौट रहे थे. रास्ता काफ़ी लंबा था और वह इलाक़ा पहाड़ी होने के कारण वहाँ की सड़कें बेढंगी व कठिन थीं. आश्रम के रास्ते में उन्हें गंगा नदी का एक भाग पार करना था जहाँ पानी का प्रवाह तेज़ था परन्तु प्रचंड नहीं था.

guru2

जब वह दोनों नदी के पास पहुँचे तब देखा कि वहाँ एक युवती बैठी हुई थी जिसका गाँव नदी के उस पार था. अकेले नदी पार करने में उसे डर लग रहा था और इस कारण नदी पार करने में सहायता के लिए वह गुरु के पास आई.

“अवश्य”, गुरु बोले और उसे अपनी बाहों में उठाकर सावधानीपूर्वक नदी के पार ले आए. सही समय पर मदद के लिए युवती ने गुरु को धन्यवाद दिया और अपने रास्ते चली गई. युवा शिष्य इस भाव प्रदर्शन से खुश नहीं था और उसका चेहरा विषादग्रस्त हो गया.

पहाड़ियों में कुछ समय और कठिन व थकाऊ सफर के बाद दोनों आश्रम पहुँचे. आश्रम लौटने के बाद भी युवक स्पष्ट रूप से व्याकुल था. युवक को बेचैन देखकर गुरु ने शिष्य से उसकी उत्तेजना का कारण पूछा.

शिष्य बोला, “गुरुदेव, किसी भी औरत को न छूने का हमने प्रण लिया है पर फिर भी आपने उसे अपनी बाहों में उठाया. हमें आप स्त्री के बारे में सोचने से भी मना करते हैं पर आपने उस स्त्री को छूआ.”

गुरु मुस्कुराये और शिष्य से बोले, “मैंने उस स्त्री को उठाकर नदी पार की और उसे नदी के पार छोड़ दिया परन्तु तुम तो अभी भी उसे उठाए हुए हो.”

सीख:
गुरु से मिली शिक्षा से हमें उसमें निहित सन्देश पर ध्यान देना चाहिए. हमें शिक्षा का विश्लेषण करके उससे गलत समझ निकालकर स्वयं को उलझाना नहीं चाहिए.

अनुवादक- अर्चना

हाथी और उसकी वृद्ध अंधी माँ

ele2

आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: प्रेम, अपने माता-पिता के प्रति सम्मान

बहुत समय पहले हिमालय की पहाड़ियों में कमल के तालाब के पास बुद्ध का जन्म एक हाथी के रूप में हुआ. वह सफ़ेद रंग का अत्यंत सुन्दर हाथी था जिसका चेहरा व पैर मूँगिया रंग के थे. उसकी सूँड़ चाँदी की डोर के समान चमकती थी.

वह हर जगह अपनी माँ के पीछे-पीछे जाता था. उसकी माँ सबसे ऊँचे पेड़ों से सबसे कोमल पत्ते और सबसे अधिक मीठे आम तोड़कर उसे देते हुए बोलती थी, “पहले तुम, फिर मैं.”

ele3

उसकी माँ कमल के तालाब में सुगन्धित फूलों के बीच उसे नहलाती थी. गहरी सांस लेकर तालाब का पानी अपनी सूँड़ में भरकर वह अपने शिशु के सर और शरीर पर तब तक फुहारती थी जब तक कि वह साफ़ होकर चमकने न लगे. फिर अपनी सूँड़ में पानी भरकर शिशु भी निशाना साधकर अपनी माँ की आँखों के बीच में फुहारे के समान पानी छिड़कता था. जवाब में माँ भी अपने शिशु पर पानी की तेज़ धार छोड़ती थी. इस प्रकार दोनों अपनी-अपनी सूँड़ में पानी भरकर फुहार मारकर एक-दूसरे को गीला करते और प्रसन्नतापूर्वक समय व्यतीत करते थे. कुछ देर पानी से खेलने के बाद दोनों अपनी सूँड़ आपस में लपेटकर मिट्टी में बैठकर आराम करते थे.

ele1

अक्सर दोपहर के समय शिशु हाथी की माँ जावाहफल के पेड़ की छाँव में आराम करती और अपने बच्चे को अन्य नन्हें हाथियों के साथ उछल-कूद करते और शोरगुल मचाते हुए खेलते देखती थी. समय के साथ-साथ नन्हा हाथी बड़ा होता रहा और जल्द ही अपने समूह का सबसे विशाल व शक्तिशाली युवक हाथी बन गया. जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया वैसे-वैसे उसकी माँ वृद्ध होती गई. माँ के दाँत पीले पड़कर टूट गए और उसकी आँखों की दृष्टि भी चली गई. युवा हाथी सबसे ऊँचे पेड़ों से कोमल पत्तियाँ व सबसे मीठे आम तोड़कर अपनी प्रिय वृद्ध अंधी माँ को देकर कहता था, “पहले तुम, फिर मैं.”

वह अपनी माँ को कमल के तालाब में मनमोहक फूलों के बीच ठन्डे पानी से नहलाता था. फिर तालाब का पानी अपनी सूँड़ में भरकर वह माँ के सर व शरीर पर तब तक छिड़कता था जब तक कि उसकी माँ बिल्कुल साफ़ न हो जाती. तत्पश्चात वह दोनों अपनी सूँड़ आपस में लपेटकर मिट्टी में बैठकर आराम करते थे. दोपहर के समय वह अपनी माँ की अगुवाई करता और उसे जावाहफल के पेड़ की छाँव में ले जाता था. फिर वह बाकी के हाथियों के साथ घूमने-फिरने निकल जाता था.

एक दिन शिकार के दौरान एक राजा की निगाह इस मनमोहक सफ़ेद हाथी पर पड़ी.
“कितना उत्कृष्ट हाथ है! इसे तो मेरे पास होना चाहिए ताकि मैं इसकी सवारी कर सकूँ !”
राजा ने हाथी को बंदी बना लिया और उसे शाही तबेले में भेज दिया. राजा ने हाथी को रेशम, रत्न तथा कमल के फूलों के हार से विभूषित किया. उसने हाथी को मीठी घास और रसीले आलूबुखारे दिए और उसकी नांद स्वच्छ पानी से भर दी.

ele4

परन्तु युवा हाथी न कुछ खाता और न ही कुछ पीता. वह निरंतर रोता रहता और इस कारण धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगा. राजा बोला, “उत्कृष्ट हाथी, मैंने तुम्हें रेशम तथा रत्नों से सुसज्जित किया. मैं तुम्हें बेहतरीन खाना व शुद्ध पानी देता हूँ पर फिर भी तुम न तो खाना कहते हो और न ही पानी पीते हो. तुम्हें किस चीज़ से ख़ुशी मिलती है?” युवा हाथी बोला, “रेशम, रत्न, श्रेष्ठ खाना व स्वच्छ पानी से मुझे ख़ुशी नहीं मिलती है. मेरी वृद्ध व अंधी माँ जंगल में अकेली है और उसकी देखभाल करने के लिए कोई भी नहीं है. जब तक मैं अपनी माँ को कुछ खाने को नहीं दे देता तब तक मैं खाना व पानी ग्रहण नहीं करूँगा. इससे मेरी चाहे मृत्यु ही क्यों न हो जाए.”

राजा बोला, “ऐसी अनुकम्पा तो मैंने मनुष्यों में भी नहीं देखी है. इस युवा हाथी को ज़ंजीर में रखना उचित नहीं है.”
शाही तबेले से आज़ाद होते ही युवा हाथी अपनी माँ को ढूँढ़ने पहाड़ियों के पार भागा. उसे अपनी माँ कमल के तालाब के पास मिली. वह मिट्टी में लेती हुई थी क्योंकि वह अत्यंत कमज़ोर हो चुकी थी. माँ को देखकर युवक की आँखें भर आईं. उसने अपनी सूँड़ में पानी भरा और माँ के सर व शरीर पर पानी तब तक छिड़का जब तक कि वह पूर्ण रूप से साफ़ न हो गई.
“यह बारिश हो रही है या फिर मेरा पुत्र लौट आया है?, माँ ने पूछा.
“यह तुम्हारा अपना बेटा है. राजा ने मुझे छोड़ दिया है” , युवक बोला.
युवक ने जब माँ की आँखें धोईं तब चमत्कारपूर्ण ढ़ंग से उसकी माँ की दृष्टि ठीक हो गई और वह बोली, “जिस प्रकार अपने बेटे को देखकर मैं प्रसन्न हूँ उसी प्रकार राजा भी सदा खुश रहे!”

युवा हाथी ने झटपट पेड़ से कोमल पत्ते और मीठे आम तोड़े और माँ को देते हुए बोला, “पहले तुम, फिर मैं.”

सीख:

हमारे माता-पीता हमसे बिना शर्त के प्रेम करते हैं. हमें सिखाया गया है- माता, पिता, गुरु, दैवं. हमारे जीवन में माँ का स्थान सर्वोच्च होता है. हमें भी अपने माता-पिता से प्रेम करना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए विशेषकर तब जब उन्हें हमारे प्यार की सबसे अधिक ज़रुरत होती है.

ele5

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना