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एक तपस्वी का संकल्प

 

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: दृढ़ निश्चय, श्रद्धा

भगवान् को प्रसन्न करने के मुख्य उद्देश्य से बहुत सारे लोग तप करते हैं. एक तपस्वी ने एक बार भगवान् को प्रसन्न करने का निश्चय किया और अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या करने लगा. उसने सोचा कि अगर वह भगवान् को प्रसन्न करने में सफल हो जाएगा तो उसे आशीर्वाद में भगवान् के दर्शन मिलेंगें. अतः वह प्रतिदिन पेड़ की परिक्रमा करता था और भोजन में रोज़ाना पेड़ के पत्ते खाता था.

एक दिन नारदजी भगवान् के धाम जा रहे थे. रास्ते में तपस्वी को देखकर वह उससे मिलने आ गए. नारदजी को देखकर तपस्वी ने तुरंत उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया. नारदजी के पूछने पर तपस्वी ने भगवान् की कृपा पाने के अपने निश्चय का वर्णन किया. तपस्वी बोला, “नारदजी, मैं कई वर्षों से तपस्या कर रहा हूँ और इस अम्बली वृक्ष के पत्तों का ही भोजन करता हूँ ताकि मुझे भगवान् के दर्शन हो सकें. आप जब भगवान् से मिलेंगें तो कृपया मेरी ओर से उन्हें मुझे दर्शन प्रदान करने के लिए कहना.” तपस्वी की कहानी सुनकर नारदजी ने निश्चय किया कि वह उसका सन्देश भगवान् तक अवश्य पहुँचाएंगें.

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नारद के आगमन पर भगवान् ने उनसे पूछा, “नारद! पृथ्वी से क्या समाचार लाए हो?”

तपस्वी से अपनी मुलाकात का स्मरण करते हुए नारदजी बोले, “भगवन! एक तपस्वी अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या कर रहा है ताकि उसे आपके दर्शन हो सकें. आप उसे अपने दर्शन कब देंगें?”

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भगवान् बोले, “उससे कहो कि मेरे दर्शन पाने के लिए उसे उतने वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने कि अम्बली पेड़ पर पत्ते हैं! ”

प्रभु का कथन सुनकर नारदजी के घुटने ठिठुरने लगे. उनकी टांगें सुन्न हो गयीं मानो वह एक कदम भी नहीं ले पाएंगीं और उनका दिल बैठ गया. उत्सुक तपस्वी को वह यह समाचार कैसे दे पायेंगें. वह तो बेचारा बिलकुल टूट जाएगा. नारदजी ने मन ही मन सोचा, “मैं उससे क्या कहूँगा? वह हिम्मत हार जाएगा और तपस्या के लिए सारा उत्साह गँवा देगा.” इस प्रकार चिंतन करते हुए नारदजी आसमान से पृथ्वी की ओर आ रहे थे जब तपस्वी ने उन्हें देखा. अपना नाम सुनकर, नारदजी तपस्वी के पास गए. तपस्वी यह सुनकर अत्यंत हर्षित हुआ कि नारदजी भगवान् से मिले थे.god

उसने नारदजी से पूछा, “मेरे लिए भगवान् का क्या सन्देश है?”
नारदजी ने उदासी से उत्तर दिया, “वह मैं नहीं बता सकता क्योंकि मेरी बात सुनकर तुम हिम्मत हार जाओगे और अपनी तपस्या त्याग दोगे.”
तपस्वी ने जवाब दिया, “भगवान् ने चाहे कुछ भी कहा हो, मैं हिम्मत नहीं हारूँगा. कम से कम मुझे प्रभु के दिव्य शब्द सुनने का अवसर प्राप्त होगा. कृपया मुझे ठीक-ठीक बताएं कि भगवान् ने क्या कहा है.”

नारदजी अभी भी अनिश्चित थे. वह सोचने लगे, “क्या मैं इसे बता दूँ? कहीं इस बेचारे का विश्वास न टूट जाए. मैं इसके साथ ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहता.”

तपस्वी ने पुनः विनती की, “कृपया मुझे भगवान् का सन्देश बताएं.”
इस पर नारदजी बोले, “भगवान् ने कहा है कि तुम्हें और कई वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी. असल में, भगवान् के दर्शन पाने के लिए तुम्हें उतने सालों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने इस अम्बली वृक्ष पर पत्ते हैं.”
तपस्वी आनंदोल्लास हो गया. वह नाचने और गाने लगा, “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. भगवान् ने अपने धाम से मेरे लिए सन्देश भेजा है. उन्होंने मुझसे वादा किया है कि वह मुझे दर्शन देंगें.यह वर्ष तो तुरंत ही बीत जायेंगें.”
तपस्वी का प्रेम और हौसला देखकर भगवान् ने तत्क्षण तपस्वी के सामने प्रकट होकर उसे अपने दर्शन दिए. तपस्वी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. वह प्रभु के चरणों में गिर पड़ा.

नारदजी अचंभित थे. उन्होंने भगवान् से पूछा, “प्रभु, आप यहाँ कैसे? आपने तो कहा था कि आप इसे कई वर्षों की तपस्या के बाद दर्शन देंगें.”

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भगवान् ने जवाब दिया, “इसकी हिम्मत और दृढ़ निश्चय को देखो! यह जानने के बाद भी कि इसे अभी कई और वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी, इसने हिम्मत नहीं हारी और अपना विश्वास बनाए रखा. ऐसे व्यक्ति को मैं दर्शन अवश्य देता हूँ.”

 

सीख:
अगर तपस्वी अपना विश्वास खो देता तो क्या उसे भगवान् के दर्शन प्राप्त हो पाते? नहीं! चूँकि उसने हिम्मत नहीं हारी, भगवान् ने उसे दर्शन दिए. दृढ़ संकल्पी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचता है. एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने पर हमें हार न मानने का निश्चय करना चाहिए और उद्देश्य हासिल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयास, उचित प्रवृत्ति व विश्वास से काम करना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

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नदी पार करते हुए एक गुरु और शिष्य

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: बूझ, मन पर नियंत्रण

एक वयोवृद्ध गुरु और उनका युवा शिष्य हिमालय से पैदल चलकर अपने आश्रम वापस लौट रहे थे. रास्ता काफ़ी लंबा था और वह इलाक़ा पहाड़ी होने के कारण वहाँ की सड़कें बेढंगी व कठिन थीं. आश्रम के रास्ते में उन्हें गंगा नदी का एक भाग पार करना था जहाँ पानी का प्रवाह तेज़ था परन्तु प्रचंड नहीं था.

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जब वह दोनों नदी के पास पहुँचे तब देखा कि वहाँ एक युवती बैठी हुई थी जिसका गाँव नदी के उस पार था. अकेले नदी पार करने में उसे डर लग रहा था और इस कारण नदी पार करने में सहायता के लिए वह गुरु के पास आई.

“अवश्य”, गुरु बोले और उसे अपनी बाहों में उठाकर सावधानीपूर्वक नदी के पार ले आए. सही समय पर मदद के लिए युवती ने गुरु को धन्यवाद दिया और अपने रास्ते चली गई. युवा शिष्य इस भाव प्रदर्शन से खुश नहीं था और उसका चेहरा विषादग्रस्त हो गया.

पहाड़ियों में कुछ समय और कठिन व थकाऊ सफर के बाद दोनों आश्रम पहुँचे. आश्रम लौटने के बाद भी युवक स्पष्ट रूप से व्याकुल था. युवक को बेचैन देखकर गुरु ने शिष्य से उसकी उत्तेजना का कारण पूछा.

शिष्य बोला, “गुरुदेव, किसी भी औरत को न छूने का हमने प्रण लिया है पर फिर भी आपने उसे अपनी बाहों में उठाया. हमें आप स्त्री के बारे में सोचने से भी मना करते हैं पर आपने उस स्त्री को छूआ.”

गुरु मुस्कुराये और शिष्य से बोले, “मैंने उस स्त्री को उठाकर नदी पार की और उसे नदी के पार छोड़ दिया परन्तु तुम तो अभी भी उसे उठाए हुए हो.”

सीख:
गुरु से मिली शिक्षा से हमें उसमें निहित सन्देश पर ध्यान देना चाहिए. हमें शिक्षा का विश्लेषण करके उससे गलत समझ निकालकर स्वयं को उलझाना नहीं चाहिए.

अनुवादक- अर्चना

हाथी और उसकी वृद्ध अंधी माँ

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: प्रेम, अपने माता-पिता के प्रति सम्मान

बहुत समय पहले हिमालय की पहाड़ियों में कमल के तालाब के पास बुद्ध का जन्म एक हाथी के रूप में हुआ. वह सफ़ेद रंग का अत्यंत सुन्दर हाथी था जिसका चेहरा व पैर मूँगिया रंग के थे. उसकी सूँड़ चाँदी की डोर के समान चमकती थी.

वह हर जगह अपनी माँ के पीछे-पीछे जाता था. उसकी माँ सबसे ऊँचे पेड़ों से सबसे कोमल पत्ते और सबसे अधिक मीठे आम तोड़कर उसे देते हुए बोलती थी, “पहले तुम, फिर मैं.”

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उसकी माँ कमल के तालाब में सुगन्धित फूलों के बीच उसे नहलाती थी. गहरी सांस लेकर तालाब का पानी अपनी सूँड़ में भरकर वह अपने शिशु के सर और शरीर पर तब तक फुहारती थी जब तक कि वह साफ़ होकर चमकने न लगे. फिर अपनी सूँड़ में पानी भरकर शिशु भी निशाना साधकर अपनी माँ की आँखों के बीच में फुहारे के समान पानी छिड़कता था. जवाब में माँ भी अपने शिशु पर पानी की तेज़ धार छोड़ती थी. इस प्रकार दोनों अपनी-अपनी सूँड़ में पानी भरकर फुहार मारकर एक-दूसरे को गीला करते और प्रसन्नतापूर्वक समय व्यतीत करते थे. कुछ देर पानी से खेलने के बाद दोनों अपनी सूँड़ आपस में लपेटकर मिट्टी में बैठकर आराम करते थे.

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अक्सर दोपहर के समय शिशु हाथी की माँ जावाहफल के पेड़ की छाँव में आराम करती और अपने बच्चे को अन्य नन्हें हाथियों के साथ उछल-कूद करते और शोरगुल मचाते हुए खेलते देखती थी. समय के साथ-साथ नन्हा हाथी बड़ा होता रहा और जल्द ही अपने समूह का सबसे विशाल व शक्तिशाली युवक हाथी बन गया. जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया वैसे-वैसे उसकी माँ वृद्ध होती गई. माँ के दाँत पीले पड़कर टूट गए और उसकी आँखों की दृष्टि भी चली गई. युवा हाथी सबसे ऊँचे पेड़ों से कोमल पत्तियाँ व सबसे मीठे आम तोड़कर अपनी प्रिय वृद्ध अंधी माँ को देकर कहता था, “पहले तुम, फिर मैं.”

वह अपनी माँ को कमल के तालाब में मनमोहक फूलों के बीच ठन्डे पानी से नहलाता था. फिर तालाब का पानी अपनी सूँड़ में भरकर वह माँ के सर व शरीर पर तब तक छिड़कता था जब तक कि उसकी माँ बिल्कुल साफ़ न हो जाती. तत्पश्चात वह दोनों अपनी सूँड़ आपस में लपेटकर मिट्टी में बैठकर आराम करते थे. दोपहर के समय वह अपनी माँ की अगुवाई करता और उसे जावाहफल के पेड़ की छाँव में ले जाता था. फिर वह बाकी के हाथियों के साथ घूमने-फिरने निकल जाता था.

एक दिन शिकार के दौरान एक राजा की निगाह इस मनमोहक सफ़ेद हाथी पर पड़ी.
“कितना उत्कृष्ट हाथ है! इसे तो मेरे पास होना चाहिए ताकि मैं इसकी सवारी कर सकूँ !”
राजा ने हाथी को बंदी बना लिया और उसे शाही तबेले में भेज दिया. राजा ने हाथी को रेशम, रत्न तथा कमल के फूलों के हार से विभूषित किया. उसने हाथी को मीठी घास और रसीले आलूबुखारे दिए और उसकी नांद स्वच्छ पानी से भर दी.

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परन्तु युवा हाथी न कुछ खाता और न ही कुछ पीता. वह निरंतर रोता रहता और इस कारण धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगा. राजा बोला, “उत्कृष्ट हाथी, मैंने तुम्हें रेशम तथा रत्नों से सुसज्जित किया. मैं तुम्हें बेहतरीन खाना व शुद्ध पानी देता हूँ पर फिर भी तुम न तो खाना कहते हो और न ही पानी पीते हो. तुम्हें किस चीज़ से ख़ुशी मिलती है?” युवा हाथी बोला, “रेशम, रत्न, श्रेष्ठ खाना व स्वच्छ पानी से मुझे ख़ुशी नहीं मिलती है. मेरी वृद्ध व अंधी माँ जंगल में अकेली है और उसकी देखभाल करने के लिए कोई भी नहीं है. जब तक मैं अपनी माँ को कुछ खाने को नहीं दे देता तब तक मैं खाना व पानी ग्रहण नहीं करूँगा. इससे मेरी चाहे मृत्यु ही क्यों न हो जाए.”

राजा बोला, “ऐसी अनुकम्पा तो मैंने मनुष्यों में भी नहीं देखी है. इस युवा हाथी को ज़ंजीर में रखना उचित नहीं है.”
शाही तबेले से आज़ाद होते ही युवा हाथी अपनी माँ को ढूँढ़ने पहाड़ियों के पार भागा. उसे अपनी माँ कमल के तालाब के पास मिली. वह मिट्टी में लेती हुई थी क्योंकि वह अत्यंत कमज़ोर हो चुकी थी. माँ को देखकर युवक की आँखें भर आईं. उसने अपनी सूँड़ में पानी भरा और माँ के सर व शरीर पर पानी तब तक छिड़का जब तक कि वह पूर्ण रूप से साफ़ न हो गई.
“यह बारिश हो रही है या फिर मेरा पुत्र लौट आया है?, माँ ने पूछा.
“यह तुम्हारा अपना बेटा है. राजा ने मुझे छोड़ दिया है” , युवक बोला.
युवक ने जब माँ की आँखें धोईं तब चमत्कारपूर्ण ढ़ंग से उसकी माँ की दृष्टि ठीक हो गई और वह बोली, “जिस प्रकार अपने बेटे को देखकर मैं प्रसन्न हूँ उसी प्रकार राजा भी सदा खुश रहे!”

युवा हाथी ने झटपट पेड़ से कोमल पत्ते और मीठे आम तोड़े और माँ को देते हुए बोला, “पहले तुम, फिर मैं.”

सीख:

हमारे माता-पीता हमसे बिना शर्त के प्रेम करते हैं. हमें सिखाया गया है- माता, पिता, गुरु, दैवं. हमारे जीवन में माँ का स्थान सर्वोच्च होता है. हमें भी अपने माता-पिता से प्रेम करना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए विशेषकर तब जब उन्हें हमारे प्यार की सबसे अधिक ज़रुरत होती है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

जीवन के संघर्ष

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      आदर्श: आशावाद
 उप आदर्श: रवैया

एक दिन एक बेटी ने अपने पिता से शिकायत करते हुए कहा कि उसकी ज़िन्दगी बहुत तकलीफ़देह थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किस प्रकार सफल हो पाएगी. हर पल जूझते और संघर्ष करते-करते वह पूरी तरह से थक चुकी थी. जैसे ही एक परेशानी का समाधान निकलता था तभी दूसरी परेशानी सामने आ खड़ी होती थी. उसके पिता जो व्यवसाय से एक रसोइया थे, उसे रसोई में ले गए. उन्होंने ३ बर्तनों में पानी भरा और उन्हें तेज आँच पर रख दिया.

जब तीनों बर्तनों में पानी उबलने लगा तब उन्होंने एक में आलू डाले, दूसरे में अंडे और तीसरे में कॉफ़ी के बीज डाल दिए. अपनी बेटी से बिना कुछ बोले एक बार पुनः वह तीनों बर्तनो में उबाल आने का इंतज़ार करने लगे.

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बेटी हैरान थी कि उसके पिता क्या कर रहे थे परन्तु नाखुश होने के बावजूद वह बेताबी से इंतज़ार करने लगी. २० मिनट के बाद पिता ने तीनों चूल्हे बंद कर दिए. फिर उन्होंने पहले बर्तन में से आलू निकालकर एक कटोरे में रख दिए. इसी प्रकार दूसरे बर्तन में से अंडे निकालकर एक अन्य कटोरे में रख दिए और फिर एक कड़छी से कॉफ़ी निकालकर एक कप में डाल दी.

इस के बाद अपनी बेटी को देखकर उन्होंने पूछा, ” तुम्हें क्या दिख रहा है?”
उसने फौरन जवाब दिया, ” आलू, अंडे और कॉफ़ी.”

पिता बोले, ध्यान से देखो और आलूओं को छूकर महसूस करो. आलूओं को छूने पर उसने पाया कि आलू नरम थे.

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फिर उन्होंने एक अंडे को लेकर उसे फोड़ने को कहा. अंडे का छिलका छिलने पर बेटी ने पाया कि अंडा पूर्णतया उबलकर अब कठोर था.

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अंत में उन्होंने उसे कॉफ़ी का एक घूँट लेने को कहा. कॉफ़ी की लुभावनी महक सूँघते ही उसका चेहरा खिल उठा.

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उसने अपने पिता से पूछा, “इसका क्या मतलब है?”

तब पिता ने समझाया कि सभी- आलू, अंडे व कॉफ़ी के बीज- ने ही उबलते हुए पानी नामक कठिनाई का सामना किया था. परन्तु फिर भी सभी की प्रतिक्रिया भिन्न थी. उबलते पानी में जाने से पहले आलू सशक्त, सख्त व कठोर था पर उबलते पानी में कुछ देर रहने के बाद वह नरम व कमजोर हो गया. इसी प्रकार उबलते पानी में जाने से पहले अंडे नाज़ुक थे और उनके अंदर के द्रव्य की रक्षा उनका ठोस बाहरी छिलका कर रहा था. परन्तु उबलते पानी में रहने के बाद अंडे भीतर से सख्त हो गए. इन दोनों की अपेक्षा कॉफ़ी के पिसे हुए बीज बिलकुल अनोखे थे. उन्हें उबलते पानी में डालने से पानी ही बदल गया और सबका पसंदीदा एक नया पेय बनकर तैयार हो गया.

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फिर उन्होंने अपनी बेटी से पूछा, “तुम इन सब में से कौन सी हो?” “विपत्ति का सामना करने पर तुम्हारी अनुक्रिया क्या होती है? क्या तुम आलू हो, अंडा हो या फिर कॉफ़ी का बीज हो?”

सीख:
जीवन में हमारे आस-पास और हमारे साथ बहुत सी घटनाएँ होतीं हैं. परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि हम किस भाव से उनका सामना करते हैं और उससे क्या सबक सीखते हैं. जीवन निरंतर सीखने व परिस्थिति के अनुकूल स्वयं को अपनाने के साथ-साथ प्रत्येक कठिनाई को सकारात्मकता में परिवर्तित करने का नाम है.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

प्रतिक्रिया या अनुक्रिया

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: आत्म विश्लेषण, परिस्थिति संभालना

अचानक एक तिलचट्टा कहीं से उड़ कर आया और एक महिला पर बैठ गया. मुझे आश्चर्य हुआ यदि ऐसा तिलचट्टों की परिचर्चा के फलस्वरूप हुआ था. वह महिला भयभीत होकर चिल्लाने लगी. घबराया हुआ चेहरा और काँपती हुई आवाज़ में चिल्लाती हुई, वह कूदने लगी और अपने दोनों हाथों से तिलचट्टे को स्वयं पर से हटाने की उग्र कोशिश करने लगी.panic4 महिला की प्रतिक्रिया से उसके समूह के अन्य सभी सदस्य भी व्याकुल और विक्षुब्ध हो गए. तिलचट्टे को स्वयं पर से हटाने की लगातार कोशिश के कारण अब वह तिलचट्टा एक दूसरी महिला पर जा बैठा. तिलचट्टे को स्वयं पर बैठा पाते ही दूसरी महिला ने सारा नाटक दोहराया और समस्त समूह में कोलाहल व अस्तव्यस्थता फैल गई. महिलओं की दशा देखकर रेस्टोरेंट का बैरा झटपट उनके बचाव के लिए आगे आया. तिलचट्टे से छुटकारा पाने की हड़बड़ी में अब वह तिलचट्टा बैरे पर जा गिरा. बैरा शांतचित्त व स्थिर खड़ा रहा और अपनी कमीज पर तिलचट्टे का व्यवहार गौर से देखने लगा. आश्वस्त और निश्चित होने पर उसने तिलचट्टे को पकड़ा और बाहर फेंक दिया.

कॉफ़ी का घूंट लेते हुए और सारा तमाशा देखते हुए मैं मन ही मन सोचने लगी कि क्या महिलाओं के नाटकीय व्यवहार के लिए वह तिलचट्टा जिम्मेवार था. और यदि ऐसा था तो वह बैरा क्यों नहीं व्याकुल हुआ? उसने तो सारे बवाल को बहुत ही निपुणता से संभाला.

वास्तव में सारी खलबली का कारण तिलचट्टा था ही नहीं. महिलाओं के समूह में अशांति की वजह तिलचट्टे द्वारा उत्पन्न बवाल को संभालने की उनकी अक्षमता थी.

इस घटना से मुझे भी यह अहसास हुआ कि मेरे परेशान होने की वजह मेरे पिता या मेरे प्रबंधकर्ता द्वारा मुझ पर चिल्लाना नहीं था. वास्तव में उनके चिल्लाने से उत्पन्न अशांति को संभालने की मेरी अक्षमता मुझे उत्तेजित करती है.

वास्तव में सड़कों पर यातायात जाम मुझे परेशान नहीं करता है बल्कि यातायात जाम से उत्पन्न अशांन्ति को संभालने की मेरी अक्षमता मुझे व्याकुल करती है.

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समस्या से अधिक उसके प्रति मेरी प्रतिक्रिया मुझे कष्ट देती है.

सीख:
इस घटना से मुझे समझ में आया कि जीवन में मुझे विरूद्ध प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए. मुझे सदा अनुकूल रहना चाहिए.
महिलाओं ने प्रतिक्रिया उत्पन्न की जबकि बैरा परिस्थिति के अनुकूल रहा.
प्रतिक्रिया सदा स्वाभाविक होती है जबकि अनुक्रिया सदा बौद्धिक….

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अनुवादक- अर्चना

दीवार के दूसरी तरफ

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: ध्यान रखना, लगातार कोशिश

एक युवा महिला थी जिसे अपने फूलों के बगीचे की देखरेख व उगाई पर बहुत गर्व था. इस महिला का लालन-पालन उसकी दादी ने किया था और उन्होंने ठीक अपनी ही तरह उसे भी पौधों की देखरेख व उनसे प्रेम करना सिखाया था.

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इस कारण उसकी दादी की ही तरह उसका बगीचा भी अत्यंत उत्कृष्ट था. एक दिन जब वह महिला अपने फूलों की तालिका को उलट-पुलट रही थी तब उसकी नज़र एक पौधे की तस्वीर पर पड़ी.

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उसने ऐसे खूबसूरत फूल पहले कभी नहीं देखे थे. उसने मन ही मन सोचा, “ऐसे फूल मेरे पास होने ही चाहिए ” और उसने तुरंत वह पौधा मंगवा लिया.

पौधे के आने से पहले ही उसने बगीचे में उसके लिए स्थान तैयार रखा हुआ था. पौधा आने पर उसने उसे अपने घर के आँगन के पीछे पत्थर की दीवार के तले लगा दिया. देखते ही देखते वह पौधा बहुत ही खूबसूरती से पनपने लगा और आकर्षक हरी पत्तियों से भर गया. पर उसमें एक भी फूल नहीं खिला. वह महिला पूरे मन व मेहनत से पौधे को नियमित रूप से पानी व खाद देती रही. यहाँ तक कि पौधे को खिलने के लिए उससे मीठी बातें भी करती थी. परंतु कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

कुछ हफ़्तों बाद एक सुबह वह फूलों की बेल के पास खड़ी होकर सोच रही थी कि उस हरी-भरी बेल में फूल न खिलने से वह कितनी निराश थी. वह इस बात पर गंभीरता से विचार कर रही थी यदि उसे उस पौधे को काटकर कोई अन्य पौधा लगाना चाहिए. तभी उसकी अपाहिज पड़ोसी, जिसके घर से वह पत्थर की दीवार सांझी थी, का फ़ोन आया. ph5
“तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद. तुम सोच भी नहीं सकती कि मैंने तुम्हारी लगाई बेल के मनमोहक फूलों का कितना आनंद उठाया है.”

पड़ोसी की बात सुनकर महिला झटपट पड़ोसी के आँगन में गई और उसने बेल अति सुन्दर फूलों से भरी पाई. ऐसे आकर्षक फूल उसने पहले कभी नहीं देखे थे. महिला द्वारा लगाया हुआ पौधा धीरे-धीरे पड़ोसी के बाड़े की तरफ फैल गया था और किसी कारण से पड़ोसी की तरफ की बेल अत्यंत ख़ूबसूरत फूलों से लदी हुई थी. सिर्फ इसलिए कि हम अपनी मेहनत का परिणाम देख नहीं सकते हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हमारा परिश्रम सफल नहीं हुआ.

सीख:
कठिन परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता है. यह आवश्यक नहीं है कि अच्छा कार्य हमेशा प्रत्यक्ष हो पर किसी न किसी रूप में उसका सकारात्मक प्रभाव ज़रूर पड़ता है. हमारा अच्छा कार्य किसी और के जीवन में अंतर ला सकता है. हमें पूरे विश्वास के साथ लगातार प्रयास करते रहना चाहिए, परिणाम अवश्य प्रत्यक्ष होगा.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

अधिक उदार कौन है

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     आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: उदारता

एक बार कृष्ण और अर्जुन एक गाँव की ओर जा रहे थे. अर्जुन कृष्ण से बार-बार एक ही प्रश्न कर रहा था कि दान-दक्षिणा के संदर्भ में उसकी अपेक्षा कर्ण को अनुकरणीय व्यक्ति क्यों समझा जाता है. अर्जुन को सीख सिखाने के उद्देश्य से कृष्ण ने अपने हाथ की अंगुलियाँ तोड़ दीं और उनके ऐसा करते ही उनके मार्ग के आस-पास के दो पहाड़ सोने में परिवर्तित हो गए.

karn4फिर कृष्ण बोले, “अर्जुन, यह दोनों सोने के पहाड़ सभी ग्रामवासियों में बाँट दो. इस बात का ध्यान रखना कि तुम इन दोनों पहाड़ों का समस्त सोना दानस्वरूप दो.’

कृष्ण के आदेशानुसार अर्जुन गाँव में गया और उसने घोषणा की वह प्रत्येक ग्रामवासी को सोना दान में देगा. अर्जुन ने सभी ग्रामवासियों को एक पहाड़ के पास एकत्रित होने को कहा. सभी ग्रामवासी अत्यंत प्रसन्न होकर अर्जुन की प्रशंसा करने लगे और अर्जुन छाती तानकर अभिमान से पहाड़ की ओर बढ़ा. दो दिन और दो रातों तक लगातार पहाड़ खोदकर वह सोना निकाल-निकालकर ग्रामवासियों को दान देता रहा. परंतु फिर भी पहाड़ वैसे के वैसे ही थे और उनका सोना ज़रा भी काम नहीं हुआ. बहुत सारे ग्रामवासी झटपट वापस आकर दुबारा कतार में खड़े हो रहे थे. कुछ समय बाद अर्जुन को थकान व कमज़ोरी महसूस होने लगी. पर फिर भी वह अपना अभिमान छोड़ने को तैयार नहीं था और उसने कृष्ण से कहा कि कुछ देर आराम करने के बाद वह वापस काम पर लग जाएगा.

इस दौरान कृष्ण ने कर्ण को बुलाया. उन्होंने कर्ण से कहा, “कर्ण, तुम्हें इन दोनों पहाड़ों का एक-एक अंश दान देना है.” कर्ण ने तुरंत दो गाँववालों को बुलाया और उनसे बोला, “तुम वह दो पहाड़ देख रहे हो? वह दोनों सोने के पहाड़ तुम सभी ग्रामवासियों के लिए हैं. तुम उन्हें जिस प्रकार चाहो उस प्रकार इस्तेमाल कर सकते हो.” ऐसा कहकर कर्ण वहाँ से चला गया.

 

कर्ण को देखकर अर्जुन अवाक था. उसे आश्चर्य हुआ कि ऐसा विचार उसके मन में क्यों नहीं आया.

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अर्जुन की ओर देखकर कृष्ण शरारती ढंग से मुस्कुराए और बोले, “अर्जुन, अवचेतन रूप से तुम स्वयं भी सोने की ओर आकृष्ट थे. तुमने दुखी मन से हर ग्रामवासी को दान दिया और उतना ही दिया जितना तुम्हारे हिसाब से प्रचुर था.karn6 इसलिए तुम्हारे दान का माप केवल तुम्हारी कल्पना पर आधारित था. लेकिन कर्ण के साथ ऐसा नहीं था. इतना सब दान करने के बाद भी वह असम्बद्ध रहा और उसने लोगों से अपनी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं की. उसे कोई परवाह नहीं थी कि लोग उसकी पीठ पीछे उसके लिए अच्छा बोल रहें हैं या बुरा. ज्ञानोदय के पथ पर चल रहे व्यक्ति का यही प्रतीक होता है.

सीख:

सही मायने में देना या प्रेम करना वह है जो बिना किसी शर्त के किया जाए. हमें सदा सही कार्य करना चाहिए क्योंकि हमें शुरू से यही सीख दी गई है. किसी नाम, सत्कार या प्रशंसा की परवाह किए बिना सही कार्य करना ही मनुष्य की विशिष्टता है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना