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        आलोचना के प्रति सही मनोभाव 

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      आदर्श: उचित आचरण 

  उप आदर्श: सही नज़रिया

  हज़रत मुहम्मद का अली नामक एक शिष्य था. हज़रत मुहम्मद के अन्य शिष्य अक्सर अली की आलोचना करते थे पर अली धीरता ali3से बर्दाश्त करता था. एक दिन अपने मालिक की उपस्थिति में दूसरों ने अली की निंदा की; काफी समय तक धैर्ययुक्त व सहनशील रहने के बाद आख़िरकार अली अपने प्रतिरक्षा के लिए खड़ा हुआ. अली के ऐसा करते ही, हज़रत मुहम्मद तुरंत वहाँ से चले गए. अली ने मालिक का अनुगमन किया और उनसे पूछा, “मालिक, जब दूसरों ने मेरी आलोचना करनी आरम्भ की तब आप वहाँ से चले क्यों आए? आपने ने मेरा समर्थन क्यों नहीं किया?”

  हज़रत बोले, “मैंने देखा कि जब तक तुम मौन थे तब तक तुम्हारे पीछे १० फरिश्ते खड़े थे और तुम्हारी रक्षा कर रहे थे; लेकिन जैसे ही तुमने अपनी वक़ालत करनी शुरू की, उसी क्षण फरिश्ते लुप्त हो गए और मैं भी वहाँ से चला आया.” 

  सीख:

    यह ज़रूरी नहीं है कि फरिश्ते मानव शरीर में हों. फरिश्ते आनंद, धैर्य, सहनशीलता तथा क्षमा के रूप में भी विद्यमान हो सकते हैं. जब हम पलट कर हमला करते हैं तब हम प्रतिशोध व द्वेष जैसे नकारात्मक स्वभाव का प्रदर्शन करते हैं. ऐसा विचार सही नहीं है कि जो अपनी प्रतिरक्षा करते हैं वह ही सशक्त होते हैं. यदि हमारा लक्ष्य शांत जीवन व्यतीत करना या भगवान् की खोज करना है तो दूसरों द्वारा निंदा किए जाने पर हमें उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए. हमें दूसरों की त्रुटियों में संलग्न नहीं होना चाहिए. हम स्वयं में परिवर्तन लाकर अपने उदाहरण से दूसरों में बदलाव ला सकते हैं. हमें हिदायत तभी देनी चाहिए जब हमसे सलाह माँगी जाए. और वह उपदेश दूसरों के प्रति प्रेम से आना चाहिए… वरना हमें दूसरों की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

  अनुवादक- अर्चना   

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मछुआरा जिसने धर्मात्मा होने का ढोंग किया

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: बदलाव

एक अँधेरी रात एक मछुआरा किसी के निजी बगीचे में चुपके से घुस गया. बगीचे में एक तालाब था जो मछलियों से भरा हुआ था. घर में अँधेरा देखकर मछुआरा बहुत खुश हुआ और सभी को सोता हुआ सोचकर उसने तालाब से कुछ मछलियॉँ पकड़ने का निश्चय किया.

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परन्तु जाल के पानी में गिरने की आवाज़ से घर के मालिक की नींद टूट गई. मालिक बोला, “तुमने सुना? शायद कोई हमारी मछली चुरा रहा है.”fish3

मालिक ने अपने नौकरों को जाँच कर पता लगाने का आदेश दिया. मछुआरा असमंजस में था. घबड़ाहट में स्वयं से बोला, “यह तो इसी तरफ आ रहे हैं? जल्द ही यहाँ आकर मुझे मारेंगे. मैं क्या करूँ?”

अपने जाल को झाड़ियों के नीचे छिपाकर वह भागने लगा. पर वहाँ से बचने का कोई रास्ता नहीं था. हताश होकर छिपने की जगह ढूँढ़ते हुए, उसे अचानक सुलगती हुआ आग दिखी जो शायद किसी धर्मात्मा ने वहाँ छोड़ी थी.

आग को देखकर मछुआरे के मन में तुरंत एक विचार आया और उसने सोचा, “मेरी तक़दीर मुझपर इससे अधिक मेहरबान नहीं हो सकती थी.” उसने फटाफट अपनी पगड़ी उतारी और अपनी बाँहों व माथे पर राख लगा ली. फिर आग के समक्ष बैठकर वह समाधि में मग्न किसी धर्मात्मा का ढोंग करने लगा.

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नौकर अचानक उस स्थान पर पहुँचे पर उसे कोई धर्मात्मा समझकर बिना कुछ कहे ही वहाँ से चले गए.
घर के मालिक ने नौकरों से पूछा, “क्या हुआ? तुम्हें चोर मिला?”

नौकरों ने उत्तर दिया, “नहीं सरकार! वह भाग गया. लेकिन बगीचे में हमें एक धर्मात्मा ध्यानस्थ मिले.”

मेरे बगीचे में धर्मात्मा! “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. मुझे अभी उनके पास ले चलो” , मालिक बोला.

नौकर अपने मालिक को उस स्थान पर ले गए जहाँ मछुआरा तपस्या करने का ढोंग कर रहा था. उसके नज़दीक पहुँचने पर मालिक ने सबसे शांत रहने को कहा ताकि उस महान साधु की तपस्या में विघ्न न पड़े.
तपस्या करने का ढोंग कर रहे मछुआरे ने सोचा, “मैंने इन सबको मूर्ख बना दिया… यहाँ तक कि घर के मालिक को भी.”

अंततः मालिक और उसके नौकर वहाँ से चले गए. मछुआरे ने रात भर वहीं चुपचाप बैठकर सवेरे वहाँ से बचकर निकलने का निश्चय किया.
सवेरे जैसे ही वह जाने के लिए उठा तभी उसे एक युवा दम्पति अपने नवजात शिशु के साथ उस तरफ आते दिखे.fish7

मछुआरे को देखकर वह बोले, “हे महात्मा! आपके बारे में सुनकर हम आपका आशीर्वाद लेने आए हैं. कृपया हमारे बच्चे को आशीर्वाद दीजिए.”
नकली धर्मात्मा बोला, “भगवान् तुम्हारा भला करें.”

उस दम्पति के जाते ही मछुआरे ने लोगों का एक बड़ा झुंड अपनी ओर आते देखा. लोग उसका आशीर्वाद लेने आ रहे थे ओर उनके हाथ में नाना प्रकार का चढ़ावा था- जैसे कि फूल, मिठाई ओर चांदी की थाली भी.

लोगों का सम्मान व श्रद्धा देखकर मछुआरा द्रवित हो गया तथा उसने और ढोंग न करने का निश्चय किया. उस क्षण से वह वास्तव में भगवान् का भक्त बन गया. उसने सदा के लिए चोरी छोड़ दी और अपना शेष जीवन पूजा व ध्यान में व्यतीत किया.

सीख:
इस कहानी के चोर के समान अक्सर परिस्तिथियाँ हमें स्वयं में बदलाव लाने के लिए विवश करती हैं. प्रारम्भ में हम ढोंग करते हैं और कुछ समय तक मिथ्या जीवन जीने पर हम शीघ्र ही उस साँचे में स्वयं को ढाल लेते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

 

एक चोर का बदलाव

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आदर्श: सच्चाई, उचित आचरण
उप आदर्श: ईमानदारी

एक चोर चोरी की तलाश में था पर उसके हाथ कुछ विशेष व ठोस नहीं लग रहा था. मायूस होकर वह एक मंदिर पहुँचा जहाँ पुजारी एकत्रित लोगों को सच्चाई के विषय में भाषण दे रहा था. कुछ देर भाषण सुनने के बाद चोर को भाषण अच्छा लगने लगा और वह सच्चाई के सिद्धांत को पूरे ध्यान से एकाग्रचित होकर सुनने लगा. कार्यक्रम समाप्त होने पर सभी घर चले गए लेकिन चोर वहीँ बैठा रहा.

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स्वयं को वहाँ अकेले पाकर चोर को मन ही मन चिंता होने लगी कि पुजारी कहीं यह न समझे कि वह मंदिर में कुछ गलत करने आया है. उसने पुजारी से कहा, “वैसे तो यहाँ मेरा कोई काम नहीं है पर मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि सच्चाई की महत्ता पर आपने बहुत ही गूढ़ भाषण दिया. मुझे आपका भाषण बहुत अच्छा लगा.” सत्यता के प्रभाव को लेकर चोर के मन में काफ़ी विवाद व प्रश्न थे. अतः उसने पुजारी से पूछा कि वह अपनी झूठ बोलने की आदत पर कैसे काबू पा सकता है. पुजारी ने उसे समझाया वह चाहे कहीं भी हो और उसने चाहे कैसी भी चोरी की हो पर सच्चाई के बल पर वह सदा सुरक्षित और निर्भय रहेगा. पुजारी ने चोर को विश्वास दिलाया कि चोरी करते हुए भी वह कामयाब हो सकता है. पुजारी की बातों से प्रोत्साहित होकर चोर ने संकल्प किया कि अपनी व्यवहारिक ज़िन्दगी में वह पुजारी द्वारा दी हिदायत का सदा पालन करेगा. चोर ने स्वयं से वादा किया कि उस दिन से वह हर परिस्थिति में सच्चाई व ईमानदारी के पथ पर चलेगा. उसने उसी क्षण से हमेशा सच बोलने और असलियत का साथ देने का फैसला किया.

सदा सच बोलने का संकल्प लेकर जैसे ही चोर मंदिर से बाहर निकला तभी उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई. यह व्यक्ति वास्तव में राजा था जो एक साधारण नागरिक के भेष में अपने राज्य का मुआयना करने निकला था.thief2 चोर से मिलने पर उस व्यक्ति ने चोर से पूछा कि वह कौन है. यद्यपि अपनी असलियत बताने में चोर को हिचकिचाहट हो रही थी पर फिर सदा सत्य बोलने की अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण करके चोर ने बताया कि वह एक चोर है. वह व्यक्ति बेहद खुश हुआ और उसने कहा कि वह भी एक चोर ही है. दोनों व्यक्ति आपस में गले मिले और एक दूसरे से हाथ मिलाकर जल्द ही दोस्त बन गए. नए चोर ने कुछ बहुमूल्य वस्तुएँ चुराने का सुझाव दिया और कहा कि उसे ठीक मालूम है कि ऐसे अनमोल रत्न कहाँ मिलेंगें. वह उसे एक गुप्त रास्ते से ले गया और दोनों एक शानदार राजभवन के सामने पहुँच गए. वहाँ से वह नया चोर उसे राजवंशी राजकोष ले गया और उससे तिजोरी तोड़ने को कहा. तिजोरी तोड़ने पर उन्हें उसमें पाँच बेशकीमती हीरे मिले. thief4नए चोर ने सलाह दी कि वह दोनों चार हीरे ही चुरायें ताकि दोनों बराबर का हिस्सा कर पाए. पाँचवे हीरे को आधा करने से वह हीरा मूल्यहीन हो जाएगा. दोनों ने सहमत होकर तिजोरी में से चार हीरे निकाले और एक हीरा राजकोष में ही छोड़ दिया. लूट का माल आपस में बाँट कर दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए.

अगले दिन जब राजमहल का कार्यालय खुला तो अधिकारियों ने राजवंशी तिजोरी खुली पाई. जांच करने पर शाही कोषाध्यक्ष ने पाया कि तिजोरी में से चार हीरे ग़ायब थे. thief5उपयुक्त व सटीक अवसर देखकर उसने बचा हुआ हीरा अपनी जेब में डाल लिया और राजा को बतलाया कि राजकोष के पाँचों हीरे चोरी हो गए हैं. राजा ने चौकीदारों को आज्ञा दी कि चोर को पकड़कर राजभवन लेकर आएँ. सिपाहियों ने चोर को ढूँढ़कर महाराज के सामने प्रस्तुत किया. राजा ने चोर को ग़ौर से देखा और बोला, “तो तुम ही वह चोर हो? तुमने क्या चुराया है.”

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चोर ने उत्तर दिया, “मैं झूठ नहीं बोल सकता इसलिए आपको बतला रहा हूँ कि मैंने ही अपने एक दोस्त के साथ मिलकर आपके राजकोष से हीरे चुराए हैं.”
राजा ने पूछा, “तुम दोनों ने कितने हीरे चुराए थे?”
“हमने चार हीरे चुराए थे. दो-दो दोनों के लिए. चूँकि हम पाँचवे हीरे को तोड़ नहीं सकते थे इसलिए हमने उसे तिजोरी में ही छोड़ दिया था.”
राजा ने फिर कोषाध्यक्ष से पूछा, “कितने हीरे ग़ायब हैं? ”
“सभी पाँच, जनाहपनाह.”

राजा तुरंत सारी कहानी समझ गया और उसने कोषाध्यक्ष को नौकरी से निकालकर चोर को उसकी सत्यवादी के लिए राजमहल का नया कोषाध्यक्ष नियुक्त कर लिया.

सदा सच बोलने की आदत विकसित करने पर उचित रूप से पुरस्कृत होने से प्रोत्साहित होने पर चोर ने शीघ्र ही अन्य सभी बुरी आदतों का भी त्याग कर दिया. दृढ़ता और पूर्ण विश्वास के साथ व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने से हम अपनी बुरी आदतों का त्यागकर स्वयं में सुधार ला सकते हैं.

सीख:
हमें दूसरों द्वारा किए गलत व स्वयं द्वारा की गई अच्छाई को भुला देना चाहिए. अच्छा कार्य करने से नकारात्मक भाव में कमी आती है. अच्छी आदतें बुराई को निकाल बाहर करती हैं.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

सेवानिवृत्त समुद्री कप्तान

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: विश्वास, कर्तव्य भाव, विचारों में स्पष्टता

यह कहानी एक समुद्री कप्तान की है जो कार्य से निवृत्त हो चुका था. अब वह एक दिवसीय यात्रा करने वाले पर्यटकों को नाव में शैट्लैंड द्वीप पर ले जाया करता था.

ऐसी एक यात्रा के दौरान उसकी नाव युवकों से भरी हुई थी. यात्रा शुरू होने से पहले वृद्ध कप्तान को प्रार्थना करते देख सभी यात्री उस पर हँसने लगे क्योंकि उस समय समुद्र शांत था एवं आसमान साफ़ और स्पष्ट था.

मगर यात्रा शुरू होने के कुछ समय बाद ही अचानक घने बादल छा गए. शीघ्र ही काले व घने बादलों ने भयंकर तूफ़ान का रूप ले लिया और नाव हिंसात्मक रूप से डगमगाने लगी. भयभीत यात्री कप्तान के पास आए और उनके साथ प्रार्थना में शामिल होने के लिए उससे आग्रह करने लगे.

कप्तान ने उत्तर दिया, ” मैं निश्चलता व स्थिरता में प्रार्थना करता हूँ. कठिनाई व मुसीबत के समय मैं अपनी नाव पर ध्यान देता हूँ.”

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सीख:

अपने जीवन के शांत व स्थिर समय में यदि हम भगवान् को नहीं पा सकते तो प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने पर ईश्वर को पाना असंभव है. संभवतः ऐसे में हम घबराये हुए होंगें. लेकिन निश्चल लम्हों में यदि हम प्रभु की तलाश और उन पर विश्वास करना सीख लेंगें तो कठिनाई का सामना करने पर हम निस्संदेह ही उन्हें ढूँढ़ लेंगें.

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अनुवादक- अर्चना

दो महासागर : दो दृष्टिकोण

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: सहभाजन व देखरेख

दो महासागरों से सम्बंधित एक ख़ूबसूरत लघु कथा है:

भूमध्यसागर की घाटी में विख्यात मृत सागर स्थित है. प्रत्येक विद्यार्थी को यह सच्चाई मालूम है कि मृत सागर ही पानी की एक ऐसी संरचना है जो समुद्र न होते हुए भी सागर की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है : वास्तव में यह एक सरोवर है. अब प्रश्न यह उठता है कि इसे मृतसागर क्यों कहते हैं? या फिर इसे घातक सागर का नाम क्यों दिया गया है? यद्यपि यह ६७ किलोमीटर लम्बा, १८ किलोमीटर चौड़ा और १२३७ फुट गहरा है परन्तु फिर भी इस सागर में कोई जीवन नहीं है. इस सागर का पानी पृथ्वी का सबसे अधिक खारा पानी है; तथ्यों के आधार पर इस सागर का पानी सामान्य सागर के पानी से लगभग ९ गुना अधिक खारा है. पानी में नमक की इतनी अधिकता किसी भी प्रकार के समुद्री पेड़-पौधे व जीव-जंतु को पनपने नहीं देती. पर इस सरोवर का पानी इतना खारा क्यों है? इसका उत्तर बहुत ही सरल है. मृत महासागर में जॉर्डन नदी से पानी आता है और यह सागर सारा पानी अपने पास रख लेता है. इसका पानी कभी बाहर की ओर नहीं बहता है. यह सागर औसत समुद्र तल से इतना नीचे स्थित है कि पानी के निकास का कोई माध्यम ही नहीं है. वातावरण की गर्मी से जो पानी वाष्पित हो जाता है वह वापस नमक में परिवर्तित हो जाता है और यही इस महासागर के निर्जन व निर्जीव पर्यावरण का कारण है.

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इस मृतसागर के उत्तर में गलिली महासागर है. यद्यपि इसका आकार मृतमहासागर की तुलना में काफ़ी छोटा है परन्तु फिर भी यह अनोखे व विचित्र पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से संपन्न है. ऐसा कहा जाता है कि यह २० प्रकार की अलग-अलग मछलियों का वास-स्थान है. वास्तव में इस सागर ने २ हज़ार वर्षों से कई प्राणियों का भरण-पोषण किया है. इस क्षेत्र का समृद्धिशाली मछली-पालन व महासागर के आस-पास की ज़मीन पर भरपूर फ़सल का उतरना इस बात का प्रमाण है.

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यहाँ गौरतलब प्रश्न यह है कि गलिली महासागर, विशाल मृतमहासागर की तुलना में इतना छोटा होने के बावजूद भी सक्रीय कैसे है? एक सरल भेद: गलिली महासागर अपना पानी बाँटता है. जॉर्डन नदी का पानी गलिली महासागर में भी गिरता है पर गलिली महासागर अपने पानी को बाहर बहने की अनुमति देता है. यही इस महासागर के पानी को हितकर, उपयोगी व सक्रीय बनाता है.

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सीख:
जब हम बाँटते हैं तब हम धनवान बनते हैं. इस गणित को समझकर बहुत लोगों ने अपना जीवन संवारा है. यदि हमारे पास धन, ज्ञान, प्रेम, समादर या ईश्वर से प्राप्त अन्य कोई उपहार है और हम उन्हें बाँटना नहीं सीखते तो यह सब धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं. कहा जाता है कि किसी वस्तु का संग्रह करने से उसका विकास नहीं होता है. ईश्वर की अनुकम्पा पाने के लिए यह आवश्यक है कि हम आपस में मिल-बाँटकर रहना सीखें. जब एक कटोरा खाली होने लगता है तभी उसमें स्वच्छ पानी डाल सकते हैं. अतः हमें देने की कला को अंतर्ग्रहण करना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

कृष्ण ,बलराम और राक्षस

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आदर्श:उचित आचरण

उप आदर्श :आत्म विश्वास,साहस

एक पूर्णिमा की रात, कृष्ण और बलराम जंगल की ओर चल पड़े. देरी हो जाने के कारण उन्हें रात जंगल में गुजारना पड़ा. जंगल भयानक था और दोनों की सुरक्षा के लिए कृष्ण ने बलराम को सुझाव दिया की वे दोनों बारी बारी पहरा देंगे. पहला पहरा देने की बारी बलराम की थी और कृष्ण सोने के लिए तैयार हो गए.

कुछ ही समय मे कृष्ण गहरी नींद सो गए. बलराम को दूर से किसी की गुर्राने की आवाज सुनायी दी. बलराम आवाज़ की ओर बढ़ने लगे. तब  उन्होंने एक विरूप आकारवाले राक्षस को अपने ओर आते हुए देखा. वह राक्षस फिर से गुर्राया. बलराम डर से थर थर कांपने लगे.जैसे जैसे बलराम डर रहे थे, वैसे वैसे वह राक्षस दुगुना बढ़ता गया.वह राक्षस बहुत बड़ा आकार लेकर ,बलराम के बहुत खरीब आकर खडा हो गया और उसने फिर गुर्राया. बलराम उसकी आकार और दुर्गन्ध सह नहीं पाए. वे जोर से “कृष्ण,कृष्ण” चिल्लाते हुए बेहोश गिर पड़े.

बलराम की पुकार सुन कर कृष्ण जाग गए और उस आवाज़ की ओर चलने लगे. उन्हें लगा कि बलराम सो गए होंगे और पहरा देने की बारी उनकी है. इस सोच से वे आगे पीछे टहलने लगे और उन्होंने अपने समक्ष एक भयानक प्राणी खडा पाया.

राक्षस कृष्ण को देखकर गुर्राया. कृष्ण निडर होकर राक्षस से प्रश्न पूछने लगे. उन्होंने पहले उसे वहां आने की वजह पूछी. प्रश्न सुनते ही राक्षस का आकार आधा कम हो गया. कृष्ण लगातार जवाब की प्रतीक्षे में  प्रश्न पूछते गए ,और वह राक्षस सिकुड़ता गया.

अब वह राक्षस केवल दो इंच का हो गया. वह देखने में बहुत सुन्दर और प्यारा लग रहा था . कृष्ण उसे अपने जेब में रखकर बलराम की ओर चल पड़े. रात बीती और सुबह बलराम नींद से जागे.

कृष्ण को देखते ही बलराम खुशी से “कृष्ण,कृष्ण” पुकारने लगे. बलराम ने कृष्ण से कहा कि “कृष्ण, कल रात जब तुम सो रहे थे,तब एक भयानक राक्षस यहाँ आकर हम दोनों को मारने की कोशिश कर रहा था. किसी तरह हम बच गए. मुझे सिर्फ इतना याद है कि मैं बेहोश होकर गिर गया.”

कृष्ण अपने जेब से वह छोटी सी आकार वाले राक्षस को  निकालकर, बलराम से पूछे; “क्या तुम इसी राक्षस की बात कर रहे हो?”

बलराम ने जवाब दिया कि “जी हाँ. मगर वह तो बड़ा था, कैसे इस तरह सिकुड़ गया?”

कृष्ण ने कहा “जब मैं उससे प्रश्न पूछने लगा,तो वह सिकुड़ता गया, और अंत में इस तरह बन गया”. बलराम कृष्ण को यह बताने लगे कि पिछली रात को जब वे डर रहे थे ,तब वह राक्षस आकार र्में बढता गया. अंत में कृष्ण ने कहा कि “जब हम डरते हैं ,तब हमारी समस्या भयानक हो जाती हैं; मगर जब हम निडर होकर, साहस के साथ समस्या का सामना करते हैं, तब हमारा डर कम हो जाता है.

शिक्षा :

जब हम किसी समस्या को सामना करने से झिझकते या डरते हैं ,तब वह समस्या बढ़ जाता है. साहस के साथ सामना करने से हम सभी  समस्या का समाधान दूंढ़ सकते हैं. समाधान अपने अनुकूल या प्रतिकूल हो सकता है परन्तु हम समस्या का सामना तो कर चुके होंगे. परिस्तिथि का सामना करके ही हम जीवन में प्रगति पा सकते हैं. टालना प्रगति में बाधा डालता है और आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करता है.

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एक तपस्वी का संकल्प

 

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: दृढ़ निश्चय, श्रद्धा

भगवान् को प्रसन्न करने के मुख्य उद्देश्य से बहुत सारे लोग तप करते हैं. एक तपस्वी ने एक बार भगवान् को प्रसन्न करने का निश्चय किया और अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या करने लगा. उसने सोचा कि अगर वह भगवान् को प्रसन्न करने में सफल हो जाएगा तो उसे आशीर्वाद में भगवान् के दर्शन मिलेंगें. अतः वह प्रतिदिन पेड़ की परिक्रमा करता था और भोजन में रोज़ाना पेड़ के पत्ते खाता था.

एक दिन नारदजी भगवान् के धाम जा रहे थे. रास्ते में तपस्वी को देखकर वह उससे मिलने आ गए. नारदजी को देखकर तपस्वी ने तुरंत उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया. नारदजी के पूछने पर तपस्वी ने भगवान् की कृपा पाने के अपने निश्चय का वर्णन किया. तपस्वी बोला, “नारदजी, मैं कई वर्षों से तपस्या कर रहा हूँ और इस अम्बली वृक्ष के पत्तों का ही भोजन करता हूँ ताकि मुझे भगवान् के दर्शन हो सकें. आप जब भगवान् से मिलेंगें तो कृपया मेरी ओर से उन्हें मुझे दर्शन प्रदान करने के लिए कहना.” तपस्वी की कहानी सुनकर नारदजी ने निश्चय किया कि वह उसका सन्देश भगवान् तक अवश्य पहुँचाएंगें.

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नारद के आगमन पर भगवान् ने उनसे पूछा, “नारद! पृथ्वी से क्या समाचार लाए हो?”

तपस्वी से अपनी मुलाकात का स्मरण करते हुए नारदजी बोले, “भगवन! एक तपस्वी अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या कर रहा है ताकि उसे आपके दर्शन हो सकें. आप उसे अपने दर्शन कब देंगें?”

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भगवान् बोले, “उससे कहो कि मेरे दर्शन पाने के लिए उसे उतने वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने कि अम्बली पेड़ पर पत्ते हैं! ”

प्रभु का कथन सुनकर नारदजी के घुटने ठिठुरने लगे. उनकी टांगें सुन्न हो गयीं मानो वह एक कदम भी नहीं ले पाएंगीं और उनका दिल बैठ गया. उत्सुक तपस्वी को वह यह समाचार कैसे दे पायेंगें. वह तो बेचारा बिलकुल टूट जाएगा. नारदजी ने मन ही मन सोचा, “मैं उससे क्या कहूँगा? वह हिम्मत हार जाएगा और तपस्या के लिए सारा उत्साह गँवा देगा.” इस प्रकार चिंतन करते हुए नारदजी आसमान से पृथ्वी की ओर आ रहे थे जब तपस्वी ने उन्हें देखा. अपना नाम सुनकर, नारदजी तपस्वी के पास गए. तपस्वी यह सुनकर अत्यंत हर्षित हुआ कि नारदजी भगवान् से मिले थे.god

उसने नारदजी से पूछा, “मेरे लिए भगवान् का क्या सन्देश है?”
नारदजी ने उदासी से उत्तर दिया, “वह मैं नहीं बता सकता क्योंकि मेरी बात सुनकर तुम हिम्मत हार जाओगे और अपनी तपस्या त्याग दोगे.”
तपस्वी ने जवाब दिया, “भगवान् ने चाहे कुछ भी कहा हो, मैं हिम्मत नहीं हारूँगा. कम से कम मुझे प्रभु के दिव्य शब्द सुनने का अवसर प्राप्त होगा. कृपया मुझे ठीक-ठीक बताएं कि भगवान् ने क्या कहा है.”

नारदजी अभी भी अनिश्चित थे. वह सोचने लगे, “क्या मैं इसे बता दूँ? कहीं इस बेचारे का विश्वास न टूट जाए. मैं इसके साथ ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहता.”

तपस्वी ने पुनः विनती की, “कृपया मुझे भगवान् का सन्देश बताएं.”
इस पर नारदजी बोले, “भगवान् ने कहा है कि तुम्हें और कई वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी. असल में, भगवान् के दर्शन पाने के लिए तुम्हें उतने सालों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने इस अम्बली वृक्ष पर पत्ते हैं.”
तपस्वी आनंदोल्लास हो गया. वह नाचने और गाने लगा, “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. भगवान् ने अपने धाम से मेरे लिए सन्देश भेजा है. उन्होंने मुझसे वादा किया है कि वह मुझे दर्शन देंगें.यह वर्ष तो तुरंत ही बीत जायेंगें.”
तपस्वी का प्रेम और हौसला देखकर भगवान् ने तत्क्षण तपस्वी के सामने प्रकट होकर उसे अपने दर्शन दिए. तपस्वी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. वह प्रभु के चरणों में गिर पड़ा.

नारदजी अचंभित थे. उन्होंने भगवान् से पूछा, “प्रभु, आप यहाँ कैसे? आपने तो कहा था कि आप इसे कई वर्षों की तपस्या के बाद दर्शन देंगें.”

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भगवान् ने जवाब दिया, “इसकी हिम्मत और दृढ़ निश्चय को देखो! यह जानने के बाद भी कि इसे अभी कई और वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी, इसने हिम्मत नहीं हारी और अपना विश्वास बनाए रखा. ऐसे व्यक्ति को मैं दर्शन अवश्य देता हूँ.”

 

सीख:
अगर तपस्वी अपना विश्वास खो देता तो क्या उसे भगवान् के दर्शन प्राप्त हो पाते? नहीं! चूँकि उसने हिम्मत नहीं हारी, भगवान् ने उसे दर्शन दिए. दृढ़ संकल्पी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचता है. एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने पर हमें हार न मानने का निश्चय करना चाहिए और उद्देश्य हासिल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयास, उचित प्रवृत्ति व विश्वास से काम करना चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना