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ज्ञानी पंडित

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: अभ्यास

एक दिन बहुत सारे लोग एक नाव में बैठकर नदी पार कर रहे थे. उनमें से एक व्यक्ति ज्ञानी पंडित था. उस पंडित ने समय व्यतीत करने तथा अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने के लिए एक सह यात्री के साथ हिन्दू शास्त्रों पर बातचीत करने का निश्चय किया.

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अतएव वह एक यात्री की तरफ मुड़कर बोला, “मेरे अनुमान से तुमने उपनिषद् तो पढ़ें ही होंगे? ”

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यात्री ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “नहीं महाशय! मैंने उपनिषद् नहीं पढ़े हैं.”
पंडित ने आश्चर्यचकित होकर कहा, “अच्छा! तुम्हारे जीवन का तो एक चौथाई भाग बर्बाद हो चुका है.”

“पर तुमने शास्त्रों का अध्ययन तो किया ही होगा! ” पंडित ने आगे पूछा.

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“नहीं महाशय, मैंने शास्त्रों का भी अध्ययन नहीं किया है” , यात्री ने उत्तर दिया.
यात्री का जवाब सुनकर पंडित सगर्व बोला, “फिर तो तुम्हारी आधी ज़िन्दगी बर्बाद हो चुकी है.”

“और हिन्दू दर्शनशास्त्र के ६ सिद्धांत? ” बौद्धिक बातचीत शुरू करने के अपने अंतिम प्रयास में पंडित ने पूछा.

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“महाशय! क्षमा कीजिएगा, मैंने तो उनके बारे में सुना भी नहीं है!” यात्री बोला.
“उनके बारे में सुना भी नहीं है? फिर तो मित्रवर, तुम्हारी तीन चौथाई ज़िन्दगी बर्बाद है.”

पंडित के ऐसा बोलते ही अचानक बढ़ती हुई ज़ोरदार लहरों में नाव डगमगाने लगी.boat6

नाविक चिल्लाया, “तूफ़ान आने वाला है और मैं नाव को नियंत्रित नहीं कर पा रहा हूँ. नाव उलटने वाली है. सुरक्षा के लिए सभी लोग नाव पर से पानी में कूद जायें और तैरकर नदी तट तक पहुँच जायें.”

पंडित को व्याकुल व भयभीत देखकर सह यात्री ने पूछा, “आपको तैरना नहीं आता है?”
पंडित शोक करते हुए बोला, “नहीं, मैंने कभी तैरना सीखा ही नहीं.”
“आपने तैरना नहीं सीखा! फिर तो पंडितजी, आपकी पूरी ज़िन्दगी बर्बाद है.” इस प्रकार पंडित का मज़ाक उड़ाते हुए वह यात्री डूबती नाव से पानी में कूद गया.

सीख:

केवल ज्ञान हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है. उसका व्यवहारिक प्रयोग भी अनिवार्य है. कोई कितना भी सुशिक्षित हो और उसने कितना भी ज्ञान उपार्जित क्यों न किया हो पर यदि समय पर वह काम न आए तो ऐसा ज्ञान व्यर्थ है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com
अनुवादक- अर्चना

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एक चोर का बदलाव

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आदर्श: सच्चाई, उचित आचरण
उप आदर्श: ईमानदारी

एक चोर चोरी की तलाश में था पर उसके हाथ कुछ विशेष व ठोस नहीं लग रहा था. मायूस होकर वह एक मंदिर पहुँचा जहाँ पुजारी एकत्रित लोगों को सच्चाई के विषय में भाषण दे रहा था. कुछ देर भाषण सुनने के बाद चोर को भाषण अच्छा लगने लगा और वह सच्चाई के सिद्धांत को पूरे ध्यान से एकाग्रचित होकर सुनने लगा. कार्यक्रम समाप्त होने पर सभी घर चले गए लेकिन चोर वहीँ बैठा रहा.

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स्वयं को वहाँ अकेले पाकर चोर को मन ही मन चिंता होने लगी कि पुजारी कहीं यह न समझे कि वह मंदिर में कुछ गलत करने आया है. उसने पुजारी से कहा, “वैसे तो यहाँ मेरा कोई काम नहीं है पर मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि सच्चाई की महत्ता पर आपने बहुत ही गूढ़ भाषण दिया. मुझे आपका भाषण बहुत अच्छा लगा.” सत्यता के प्रभाव को लेकर चोर के मन में काफ़ी विवाद व प्रश्न थे. अतः उसने पुजारी से पूछा कि वह अपनी झूठ बोलने की आदत पर कैसे काबू पा सकता है. पुजारी ने उसे समझाया वह चाहे कहीं भी हो और उसने चाहे कैसी भी चोरी की हो पर सच्चाई के बल पर वह सदा सुरक्षित और निर्भय रहेगा. पुजारी ने चोर को विश्वास दिलाया कि चोरी करते हुए भी वह कामयाब हो सकता है. पुजारी की बातों से प्रोत्साहित होकर चोर ने संकल्प किया कि अपनी व्यवहारिक ज़िन्दगी में वह पुजारी द्वारा दी हिदायत का सदा पालन करेगा. चोर ने स्वयं से वादा किया कि उस दिन से वह हर परिस्थिति में सच्चाई व ईमानदारी के पथ पर चलेगा. उसने उसी क्षण से हमेशा सच बोलने और असलियत का साथ देने का फैसला किया.

सदा सच बोलने का संकल्प लेकर जैसे ही चोर मंदिर से बाहर निकला तभी उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से हुई. यह व्यक्ति वास्तव में राजा था जो एक साधारण नागरिक के भेष में अपने राज्य का मुआयना करने निकला था.thief2 चोर से मिलने पर उस व्यक्ति ने चोर से पूछा कि वह कौन है. यद्यपि अपनी असलियत बताने में चोर को हिचकिचाहट हो रही थी पर फिर सदा सत्य बोलने की अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण करके चोर ने बताया कि वह एक चोर है. वह व्यक्ति बेहद खुश हुआ और उसने कहा कि वह भी एक चोर ही है. दोनों व्यक्ति आपस में गले मिले और एक दूसरे से हाथ मिलाकर जल्द ही दोस्त बन गए. नए चोर ने कुछ बहुमूल्य वस्तुएँ चुराने का सुझाव दिया और कहा कि उसे ठीक मालूम है कि ऐसे अनमोल रत्न कहाँ मिलेंगें. वह उसे एक गुप्त रास्ते से ले गया और दोनों एक शानदार राजभवन के सामने पहुँच गए. वहाँ से वह नया चोर उसे राजवंशी राजकोष ले गया और उससे तिजोरी तोड़ने को कहा. तिजोरी तोड़ने पर उन्हें उसमें पाँच बेशकीमती हीरे मिले. thief4नए चोर ने सलाह दी कि वह दोनों चार हीरे ही चुरायें ताकि दोनों बराबर का हिस्सा कर पाए. पाँचवे हीरे को आधा करने से वह हीरा मूल्यहीन हो जाएगा. दोनों ने सहमत होकर तिजोरी में से चार हीरे निकाले और एक हीरा राजकोष में ही छोड़ दिया. लूट का माल आपस में बाँट कर दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए.

अगले दिन जब राजमहल का कार्यालय खुला तो अधिकारियों ने राजवंशी तिजोरी खुली पाई. जांच करने पर शाही कोषाध्यक्ष ने पाया कि तिजोरी में से चार हीरे ग़ायब थे. thief5उपयुक्त व सटीक अवसर देखकर उसने बचा हुआ हीरा अपनी जेब में डाल लिया और राजा को बतलाया कि राजकोष के पाँचों हीरे चोरी हो गए हैं. राजा ने चौकीदारों को आज्ञा दी कि चोर को पकड़कर राजभवन लेकर आएँ. सिपाहियों ने चोर को ढूँढ़कर महाराज के सामने प्रस्तुत किया. राजा ने चोर को ग़ौर से देखा और बोला, “तो तुम ही वह चोर हो? तुमने क्या चुराया है.”

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चोर ने उत्तर दिया, “मैं झूठ नहीं बोल सकता इसलिए आपको बतला रहा हूँ कि मैंने ही अपने एक दोस्त के साथ मिलकर आपके राजकोष से हीरे चुराए हैं.”
राजा ने पूछा, “तुम दोनों ने कितने हीरे चुराए थे?”
“हमने चार हीरे चुराए थे. दो-दो दोनों के लिए. चूँकि हम पाँचवे हीरे को तोड़ नहीं सकते थे इसलिए हमने उसे तिजोरी में ही छोड़ दिया था.”
राजा ने फिर कोषाध्यक्ष से पूछा, “कितने हीरे ग़ायब हैं? ”
“सभी पाँच, जनाहपनाह.”

राजा तुरंत सारी कहानी समझ गया और उसने कोषाध्यक्ष को नौकरी से निकालकर चोर को उसकी सत्यवादी के लिए राजमहल का नया कोषाध्यक्ष नियुक्त कर लिया.

सदा सच बोलने की आदत विकसित करने पर उचित रूप से पुरस्कृत होने से प्रोत्साहित होने पर चोर ने शीघ्र ही अन्य सभी बुरी आदतों का भी त्याग कर दिया. दृढ़ता और पूर्ण विश्वास के साथ व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने से हम अपनी बुरी आदतों का त्यागकर स्वयं में सुधार ला सकते हैं.

सीख:
हमें दूसरों द्वारा किए गलत व स्वयं द्वारा की गई अच्छाई को भुला देना चाहिए. अच्छा कार्य करने से नकारात्मक भाव में कमी आती है. अच्छी आदतें बुराई को निकाल बाहर करती हैं.

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अनुवादक- अर्चना

सेवानिवृत्त समुद्री कप्तान

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: विश्वास, कर्तव्य भाव, विचारों में स्पष्टता

यह कहानी एक समुद्री कप्तान की है जो कार्य से निवृत्त हो चुका था. अब वह एक दिवसीय यात्रा करने वाले पर्यटकों को नाव में शैट्लैंड द्वीप पर ले जाया करता था.

ऐसी एक यात्रा के दौरान उसकी नाव युवकों से भरी हुई थी. यात्रा शुरू होने से पहले वृद्ध कप्तान को प्रार्थना करते देख सभी यात्री उस पर हँसने लगे क्योंकि उस समय समुद्र शांत था एवं आसमान साफ़ और स्पष्ट था.

मगर यात्रा शुरू होने के कुछ समय बाद ही अचानक घने बादल छा गए. शीघ्र ही काले व घने बादलों ने भयंकर तूफ़ान का रूप ले लिया और नाव हिंसात्मक रूप से डगमगाने लगी. भयभीत यात्री कप्तान के पास आए और उनके साथ प्रार्थना में शामिल होने के लिए उससे आग्रह करने लगे.

कप्तान ने उत्तर दिया, ” मैं निश्चलता व स्थिरता में प्रार्थना करता हूँ. कठिनाई व मुसीबत के समय मैं अपनी नाव पर ध्यान देता हूँ.”

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सीख:

अपने जीवन के शांत व स्थिर समय में यदि हम भगवान् को नहीं पा सकते तो प्रतिकूल परिस्थिति का सामना करने पर ईश्वर को पाना असंभव है. संभवतः ऐसे में हम घबराये हुए होंगें. लेकिन निश्चल लम्हों में यदि हम प्रभु की तलाश और उन पर विश्वास करना सीख लेंगें तो कठिनाई का सामना करने पर हम निस्संदेह ही उन्हें ढूँढ़ लेंगें.

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अनुवादक- अर्चना

एक मरते हुए व्यक्ति की चार पत्नियाँ

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: आध्यात्मिक रूप से सशक्त होना, अपनी वास्तविकता का अहसास होना

एक व्यक्ति की चार पत्नियाँ थीं. वह अपनी चौथी पत्नी से सबसे अधिक प्रेम करता था और उसके लिए सबसे अच्छी पोशाक खरीदता था. अपनी चौथी पत्नी के लिए वह सबसे सुन्दर और मनमोहक आभूषण खरीदता था और अपना सारा समय उसे रिझाने में व्यतीत करता था. कुल मिलाकर उसकी पत्नी उससे प्रेम करती थी और वह अपनी पत्नी से प्यार करता था.

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वह अपनी तीसरी पत्नी से भी प्रेम करता था. तीसरी पत्नी भी उसे प्रिय थी और वह उसकी भी हर इच्छा पूरी करता था. यह तीसरी पत्नी उसकी ज़िन्दगी नियंत्रित करती थी.

वह अपनी दूसरी पत्नी से भी प्रेम करता था. उसपर उसे पूरा विश्वास था और वह उससे अपनी हर व्यक्तिगत चीज़ के बारे में बात करता था. अपने जीवन के विषय में वह सदा अपनी दूसरी पत्नी से ही सलाह करता था.

लेकिन किसी कारणवश उसे अपनी पहली पत्नी से अनुराग नहीं था. इसके बावजूद उसकी पहली पत्नी उसकी मदद के लिए सदा उपस्थित रहती थी, वह बहुत सुशील थी और अपनी पति को खुश रखने की हर संभव कोशिश करती थी.

एक दिन वह व्यक्ति बहुत बीमार पड़ गया और उसे अहसास हुआ कि उसका अंत निकट है. उसने अपनी चारों पत्नियों को बुलाया और बोला, “मेरी ख़ूबसूरत पत्नियों! मेरा अंत अब निकट है पर मैं अकेला नहीं मरना चाहता हूँ. तुम में से कौन मेरे साथ आने को तैयार है? ”

उसने अपनी चौथी पत्नी को आगे बुलाया और बोला, “तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो. मैंने तुमसे हमेशा प्यार किया है और तुम्हें हर सर्वश्रेष्ठ वस्तु दी है. मेरी मृत्यु अब निश्चित है तो क्या तुम मेरे साथ आओगी? क्या तुम मेरा साथ दोगी?” पत्नी ने बिना सोचे झट से ‘नहीं’ कहा और पीछे मुड़कर चली गई. अपनी प्रियतम पत्नी का जवाब सुनकर उसका दिल टूट गया.

उदास मन से उसने अपनी तीसरी पत्नी को आगे बुलाया और बोला, “मेरा अंत निकट है, क्या तुम मेरे साथ चलोगी?” इस पर तीसरी पत्नी बोली, “बिलकुल नहीं. तुम्हारे जाते ही, मैं किसी और के साथ चली जाऊँगी.” फिर वह भी पीछे मुड़कर चली गई.

इसके बाद अपनी दूसरी पत्नी को बुलाकर उसने एक बार पुनः वही प्रश्न दोहराया. दूसरी पत्नी बोली, “मुझे दुःख है कि आपका अंत निकट है पर मैं केवल शमशान तक ही आपके साथ आ सकती हूँ. वहाँ तक मैं आपके साथ रहूँगी.” फिर पीछे मुड़कर वह भी अपनी जगह पर जाकर खड़ी हो गई.

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तभी पीछे से एक आवाज़ आई, “मैं आपके साथ आऊँगी.” उसने अपनी पहली पत्नी की ओर देखा और दुखी मन से बोला, “मेरी प्रियतमा, मैंने तुम्हारी ओर कभी ध्यान नहीं दिया, तुम कितनी कमज़ोर दिखती हो. अब जब मेरे जीवन का अंत आ गया है, मुझे अफ़सोस है कि मैं पहले समझ नहीं पाया कि तुम मुझे हर किसी से अधिक प्रेम करती हो. मुझे इस बात का बहुत खेद है कि मैंने हर समय तुम्हारी उपेक्षा की है.” ऐसा कहकर उस व्यक्ति का देहांत हो गया.

इस कहानी में चौथी पत्नी शरीर व उसकी तृष्णा का प्रतीक है जिसे मृत्यु के पश्चात हम खो देते हैँ. तीसरी पत्नी धन-दौलत का प्रतीक है जो हमारे शरीर छोड़ने पर दूसरों को मिलती है. दूसरी पत्नी हमारा परिवार व मित्र हैँ जो केवल शमशान घाट तक ही हमारे साथ आ सकते हैँ. पहली पत्नी जीवात्मा को दर्शाता है जो अप्रत्यक्ष होते हुए भी सदा हमारे साथ होती है. यद्यपि हमारी जीवात्मा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व प्रिय है परन्तु फिर भी हम उस पर ध्यान नहीं देते हैँ और इस बात का अहसास हमें जीवनकाल के अंत में होता है.

सीख:
शाश्वत सत्य यह है कि हम ‘शरीर’ नहीं जीवात्मा हैँ, जो जन्म व मृत्यु के परे है. ज़िन्दगी भर हम उन सभी अनावश्यक चीज़ों को महत्त्व देते रहते हैं जो निरर्थक व अस्थायी हैं. हमें अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान देकर अपने जीवन को श्रेष्ठतर बनाने की चेष्ठा करनी चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

भगवान् राम से पत्र

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: अनुकम्पा, सभी में भगवान् को देखना

शिवानी की डाक पेटी में आज एक ही पत्र था. उसने पत्र उठाया और उसे खोलने से पहले लिफ़ाफ़े पर एक नज़र घुमाई. आश्चर्यचकित शिवानी ने एक बार पुनः लिफ़ाफ़े को जाँचा. लिफ़ाफ़े पर कोई भी टिकट या डाक-घर की मुहर नहीं थी. उसपर केवल शिवानी का नाम व पता लिखा हुआ था.

शिवानी ने झटपट पत्र पढ़ा:

“प्रिय शिवानी: शनिवार की दोपहर मैं तुम्हारे मुहल्ले में आने वाला हूँ और मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ.

सप्रेम, भगवान् राम.”

शिवानी ने काँपते हुए हांथों से पत्र मेज़ पर रखा और सोचने लगी, “भगवान् मुझसे मिलने क्यों आना चाहते हैं? मैं तो बहुत ही साधारण से महिला हूँ. मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है.”

मन में इस प्रकार के विचार लिए वह अपनी रसोईघर की खाली अलमारियों के बारे में सोचने लगी.

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“हे भगवान्! मेरे पास तो आपको देने के लिए वास्तव में कुछ भी नहीं है. मुझे झटपट दुकान से कुछ खाने के लिए खरीदकर लाना होगा.”

उसने अपना बटुआ खोला और पैसे गिनने लगी- २० रूपए और ५० पैसे.

“चलो, कम से कम मैं डबल रोटी और सब्ज़ी खरीद सकती हूँ.”

शिवानी ने जल्दी से कोट पहना और दुकान के लिए निकल पड़ी. एक पाव रोटी, कुछ सब्ज़ियाँ और दूध का एक डिब्बा खरीदने के बाद उसके पास मात्र ३० पैसे ही शेष बचे थे. उसे सोमवार तक इन्हीं पैसों से काम चलाना था. फिर भी वह खुश थी. अपनी खरीदारी का सामान उसने हाथ में लिया और मंद-मंद मुस्कुराते हुए घर वापस जाने लगी.

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“अरे भद्र महिला, क्या तुम हमारी मदद कर सकती हो?”
शिवानी खाने की परियोजना में इतनी तल्लीन थी कि गली में सिमट कर बैठे दो व्यक्तियों पर इसका ध्यान ही नहीं गया. एक पुरुष और एक महिला गली के एक कोने में बैठे हुए थे और दोनों ने फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे.

“महोदया, मेरे पास नौकरी नहीं है. अपनी पत्नी के साथ मैं इसी गली में रहता हूँ. सर्दी का मौसम शुरू हो गया है और हम दोनों को बहुत भूख भी लगी हुई है. अगर आप हमारी मदद करेंगीं तो हम आपका बहुत आभार समझेंगें.”

शिवानी ने दोनों को ध्यान से देखा. दोनों मलिन थे और उनके पास से गन्दी बदबू आ रही थी. शिवानी को विश्वास था कि यदि वह पति-पत्नी चाहते तो किसी प्रकार का काम करके कुछ पैसे कमा सकते थे.

“भाईजी, मैं अवश्य ही आपकी मदद करना चाहती हूँ पर मैं स्वयं भी एक गरीब महिला हूँ. मेरे पास सिर्फ कुछ सब्ज़ियाँ, पावरोटी और दूध है. आज रात मेरे घर खाने पर एक महत्वपूर्ण अतिथि आने वाला है और यह खाना मैं उसी के लिए ले जा रही हूँ. ”

“कोई बात नहीं, बहनजी. मैं समझता हूँ. आपका फिर भी धन्यवाद.”

उस आदमी ने अपनी पत्नी के कन्धों पर हाथ रखा और दोनों अपनी गली की ओर लौटने लगे. दोनों को वापस जाते देख, शिवानी के हृदय में दर्द की एक लहर सी उठी. वह भाग कर उनके पास गई और उस व्यक्ति को अपना किराने का सामान सौंप दिया.

“धन्यवाद, बहनजी. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! हम तहे दिल से आपके आभारी हैं.”
उस व्यक्ति की पत्नी को भी धन्यवाद कहते सुन, शिवानी की निगाह उस पर पड़ी. वह महिला स्पष्ट रूप से काँप रही थी.

“मेरे पास एक और कोट है. यह लो, तुम इसे रख लो.”
शिवानी ने अपना कोट उतारा और उस महिला के कंधों पर डाल दिया. फिर वह मुस्कुराते हुए मुड़ी और घर वापस लौटने लगी….. अब उसके पास न तो कोट था और न ही अपने अतिथि को खिलाने के लिए खाना.

जब तक शिवानी अपने घर के सामने वाले दरवाज़े तक पहुँची, वह ठिठुर रही थी और बेहद चिंतित थी. स्वयं प्रभु राम उसके घर पधारने वाले थे और उसके पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं था.
दरवाज़े की चाभी निकालने के लिए जब वह अपना बटुआ टटोल रही थी तब उसकी निगाह डाक-पेटी में पड़े एक लिफ़ाफ़े पर पड़ी.
“बड़ी अजीब बात है. आम तौर पर डाकिया एक दिन में एक बार ही आता है.”

शिवानी ने डाक-पेटी में से लिफ़ाफ़ा निकला और उसे खोलकर पढ़ने लगी:
“प्रिय शिवानी: तुम्हें एक बार पुनः देखकर अच्छा लगा. आनंददायक खाने के लिए तुम्हारा शुक्रिया. उस ख़ूबसूरत कोट के लिए भी तुम्हारा धन्यवाद.
सप्रेम- भगवान् राम. “

यद्यपि हवा में ठंडक थी और शिवानी ने कोट नहीं पहना हुआ था पर फिर भी उसे ठंड महसूस नहीं हो रही थी. उसकी आँखें ख़ुशी के आँसू बहा रहीं थीं और भगवान् राम का पत्र लेकर वह स्तंभित खड़ी हुई थी.

सीख:

मानव सेवा माधव सेवा होती है. ईश्वर की सृष्टि में हमें सर्वत्र ईश्वर को देखने का प्रयास करना चाहिए, सबसे प्रेम करना चाहिए और अवसर मिलने पर सबकी सेवा करनी चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना

कृष्ण के प्रति द्रौपदी की भक्ति- नाम स्मरण की ताकत

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: अनुराग, श्रद्धा

द्रौपदी, पांडवों की पत्नी थी. भगवान् कृष्ण ने द्रौपदी को कई बार अपमान व निरादर से बचाया था. भगवान् कृष्ण की पत्नियाँ, सत्यभामा और रुक्मिणी, अक्सर अचंभित होती थीं कि भगवान् , द्रौपदी की इतनी मदद क्यों करते थे और उसपर इतना अनुग्रह क्यों बरसाते थे.

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उनकी शंका दूर करने के लिए एक दिन कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी से कहा कि वह दोनों उनके साथ द्रौपदी के घर चलें.

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जब वह द्रौपदी के घर पहुँचे तब द्रौपदी स्नान करने के पश्चात अपने बाल सँवार रही थी. कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को बाल बनाने में मदद करें. यद्यपि सत्यभामा और रुक्मिणी क्रुद्ध थीं पर फिर भी उन्होंने कृष्ण की आज्ञा का पालन किया. द्रौपदी के एक-एक बाल से ‘कृष्णा, कृष्णा’ का निरंतर गुणगान सुनकर दोनों को बहुत ही आश्चर्य हुआ और तब उन्हें अहसास हुआ कि द्रौपदी सही मायने में कृष्ण के अनुग्रह की अधिकारी थी. कृष्ण का नाम द्रौपदी के रोम-रोम में व्याप्त था. कृष्ण के लिए उसकी ललक और भक्ति तथा उनके प्रति प्रेम से उसका अस्तित्व पूरी तरह भरा हुआ था. अपने इस भक्त की दिली श्रद्धा को पुरस्कृत करने के लिए भगवान् कृष्ण बाध्य थे. नामजप की इस सहज साधना के माध्यम से द्रौपदी ने प्रभु के साथ निरंतर संसर्ग प्राप्त किया था.

सीख:

कलयुग में ईश्वर के नाम का सतत जाप सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक अभ्यास है. ईश्वर के नाम का निरंतर गुणगान प्रचुर अनुग्रह व प्रेम सुनिश्चित करता है. ईश्वर को प्राप्त करने का यह सबसे अच्छा तरीका है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक – अर्चना

दो महासागर : दो दृष्टिकोण

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: सहभाजन व देखरेख

दो महासागरों से सम्बंधित एक ख़ूबसूरत लघु कथा है:

भूमध्यसागर की घाटी में विख्यात मृत सागर स्थित है. प्रत्येक विद्यार्थी को यह सच्चाई मालूम है कि मृत सागर ही पानी की एक ऐसी संरचना है जो समुद्र न होते हुए भी सागर की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है : वास्तव में यह एक सरोवर है. अब प्रश्न यह उठता है कि इसे मृतसागर क्यों कहते हैं? या फिर इसे घातक सागर का नाम क्यों दिया गया है? यद्यपि यह ६७ किलोमीटर लम्बा, १८ किलोमीटर चौड़ा और १२३७ फुट गहरा है परन्तु फिर भी इस सागर में कोई जीवन नहीं है. इस सागर का पानी पृथ्वी का सबसे अधिक खारा पानी है; तथ्यों के आधार पर इस सागर का पानी सामान्य सागर के पानी से लगभग ९ गुना अधिक खारा है. पानी में नमक की इतनी अधिकता किसी भी प्रकार के समुद्री पेड़-पौधे व जीव-जंतु को पनपने नहीं देती. पर इस सरोवर का पानी इतना खारा क्यों है? इसका उत्तर बहुत ही सरल है. मृत महासागर में जॉर्डन नदी से पानी आता है और यह सागर सारा पानी अपने पास रख लेता है. इसका पानी कभी बाहर की ओर नहीं बहता है. यह सागर औसत समुद्र तल से इतना नीचे स्थित है कि पानी के निकास का कोई माध्यम ही नहीं है. वातावरण की गर्मी से जो पानी वाष्पित हो जाता है वह वापस नमक में परिवर्तित हो जाता है और यही इस महासागर के निर्जन व निर्जीव पर्यावरण का कारण है.

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इस मृतसागर के उत्तर में गलिली महासागर है. यद्यपि इसका आकार मृतमहासागर की तुलना में काफ़ी छोटा है परन्तु फिर भी यह अनोखे व विचित्र पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से संपन्न है. ऐसा कहा जाता है कि यह २० प्रकार की अलग-अलग मछलियों का वास-स्थान है. वास्तव में इस सागर ने २ हज़ार वर्षों से कई प्राणियों का भरण-पोषण किया है. इस क्षेत्र का समृद्धिशाली मछली-पालन व महासागर के आस-पास की ज़मीन पर भरपूर फ़सल का उतरना इस बात का प्रमाण है.

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यहाँ गौरतलब प्रश्न यह है कि गलिली महासागर, विशाल मृतमहासागर की तुलना में इतना छोटा होने के बावजूद भी सक्रीय कैसे है? एक सरल भेद: गलिली महासागर अपना पानी बाँटता है. जॉर्डन नदी का पानी गलिली महासागर में भी गिरता है पर गलिली महासागर अपने पानी को बाहर बहने की अनुमति देता है. यही इस महासागर के पानी को हितकर, उपयोगी व सक्रीय बनाता है.

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सीख:
जब हम बाँटते हैं तब हम धनवान बनते हैं. इस गणित को समझकर बहुत लोगों ने अपना जीवन संवारा है. यदि हमारे पास धन, ज्ञान, प्रेम, समादर या ईश्वर से प्राप्त अन्य कोई उपहार है और हम उन्हें बाँटना नहीं सीखते तो यह सब धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं. कहा जाता है कि किसी वस्तु का संग्रह करने से उसका विकास नहीं होता है. ईश्वर की अनुकम्पा पाने के लिए यह आवश्यक है कि हम आपस में मिल-बाँटकर रहना सीखें. जब एक कटोरा खाली होने लगता है तभी उसमें स्वच्छ पानी डाल सकते हैं. अतः हमें देने की कला को अंतर्ग्रहण करना चाहिए.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना