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दो महासागर : दो दृष्टिकोण

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: सहभाजन व देखरेख

दो महासागरों से सम्बंधित एक ख़ूबसूरत लघु कथा है:

भूमध्यसागर की घाटी में विख्यात मृत सागर स्थित है. प्रत्येक विद्यार्थी को यह सच्चाई मालूम है कि मृत सागर ही पानी की एक ऐसी संरचना है जो समुद्र न होते हुए भी सागर की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है : वास्तव में यह एक सरोवर है. अब प्रश्न यह उठता है कि इसे मृतसागर क्यों कहते हैं? या फिर इसे घातक सागर का नाम क्यों दिया गया है? यद्यपि यह ६७ किलोमीटर लम्बा, १८ किलोमीटर चौड़ा और १२३७ फुट गहरा है परन्तु फिर भी इस सागर में कोई जीवन नहीं है. इस सागर का पानी पृथ्वी का सबसे अधिक खारा पानी है; तथ्यों के आधार पर इस सागर का पानी सामान्य सागर के पानी से लगभग ९ गुना अधिक खारा है. पानी में नमक की इतनी अधिकता किसी भी प्रकार के समुद्री पेड़-पौधे व जीव-जंतु को पनपने नहीं देती. पर इस सरोवर का पानी इतना खारा क्यों है? इसका उत्तर बहुत ही सरल है. मृत महासागर में जॉर्डन नदी से पानी आता है और यह सागर सारा पानी अपने पास रख लेता है. इसका पानी कभी बाहर की ओर नहीं बहता है. यह सागर औसत समुद्र तल से इतना नीचे स्थित है कि पानी के निकास का कोई माध्यम ही नहीं है. वातावरण की गर्मी से जो पानी वाष्पित हो जाता है वह वापस नमक में परिवर्तित हो जाता है और यही इस महासागर के निर्जन व निर्जीव पर्यावरण का कारण है.

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इस मृतसागर के उत्तर में गलिली महासागर है. यद्यपि इसका आकार मृतमहासागर की तुलना में काफ़ी छोटा है परन्तु फिर भी यह अनोखे व विचित्र पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से संपन्न है. ऐसा कहा जाता है कि यह २० प्रकार की अलग-अलग मछलियों का वास-स्थान है. वास्तव में इस सागर ने २ हज़ार वर्षों से कई प्राणियों का भरण-पोषण किया है. इस क्षेत्र का समृद्धिशाली मछली-पालन व महासागर के आस-पास की ज़मीन पर भरपूर फ़सल का उतरना इस बात का प्रमाण है.

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यहाँ गौरतलब प्रश्न यह है कि गलिली महासागर, विशाल मृतमहासागर की तुलना में इतना छोटा होने के बावजूद भी सक्रीय कैसे है? एक सरल भेद: गलिली महासागर अपना पानी बाँटता है. जॉर्डन नदी का पानी गलिली महासागर में भी गिरता है पर गलिली महासागर अपने पानी को बाहर बहने की अनुमति देता है. यही इस महासागर के पानी को हितकर, उपयोगी व सक्रीय बनाता है.

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सीख:
जब हम बाँटते हैं तब हम धनवान बनते हैं. इस गणित को समझकर बहुत लोगों ने अपना जीवन संवारा है. यदि हमारे पास धन, ज्ञान, प्रेम, समादर या ईश्वर से प्राप्त अन्य कोई उपहार है और हम उन्हें बाँटना नहीं सीखते तो यह सब धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं. कहा जाता है कि किसी वस्तु का संग्रह करने से उसका विकास नहीं होता है. ईश्वर की अनुकम्पा पाने के लिए यह आवश्यक है कि हम आपस में मिल-बाँटकर रहना सीखें. जब एक कटोरा खाली होने लगता है तभी उसमें स्वच्छ पानी डाल सकते हैं. अतः हमें देने की कला को अंतर्ग्रहण करना चाहिए.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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श्री कृष्ण, अर्जुन और कबूतर की कहानी

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आदर्श: विश्वास
उप आदर्श : भरोसा

श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच घटित एक विख्यात उपकथा इस प्रकार से है:
“कृष्णा, मेरे लिए आपके शब्द मेरी आँखों के प्रमाण से अधिक विश्वसनीय हैं.”

श्री कृष्ण और अर्जुन एक बगीचे में घूम रहे थे जब आसमान में उन्हें एक पक्षी उड़ता दिखा.
पक्षी की ओर इशारा करते हुए श्री कृष्ण बोले,
“अर्जुन, वह पक्षी देख रहे हो…..क्या वह कबूतर है? ”

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“जी, मेरे प्रभु! वह निस्संदेह कबूतर है” ,अर्जुन ने उत्तर दिया.
“अरे रूको …..मेरा ऐसा सोचना है कि वह बाज है. देखो तो, क्या वह बाज नहीं है? “कृष्ण ने पूछा.

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“आप सही कह रहे हैं, कृष्ण. वह पक्षी निश्चित रूप से बाज ही है” ,अर्जुन बोला.
“अरे नहीं! वह बाज के समान प्रतीत नहीं हो रहा है” ,कृष्ण बोले. “वह अवश्य ही कौआ है.”
“निःसंदेह कृष्णा, वह कौआ ही है” ,अर्जुन ने उत्तर दिया.

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अर्जुन की बात सुनकर कृष्ण हँसते हैं और अर्जुन से झिड़ककर कहते हैं,
“अर्जुन, क्या तुम अंधे हो? तुम्हारी अपनी आँखें नहीं हैं, क्या? मैं जो भी कह रहा हूँ तुम उससे सहजता से सहमत होते जा रहे हो.”

अर्जुन बोला, “कृष्णा, मेरे लिए आपके शब्द मेरी आँखों के प्रमाण से कहीं अधिक विश्वसनीय हैं. आप जब कुछ कहते हैं तो उसे हकीकत में बदलने की ताकत रखते हैं- चाहे वह कौआ हो, कबूतर हो या बाज. अतः यदि आपने कहा है कि वह पक्षी कौआ है तो वह अवश्य कौआ ही होगा! ”

सीख:
इस कहानी का उद्धरण प्रायः विश्वास का दृष्टांत देने के लिए दिया जाता है. अपने गुरु व प्रभु पर हमें भी इसी प्रकार का विश्वास स्थापित करना चाहिए. श्री कृष्ण पर इस प्रकार के सम्पूर्ण व दृढ़ विश्वास के कारण ही अर्जुन अच्छाई और बुराई में हुए युद्ध को जीत पाया था.

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अनुवादक- अर्चना

भगवान में विश्वास

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        आदर्श: विश्वास
  उप आदर्श : भरोसा

एक नवविवाहित व्यक्ति अपनी ख़ूबसूरत पत्नी के साथ घर लौट रहा था. वह दोनों नाव से नदी पार कर रहे थे जब अचानक ही वह एक भयनाक तूफ़ान में फंस गए.

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वह व्यक्ति जो वास्तव में सैनिक था, भयरहित था पर उसकी पत्नी अत्यधिक डरी हुई व मायूस थी. उनकी छोटी सी किश्ती बड़ी-बड़ी प्रबल लहरों में डावांडोल हो रही थी और तूफ़ान की उग्रता से पत्नी को बहुत डर लग रहा था. उसे भय था कि किसी भी क्षण उनकी नाव उलट जाएगी और वह डूब जायेंगें. परन्तु वह व्यक्ति शांत, स्थिर व अव्याकुल था मानो कुछ भी न हुआ हो.

पत्नी ने कांपती हुई आवाज़ में अपने शांत पति से पूछा, “क्या आपको डर नहीं लग रहा है? यह हमारी ज़िन्दगी का आखिरी पल भी हो सकता है! हमारा तट पर पहुँच पाना असंभव सा लग रहा है. केवल एक चमत्कार ही हमें बचा सकता है; वरना हमारा अंत निश्चित है. क्या आपको डर नहीं लग रहा है? आप बावले हैं क्या? आप पत्थर के बने हैं क्या?

व्यक्ति हँसा और उसने कोष में से अपनी तलवार निकाली.trust3 पति को इस प्रकार तलवार निकालते हुए देखकर पत्नी और भी अधिक उलझन में आ गई और अचंभित थी कि वह क्या करने वाला है. तत्पश्चात पति अपनी तलवार पत्नी के गले के पास ले आया, इतनी करीब ले आया कि तलवार पत्नी के गले को करीब-करीब छू रही थी.

पति ने पत्नी से पूछा, “क्या तुम्हें डर लग रहा है? ”
पत्नी हँसने लगी और बोली, “मुझे क्यों डर लगेगा? भले ही आपके हाथ में तलवार है पर मैं क्यों डरूँ? मुझे पूरा विश्वास है कि आप मुझसे प्रेम करते हैं.”
पत्नी की बात सुनकर तलवार वापस रखते हुए पति बोला, “यही मेरा उत्तर है. मैं जानता हूँ कि भगवान मुझसे प्रेम करते हैं और यह तूफ़ान उन्हीं के हाथ में है.”

अतः जो भी होगा, अच्छा ही होगा क्योंकि सब कुछ ईश्वर के हाथ में है और वह कभी कुछ गलत नहीं कर सकते हैं.

सीख:
हमें स्वयं में दृढ़ विश्वास विकसित करना चाहिए. यह दृढ़ विश्वास ही हमारे जीवन को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखता है.

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अनुवादक- श्रीमती सरस्वती व अर्चना

कृष्ण ,बलराम और राक्षस

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आदर्श:उचित आचरण

उप आदर्श :आत्म विश्वास,साहस

एक पूर्णिमा की रात, कृष्ण और बलराम जंगल की ओर चल पड़े. देरी हो जाने के कारण उन्हें रात जंगल में गुजारना पड़ा. जंगल भयानक था और दोनों की सुरक्षा के लिए कृष्ण ने बलराम को सुझाव दिया की वे दोनों बारी बारी पहरा देंगे. पहला पहरा देने की बारी बलराम की थी और कृष्ण सोने के लिए तैयार हो गए.

कुछ ही समय मे कृष्ण गहरी नींद सो गए. बलराम को दूर से किसी की गुर्राने की आवाज सुनायी दी. बलराम आवाज़ की ओर बढ़ने लगे. तब  उन्होंने एक विरूप आकारवाले राक्षस को अपने ओर आते हुए देखा. वह राक्षस फिर से गुर्राया. बलराम डर से थर थर कांपने लगे.जैसे जैसे बलराम डर रहे थे, वैसे वैसे वह राक्षस दुगुना बढ़ता गया.वह राक्षस बहुत बड़ा आकार लेकर ,बलराम के बहुत खरीब आकर खडा हो गया और उसने फिर गुर्राया. बलराम उसकी आकार और दुर्गन्ध सह नहीं पाए. वे जोर से “कृष्ण,कृष्ण” चिल्लाते हुए बेहोश गिर पड़े.

बलराम की पुकार सुन कर कृष्ण जाग गए और उस आवाज़ की ओर चलने लगे. उन्हें लगा कि बलराम सो गए होंगे और पहरा देने की बारी उनकी है. इस सोच से वे आगे पीछे टहलने लगे और उन्होंने अपने समक्ष एक भयानक प्राणी खडा पाया.

राक्षस कृष्ण को देखकर गुर्राया. कृष्ण निडर होकर राक्षस से प्रश्न पूछने लगे. उन्होंने पहले उसे वहां आने की वजह पूछी. प्रश्न सुनते ही राक्षस का आकार आधा कम हो गया. कृष्ण लगातार जवाब की प्रतीक्षे में  प्रश्न पूछते गए ,और वह राक्षस सिकुड़ता गया.

अब वह राक्षस केवल दो इंच का हो गया. वह देखने में बहुत सुन्दर और प्यारा लग रहा था . कृष्ण उसे अपने जेब में रखकर बलराम की ओर चल पड़े. रात बीती और सुबह बलराम नींद से जागे.

कृष्ण को देखते ही बलराम खुशी से “कृष्ण,कृष्ण” पुकारने लगे. बलराम ने कृष्ण से कहा कि “कृष्ण, कल रात जब तुम सो रहे थे,तब एक भयानक राक्षस यहाँ आकर हम दोनों को मारने की कोशिश कर रहा था. किसी तरह हम बच गए. मुझे सिर्फ इतना याद है कि मैं बेहोश होकर गिर गया.”

कृष्ण अपने जेब से वह छोटी सी आकार वाले राक्षस को  निकालकर, बलराम से पूछे; “क्या तुम इसी राक्षस की बात कर रहे हो?”

बलराम ने जवाब दिया कि “जी हाँ. मगर वह तो बड़ा था, कैसे इस तरह सिकुड़ गया?”

कृष्ण ने कहा “जब मैं उससे प्रश्न पूछने लगा,तो वह सिकुड़ता गया, और अंत में इस तरह बन गया”. बलराम कृष्ण को यह बताने लगे कि पिछली रात को जब वे डर रहे थे ,तब वह राक्षस आकार र्में बढता गया. अंत में कृष्ण ने कहा कि “जब हम डरते हैं ,तब हमारी समस्या भयानक हो जाती हैं; मगर जब हम निडर होकर, साहस के साथ समस्या का सामना करते हैं, तब हमारा डर कम हो जाता है.

शिक्षा :

जब हम किसी समस्या को सामना करने से झिझकते या डरते हैं ,तब वह समस्या बढ़ जाता है. साहस के साथ सामना करने से हम सभी  समस्या का समाधान दूंढ़ सकते हैं. समाधान अपने अनुकूल या प्रतिकूल हो सकता है परन्तु हम समस्या का सामना तो कर चुके होंगे. परिस्तिथि का सामना करके ही हम जीवन में प्रगति पा सकते हैं. टालना प्रगति में बाधा डालता है और आगे बढ़ने में रुकावट पैदा करता है.

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लंगर- एक नि:स्वार्थ प्रेम की कहानी

आदर्श :प्रेम

उप आदर्श: कृपा,दयालुता

कई सौ सालों से पहले, गुरु गोबिंद राय सिख धर्म के दस्वें मदगुरु थे. भगवान के प्रति उनका प्यार गहरा और स्थिर था. जो भी उनके आसपास थे, वे हमेशा सुख और आनंद का अनुभव करते थे. सिख लोग हमेशा गुरु के सीख के लिए उत्सुक थे.

एक बार वे अपने प्यारे जनता से बोले ,”सभी के घरों में लंगर होना जरूरी है. आपके घर यात्रियों और अतिथियों के खानपान और खातिरदारी के लिए हमेशा तैयार रहने चाहिए. जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाइए. कोई भी आदमी आप के घर से भूखे या खाए बिना नहीं जायें “

सभी लोग गुरु के बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहे थे. सिख समुदाय सेवा के लिए मशहूर हैं . फिर भी गुरुजी उनकी परीक्षा लेकर यह जानना चाहते थे कि वे कितने तैयार हैं; हमेशा तैयार थे या कभी कभी…..

एक दिन सवेरे एक मजेदार घटना घटी.यह गुरूजी की अनोखी लीला थी. गुरु गोबिंद राय साधारण यात्री के वेष में अपने भक्तों के घर के लिए निकल पड़े.

साधारणत: गुरुजी स्वच्छ और बिना सिकुडे हुए कपडे पहनते हैं. लेकिन उस दिन सुबह वे मैले और सिकुडे कपडे पहनकर निकले ताकि कोई उन्हें पहचान न पाए.

वे अपने भक्तों के घर एक वे असुविधा जनक समय पर पहुंचे ! सूर्योदय के पहले का समय था. इसलिए कई भक्त तब ही जाग रहे थे. दिनभर के कामों जैसे नहाना,धोना और प्रार्थना करने में व्यस्थ थे. गुरूजी उनके दरवाजे पर दस्तक देकर कहते थे,”भाई,तकलीफ के लिए माफ़ करना. मैं एक यात्री हूँ. मुझे भूख लगी है. क्या आप मुझे कुछ रोटी खाने के लिए दे सकते हैं?

लोगों का जवाब था “माफ़ कीजिये आप अपने कार्यक्रम में जल्दी निकले हैं; हमारे पास इस वक्त आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है. हमारे घर खाना देर से बनती है. आप थोड़ी समय बाद आते तो ,हम आपको कुछ परोस सकते हैं.”गुरु अपने प्रियजनों की परीक्षा ले रहे थे.एक मामूली बात को वे अविस्मरणीय तरीके से दिखाना चाहते थे. वे उनको यह दिखाना चाहते थे कि वे (लोग) अभी भी थोड़े स्वार्थी हैं,पूर्ण रूप से नि:स्वार्थ नहीं थे. खुद को सुधारने के लिए उन्हें अब भी समय की जरूरत थी.

किसी घर पर अगर गुरुजी दाल के लिए पूछते वहां उन्हें जवाब मिलता; “माफ़ करना भैय्या , दाल पकने में तो बहुत समय लगता है; हमारे यहाँ तो अब तक नाश्ता भी नहीं बना है. आप को परोसने में हमें खुशी है,… मगर कृपया थोड़ी देर बाद आइये.

एक घर के बाद दूसरा घर….गुरुजी चलते गए. उनके होंठों पर एक मुस्कान और आँखों में चमक थी.

कोई भी सिख ने अब तक उन्हें खाने में कुछ नहीं दिया.

अंत में गुरुजी नंदलाल नाम के आदमी के घर आये. नंदलाल एक कवि था और सच्चे गुरुओं को प्रेम भाव से आदर करता था. गुरु गोबिंद राय से २३ वर्ष उम्र में बड़े होने के बावजूद ,वह उनका भक्त था. गुरुजी के दरबार में  उसका मन खिल जाता था. वह हमेशा प्रेम और भक्ति से गुरु की सेवा करता था.

नंदलाल ने खुशी से अपने अतिथि का स्वागत करते हुए कहा “सु स्वागत है, मेरे दोस्त “

गुरुजी के बात करने से पेहले ही नंदलाल ने कहा “अन्दर आकर बैठकर आराम कीजिये”. तब गुरु ने कहा “मैं एक मामूली यात्री हूँ. क्या आप के पास कुछ खाने के लिए है?” नंदलाल ने बेझिझक जवाब दिया, “आपको पूछने की जरूरत नहीं है. खाना अभी आ रहा है.”

खाना परोसने (सेवा) का अवसर पाकर वह बहुत खुश हुआ. वह अन्दरसे रोटी के कच्चे आटा, अध् पके दाल, सब्जियां और मक्खन ले आया.

अध् पके खाने को उसने अतिथि के सामने बड़े कृपा और गौरव के साथ रखा. नंदलाल ने कहा “आप जो चाहे, जितना चाहे खाइए. अगर आप थोड़ी प्रतीक्षा करें तो मैं आप के लिए गरम गरम रोटियाँ, स्वादिष्ट दाल और सब्जियोंको पका कर ले आऊँगा. आप की सेवा करना मेरा सौभाग्य है. यह मेरी गुरु की कृपा है. तब तक आप आराम कीजिये.

नंदलाल भाई की सेवा भाव देख, गुरुजी खुश हुए. इतने प्यार से बना खाना खाकर संतुष्ट हुए. नंदलाल अपने गुरुजी की सीख का सच्चा पालन करता था . जो कोई नंदलाल भाई के घर आता, वह बिना खाये कभी नहीं लौटता था.

अगले दिन सुबह गुरुजी ने सभी लोगों से कहा “इस गाँव में एक ही अतिथि-सत्कार मंदिर है, और वह है नंदलाल भाई का घर. नंदलाल प्रेम और भक्ति की भाषा बोलता है. हम सबको दुआएं देता है. उसकी वचन-बद्धता प्रशंसनीय है. उसका प्रेम सब के मन को जीत लेता है. ऐसे लंगर चलाने से ही सिख लोग सही माय्न्ने मे अमीर बनते हैं. इस प्रकार से नंदलाल का लंगर सफलपूर्वक है”

सभी भक्त यह सुनकर मन ही मन हसें और समझ गए कि गुरुजी ने उनकी परीक्षा ली है. स्नेहभाव से रहने पर भी ,वे सफलता न पा सके. भाई नंदलाल हमेशा सेवा केलिए तत्पर रहता था. वह खुशी से,बिना कुछ बहाने किये बेझिझक सब को लंगर परोसता था. जब हम नि:स्वार्थ बनते हैं, तब हमें कोई बहाने की जरूरत नहीं होती  है, हम हमेशा खुश रहेंगे. अतिथि-सत्कार करने के लिए भाई नंदलाल एक उदाहरण बना.

भाई नंदलाल ने कहा; “साधुओं को पानी देना संसार के बड़े बादशाह होने के समान है. उनके लिए खाना देना सभी स्वर्गों से भी आरामदायक है.गुरु के लिए लंगर बनाना सभी धन, दौलत से बढ़कर है. महान लोग जरूरतमंदों की सेवा करते हैं और उनके समक्ष रहकर दुसरे आदमी विनम्रता सीखतें हैं . गुरु की सीख इन सभी चीजों और हर जगह पर है.”

सीख :

आदमी को लगातार अच्छे कर्मों से अपने में परिवर्तन लाना चाहिए. प्रेम और सेवा की कोई सीमा नहीं होती है. अतिथि देवो भवः अतिथि भगवान का रूप होते हैं. जो भी अतिथि अपने घर आये ,उनका आदर प्रेम और सम्मान पूर्वक करना चाहिए. सभी से प्रेम करें सभी की सेवा करें.

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आम का पेड़

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आदर्श : प्रेम
उप आदर्श: आदर, देख-रेख

एक बार आम का एक बहुत बड़ा पेड़ था. एक नन्हा बालक हर रोज़ उस पेड़ के आस-पास खेला करता था. कभी वह पेड़ के ऊपर चढ़ता था, कभी पेड़ के पक्के आम तोड़कर खाता था और कभी पेड़ की छाया में सो जाता था. उसे आम का वह पेड़ बहुत पसंद था और पेड़ को भी उसके साथ खेलना अच्छा लगता था.

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समय बीतता रहा….. नन्हा बालक बड़ा हो गया और अब वह पेड़ के आस-पास नहीं खेलता था.

एक दिन उदास चेहरा लेकर वह लड़का पेड़ के पास वापस आया.

लड़के को देखकर पेड़ बोला, “आओ, मेरे साथ खेलो.”
“नहीं, अब मैं बच्चा नहीं रहा. मैंने पेड़ के आस-पास खेलना छोड़ दिया है,” लड़के ने जवाब दिया. “मुझे खिलौने चाहिए हैं और उन्हें खरीदने के लिए मुझे पैसों की आवश्यकता है.”aam3
“माफ़ करना, मेरे पास पैसे नहीं हैं…. पर तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बेचकर तुम्हें पैसे मिल जाएंगें.”
पेड़ का सुझाव सुनकर लड़का बहुत ही खुश हो गया. फिर पेड़ के सारे आम तोड़कर वह वहाँ से ख़ुशी-ख़ुशी चला गया. काफी समय तक वह लड़का वापस नहीं आया और पेड़ उदास था.

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एक दिन वह लड़का पेड़ के पास पुनः लौटा. इस बार वह बड़ा होकर आदमी बन चुका था. उसे देखकर पेड़ बहुत ही खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो, ” पेड़ ने कहा.
“मेरे पास खेलने का समय नहीं है. मुझे अपने परिवार के लिए काम करना है. हमें एक घर की ज़रुरत है. क्या तुम हमारी मदद कर सकते हो?”
“माफ़ करना, मेरे पास घर नहीं है. पर अपना घर बनाने के लिए तुम मेरी शाखाएँ काट सकते हो.”

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अतः युवक ने पेड़ की सारी शाखाएँ काट लीं और ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से चला गया. उसे खुश देखकर पेड़ प्रसन्न था पर उसके बाद वह युवक वापस नहीं आया. एक बार फिर पेड़ अकेला व उदास था.

कड़ी गर्मी के एक दिन वह युवक लौटा और उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ.
“आओ, मेरे साथ खेलो.”
“मैं उदास हूँ और वृद्ध हो रहा हूँ. अपने विश्राम के लिए मैं नौकायान पर जाना चाहता हूँ. क्या तुम मुझे एक नाव दे सकते हो?”
“तुम मेरे तने से नाव बना लो. नाव लेकर तुम लम्बी जलयात्रा पर निकल जाओ और यात्रा का आनंद लो.”

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पेड़ की बात सुनकर उस व्यक्ति ने पेड़ का तना काटा और अपने लिए एक नाव तैयार कर ली. वह जलयात्रा पर चला गया और काफी समय तक वापस नहीं आया.

अंततः कई वर्षों के बाद वह व्यक्ति वापस लौटा.
“माफ़ करना, मेरे बच्चे, पर अब मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है. तुम्हें देने के लिए आम भी नहीं बचे हैं, पेड़ ने कहा.
व्यक्ति ने उत्तर दिया, ” अब तो मेरे पास दांत भी नहीं हैं.”
“तुम्हारे चढ़ने के लिए तना भी नहीं बचा है.”
व्यक्ति बोला, “उसके लिए मैं बूढ़ा हो चुका हूँ.”
“मेरे पास तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है…. केवल मेरी मुरझाई हुई जड़ें ही बाकी बची हैं, ” पेड़ ने निराश होकर कहा.
“अब मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. इतने वर्षों के बाद मैं थक चुका हूँ, ” व्यक्ति ने उत्तर दिया.
“अच्छा है! टेक लगाकर आराम करने के लिए पुराने वृक्ष की जड़ें सर्वोत्तम होती हैं.”

वह व्यक्ति मुस्कुराया और वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गया.

सीख:
कहानी में पेड़ हमारे माता-पिता को दर्शाता है. जब हम छोटे होते हैं तब हम उनके साथ खेलना पसंद करते हैं. जब हम बड़े हो जाते हैं तब हम उन्हें छोड़कर चले जाते हैं और वापस तभी आते हैं जब हमें मदद चाहिए होती है. माता-पिता हमारे लिए अपने जीवन का बलिदान करते हैं. हमें उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और जब उन्हें हमारी सबसे अधिक ज़रुरत होती है, हमें उनकी मदद अवश्य करनी चाहिए. उन्हें केवल हमारे प्रेम की आवश्यकता होती है और हमारे साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं.

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अनुवादक- अर्चना

एक तपस्वी का संकल्प

 

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: दृढ़ निश्चय, श्रद्धा

भगवान् को प्रसन्न करने के मुख्य उद्देश्य से बहुत सारे लोग तप करते हैं. एक तपस्वी ने एक बार भगवान् को प्रसन्न करने का निश्चय किया और अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या करने लगा. उसने सोचा कि अगर वह भगवान् को प्रसन्न करने में सफल हो जाएगा तो उसे आशीर्वाद में भगवान् के दर्शन मिलेंगें. अतः वह प्रतिदिन पेड़ की परिक्रमा करता था और भोजन में रोज़ाना पेड़ के पत्ते खाता था.

एक दिन नारदजी भगवान् के धाम जा रहे थे. रास्ते में तपस्वी को देखकर वह उससे मिलने आ गए. नारदजी को देखकर तपस्वी ने तुरंत उन्हें नतमस्तक होकर प्रणाम किया. नारदजी के पूछने पर तपस्वी ने भगवान् की कृपा पाने के अपने निश्चय का वर्णन किया. तपस्वी बोला, “नारदजी, मैं कई वर्षों से तपस्या कर रहा हूँ और इस अम्बली वृक्ष के पत्तों का ही भोजन करता हूँ ताकि मुझे भगवान् के दर्शन हो सकें. आप जब भगवान् से मिलेंगें तो कृपया मेरी ओर से उन्हें मुझे दर्शन प्रदान करने के लिए कहना.” तपस्वी की कहानी सुनकर नारदजी ने निश्चय किया कि वह उसका सन्देश भगवान् तक अवश्य पहुँचाएंगें.

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नारद के आगमन पर भगवान् ने उनसे पूछा, “नारद! पृथ्वी से क्या समाचार लाए हो?”

तपस्वी से अपनी मुलाकात का स्मरण करते हुए नारदजी बोले, “भगवन! एक तपस्वी अम्बली पेड़ के नीचे तपस्या कर रहा है ताकि उसे आपके दर्शन हो सकें. आप उसे अपने दर्शन कब देंगें?”

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भगवान् बोले, “उससे कहो कि मेरे दर्शन पाने के लिए उसे उतने वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने कि अम्बली पेड़ पर पत्ते हैं! ”

प्रभु का कथन सुनकर नारदजी के घुटने ठिठुरने लगे. उनकी टांगें सुन्न हो गयीं मानो वह एक कदम भी नहीं ले पाएंगीं और उनका दिल बैठ गया. उत्सुक तपस्वी को वह यह समाचार कैसे दे पायेंगें. वह तो बेचारा बिलकुल टूट जाएगा. नारदजी ने मन ही मन सोचा, “मैं उससे क्या कहूँगा? वह हिम्मत हार जाएगा और तपस्या के लिए सारा उत्साह गँवा देगा.” इस प्रकार चिंतन करते हुए नारदजी आसमान से पृथ्वी की ओर आ रहे थे जब तपस्वी ने उन्हें देखा. अपना नाम सुनकर, नारदजी तपस्वी के पास गए. तपस्वी यह सुनकर अत्यंत हर्षित हुआ कि नारदजी भगवान् से मिले थे.god

उसने नारदजी से पूछा, “मेरे लिए भगवान् का क्या सन्देश है?”
नारदजी ने उदासी से उत्तर दिया, “वह मैं नहीं बता सकता क्योंकि मेरी बात सुनकर तुम हिम्मत हार जाओगे और अपनी तपस्या त्याग दोगे.”
तपस्वी ने जवाब दिया, “भगवान् ने चाहे कुछ भी कहा हो, मैं हिम्मत नहीं हारूँगा. कम से कम मुझे प्रभु के दिव्य शब्द सुनने का अवसर प्राप्त होगा. कृपया मुझे ठीक-ठीक बताएं कि भगवान् ने क्या कहा है.”

नारदजी अभी भी अनिश्चित थे. वह सोचने लगे, “क्या मैं इसे बता दूँ? कहीं इस बेचारे का विश्वास न टूट जाए. मैं इसके साथ ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहता.”

तपस्वी ने पुनः विनती की, “कृपया मुझे भगवान् का सन्देश बताएं.”
इस पर नारदजी बोले, “भगवान् ने कहा है कि तुम्हें और कई वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी. असल में, भगवान् के दर्शन पाने के लिए तुम्हें उतने सालों तक तपस्या करनी पड़ेगी जितने इस अम्बली वृक्ष पर पत्ते हैं.”
तपस्वी आनंदोल्लास हो गया. वह नाचने और गाने लगा, “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. भगवान् ने अपने धाम से मेरे लिए सन्देश भेजा है. उन्होंने मुझसे वादा किया है कि वह मुझे दर्शन देंगें.यह वर्ष तो तुरंत ही बीत जायेंगें.”
तपस्वी का प्रेम और हौसला देखकर भगवान् ने तत्क्षण तपस्वी के सामने प्रकट होकर उसे अपने दर्शन दिए. तपस्वी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. वह प्रभु के चरणों में गिर पड़ा.

नारदजी अचंभित थे. उन्होंने भगवान् से पूछा, “प्रभु, आप यहाँ कैसे? आपने तो कहा था कि आप इसे कई वर्षों की तपस्या के बाद दर्शन देंगें.”

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भगवान् ने जवाब दिया, “इसकी हिम्मत और दृढ़ निश्चय को देखो! यह जानने के बाद भी कि इसे अभी कई और वर्षों तक तपस्या करनी पड़ेगी, इसने हिम्मत नहीं हारी और अपना विश्वास बनाए रखा. ऐसे व्यक्ति को मैं दर्शन अवश्य देता हूँ.”

 

सीख:
अगर तपस्वी अपना विश्वास खो देता तो क्या उसे भगवान् के दर्शन प्राप्त हो पाते? नहीं! चूँकि उसने हिम्मत नहीं हारी, भगवान् ने उसे दर्शन दिए. दृढ़ संकल्पी व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचता है. एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने पर हमें हार न मानने का निश्चय करना चाहिए और उद्देश्य हासिल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयास, उचित प्रवृत्ति व विश्वास से काम करना चाहिए.

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अनुवादक- अर्चना