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मकर संक्रांति

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हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में मकर संक्रांति की गणना भी होती है. इसे सम्पूर्ण भारतवर्ष के विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नाम और परंपरा के अनुसार मनाया जाता है. मकर संक्रांति जनवरी माह में मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है. इस दिन से सूर्य की उत्तरायण गति आरम्भ होती है और इसी कारण इस पर्व को उत्तरायणी भी कहते हैं.

मकर संक्रांति एक कृषि व फसल काटने की प्रक्रिया शुरू होने का उत्सव है. उत्तर भारत में इस पर्व को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. पंजाब व हरियाणा में इसे लोहड़ी के रूप में मनाते हैं. लोगों का मानना है कि इस दिन से शीतऋतु का प्रभाव कम होना शुरू हो जाता है और सभी बसंत ऋतु का हर्षोल्लास से स्वागत करते हैं.makar1

 

 

असम में संक्रांति भोगली बिहू के नाम से प्रख्यात है. जगह -जगह बिहू नृत्य व लोक गीतों का आयोजन किया जाता है.makar9

तमिल नाडु में पोंगल तथा कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में संक्रांति के नाम से मनाया जाता है.
इस दिन यूपी व बिहार के लोग खिचड़ी बनाकर भगवान सूर्यदेव को भोग लगाते हैं और इस कारण   इस पर्व को खिचड़ी के नाम से भी मनाते हैं.makar8

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गुजरात प्रदेश में हर जगह आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ती दिखाई पड़ती हैं.

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मकर संक्रांति से कई पौराणिक कथाएँ जुड़ीं हुईं हैं-

कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं. चूंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं, अतः इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है.makar7.jpg

मकर संक्रांति के दिन गंगाजी ऋषि भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जा मिलीं थीं. ऐसा कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था. उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद गंगा इसी दिन सागर में जा मिलीं थीं. इसी कारणवश मकर संक्रांति पर गंगासागर पर भव्य मेला लगता है. मकर संक्रांति पर गंगा नदी में स्नान करना अति शुभ मना जाता है और लोगों का ऐसा विश्वास है कि मकर संक्रांति पर गंगास्नान से सारे पाप धुल जाते हैं.

महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपना देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के दिन का ही चयन किया था.makar6

इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी और सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था. इस कारण यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को ख़त्म करने के दिन भी माना जाता है.

 

मकर संक्रांति का भीतरी अभिप्राय:

मकर संक्रांति के दिन से सूर्यदेव उत्तर की ओर यात्रा आरम्भ करते हैं. उत्तर दिशा मोक्ष की ओर जाने वाले रास्ते को दर्शाती है. ऐसी मान्यता है कि सूर्यदेव हिमाचल की ओर बढ़ना आरम्भ करते हैं. ‘हिम’ का अर्थ है- बर्फ के समान सफ़ेद और ‘अचल’ का अर्थ है- दृढ़ व अटल. इसका तात्पर्य यह है कि केवल एक पवित्र व अटल हृदय में बुद्धि के सूर्यदेव प्रवेश करते हैं और हृदय को प्रकाशित करते हैं. अतः सरल शब्दों में उत्तरायण का अर्थ है, अपनी बुद्धि को अपने भीतर अपने हृदय की ओर मोड़ना. संक्रांति के दिन हमें स्वयं को इस बात कास्मरण कराना चाहिए कि सांसारिक आनंद क्षणभंगुर हैं और हमें एक शुद्ध व पवित्र हृदय की ओर यात्रा आरंम्भ करनी चाहिए.

source: bharatdarshan.co.nz, media.radiosai.org

 

 

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जन्माष्टमी

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  यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् !

जब जब संसार में धर्म का ह्रास होता है, सदा कृपालु निराकार भगवान उचित व नया रूप लेकर, धर्म के उत्थान हेतु, लोगों के समक्ष प्रकट होते हैं. कुछ विशिष्ट कारणों से भगवान श्री कृष्ण, जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार थे, इतिहास के सबसे लोकप्रिय व सबसे शक्तिशाली मानव अवतरण माने जाते हैं. कृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है और लोग कृष्ण को अनेकों नामों से जानते हैं- रास रसिला, लीलाधर, देवकी नंदन, गिरिधर, माखन चोर, माधव इत्यादि.

जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्री कृष्ण के जन्म के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास से दुनिया भर में मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि द्वापर युग के अंतिम चरण में भाद्रपद माह के रोहिणी नक्षत्र में तथा कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में श्री कृष्ण का जन्म हुआ था. जन्माष्टमी को विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे कि कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयंती तथा श्री जयंती. लगभग ५००० वर्ष पूर्व, भगवन श्री कृष्ण के जन्म का एक मात्र उद्देश्य धरती को राक्षसों की दुष्टता से मुक्ति दिलाना था. भगवन कृष्ण ने महाभारत में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उन्होंने भक्ति व अच्छे कर्मों के सिद्धांतों का प्रचार किया था जिसका वर्णन भगवत गीता में गहराई से है.
 भगवन कृष्ण का जन्म :

मथुरा का शासक, कंस, एक निष्ठुर राजा था जिससे उसकी प्रजा बहुत डरती थी. कंस की बहन, देवकी, का विवाह जब वासुदेव से हुआ तब भविष्यवाणी हुई थी कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस का नाश करेगा. भयभीत व क्रोधित कंस, अपनी बहन को मारना चाहता था पर वसुदेव ने कंस से वादा किया कि वह अपना हर नवजात शिशु कंस के हवाले कर देगा. कंस मान तो गया पर उसने देवकी व वसुदेव को कारगाह में बंद कर दिया.

भाद्रपद माह की अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ. jn3और भगवान विष्णु के आदेशानुसारjn2 वसुदेव कृष्ण को उनके जन्म के तुरंत बाद बाबा नन्द व माता यशोदा के पास गोकुल ले गए.jn5 इस प्रकार कंस की आँखों में धुल झोंककर, वसुदेव भगवान श्री कृष्ण को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा पाए.jn6

भगवान श्री कृष्ण का जीवन तीन चरणों में बाँटा गया है- वृन्दावन लीला, द्वारका लीला और कुरुक्षेत्र लीला.

वृन्दावन लीला

गोकुल में भगवान कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ बड़े हुए और उन्होंने अपने गोकुल- वृन्दावन समयकाल में कई लीलायें दिखाईं. इसमें से कुछ प्रमुख हैं- राक्षसी पूतना का वध, अधसुर राक्षस का नाश, धेनुकासुर का अंत, वृन्दावन में जहरीले सर्प, कालिया का वध करके यमुना नदी की पवित्रता लौटना, असुर प्रलम्ब का विनाश, गोपिकाओं के साथ रास-लीला, तथा अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्रदेव का अहम नष्ट करना.

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इसके पश्चात, कुछ वर्षों बाद श्री कृष्ण ने मथुरा लौटकर पापी कंस का अंत किया और महाराजा उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजा प्रतिष्ठित किया.

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द्वारका लीला के दौरान कृष्ण ने सत्यभामा, गरुड़ व सुदर्शन चक्र के अभिमान पर प्रहार किया था.

कुरुक्षेत्र लीला का सबसे विशिष्ट अंश कृष्ण का पांडवों तथा कौरवों के साथ सम्बन्ध था. इस दौरान भगवान कृष्ण ने ऐसी कई परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं जो आगे जाकर महाभारत के युद्ध का कारण बनीं. jn12इस विश्व विख्यात युद्ध के दौरान भगवत गीता की रचना हुई थी happiness8जिसके द्वारा भगवान श्री कृष्ण ने हमें अच्छे व बुरे में भेद करना सिखाया तथा हमें अच्छे कर्मों के लिए प्रेरित कर अपने सारे कार्य ईश्वर को समर्पित करना सिखाया. भगवत गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जो घर-घर में तथा प्रत्येक मंदिर में रखा व पूजा जाता है.

जन्माष्टमी उत्सव

देश-विदेश के हिन्दू इस पर्व को बहुत ही आनंद व उत्साह से, दिनभर उपवास रखकर तथा मध्यरात्रि तक जग कर मनाते हैं. लगभग प्रत्येक घर तथा मंदिर में बाल गोपाल को झूले में झुलाया जाता है. jn22कई मंदिरों में भगवद गीता के पाठ का आयोजन भी किया जाता है.

महाराष्ट्र- महाराष्ट्र राज्य में गोकुलाष्टमी को दही हांडी के रूप में मनाया जाता है.

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उत्तरी तथा पूर्वी भारत-
उत्तरी भारत के प्रसिद्द स्थान जैसे मथुरा, वृन्दावन और गोकुल हैं, जहाँ श्री कृष्ण ने अपना बचपन बिताया तथा समस्त गोपियों का मन मोहा था. यहाँ दूर-दूर से जन्माष्टमी पर बहुत से लोग आते हैं.
द्वारका का द्वारकाधीश मंदिर विशेष उल्लेख योग्य है.

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पूर्वी भारत में भागवत पुराण के १०वे स्कन्द से पुराण का प्रवचन होता है.

दक्षिण भारत-
सभी घरों के बाहर ख़ूबसूरत रंगोली बनती है तथा घरों के चौखट पर गृहणियाँ श्री कृष्ण के पदचिन्ह बनातीं हैं. गीत गोविन्दम् तथा कृष्ण सम्बन्धी अन्य भक्तिपूर्ण गीत गाए जाते हैं. दूध व दही से बने आहार भगवान कृष्ण को भोग लगते हैं.
गुर्वायुरपुर का कृष्ण मंदिर विशेष महत्ता रखता है, क्योंकि कहा जाता है कि द्वारका शहर के समुद्र में डूब जाने के उपरान्त गुर्वायुरपुर में भगवान कृष्ण की प्रतिमा की स्थापना हुई थी.

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      कृष्ण शब्द का अर्थ:

कृष्ण= कृष + ण अर्थात कृष्ण वह हैं जो हृदय का विकास करते हैं.

कृष्ण शब्द के तीन अर्थ हैं-

१) कृषिति इति कृष्णा- जो जोतता है वह कृष्ण है. हमारा हृदय मैदान का प्रतीक है. हमें हृदय से घासपात(हानिकर गुणों) को निकालकर, हृदय को प्रेम से भरना चाहिए. हृदय में भगवान के नाम के बीज बोन चाहिए.

२) कर्षति इति कृष्णा- चूँकि वह आकर्षित करता है, वह कृष्ण है. कृष्ण में आकर्षित करने की सर्वोच्च शक्ति है. अपने कार्यों, लीलाओं, संगीत तथा मधुर शब्दों द्वारा कृष्ण सभी को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं.

३) कृष्यति इति कृष्णा- उन्हें कृष्ण कहते हैं क्योंकि वह परमानंद प्रदान करते हैं. हम सब ख़ुशी की तलाश में हैं. भगवान जो आनंद की अभिव्यक्ति हैं, हम सब के भीतर हैं. हमें अपने भीतर आनंद के स्त्रोत को पहचानकर सदा प्रसन्न रहना चाहिए.

जन्माष्टमी के इस पावन अवसर पर भगवान कृष्ण द्वारा दी गई इस सार्वलौकिक शिक्षा पर प्रकाश डालना उचित रहेगा-
भगवान में सम्पूर्ण श्रद्धा रखकर हमें अपना कर्त्तव्य निष्ठा से निभाना चाहिए तथा सदा सहायक रहकर अपना जीवन परिष्कृत करना चाहिए. हमें अपने सभी कार्य भगवान को समर्पित करने चाहिए- भगवान से एकात्मकता अनुभव करने का यही तरीका है.

श्री कृष्ण जिसका नाम है,
गोकुल जिसका धाम है!
ऐसे श्री भगवान को बारम्बार प्रणाम है.

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होली

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होली एक रंगबिरंगा मस्ती भरा पर्व है. इस त्यौहार को बसंत ऋतु में मनाया जाता है. यह एक महत्त्वपूर्ण पर्व है जो हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. होली को ‘रंगों का त्यौहार’ भी कहते हैं और इसे मुख्य रूप से भारत तथा नेपाल में मनाया जाता है. फाल्गुन मास में मनाये जाने वाले इस पर्व को ‘फाल्गुनी’ भी कहते हैं और पारम्परिक रूप से इसे दो दिन मनाया जाता है. पहले दिन को होलिका जलायी जाती है जिसे होलिका दहन भी कहते हैं. holikaदूसरे दिन को धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवन्दन कहते हैं. लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल फेंकते हैं और ढोल बजाकर होली के गीत गाये जाते है. हर तरफ आनंद, हर्ष व मस्ती का वातावरण होता है और बच्चे तथा युवा, सभी समान भाव से इस रंगों के त्यौहार में भाग लेते हैं.ऐसा माना जाता है की होली के दिन लोग अपनी पुरानी कटुता भूलकर गले मिलते है और एक बार फिर दोस्त बन जाते हैं.    holi5

होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से जाना जाता है. होली बसंत ऋतु के आगमन का संदेशवाहक भी है और इस कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहते हैं. होली के पर्व से साथ अनेक कहानियाँ जुड़ीं हुईं हैं जिनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी प्रह्लाद की है. ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को ईश्वर मानता था और उसके राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर पाबंदी थी. परन्तु हिरण्यकश्यपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था. प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यपु ने उसे अनेक दंड दिए परन्तु उसने फिर भी ईश्वर भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा. आखिरकार हिरण्यकश्यपु ने अपनी बहिन होलिका की मदद मांगी. होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका अपने भाई की सहायता करने के लिए तैयार हो गई। होलिका प्रह्लाद को लेकर चिता में जा बैठी परन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल कर भस्म हो गई।holika1

यह कथा इस बात का संकेत करती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत अवश्य होती है। आज भी पूर्णिमा को होली जलाते हैं, और अगले दिन सब लोग एक दूसरे पर गुलाल, अबीर और तरह-तरह के रंग डालते हैं। holi3यह त्योहार रंगों का त्योहार है। इस दिन लोग प्रात:काल उठकर रंगों को लेकर अपने नाते-रिश्तेदारों व मित्रों के घर जाते हैं और उनके साथ जमकर होली खेलते हैं। बच्चों के लिए तो यह त्योहार विशेष महत्व रखता है। वह एक दिन पहले से ही बाजार से अपने लिए तरह-तरह की पिचकारियां व गुब्बारे लाते हैं। बच्चे गुब्बारों व पिचकारी से अपने मित्रों के साथ होली का आनंद उठते हैं।
सभी लोग बैर-भाव भूलकर एक-दूसरे से परस्पर गले मिलते हैं।कई लोग होली की टोली बनाकर निकलते हैं उन्हें हुरियारे कहते हैं।

होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े और कई प्रकार के व्यंजन पकाये जाते हैं. इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनायीं जाती हैं जिनमें गुजिया का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. उत्तर प्रदेश के प्रायः प्रत्येक घर में बेसन के सेव और दही बड़े बनाए व खिलाये जाते हैं. कांजी, भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय हैं.

ब्रज की होली, मथुरा की होली, वृंदावन की होली, बरसाने की होली, काशी की होली पूरे भारत में मशहूर है।

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महाशिवरात्रि

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महाशिवरात्रि का पर्व महादेव शिव, जो हिन्दुओं के त्रिदेवों में से एक हैं, के मान-सम्मान में भक्ति व धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है. महाशिवरात्रि का त्यौहार भारत के सबसे प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण त्योहारों में से एक है और हिन्दू तालिका के अनुसार इसे माघ मास के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है. महाशिवरात्रि का यथाशब्द अर्थ है ‘शिव की महान रात’ और इसे मुख्यतः भारत तथा नेपाल में मनाया जाता है.

महाशिवरात्रि से अनेक मनोरंजक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं. इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कहानी के अनुसार, शिवरात्रि की रात शिव व पार्वती का विवाह हुआ था. कुछ विद्वानों का मानना है कि शिवरात्रि की मांगलिक रात को भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया था- यह नृत्य सृष्टि, संरक्षण तथा विनाश का मुख्य मौलिक नृत्य है. लिंग पुराण में चर्चित एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार शिवरात्रि के शुभ अवसर पर भगवान शिव, लिंग के रूप में व्यक्त हुए थे.shivarati6 एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले विष का सेवन करके भगवान शिव ने संसार को विनाश से बचाया था. विष को अपने गले में धारण करने के परिणामस्वरूप शिव का कंठ नीला पड़ गया था और इसके बाद से महादेव को “नीलकंठ” भी कहा जाता है. अतः शिवरात्रि का पर्व शिव भक्तों द्वारा अत्यंत शुभ माना जाता है और वे इसे महाशिवरात्रि के रूप में मनाते हैं.

शिवरात्रि के पावन अवसर पर लोग निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए महादेव के दिव्य नाम का भजन करते हैंshivaratri5 तथा शिवलिंग की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं. शिवलिंग पर बेल पत्ते, पानी तथा दूध अर्पण किया जाता है क्योंकि ये महादेव के मनभावन माने जाते हैं. shivaratri3shivaratri4शिव भक्त भगवान शिव के परमपावन पंचाक्षर मन्त्र “ओम नमः शिवाय” का निरंतर जाप करते हैं. इसके अतिरिक्त, शिवरात्रि की रात ‘महा मृत्युंजय’ के सशक्त तथा प्राचीन संस्कृत मन्त्र का उच्चारण करने की विशेष महत्ता है. शिवरात्रि के अवसर पर प्रत्येक शिव मंदिर को दीपक तथा रंग-बिरंगी सजावटों से अलंकृत किया जाता है. मंदिरों में लोगों का जमघट लगा रहता है और भक्तजन रातभर पूजा करते हैं और प्रभु का ध्यान करते हैं.

महाशिवरात्रि का पर्व सबसे अधिक लोकप्रिय उज्जैन में है, जो भगवान शंकर का निवास स्थान माना जाता है. shivaratri1
भारत के इलावा, नेपाल में भी विश्वभर से हज़ारों हिन्दू प्रख्यात पशुपतिनाथ मंदिर में एकत्रित होते हैं और अत्यधिक श्रद्धा व उल्लास से भगवान शिव की आराधना करते हैं.shivaratri नेपाल के शिव शक्ति पीठम में भी इसी प्रकार से श्रद्धालु बहुत निष्ठा से महादेव की पूजा-अर्चना करते हैं.

शिवरात्रि का आध्यात्मिक अभिप्राय :

मनुष्य की दस इन्द्रियाँ उसे गलत पथ पर आकर्षित करने की जिम्मेदार होती हैं. शिवरात्रि शब्द में चार अक्षर हैं- शि, व, रा, त्रि. इन चार अक्षरों के अर्थ तथा अंकविद्या में घनिष्ठ सम्बन्ध है. ‘शि’ अंक ५ का प्रतिक है, ‘व’ अंक ४ की ओर संकेत करता है तथा ‘रा’ अंक २ को दर्शाता है. ५+४+२ को जोड़ने ने ११ प्राप्त होता है. ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मस्तिष्क का जोड़ ११ होता है और ये ११ रूद्र हैं- एकादश रूद्र. यह एकादश रूद्र मनुष्य को सांसारिक वस्तुओं में तल्लीन करते हैं, तुच्छ इच्छाओं को बढ़ावा देते हैं और मनुष्य को सांसारिक जीवन में डुबो देते हैं. इन सभी रुद्रों के पार एक और अस्तित्व है और वह परमात्मा है. केवल जब हम इस बारहवें को पकड़ पाते हैं, हम अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण पर पाने में समर्थ हो पाते हैं.

शिवरात्रि का अर्थ है परमपवित्र रात. रात्रि मूल रूप से अन्धकार को दर्शाती है. “चन्द्रमा मनसो जातः चक्षो सूर्योSजायता”-चन्द्रमा हमारे मस्तिष्क का अधिष्ठ देवता होता है. अतः हमारे मस्तिष्क तथा चन्द्रमा में बहुत गहन सम्बन्ध होता है . चद्रमा के १६ चरण हमारे मस्तिष्क के १६ पहलुओं को दर्शाते हैँ. शिवरात्रि अमावस्या के एक दिन पहले होती है जब चाँद की केवल एक लकीर प्रत्यक्ष होती है. यह मस्तिष्क के घटते हुए प्रभाव का प्रतिक है जब १५ पहलु आत्मा में विलीन हो चुके होते हैँ तथा केवल एक अवशेष रहता है. अतः इस दिन मस्तिष्क पर नियंत्रण करके उसे ईश्वर की ओर निदेशित करना अधिक सरल होता है.

ओम नमः शिवायshivaling

http://www.mahashivratri.org

http://www.hismessagehisvoice.blogspot,sg
-अर्चना

बसंत पंचमी

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जिस प्रकार “दिवाली”- दीपों का त्यौहार- लक्ष्मी, जो दौलत व समृद्धि की देवी हैं, से जुड़ा है ; “नवरात्रि” का पर्व दुर्गा, जो शक्ति एवं वीरता का प्रतीक है, से जुड़ा है; ठीक उसी प्रकार बसंत पंचमी का त्यौहार सरस्वती से सम्बंधित है, जो ज्ञान, कला, संगीत तथा वाणी की देवी हैं. हर वर्ष इस त्यौहार को माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाते हैं. यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन का संदेशवाहक है.

भारत देश में छह ऋतुएँ होती हैं, जो अपने क्रम से आकर अपना पृथक-पृथक रंग दिखातीं हैं. इन सब में बसंत ऋतु का अपना अलग एवं विशिष्ट महत्त्व है. इसमें प्रकृति का सौंदर्य सभी ऋतुओं से बढ़कर होता है. बसंत पंचमी के अवसर पर चारों ओर पीली सरसों लहलहाने लगती है. शरद ऋतु की विदाई के साथ पेड़-पौद्यों और प्राणियों में नवजीवन का संचार होता है. वन-उपवन तरह-तरह के पुष्पों से लहलहा उठते हैं.

ऐसा माना जाता है कि इस दिन विद्या, कला व बुद्धिमत्ता कि देवी सरस्वती का जन्म हुआ था. हिन्दू इस त्यौहार को अत्यंत उत्साह और जोश के साथ मंदिरों, घरों, विद्यालयों तथा विश्वविद्यलयों में मनाते हैं. विद्यार्थियों के लिए यह त्यौहार खासतौर से महत्वपूर्ण व विशेष है. प्रायः सभी विद्यालयों में सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है. सरस्वती पूजा को अक्षर-अभ्यास या विद्या-आरम्भ भी कहते हैं क्योंकि इस दिन छोटे बच्चों को उनका पहला अक्षर सिखाया जाता है. किताबें, पेन, पेंसिल तथा पत्रिकाओं को देवी सरस्वती के चरणों के पास रखा जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है.

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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वति भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

बसंत पंचमी के दिन पीले रंग का विशेष महत्त्व है. पीले रंग तो सरसों के खिलते फूलों का प्रतीक मानते हैं. घर-घर में लोग पीले कपड़े पहनते हैं. इसके अतिरिक्त इस दिन पकवान और मिठाइयाँ भी पीले रंग कीं या केसर से बनतीं हैं. पीले रंग के मीठे चावल व केसर हलवा प्रायः प्रतेक घर में बनता है.

भारत के पूर्वी क्षेत्रों में, विशेषतः पश्चिम बंगाल में इसे सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं. देवी का आह्वान कर उनकी पूजा करने के लिए भव्य पंडाल लगाए जाते हैं. इसे श्री पंचमी भी कहा जाता है. bp5गंगा नदी के पवित्र पानी में सरस्वती की मूर्ति का विसर्जन करने के लिए रंगबिरंगी झाँकियाँ निकालीं जाती हैं. पंजाब तथा बिहार के राज्यों में इसे ‘पतंगों के पर्व’ के रूप में जाना जाता है.bpbp1

फिरोज़पुर में, इस दिन बच्चे और बड़े सभी भिन-भिन रंग तथा रूप की पतंगें उड़ाते हैं. इस त्यौहार को नेपाल में भी मनाते हैं. सरस्वती माँ का स्वागत करने के लिए मंदिर एक दिन पहले से ही सजाये जाते हैं.

अर्चना

नवरात्रि

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नवरात्रि हिन्दूओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. नवरात्रि का त्यौहार देवी माता के सभी रूपों जैसे दुर्गा, लक्ष्मी तथा सरस्वती की पूजा-अर्चना को समर्पित है. नवरात्रि का अर्थ ‘नौ रातें” होता है- ‘नव’ अर्थात नौ और “रात्रि” अर्थात रात. इन नौ रातों तथा दस दिनों के दौरान शक्ति/देवी के नौ रूपों को पूजा जाता है. दसवें दिन को ‘विजयादशमी’ या ‘दशहरा’ कहा जाता है. यह त्यौहार पूजा तथा नाच-गाने से परिपूर्ण पर्व है और इसे देश भर में हर्षोल्लास से मनाया जाता है.

नवरात्रि का अभिप्राय :

नवरात्रि के दौरान हम ईश्वर के शक्ति भाव का सर्वव्यापी माता के रूप में आह्वान करते हैं. इन्हें साधारणतः दुर्गा के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है जीवन की विपदाओं को मिटाने वाली.

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

इनका उल्लेख ‘भगवती’ या ‘शक्ति’ के रूप में भी किया जाता है. यही शक्ति ईश्वर को सृष्टि, संरक्षण तथा संहार का कार्य करने में मदद करती है. अन्य शब्दों में, ईश्वर अचल है, पूर्णतयः अपरिवर्तनशील है और माँ दुर्गा सबकुछ करतीं हैं. वास्तव में, हमारे द्वारा शक्ति की पूजा वैज्ञानिक सिद्धांत की पुनः पुष्टि करता है कि शक्ति अविनाशी है. वह सदा विद्यमान रहती है- उसकी रचना या नाश संभव नहीं है.

नवरात्रि की परम्परा:

नवरात्रि प्रतिवर्ष पाँच बार मनाई जाती है- वसंत, आषाढ़, शरद, पौष तथा माघ नवरात्रि. इनमें से वसंत नवरात्रि तथा शरद नवरात्रि सर्वाधिक महत्वपूर्ण व लोकप्रिय हैं.

१) वसंत नवरात्रि : वसंत नवरात्रि चैत्र माह( मार्च-अप्रैल) के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है. इस दौरान नौ दिन, शक्ति के नौ रूपों को समर्पित होते हैं. हिन्दू पौराणिक महीनों के अनुसार यह नवरात्रि नए वर्ष का चिन्ह है.

२) आषाढ़ नवरात्रि – आषाढ़ नवरात्रि को गुप्ता गायत्री या शाकम्भरी नवरात्रि भी कहते हैं. इसे आषाढ़ माह(जून-जुलाई) के आषाढ़ शुक्ल पक्ष में मनाते हैं.

३) शरद नवरात्रि – यह सबसे आशिक महत्वपूर्ण नवरात्रि है. इसे महा नवरात्रि कहते हैं और इसे आश्विन मास के उज्जवल पाख के प्रथम दिन से मनाया जाता है. इसे शरद नवरात्रि भी कहते हैं क्योंकि इसे शरद काल(सितम्बर-अक्टूबर) में मनाते हैं.

४) पौष नवरात्रि – पौष नवरात्रि तारशी(दिसंबर-जनवरी) माह के पौष शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है.

५) माघ नवरात्रि – माघ नवरात्रि माघ माह(जनवरी-फरवरी) के माघ शुक्ल पक्ष में मनाते हैं.

नवरात्रि के दौरान देवी के विभिन्न पहलुओं की आराधना करने के लिए इसे ३ भागों में बाँटा जाता है. पहले तीन दिनों में देवी का दुर्गा के रूप में आह्वान किया जाता है ताकि हमारी अशुद्धताओं, अवगुणों एवं त्रुटियों का नाश हो सके. अगले तीन दिन, देवी की आराधना आध्यात्मिक तथा भौतिक सम्पत्ति की दाता, लक्ष्मी के रूप में की जाती है. ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मी अपने भक्तों को अनंत धन-दौलत प्रदान करने की शक्ति रखतीं हैं. आखिर के ३ दिन, देवी का ज्ञान की भण्डार, सरस्वती के रूप में पूजा की जाती है.

नवरात्रि का त्यौहार देश भर में बहुत ही आकर्षक, विशिष्ट और विभिन्न रूपों में आयोजित किया जाता है.

उत्तरी भारत में चैत्र नवरात्रि राम नवमी से समाप्त होती है तथा शरद नवरात्रि दशहरा पर खत्म होती है. नवरात्रि का पर्व सभी नौ दिन व्रत रखकर तथा देवी का भिन्न रूपों में पूजन करके बहुत ही जोश तथा श्रद्धा से मनाया जाता है. ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ प्रायः प्रत्येक घर में होता है. नवरात्रि के नौ दिन अलग-अलग जगहों पर पंडाल लगाकर “रामलीला” का औपचारिक ढ़ंग से अभिनय किया जाता है. ramlila विजय दशमी के दिन अच्छाई की बुराई पर जीत दर्शाने के लिए रावण, कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले जलाये जाते हैं.ravan हिमाचल प्रदेश के कुल्लु क्षेत्र का दशहरा विशेष रूप से प्रख्यात है.

पश्चिम भारत में, खास तौर से गुजरात व मुंबई राज्यों में नवरात्रि का आयोजन सुप्रसिद्ध ‘गरबा’ तथा ‘डांडिया-रास’ नृत्यों से होता है. नर्तक रंग-बिरंगी पोशाकें पहनकर आभूषित छड़िया हाथ में लेकर घेरों में नाचते हैं.

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दक्षिण भारत के लोग नवरात्रि को ‘गोलू’ के रूप में मनाते हैं.

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केरल तथा कर्नाटक के कुछ भागों में शरद नवरात्रि की अष्टमी, नवमी और विजयदशमी, सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं. घरों में किताबों को पूजा जाता है. बच्चों में लिखना और पढ़ना आरम्भ करने के लिए विजयदशमी का दिन अति शुभ माना जाता है तथा इसे “विध्यारम्भम” भी कहते हैं.

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कर्नाटक में “आयुध पूजा” का आयोजन विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों की पूजा से किया जाता है. रोजाना इस्तेमाल के उपकरणों को फूलों से सजाकर, उनकी पूजा की जाती है और आनेवाले समय में सफलता के लिए देवी के आशीर्वाद के आह्वान करते हैं.

पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में शरद नवरात्रि के अंतिम पाँच दिन विशेष हर्ष, उल्लास तथा उत्तेजना से परिपूर्ण होते हैं. इन्हें ‘दुर्गा पूजा’ के रूप में मनाते हैं और यह इस राज्य का सबसे महान और प्रसिद्ध वार्षिक महोत्सव है. ऐसा माना जाता है कि इस काल के दौरान माता दुर्गा ने महिषासुर असुर के रूप में पाप का अंत किया था. D 1731
उत्कृष्ट शिल्पकार दुर्गा माता की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाते हैं और उन्हें अति सुन्दर रूप से आभूषित करते हैं. दुर्गा पूजा का आरम्भ महालय से होता है. उसके पश्चात षष्ठी, महा सप्तमी, महा अष्टमी तथा महा नवमी को देवी की अत्यंत श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा से पूजा- अर्चना होती है. दशमी के दिन भव्य जलूस निकाले जाते हैं और नाच-गाने के साथ माता की मूर्ति जल में प्रवाहित की जाती है.

शक्ति को नौ दिन पूजने का आतंरिक अर्थ:

असुर शब्द “असुषु रमन्ते इति असुरः ” से उत्पन्न हुआ है. अर्थात असुर उसे कहते हैं जो जीवन में केवल आनंद उठाने तथा भौतिक वस्तुओं के भोग-विलास में लीन रहते हैं. ऐसा महिषासुर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में विद्यमान है और उसने मानव के भीतरी सात्विक गुणों पर नियंत्रण किया हुआ है. अतः इस महिषासुर के मायावी रूप को जानकर, इसके जाल से मुक्त होने के लिए, अपनी सही पहचान जानने के लिए तथा अपने मूल उद्देश्य पर केंद्रित रहने के लिए शक्ति की पूजा करना आवश्यक है. इसीलिए नवरात्रि के नौ दिन, अपने अंदर विद्यमान अहम् रुपी अंधकार से मुक्त होने के लिए, शक्ति की आराधना की जाती है.

sources: hinduism.about.com

en.wikipedia.org
translation : अर्चना

गणेश चतुर्थी

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 गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी भी कहते हैं. हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मॉस के शुक्ल चतुर्थी को हिंदूंओं का यह प्रमुख त्यौहार मनाया जाता है. गणेश पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी दिन समस्त विघ्न- बाधाओं को दूर करनेवाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश का जन्म हुआ था.

    भगवान विनायक के जन्मदिवस पर मनाया जानेवाला यह महापर्व महाराष्ट्र सहित भारत के सभी राज्यों में हर्षोउल्लास पूर्वक तथा भव्य तरीके से आयोजित किया जाता है. उत्सव के पूर्व, कुशल शिल्पकार भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाते हैं. भक्तजन गणपति की मूर्ति घर पर लाकर उनकी प्रतिष्ठा और पूजा करने के लिए अपने घरों की सफाई करते हैं.GaneshChaturthiPoojaइस पर्व की अवधि जगह तथा परंपरा के अनुसार १-११ दिनों तक रहती है. गणेश पूजा प्रायः मध्यायन में की जाती है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्यायन काल में हुआ था. इस उत्सव के दौरान विशेष पूजाएँ, धार्मिक कीर्तन और जाप का आयोजन किया जाता है.ganesh names विभिन्न मिठाइयाँ खासकर ‘मोदक’ बनाते है. गणपति देव को २१ लड्डूओं का भोग लगाने की विधि है. त्यौहार के अंतिम दिन मूर्तियों की रंगीन तथा संगीतात्मक शोभायात्रा निकालते हैं और इन्हें परंपरागत रूप से विसर्जित करते हैं. visarjan  visarjan1

गणेश चतुर्थी एक बहुत ही लोकप्रिय पर्व हैं. इसके अनेक कारण हैं. गणपति विश्वभर के जाने-माने भगवान हैं जो कला व विज्ञान के संरक्षक हैं तथा ज्ञान व बुद्धिमत्ता के देवता हैं और जिनकी पहचान उनके हाथी के मुख से होती है. भगवान विनायक को ‘विघ्न हर्ता’ और ‘बुद्धि प्रदायका’ मानते हैं. चूँकि भगवान गणेश सफलता के मार्ग के समस्त बाधायें दूर करते हैं, उनके आशीर्वाद का आह्वान प्रत्येक धार्मिक रस्मों में किया जाता है. विद्यार्थयों के लिए यह त्यौहार विशेष महत्व रखता है क्योंकि भगवान गणेश ज्ञान व बुद्धिमत्ता के प्रतीक हैं.

गणेश के अनुरूप का तात्पर्य

 

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जब हम गणेश की मूर्ति को देखते हैं तो एक आकर्षक और मनमोहक हाथी के सिर वाले देवता को देखते हैं, जिसकी पूजा सर्वप्रथम की जाती है. उन्हें ‘विघ्नहर्ता’ और ‘बुद्धि प्रदायका’ कहते हैं. पर नज़दीक से देखने पर उनके अनुरूप का गूढ़ मतलब समझ में आएगा.

गणेश के हाथी का सिर पशुओं के सबसे उच्च रूप को दर्शाता है तथा चूहा सबसे निम्न रूप का प्रतीक है. उनके मनुष्य का शरीर बताता है कि गणेश सभी जीवों के देव हैं. उनके विराट कान व सिर इस बात का संकेत हैं कि उन्होंने बुद्धिमत्ता, वेदों के शाश्वत सत्य पर विचार कर तथा श्रवण से हासिल की है. उनका सिर व सूढ़ ‘ॐ’ के आकर में है- जो हमारा सबसे पवित्र चिन्ह है. हाथी की महत्ता इसलिए भी है क्योंकि वह शाकाहारी है- सात्विक खाना खाने वाला. वह एक शांत और सौम्य पशु है जो केवल आवश्यकता पड़ने पर ही अपनी अपार शक्ति का प्रयोग करता है.

गणेश के दाहिने हाथ में अंकुश तथा बायें हाथ में पाश है. इन उपकरणों का प्रयोग हाथी के प्रशिक्षकों द्वारा जंगली हाथियों को वश में करने के लिए किया जाता है. लाक्षणिक रूप से हमारा मन भी जंगली हाथी के समान है जो सदा यहाँ- वहाँ दौड़ता रहता है. अतः हमें अंकुश तथा पाश के माध्यम से अपने मन पर नियंत्रण करना चाहिए- तभी हम एकाग्रचित्त, विचार तथा तपस्या कर पायेंगें.

गणेश के हाथ में मोदक, सात्विक खाने के ओर संकेत करता है जोकि आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक है.

कहा जाता है कि गणेश की विशाल तोंद में सम्पूर्ण विश्व सम्मिलित है. हमें अच्छे तथा बुरे, सभी अनुभवों को स्वीकार करना चाहिए. हमें उत्तेजना तथा परेशानियों के दौरान समचित्त रहना चाहिए क्योंकि सभी अनुभव हमारे लिए सीख होते हैं और हमें ईश्वर के नज़दीक ले जाते हैं.

गणपति देव एक पैर उपर मोड़कर तथा दूसरा पैर ज़मीन पर रखकर बैठते हैं. ज़मीन पर रखा पैर यह बताता है कि हम अन्य जीवों की तरह संसार में रह सकते है परन्तु उपर की हुई टाँग इस बात का संकेत है कि हमारा ध्यान सदैव हमारे भीतर के भगवान पर केंद्रित रहना चाहिए.

मूषक, नन्हा चूहा, इच्छाओं का प्रतीक है. स्वभाव से चूहा एक अत्यंत लालची प्राणी है. वह यहाँ- वहाँ भागकर कुतरता रहता है और अपनी ज़रुरत से अधिक संचय करता है. ठीक इसी प्रकार से अगर हमारी इच्छाएँ ज़्यादा हैं तो हम अपना समस्त जीवन इन्हें पूरा करने में ही व्यर्थ कर देंगें. इसके बजाय हमें भगवान गणेश के समान होना चाहिए और अपनी इच्छाओं को दृढ़ता से नियंत्रण में रखना चाहिए. विनायक पुराण के अनुसार चूहा गजमुहासुर नामक असुर का भी प्रतीक है, जिसका विनाश भगवान गणेश ने किया था. दिलचस्प बात यह है कि पौराणिक कहानियों के अनुसार सभी देवी-देवताओं के वाहन किसी विशेष असुर का प्रतीक है, जिनका उन्होंने नाश किया है. ये सभी वाहन मनुष्य की अज्ञानता का प्रतीक है. इस अज्ञानता का विनाश कर, हमें ज्ञान की ओर केवल ईश्वर ही ले जा सकतें हैं.

गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर सभी को हमारी हार्दिक शुभकामनाएँ. आशा है कि गणेश के विभिन्न अंगों तथा उपकरणों का गूढ़ अर्थ समझकर हम इससे लाभान्वित होंगें और अपनी आध्यात्मिक यात्रा में सफल होंगें.

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          गणपति बापा मोरया !!

  source: ganeshchaturthi.com

                saibabaofindia.com