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पंख की कहानी

एक दिन एक लड़के ने अपने सहपाठी के बारे में झूठी व प्रतिकूल अफ़वाह फैलाई.rumor वह लड़का धर्म से ईसाई था और हर रविवार गिरजाघर जाता था. इस कारण उसे मालूम था कि गिरजाघर में अपराध-स्वीकरण के लिए एक बॉक्स होता है,rumor3 जहाँ लोग पादरी को अपनी गलतियों के बारे में बताकर भगवान से क्षमा माँग सकते थे. इस लड़के को अहसास हुआ कि उसने अपने सहपाठी के बारे में अफ़वाह फैलाकर उसे काफी दुःख पहुँचाया था.rumor1

गिरजाघर में एक दयालु पादरी थे जो बच्चों को उनकी परेशानियों में मदद करते थे.rumor4 जब इस लड़के ने पादरी के सामने अपना अपराध-स्वीकरण किया rumor2और उन्हें बताया कि उसने अपने सहपाठी का दिल दुखाया है तब पादरी ने धैर्यपूर्वक उसकी बात सुनी. लड़के के लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना करने से पहले, पादरी चाहते थे कि वह बालक अपनी करनी के प्रभाव को समझे. इसलिए पादरी ने लड़के से कहा कि एक दिन जब तेज़ हवा चल रही हो तब वह पंख से भरा थैला लेकर एक पहाड़ी की चोटी पर जाए.rumor5 पादरी ने कहा कि चोटी पर पहुँचकर वह थैला खोलकर सारे पंखों को उड़ने दे.rumor7 फिर अगले दिन पुनः वहाँ जाकर सारे पंखों को एक-एक करके उठाए. पादरी की बात सुनते ही लड़के ने तुरंत जवाब दिया कि प्रत्येक पंख को चुनना असंभव है. तब पादरी ने लड़के को समझाया कि ठीक ऐसा ही अफ़वाह के साथ भी है. एक बार अफ़वाह फ़ैल जाने पर उसे रोकना अत्यंत कठिन होता है और उसे अनकिया भी नहीं किया जा सकता है. लड़के से हानि हो चुकी थी अतः पादरी ने उसे आगाह किया कि भविष्य में उसे बहुत सावधान रहना होगा ताकि दुबारा ऐसा कभी किसी और के साथ न हो.

लड़के ने सबक सीखा और दुबारा कभी भी यह गलती नहीं दोहराई.

सीख:
हमें दूसरों के लिए बुरा नहीं बोलना चाहिए. जब हमें किसी के बारे में तथ्य मालूम नहीं हों, तो हमें झूठी ख़बर कभी नहीं फैलानी चाहिए. इससे बहुत से लोगों की भावनाओं को चोट पहुँच सकती है. ज़ुबान से निकले शब्द कभी वापस नहीं आते हैं. एक बार हुई गलती कभी संवर नहीं सकती. निशान या खरोंच सदा बरकरार रहती है. अतः हमें सदा सोच-समझकर बोलना चाहिए.

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http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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एक जुट होकर कार्य करना

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उप आदर्श : एकता

आदर्श : उचित आचरण

यह टीम का दूसरा मैच था. हम UWC ईस्ट, सिंगापुर से खेल रहे थे. यह एक महत्वपूर्ण मैच था और हमारी टीम को जीतना था. हमारे प्रशिक्षक ने बताया कि टीम के अधिकतम विद्यार्थियों की संख्या पर प्रतिबन्ध होने के कारण, हममें से कोई एक मैच नहीं खेल सकता.

मैंने स्वेच्छा से स्थानापन्न होने की  पहल की क्योंकि मैं अपने साथियों को खेल में भाग लेने का अवसर देना चाहता था. मैच अच्छे से हो गया और मैंने अपने साथियों का प्रोत्साहन किया.

अंत में जीत हमारी हुई और हमने ख़ुशी का उत्सव मनाया. टीम की मदद कर और उनके साथ कार्य कर के मुझे प्रसन्नता हुई.
इस अनुभव से मैंने यह सीखा है कि हमें केवल अपने बारे में नहीं बल्कि संगठित समूह के दृष्टिकोण से भी सोचना चाहिए.

विवेक- ११ वर्षीय – प्रेमार्पण आदर्श एवं प्रार्थना कक्षा समूह २

वसुंधरा एवं अर्चना  द्वारा अनुवादित

http://premaarpan.wordpress.com