अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक है 

 

         आदर्श: सत्य 

     उप आदर्श: सच व झूठ का भेद करना 

    एक शिक्षक का एक शिष्य था जिसने न कभी गाय देखी थी न ही कभी उसके दूध का आस्वादन किया था. लेकिन उसने ऐसा पढ़ा था कि गाय का दूध बहुत पौष्टिक होता है और इस कारण वह गाय देखने और उसका दूध चखने के लिए उत्सुक था. वह अपने गुरु के पास गया और उनसे पूछा, “क्या आप गायों के बारे में जानते हैं? ”

     “हाँ “, गुरु ने उत्तर दिया.

      शिष्य ने अनुरोध किया, “तो क्या आप मुझे समझाएंगे कि एक गाय कैसी दिखती है?”

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      गुरु ने बतलाया, “एक गाय के चार पैर होते हैं, वह एक पालतू  जानवर है. वह जंगल में नहीं रहती है, उसे गाँवों में पाया जाता है. गाय दूध देती है जो सफ़ेद रंग का तरल होता है और स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है.” गुरु ने उसे गाय की विशेषताओं के बारे में और भी बहुत सारी  जानकारी दी: जैसे कि उसकी आँखें, कान, पेट, थन व सींग .

      कुछ समय बाद शिष्य एक गाँव में गया जहाँ उसने गाय की प्रतिमा देखी. गाय की प्रतिमा के पास किसी व्यक्ति ने, जो पास वाली परिसर की दीवार पर चूने से रंग चढ़ा रहा था, चूने के पानी से भरी एक बाल्टी रखी हुई थी. शिष्य ने गाय को देखा, उसकी विशेषताओं पर ग़ौर से विचार किया और निष्कर्ष पर पहुँचा कि वह गाय ही होगी. उसने पास ही बाल्टी में सफ़ेद तरल भी देखा और सोचा, “यह निश्चित ही गाय है और इसलिए बाल्टी में दूध ही होगा.”

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     ऐसा सोचकर उसने बाल्टी में से थोड़ा सा तरल पी लिया. जल्द ही वह दर्द से चिल्लाने लगा और उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा.

     गुरु उससे मिलने अस्पताल गए और पूछा, “क्या हुआ? ”

    “गुरूजी, आप बिलकुल गलत थे, आप गायों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं” , शिष्य ने उत्तर दिया.

     “मुझे बताओ कि क्या हुआ” , गुरु ने स्पष्टीकरण माँगा. 

      शिष्य ने सब कुछ विस्तार से बताया. 

      गुरु ने पूछा, “क्या तुमने स्वयं गाय का दूध निकाला था?”

       “नहीं” .

      “इसीलिए तुम मुसीबत में हो. यदि तुम दूसरों के कथन पर आँख मूंदकर भरोसा करोगे, तुम उस सत्य तक कभी नहीं पहुँच पाओगे जो तुम्हें मुक्त कर सकता है” , ज्ञानी गुरु ने शिष्य को समझाया.

     सीख:

     हमें केवल ज्ञान प्राप्त व दूसरों को अंधाधुन्द अनुसरण नहीं करना चाहिए बल्कि अनुभव भी करना चाहिए. भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनुभव सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है. 

     विद्यार्थी विद्यालय से बहुत सारा किताबी ज्ञान प्राप्त करते हैं और अच्छे अंकों से परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते हैं. ज्ञान तो अनेकों हासिल करते हैं लेकिन केवल कुछ ही इसे व्यावहारिक रूप में प्रयोग कर पाते हैं. हमारे द्वारा हासिल किया गया ज्ञान किस प्रकार काम करता है; इसे वास्तव में समझने के लिए अनुभव व क्रियात्मक काम करना अत्यधिक आवश्यक है. 

    आम जैसे फल की व्याख्या में बस इतना कहना कि वह एक खूबसूरत सुनहरा पीले रंग का फल है जो शहद से अधिक मीठा है और जिसकी अद्भुत खुशबू है, उस व्यक्ति के लिए सहायक नहीं है जिसने उसे कभी नहीं चखा है. इस स्वादिष्ट फल का अनुभव केवल इसे खाने पर ही हो सकता है. इसी प्रकार सभी आदर्शों को बिना अभ्यास किए केवल पढ़ना व जानना पर्याप्त नहीं है. 

     प्रेम, करुणा व दया से पूर्ण कार्यों को जब समाज में व्यवहार में लाया जाता है तो इस प्रकार की सेवा से प्राप्त आनंद व ख़ुशी असीमित होती है. यह सच्चे आनंद के उदाहरणों में से एक है. जब हम अच्छे विचारों, शब्दों व कार्यों के माध्यम से अपने मन और चित को शुद्ध करने में लगातार लगे रहते हैं तो एक दिन हम अपने वास्तविक स्वरुप को समझने में सक्षम होंगे जो सत चित्त आनंद है- सत्य, चेतना और आनंद.   

 source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

      अनुवादक- अर्चना       

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