विट्ठोबा और नामदेव 

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   विट्ठोबा ने पाया कि नामदेव को अभी तक सर्वोच्च सत्य का अहसास नहीं हुआ था और वह नामदेव को सिखलाना चाहते थे. जब ज्ञानेश्वर और नामदेव तीर्थयात्रा से वापस लौटे तो गोरा कुंभार ने सभी संतों को अपने घर एक भोज पर आमंत्रित किया. अतिथियों में ज्ञानेश्वर और नामदेव भी थे. गोरा के साथ योजना बनाकर प्रीतिभोज में ज्ञानेश्वर गोरा से खुलेआम बोले, “तुम एक कुम्हार हो, रोज़ाना मटके बनाने में व्यस्त रहते हो और फिर उनकी जाँच करते हो कि वह सही प्रकार से सूखकर तैयार हुए हैं या नहीं.

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  तुम्हारे सामने यह मटके (अर्थात संत) ब्रह्मा के मटके हैं. देखो इनमें से कौन से मजबूत व ठोस हैं और कौन से नहीं.”

  इस पर गोरा बोला, ” जी स्वामी, मैं अभी जाँच करता हूँ. ऐसा कहकर गोरा ने वह छड़ी उठाई जिसे वह अपने मटकों की मजबूती जांचने हेतु उनको थपथपाने के लिए प्रयोग करता था. छड़ी हाथ में लेकर वह प्रत्येक मेहमान के पास गया और हर एक के सिर पर थपथपाने लगा जैसा कि वह आमतौर पर अपने मटकों पर करता था. प्रत्येक मेहमान से इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया. परन्तु गोरा जब नामदेव के पास गया तो नामदेव क्रोध से चिल्लाया, “अरे कुम्हार, मुझे उसे छड़ी से थपथपाने से क्या मतलब है तुम्हारा?”

इस पर गोरा ज्ञानेश्वर से बोला, “स्वामी, अन्य सभी मटके ठीक से सूखकर ठोस बन चुके हैं. सिर्फ यह (यानि नामदेव) अभी तक ठीक से तैयार नहीं है.”

  सभी एकत्रित मेहमान हँसी से फूट पड़े.    

नामदेव ने बहुत ही अपमानित महसूस किया और भागकर विट्ठल (जिस देवता की वह पूजा करता था) के पास गया. विट्ठल से namdev1नामदेव की घनिष्ट मित्रता थी और वह उनके साथ खेलता था, खाना खाता था और सोता था. नामदेव ने विट्ठल से अपने अपमान की शिकायत की जो विट्ठल के सबसे करीबी दोस्त व साथी के साथ हुआ था. यद्यपि विट्ठल को सब कुछ पता था पर फिर भी उन्होंने नामदेव के साथ सहानुभूति रखने का ढोंग किया और गोरा के घर हुई सभी घटनाओं का विवरण पूछा. सब सुनने के बाद विट्ठल बोले, “अन्य सभी मेहमानों की तरह चुप रहकर तुमने भी क्यों नहीं थपथपाहट स्वीकार कर ली? यह सारी मुसीबत इसी कारण आई है.” 

 नामदेव और अधिक ज़ोर से रोते हुए बोले, “दूसरों की तरह आप भी मुझे अपमानित करना चाहते हैं. औरों की तरह मुझे भी क्यों झुकना चाहिए था? क्या मैं आपका निकटतम मित्र, आपका बच्चा नहीं हूँ?”

 विट्ठल बोले, “तुमने अभी तक सत्य को ठीक से समझा नहीं है और यदि मैं बताऊँगा तो तुम समझोगे नहीं. लेकिन अमुक जंगल में एक संत के पास जाओ जो एक जर्जर मंदिर में रहता है. वह तुमको आत्म ज्ञान दे पाएगा.”   

   विट्ठल के कहेनुसार नामदेव उस मंदिर में गया और एक वृद्ध व सहज व्यक्ति को एक कोने में शिवलिंग पर पैर रखकर सोते हुए पाया. नामदेव को विश्वास नहीं हुआ कि यही वह व्यक्ति था जो उसे- विट्ठल के साथी- आत्मज्ञान देने वाला था. चूँकि वहाँ और कोई नहीं था, नामदेव उस व्यक्ति के पास गया और ताली बजाई. वृद्ध व्यक्ति झटके से उठा और नामदेव को देखकर बोला, “ओह- तुम नामदेव हो न जिसे विट्ठल ने भेजा है. आओ.”

   नामदेव हक्का-बक्का रह गया और सोचने लगा, “यह अवश्य ही महान व्यक्ति होगा.” 

   फिर भी उसे लगा कि कोई व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, एक शिवलिंग पर पैर रखना द्रोही होने के बराबर है. उसने बूढ़े व्यक्ति से पूछा, “तुम एक श्रेष्ठ पुरुष लगते हो. लेकिन एक शिवलिंग पर पैर रखना क्या तुम्हारे लिए उचित है?”

    वृद्ध व्यक्ति ने उत्तर दिया, “ओह! क्या मेरे पैर शिवलिंग पैर हैं? कहाँ हैं? कृपया मेरे पैरों को कहीं और हटा दो.”

   नामदेव ने वृद्ध व्यक्ति के पैर शिवलिंग से हटाकर विभिन्न स्थानों पर रखने की चेष्टा की. परन्तु जहाँ भी पैरों को रखा, शिवलिंग वहीँ था. अंततः उसने पैरों को अपनी गोद में रखा और वह स्वयं ही शिवलिंग बन गया. तब उसे सच्चाई का अहसास हुआ और वृद्ध सज्जन बोले, “अब तुम वापस जा सकते हो.”

    सारांश:

   इस कहानी में ध्यान देने वाली बात यह है कि नामदेव का ज्ञानोदय केवल तभी हुआ जब उसने आत्मसमर्पण किया और अपने गुरु के चरण स्पर्श किए. नामदेव की ऐसी आदत थी कि वह प्रतिदिन न केवल विट्ठल से मिलने जाते था बल्कि अपना अधिकतम समय विट्ठल के साथ मंदिर में व्यतीत करता था. लेकिन इस अंतिम प्रबोधन के बाद नामदेव घर लौटा और कुछ दिनों तक विट्ठल के पास मंदिर नहीं गया.  इस कारण विट्ठल नामदेव के घर गए और बहुत भोलेपन से पूछा कि यह कैसे संभव था कि वह विट्ठल को भूल गया था और उनसे मिलने नहीं जा रहा था. नामदेव ने उत्तर दिया, “अब मुझे और बुद्धू नहीं बनाओ. अब मैं जान गया हूँ. ऐसी कौन सी जगह है जहाँ आप नहीं हो! आपके साथ रहने के लिए, क्या मुझे मंदिर जाने की ज़रुरत है? मेरा अस्तित्व क्या आपसे अलग है?”   

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 तब विट्ठल बोले, “तो अब तुम सत्य को समझते हो. इसीलिए मुझे तुम्हें इस अंतिम सीख के लिए भेजना पड़ा था.”

  तीर्थयात्रा, धर्मदान, शास्त्रों का अध्ययन जैसे बाहरी अनुष्ठान मनुष्य को अनुशासन, विश्वास व धैर्य से सन्नद्ध करते हैं जो चित्त की शुद्धि के लिए आवश्यक हैं लेकिन वास्तविक अनिवार्य अभ्यास सच्चा ज्ञान है जिसके लिए मनुष्य को स्वयं को जानने की आवश्यकता है. जो स्वयं को जानता है वह मिथ्या भ्रम से बंधता नहीं है. अज्ञानी व्यक्ति अहंकार से घिरे रहते हैं. अहंकार एक आत्म विकल्प है न कि वास्तविक आत्म. अहंकार ईश्वर को हमसे दूर रखता है. चूँकि हम अपनी वास्तविक अवस्था से परिचित नहीं हैं, इसलिए हममें अहंकार उपस्थित है. सच्चे स्व की अनुपस्थिति बनावटी स्वयं की रचना करता है. 

   हम बाहर से कितने भी अच्छे क्यों न हों; यदि हम अभी भी भीतर से अहंकार से घिरे हैं तो हमारे अंदर इच्छाएँ उत्पन्न होती रहेंगी. गुरु कहते हैं; हमें इस पर अवश्य कार्य करना चाहिए और अपने बनावटी स्वयं से बाहर आकर अपने स्वाभाविक स्व का विकास करना चाहिए.  अरे मूर्ख मन; गोविन्द की तलाश करो!

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http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना 

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