आत्म-स्मरण का मार्ग 

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    एक प्रमुख गुरु का एक विशाल मठ था जिसमें ५०० भिक्षुक रहते थे और सभी आत्म-स्मरण के मार्ग का अभ्यास करते थे. आत्म-स्मरण बुद्ध के द्वारा बताए मार्गों में से एक है. 

    एक समय एक व्यक्ति मठ में आया क्योंकि वह शिष्य बनना चाहता था. गुरु ने उसे स्वीकार कर लिया. चूँकि वह व्यक्ति एक बहुत ही सीधा-साधा व अशिक्षित ग्रामीण था, गुरु ने उससे कहा, “तुम्हारा काम रसोईघर में चावल साफ़ करने का होगा.” रसोई काफ़ी बड़ी थी क्योंकि उसमें ५०० भिक्षुओं का खाना बनता था. बेचारा आदमी सूर्यास्त से लेकर देर रात तक चावल साफ़ करता रहता था. 

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    मठ में रहने वाले सभी ५०० भिक्षु विख्यात विद्वान् थे और वह मठ देशभर में प्रसिद्ध था. पर इस व्यक्ति के पास न ही धर्मोपदेश या पूजा में जाने का समय था और ना ही धर्मग्रन्थ पढ़ने या नीतिवचन सुनने का.  २० वर्ष गुज़र गए और वह व्यक्ति सिर्फ़ चावल साफ़ करता रहा. उसे वर्षों की गिनती भूल चुकी थी. उसे दिनों और तिथियों का भी ध्यान नहीं था और धीरे-धीरे उसे अपने नाम के बारे में भी संदेह होने लगा. २० साल से किसी ने प्रयोग नहीं किया था; किसी ने उसे उसके नाम से नहीं बुलाया था- कदाचित वह उसका नाम ही नहीं था. २० साल से सुबह उठने से रात को सोने तक वह लगातार एक ही लघु काम कर रहा था: चावल साफ़ करना. 

   गुरु ने घोषणा की कि उनका शरीर त्यागने का समय आ गया था. वह अपने उत्तराधिकारी का चयन करना चाहते थे और उन्होंने यह कार्य कुछ इस प्रकार किया. गुरु ने उद्घोषणा की, “जिस किसी व्यक्ति को यह लगता है कि वह आत्म-स्मरण में सफल हो गया है, वह मेरी कुटिया की दीवार पर कुछ ऐसा परिज्ञान लिखे जो प्रमाणित कर सके कि उसने सत्य को देखा है.”

   एक भिक्षु, जिसे समुदाय का महानतम विद्वान् समझा जाता था, ने प्रयास किया. लेकिन वह उस वाक्य को लिखने से बहुत डर रहा था क्योंकि वह उसकी अंतर्दृष्टि नहीं थी. उसे ज्ञात था कि वह उसका परिज्ञान नहीं था, उसने शास्त्रों से उधार लिया था. वह उसका अपना अनुभव नहीं था और उस वृद्ध व्यक्ति को धोखा देना आसान नहीं था. अगली सुबह वृद्ध गुरु बाहर आये और नौकर से दीवार पर से सब कुछ मिटाने को कहा. गुरु नौकर से बोले, “पता लगाओ कि यह मूर्ख कौन है जिसने मेरी दीवार खराब की है.”   

  उस महान भिक्षु ने पकड़े जाने के डर से अपने हस्ताक्षर नहीं किये थे. उसकी योजना के अनुसार, यदि गुरु लेखन की प्रशंसा करते और कहते कि वह वास्तव में एक सर्वोत्कृष्ट अंतर्दृष्टि है तो वह बाहर आकर कहेगा, “यह मैंने लिखा है.” वरना वह ख़ामोश रहेगा….. किसे पता चलेगा? ५०० लोगों में वह किसी का भी काम हो सकता था.  

  लगभग १ दर्ज़न महान विद्वानों ने कोशिश की पर किसी को भी अपने हस्ताक्षर करने की हिम्मत नहीं हुई. हर बार गुरु की प्रतिक्रिया एक सी होती थी; वह पंक्ति को मिटवाकर कहते थे, “तुम में से किसी ने भी आत्म-स्मरण को हासिल नहीं किया है. तुम सब स्वयं के नाम पर अहंकार को बढ़ावा दे रहे हो. मैंने तुम सब को बार-बार याद कराया था परन्तु एक विशाल अहम् बहुत ख़ुशी देता है. आध्यात्मिक अहंकार, सांसारिक अहंकार, दैवी अहंकार और भी अधिक सुखद लगते हैं. अब मुझे स्वयं ही उस व्यक्ति को ढूँढना पड़ेगा.”

   बीच रात में गुरु उस व्यक्ति के पास गए जो २० वर्ष पहले आया था. वह व्यक्ति २० साल से केवल चावल साफ़ कर रहा था और गुरु ने उसे २० साल से नहीं देखा था. वह नींद से उठा और गुरु को पास खड़े देखकर बोला, “कौन हो तुम?” क्योंकि २० साल पहले….. दीक्षा संस्कार के समय उसने उन्हें कुछ पलों के लिए ही देखा था- “और मेरी नींद खराब करने का क्या कारण है?”

    गुरु बोले, “मैं तुम्हारा गुरु हूँ. तुम भूल गए……..? क्या तुम्हें अपना नाम याद है?”

    वह व्यक्ति बोला, ” यही मेरी समस्या है. आपने मुझे जो काम दिया है उसमें किसी नाम, प्रसिद्धि, पांडित्य या तपस्या की आवश्यकता नहीं है. मेरा कार्य इतना सहज है कि मैं सब कुछ भूल चुका हूँ. मुझे अपने नाम पर भी पक्का विश्वास नहीं है. मेरे ध्यान में कुछ नाम आते हैं पर मैं तय नहीं कर पाता हूँ कि इनमें से कौन सा मेरा नाम है. पर मैं आपका आभारी हूँ.” उसने गुरु के चरण स्पर्श किए और बोला, “कृपया मेरा काम मत बदलिए. सब कुछ भूल जाने के बावजूद मैंने सब कुछ हासिल कर लिया है.”

   “मैंने ऐसे सुकून का अनुभव किया है जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी- ऐसी शान्ति जिसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते. मैंने परमानन्द के ऐसे क्षणों का अनुभव किया है कि अगर मैं मर भी जाऊँ तो मुझे यह शिकायत नहीं होगी कि ज़िन्दगी ने मेरे साथ इन्साफ नहीं किया. मेरे इस काम ने मुझे मेरी योग्यता से कहीं अधिक दिया है. आप बस मेरी नौकरी मत बदलिए. मैं इसे बखूबी निभा रहा हूँ. वैसे क्या किसी ने मेरे काम के बारे में शिकायत की है? ”

    गुरु बोले, “नहीं, किसी ने तुम्हारी शिकायत नहीं की है. पर तुम्हारी नौकरी बदलनी पड़ेगी क्योंकि मैं तुम्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर रहा हूँ.”

     व्यक्ति बोला, “मैं मात्र एक चावल साफ़ करने वाला हूँ. मुझे गुरु या शिष्य होने के बारे में कुछ नहीं पता है. मैं कुछ नहीं जानता हूँ. कृपया मुझे माफ़ कीजिए- मैं आपका उत्तराधिकारी नहीं बनना चाहता क्योंकि मैं इतना बड़ा काम संभाल नहीं सकता हूँ, मैं केवल इस चावल की सफाई कर सकता हूँ.”  

 उस व्यक्ति को प्रेमपूर्वक समझाते हुए गुरु बोले, “तुमने वह हासिल किया है जो अन्य हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. तुमने हासिल कर लिया क्योंकि तुम प्रयास नहीं कर रहे थे. तुम बस अपना छोटा सा काम कर रहे थे. तुम्हारा काम करने के लिए सोच-विचार, भावनाओं, क्रोध, मतभेद, तुलना और आकांक्षा का होना आवश्यक नहीं था और इस कारण धीरे-धीरे तुम्हारा अहंकार ख़त्म हो गया. मनुष्य का जन्म नाम के साथ नहीं होता है. वह अहंकार है जिसे नाम दिया जाता है- यह अहम् की शुरूआत है. तुम्हारा अहम् ख़त्म होने पर तुम अपने गुरु को भी भूल गए क्योंकि वह तुम्हारा अहम् था जो तुम्हें मेरे पास लाया था. उस पल तक तुम आध्यात्मिक रूप से महत्वाकांक्षी यात्रा पर थे. तुम बिलकुल सही व्यक्ति हो इसलिए मेरा चोला, मेरी टोपी और मेरी तलवार लो जो एक गुरु हमेशा से अपने उत्तराधिकारी को देता आया है.”

    गुरु आगे बोले, “पर एक बात का ध्यान रहे: इन्हें लेकर तुम मठ से जितनी दूर भाग सकते हो उतनी दूर भाग जाओ क्योंकि तुम्हारे जीवन को खतरा होगा. यह सब ५०० अहंकारी तुम्हें मार देंगे. तुम इतने सरल हो और इतने मासूम बन गए हो कि अगर यह सभी तुम्हें rice2चोले, टोपी और तलवार के लिए पूछेंगे तो तुम सहज ही दे दोगे. तुम इन्हें लेकर जितनी दूर हो सके पहाड़ों में निकल जाओ. जल्द ही लोग तुम्हारे पास आने लगेंगे जिस प्रकार फूलों के खिलने पर मधुमक्खियाँ फूलों की तरफ रास्ता खोज लेती हैं. तुम अब खिल चुके हो. तुम्हें शिष्यों के बारे में चिंता करने की ज़रुरत नहीं है. एक दूरवर्ती जगह पर जाकर तुम केवल शांत रहो. लोग तुम्हारे पास आएंगे; तुम जो भी करते रहे हो बस वही लोगों को सिखाओ.”

 

 वह व्यक्ति बोला, “लेकिन मैंने कोई विशेष शिक्षा ग्रहण नहीं की है और मुझे नहीं पता कि मैं उन्हें क्या सिखाऊँगा.”

 गुरु बोले, “तुम उन्हें शान्ति व नीरवता से केवल छोटी-छोटी चीज़ें करना सिखाओ, उन्हें सिखाओ कि वह यह कार्य इस संसार या दूसरी दुनिया में कुछ हासिल करने की लालसा से न करें ताकि वह एक बच्चे के समान मासूम बन सकें. यह सादगी ही वास्तविक धार्मिकता है.” 

     सारांश:

   हमें जीवन के हर पल को संजोकर रखना चाहिए और उसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए. अपने लक्ष्य की ओर सतर्कता और जागरूकता होनी चाहिए. यह हमें परम सत्य पर केंद्रित रखती है. मनुष्य को अभिमानी नहीं होना चाहिए और दौलत, रिश्तों, सामर्थ्य व सौंदर्य से आसक्त व उनमें लीन नहीं होना चाहिए. यह सब अस्थायी है. यह हर रोज़ बदलते रहते हैं. समस्त संसार भ्रम से परिपूर्ण है. इसलिए स्थायी की तलाश करने के बजाए अस्थायी में स्वयं को उलझाना मूर्खता है. अतः हमें उस अनंत की तलाश करनी चाहिए जो परम सत्य है और इसके लिए अहंकार का उन्मूलन अति आवश्यक है.   

अनुवादक- अर्चना 

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

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