कुत्ता नहीं शेर बनो 

           

   दक्षिण भारत के एक गाँव में एक व्यापारी रहता था. उसके विवाह के बहुत वर्षों बाद उसके घर में पुत्र का जन्म हुआ. व्यापारी इतना ज़्यादा दौलतमंद था कि उसके पुत्र का लालन-पालन बहुत लाड़ प्यार और हर प्रकार की विलासता में हुआ. उसकी हर इच्छा व आवश्यकता का ध्यान रखा जाता था और उसके पास हर वह वस्तु थी जो दौलत खरीद सकती थी. व्यापारी भी अपने पुत्र से अत्यधिक प्रेम करता था. समय के साथ जब वह बालक बड़ा हुआ तब उसके इर्द-गिर्द ऐसे बहुत सारे मित्र थे जो उसके द्वारा दिए गए उपहार व दावत का आनंद लेते थे.

   विवाह योग्य होने पर उसके लिए अत्यधिक खूबसूरत व धनवान वधुओं के प्रस्ताव आये; उसके जीवन में सब कुछ बहुत ही अच्छा चल रहा था. वह अपने पिता की संपत्ति खर्च करता चला गया और एक दिन उसका दिवालिया निकल गया. उसने अपने दोस्तों से मदद माँगने की कोशिश की परन्तु उसके सभी मित्र उसे टालने लगे.     

  धन नहीं रहने पर, दोस्तों ने भी उसका साथ छोड़ दिया. उसकी पत्नी और बच्चे भी ऐसे इंसान के साथ नहीं रहना चाहते थे जिसके पास कुछ भी न हो. अपनी बुरी आदतों व अवगुणों के साथ अस्वस्थ हालत में उसे अकेला छोड़ दिया गया था. उसके शरीर ने भी ज़्यादा देर साथ नहीं दिया और बीमारी के कारण वह बिस्तर पर पड़ गया. वह मन ही मन सोचने लगा कि किस प्रकार भौतिक वस्तुओं से सम्बद्ध होकर उसने अपना जीवन नष्ट कर लिया था. उसे अहसास हुआ कि उसने स्वयं के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया था और वास्तव में आर्थिक व आध्यात्मिक जीवन में वह बिलकुल विफल था.  

   वह बहुत उदास रहने लगा परन्तु सौभाग्यवश एक घुमंतू संत उसके पास आया. हमारे जीवन में संत प्रभु के अनुग्रह से ही आते हैं.कृपालु संत ने इस व्यक्ति की दयनीय अवस्था देखी और उसे अपने आश्रम ले गए. उनके शिष्यों ने इस व्यक्ति का भली-भाँती ध्यान रखा. जब उसकी तबियत में सुधार हुआ तब उसने आश्रम में रहकर संत की सेवा करने के लिए उनकी अनुमति माँगी.

kutta1

  वह चाहता था कि गुरु उसे कुछ ज्ञान भी प्रदान करें. गुरु कृपालु थे और उन्होंने उसे समझाया, “मेरे बच्चे, “शेर बनो, कुत्ता नहीं.” उस व्यक्ति को समझ नहीं आया कि इस कथन से गुरु का क्या अभिप्राय था. तब गुरु ने समझाया, “जब तुम एक कुत्ते के सामने गेंद फेंकोगे तो वह गेंद के पीछे भागेगा. जब तुम शेर के सामने कुछ फेंकोगे तो उसका ध्यान फेंकी गई वस्तु पर नहीं बल्कि तुम्हारे ऊपर ही रहेगा. वह तुम्हारे ऊपर झपटने के इंतज़ार में रहेगा. इन सभी वर्षों में तुम एक कुत्ते की तरह अपनी संपत्ति, यौवन, पत्नी व बच्चों जैसे अल्पकालिक सुखों के पीछे भागते रहे हो. जीवन के वास्तविक व स्थाई सत्य पर ध्यान केंद्रित करने की तुमने कभी भी कोशिश नहीं की. कम से कम इस का अहसास करो, वह जो शाश्वत है उस पर ध्यान केंद्रित करके उसकी तलाश करो. तुम ज़्यादा खुश रहोगे.”

kutta2kutta3

   वह व्यक्ति गुरु का आभारी था. आश्रम में रहकर सेवा करने और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने से वह पुनः स्वस्थ, खुशहाल व संतुष्ट बन गया. जल्द ही उसे अहसास हो गया कि यह संसार नश्वर है और उसे कुछ उच्चतर की तलाश करनी है जोकि सर्वश्रेष्ठ है.

  वह एक मेहनती व निष्ठावान शिष्य था. उस व्यक्ति में बदलाव देखकर गुरु ने आश्रम के लिए उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. गुरु ने फिर उसे योगीत्व की दीक्षा दी. उस व्यक्ति ने आश्रम का कार्यभार संभाला और अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए अपने सभी शिष्यों को सत्य व विवेक का ज्ञान प्रदान किया. 

  सारांश:

  सांसारिक वस्तुएँ अल्पकालिक होती हैं. यह सत्य नहीं है. हम जो रोज़ अनुभव करते हैं वह सापेक्ष सत्य है. यही हमारे उतार-चढ़ाव और सुख-दुःख का कारण है. इसकी वजह यह है कि यह शाश्वत नहीं है. जब एक बार हमें स्थायी सत्य का अहसास होगा कि हम सब ब्रह्मन हैं; तब संसार हमें प्रभावित नहीं करेगा. हम ऐसा तभी हासिल कर सकते हैं जब हम मनन करेंगे, अपने भीतर देखेंगे और अपने वास्तविक आत्म द्वारा निर्देशित किए जाएंगे.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक- अर्चना    

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s