अच्छी संगत के लाभ

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    एक गुरु ने अपने शिष्य को वह सब सिखाया जितना उन्हें ज्ञात था. सभी धर्मग्रन्थ सिखाने के बाद उन्होंने अपने शिष्य से कहा कि आखिरी सीख के लिए उसे पास के आश्रम में जाना होगा. अंतिम शिक्षा के लिए उन्होंने शिष्य से एक अन्य गुरु के पास जाने को कहा. शिष्य चकित था कि उसके गुरु दूसरे गुरु से अधिक सुशिक्षित होने के बावजूद उसे किसी अन्य गुरु के पास क्यों भेज रहे थे. 

    यद्यपि वह असमंजस में था पर फिर भी उसने अपने गुरु की आज्ञापालन करने का निश्चय किया और दूसरे गुरु को मिलने पास के आश्रम में गया. उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि दूसरे गुरु ने शिक्षा देना बंद कर दिया था. वह अपने शिष्यों को प्रेम से भोजन परोसने, उनका अवशिष्ट भोजन साफ़ करने व बर्तन धोने में मगन थे. 

    दूसरे गुरु का व्यवहार देखकर शिष्य को समझ में आया कि प्रेमपूर्वक सेवा करने का अर्थ क्या होता है. इसके बाद उसने कुछ और अति गंभीर चीज़ देखी. रात में सोने से पहले गुरु ने स्वयं बर्तन धोकर उन्हें सही क्रम में रखा. 

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    अगली सुबह वह बर्तनों को निकालकर, उन्हें पुनः धोकर खाना बनाना शुरू करते थे. शिष्य चकित था कि गुरु को सुबह फिर से बर्तन धोने की क्या ज़रुरत थी जब वह पहले ही रात को उन्हें अच्छी तरह से धो चुके थे और बर्तन गंदे भी नहीं थे. शिष्य ने इस प्रकार सारे विवरणों को ध्यान से देखा और अपने पहले गुरु को उनका बयान देने वापस गया. 

      उसने कहा, “गुरूजी, मैं यह विचित्र बात समझ नहीं पा रहा हूँ कि आश्रम में गुरु पहले से ही धुले बर्तनों को सुबह पुनः क्यों धोते हैं? ऐसा करने का क्या कारण हो सकता है? “   

   गुरु ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं चाहता था कि तुम इसी समझ को ग़ौर से देखो और पूरी तरह से समझो.”

    तुम अपने मनस को नियमित रूप से शुद्ध करते हो परन्तु राह चलते कोलाहल, अस्पष्ट व धूलित बूझ के रूप में तुम्हारा मनस धूल एकत्रित करने लगता है. अब यह मत कहना कि एक बार ध्यान लगाने के बाद तुम रूक जाते हो. जब तक तुम्हारा मनस धूल बटोरता है तब तक उसे लगातार साफ़ करना पड़ता है. यह हमारे मनस को स्वच्छ और शुद्ध करने की निरंतर प्रक्रिया है. 

     सारांश:

    प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य अपने वास्तविक आत्म का बोध करना है और अंत में उस स्त्रोत में विलीन होना है. जब तक हम अपने दैनिक कर्तव्यों, रिश्तेदारियों व अन्य सांसारिक गतिविधियों में बहुत अधिक उलझे रहते हैं; तब तक अपने वास्तविक आत्म के बारे में जानने का न हमारे पास समय होता है और न ही हम मनन करने का कष्ट करते हैं.

   हम स्वयं को हमेशा अपने शरीर और अपने आसपास बनाए संबंधों से जोड़ते हैं. बाद में शरीर के पीड़ित होने पर या फिर इन रिश्तों के छूट जाने पर हम दुखी होते हैं. इसका कारण यह है कि हम जिसके पीछे भागते हैं वह अनस्थिर व नश्वर है. इस तथ्य को समझना सहज नहीं है और इसे कहना आसान है पर करना मुश्किल है. 

  परन्तु सत्संग या अच्छे लोगों की संगत में, विवेकी व्यक्ति हमें कम से कम यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कौन हैं और हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है. एक गुरु या अच्छी संगत के बिना आत्म-बोध के पथ पर आगे बढ़ना आसान नहीं है. अतः आत्म-प्राप्ति के मार्ग पर अच्छी संगत पहला कदम है. यह हम अभी शुरू करेंगे तो पता नहीं कब या कितने जन्मों में अपना लक्ष्य सिद्ध कर पाएंगे. पर कम से कम इस पथ पर हमने यात्रा अवश्य आरम्भ कर दी होगी.

Source: saibalsanskaarhindi.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना 

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