सड़े हुए केले 

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        आदर्श: उचित आचरण 

    उप आदर्श: विलम्ब मत करो 

     नरीमन एक भला इंसान था. वह पूजा में बैठकर भगवान् से संपर्क बनाकर शक्ति व उत्प्रेरणा प्राप्त करता था. वह अपने समय और धन का काफ़ी बड़ा हिस्सा गरीबों की सेवा में लगाता था. जब भी अस्पताल में निःशुल्क चिकित्सा शिविर लगते थे, वह अपनी सेवा अवश्य प्रस्तुत करता था. वह ताज़े फल खरीदकर अस्पताल के गरीब मरीज़ों में बाँटता था और कभी-कभी मज़दूर वर्ग के बस्ती के बच्चों को सिनेमा या आइसक्रीम की दावत देता था. वह सेवा का हर कार्य इस प्रकार करता था मानो वह ईश्वर की सेवा हो. 

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    एक दिन उसने अपने पुत्र से कहा, “बेटा, आज मैं भगवान् को केला चढ़ाने मंदिर जा रहा हूँ. बाद में यह केले मैं भिखारियों में बाँट दूँगा जो मंदिर के बाहर बैठे होते हैं. तुम भी मेरे साथ क्यों नहीं आते? ”

    बालक ने आलस भाव से कहा, “अरे बाबा! यह मंदिर जाना और पूजा करना; यह सेवा का कार्यकलाप …..यह सब मेरे बस का नहीं है. आप बूढ़े हैं, बाबा. यह सब बूढ़े लोगों के लिए होता है. मैं अभी जवान हूँ और मेरी इसमें कोई रुचि नहीं है. शायद आपकी तरह बूढ़े होने पर मैं इस बारे में सोचूँगा… पर अभी नहीं !”

  

  लड़के ने अपने वॉकमेन को पुनः ठीक किया और रैप संगीत की धुन पर झूमने लगा. नरीमन ने अपने पुत्र का कथन सुना पर पलटकर कोई उत्तर नहीं दिया. उसने जाकर अपने वितरण का काम संपन्न किया.

     कुछ दिनों के बाद नरीमन ने अतिपक्व केलों की टोकरी खरीदी और उसे घर के बाहर रखकर नहाने चला गया. 

    नरीमन के पुत्र की नज़र काले केलों पर पड़ी और उसने देखा की केलों पर कीड़े-मकोड़े मंडरा रहे थे. कुछ केले सड़ गए थे और कुछ काफ़ी भद्दे दिख रहे थे. नरीमन स्वच्छ व सफ़ेद कुरता-पैजामा पहनकर आया और केलों को गाड़ी में रखने लगा. पुत्र ने पूछा, ” बाबा, इन केलों को कहाँ ले जा रहे हो?”    

    “मंदिर, “ पिता ने बहुत ही सहजता से उत्तर दिया.

    “लेकिन बाबा, यह केले तो सड़े हुए हैं. मेरा मतलब यदि आपको इन्हें ईश्वर तो अर्पण करना ही था तो कम से कम ध्यान देते कि केले ताज़े हों. यह सब चिपचिपे व नरम हो चुके हैं. इन सब पर कीड़े भी फैल चुके हैं. इन्हें मंदिर में अर्पण करना लज्जाजनक होगा.”

    पिता बोले, “अगर तुम स्वयं को प्रभु को अर्पण करने के लिए अपने वृद्ध होने का इंतज़ार कर सकते हो; अगर तुम्हें लगता है कि वृद्धावस्था में तुम आकर्षक या प्रभु के भोग योग्य रहोगे तो यह पुराने और सड़े हुए केले ईश्वर को अवश्य ही अर्पण किये जा सकते हैं.”

    पुत्र अवाक रह गया. वह बहुत लज्जित था और पिता से आँख नहीं मिला पा रहा था. पिता को मालूम था कि उसका निशाना बिलकुल सही लगा था. नरीमन बोले, “जब तुम जवान व हृष्ट-पुष्ट होते हो, तुम ईश्वर के लिए काम कर सकते हो. तुम अपनी सेवा प्रस्तुत कर सकते हो. तुम ज़रूरतमंद लोगों के लिए समय व धन बचा सकते हो. 

    बूढ़े हो जाने पर तुम्हारे शरीर की अपनी समस्याएँ होंगी. तुम सेवा करने के लिए शायद शारीरिक रूप से स्वस्थ न हो. तुम्हारी आमदानी नहीं होगी, खर्चे कई होंगे और इस कारण आर्थिक रूप से मजबूर होगे. 

     बुढ़ापे में जब तुम गठिया या जोड़ों के सूजन के कारण पूजा में बैठने में असमर्थ होगे तब तुम प्रभु को क्या दे सकते हो? उस समय प्रभु के अनुग्रह की ज़रुरत तुम्हें पहले से कहीं अधिक होगी! ”

     ऐसा कहकर पिता ने सड़े हुए केलों का आखिरी गुच्छा गाड़ी में रखा और चले गए. उसने अपना पक्ष रख दया था और पता है वह कहाँ गया? नरीमन मंदिर नहीं गया क्योंकि उसे मालूम था कि वह केले ईश्वर को अर्पण करने योग्य नहीं थे. वास्तव में वह गोशाला गया जहाँ गुमराह गायें थीं और उसने उन्हें केले खिलाए. सड़े हुए केलों ने अपना काम सिद्ध कर लिया था. 

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   सीख:

   जब हम दूसरों कि मदद करने की अवस्था में होते हैं तब हमें मदद अवश्य करनी चाहिए. हमारी सहायता दूसरों के लिए उपकारी व सार्थक होनी चाहिए. हमें सही समय पर काम करना चाहिए ताकि हमारा काम अर्थपूर्ण हो. हमें अपने कार्य बाद के लिए टालने नहीं चाहिए.

    हमारे समय के एक बहुत ही महान गुरु; श्री सत्य साई बाबा कहते हैं कि, “एक पौधे को सांचे में ढाल सकते हैं परन्तु यदि हम   एक पेड़ को बदलने की कोशिश करेंगे तो वह टूट जाएगा.” साधारणतः जब बच्चे युवावस्था में आते हैं तब वह संसार, व्यवसाय, परिवार इत्यादि में फँस जाते हैं. परन्तु जिन बच्चों को अच्छे जीवन-मूल्य दिए गए होते हैं व ईश्वर से प्रेम करना सिखाया होता है वह कुछ समय के लिए उन्मत्त होने के बावजूद अपने मूल पर वापस अवश्य पहुँचते हैं. अतः हमें प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करके उनका धन्यवाद अदा करना चाहिए. बचपन से ही इस प्रकार का स्वभाव विकसित करने वाले बच्चे ज़्यादा संतुलित और शांत होते हैं और जीवन की चुनौतियों का सामना भली-भाँति कर सकते हैं. वह आर्थिक व आध्यात्मिक रूप से भी अधिक सफल होते हैं.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक- अर्चना 

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