सूअर के रूप में इन्द्र

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   सभी देवताओं के राजा, इंद्र, एक बार आनंद के उपभोग की इच्छा से पृथ्वी पर आए. इंद्र ने सूअर का रूप धारण किया क्योंकि साधारणतः शारीरिक आनंद की दृष्टि से सूअर का रूप सर्वोत्तम माना जाता है. इंद्र ने अपने लिए एक ख़ूबसूरत सुअरिया देखी और उससे शादी करके कई दर्ज़न शिशु पैदा किए. समय के साथ वह उनसे बेहद सम्बद्ध व अनुरक्त हो गए.

    देवताओं ने इसे एक लघु आमोद यात्रा समझकर इंद्र का स्वर्ग में धीरता से इंतज़ार किया. परन्तु जब इंद्र काफ़ी समय तक नहीं लौटे तब देवतागण धरती पर आए और इंद्र की जीवन-शैली देखी. उन्होंने इंद्र से तर्क-वितर्क करने की कोशिश की ताकि वह सूअर का जीवन छोड़कर स्वर्ग वापस लौट जाएं. परन्तु इंद्र अपने जीवन में इतने अधिक संयुक्त व आसक्त थे कि वह घुरघुराकर वहाँ से चले गए.

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    देवताओं ने तब इंद्र के एक शिशु को मारने का निश्चय किया. उन्हें उम्मीद थी कि इस दुखद घटना से इंद्र को अपने वास्तविक स्वरुप का अहसास होगा और वह वापस लौट जाएँगे. परन्तु ऐसा नहीं हुआ. हर एक शिशु के मरने पर इंद्र बाकी के शिशुओं को और अधिक कसकर जकड़ लेते थे. आखिरकार देवताओं ने इंद्र के सभी शिशुओं को मार दिया.

   जल्द ही इंद्र और अधिक शिशु पैदा करने में लग गए.  तब देवताओं को लगा कि इंद्र के मोह का वास्तविक कारण उनकी पत्नी है और इस कारण उन्होंने उसे मार दिया. पत्नी की मौत ने इंद्र को अत्यंत व्याकुल कर दिया. इंद्र का यह हाल देखकर उनके अन्य सूअर दोस्तों व रिश्तेदारों ने उन्हें पुनर्विवाह का सुझाव दिया. और सूअर का समस्त कार्यकलाप पुनः शुरू हो गया. 

   इंद्र की हालत देखकर देवतागण उलझन में पड़ गए. तभी बुद्धिमान ऋषि, नारद, वहाँ से गुज़रे और सारी परिस्थिति देखकर बोले, “आपने उनकी पत्नी और बच्चों को क्यों मारा? उनकी आसक्ति उनके शरीर से है. शरीर का विनाश करो.” अतः देवताओं ने सूअर रुपी इंद्र के शरीर को २ हिस्सों में काट दिया. तब इंद्र शरीर से बाहर आकर बोले, “मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?” और फिर इंद्र स्वर्ग वापस लौट गए.

   शरीर से बंधन बहुत गहरा होता है. यही समस्त मोह का मूल कारण है.

    सारांश: 

   यह जानते हुए कि हमारा शरीर अल्पकालिक है, हमें अपने शरीर से लगाव हो जाता है. यह शरीर, जिसकी आवश्यकताओं का हम इतना ध्यान रखते हैं, सिर्फ तब तक महत्वपूर्ण है जब तक कि उसमें श्वास है. एक बार प्राणशक्ति जब हमारा साथ छोड़ देती है, शरीर मुरझाने लगता है. वही शरीर जिसका इतने अच्छे से ध्यान रखा गया था और जिसे रिश्तेदारों व दोस्तों से इतना प्यार मिला था; प्राणशक्ति के बिना यकायक सबके लिए अनावश्यक बन जाता है. 

   जब शरीर में प्राण थे; वह शिव (ईश्वरत्व की उपस्थिति) था परन्तु शरीर से प्राण निकल जाने पर वही शरीर शव (मृत शरीर) बन जाता है. हमें यह सदैव याद रखना चाहिए और शरीर से बहुत ज़्यादा आसक्त नहीं होना चाहिए.

    इसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि शरीर को तुच्छ समझकर हम उसका ध्यान न रखें. एक सार्थक जीवन व्यतीत करने के लिए हमें अपने शरीर रुपी ‘वाहन’ की देखभाल अवश्य करनी चाहिए. शरीर को एक माध्यम की तरह प्रयोग करके सत्य को समझना चाहिए मगर उससे अनावश्यक रूप से सम्बद्ध नहीं होना चाहिए.

हम जितना अधिक मोह में रहते हैं, उतना ही ज़्यादा सम्बद्ध हो जाते हैं और छोड़ने से डरते हैं. इसके परिणामस्वरूप हमें उतना ही अधिक कष्ट होता है. यह ठीक नहीं है. हमें सशक्त मन का विकास करना चाहिए ताकि हम अनुकूल दोस्ती व रिश्ते बरकरार रख सकें. ऐसा करने से हम ज़रुरत से ज़्यादा सम्बद्ध व पराश्रित नहीं होंगे और स्वयं को पीड़ित होने से बचा पाएंगे. यदि हम हर रोज़ एकांत में बैठकर स्वयं पर प्रभु द्वारा दिए गए समस्त अनुग्रहों का ध्यान करके, उनका आभार प्रकट करेंगे तो हम एक सशक्त मन का विकास कर सकते हैं.

    निरंतर अभ्यास से हम अपने मन को सुदृढ़ कर सकते हैं.

     अनुवादक- अर्चना  

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