जीवन नाशवान है 

     

      एक अमेरिकन पर्यटक एक बार मिस्त्र के काहिरा नामक शहर में एक विख्यात विद्वान से मिलने गया. उस विद्वान के निवास-स्थान पर पहुँचने पर पर्यटक ने पाया कि उसका घर बहुत ही साधारण था और घर में नाम मात्र का फर्नीचर था. कमरे में सिर्फ एक पलंग, एक मेज़ और एक तख़्त था. lotus

     पर्यटक बहुत चकित था और उसने ज्ञानी पुरुष से पूछा, “आपका और दूसरा फर्नीचर कहाँ है? ” पर्यटक को उत्तर देने के बजाय ज्ञानी व्यक्ति ने उससे पूछा, “और तुम्हारा कहाँ है?”

     ‘मेरा? ”   विस्मित पर्यटक ने जवाब दिया. “मैं एक पर्यटक हूँ और मैं केवल देखने आया हूँ; पास से निकलते हुए.”

      तब ज्ञानी पुरुष बोले, “पृथ्वी पर जीवन केवल कुछ समय का ही है…..फिर भी कुछ लोग इस प्रकार जीते हैं जैसे कि वह यहाँ सदा के लिए रहने आए हैं- वह खुश रहना भूल जाते हैं.” “मैं भी केवल गुज़र ही रहा हूँ.”

   सार:

    आदि शंकर बतलाते हैं कि कमल पर पड़ी ओस की बूँद की तरह जीवन नाशवान है. कमल कीचड़दार जल में उगता है परन्तु अपने पास-पड़ोस से अनभिज्ञ रहता है. 

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    पानी की बूँद कमल के पत्ते पर रहते हुए भी उससे असम्बद्ध रहती है. इसी प्रकार हमारा नश्वर जीवन भी बीमारी, शोक, अभिमान व अहंकार से घिरा हुआ है. हमें कमल से सीखना है कि स्वयं को अस्थायी से जोड़े बिना जीवन कैसे बिताना है और वह जो शाश्वत है, उसे तलाशना है. हमें जीवन के अस्थायी रूप को समझकर जीवन का निर्वाह अर्थपूर्ण ढंग से करना चाहिए. केवल नामस्मरण से हम सच्चा प्रेम व ख़ुशी प्राप्त कर सकते हैं और चिरस्थायी सत्य का पता लगा सकते हैं.

  source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com/bal govindam   

अनुवादक- अर्चना 

      

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