बन्दर और मूँगफली

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    यह कहानी बन्दर पकड़ने वालों के बन्दर पकड़ने के बारे में है. एक बन्दर पकड़ने वाले ने किसी पेड़ पर बहुत सारे बन्दर देखे और उन्हें पकड़ने के लिए उसे एक योजना सूझी. 

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    उसने ढेर सारी मूँगफलियाँ लीं और उन्हें एक लम्बे मगर संकीर्ण गर्दन वाले मटके में डालकर उसे पेड़ के नीचे छोड़ दिया. बन्दर यह ध्यान से देख रहे थे. बंदरों को मूँगफलियाँ अत्यंत प्रिय होती हैं अतः वह सब, बन्दर पकड़ने वाले के जाने का इंतज़ार करने लगे. 

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    उसके जाते ही एक बन्दर कूदकर  झटपट नीचे आया और मूँगफलियाँ लेने के लिए उसने अपना हाथ मटके के अंदर डाला. अपने monkey3हाथ में खूब सारी मूँगफलियाँ देखकर वह बेहद खुश था और मूँगफली खाने के लिए झटपट हाथ बाहर निकालने की कोशिश करने लगा. परन्तु वह कितनी भी कोशिश करता, वह अपना हाथ बाहर निकाल नहीं पा रहा था. उसका हाथ मटके की संकरी गर्दन में फँस गया था. बन्दर को मूँगफली इतनी प्रिय थी कि एक बार मुठ्ठी भर लेने के बाद, वह उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं था. इसके परिणामस्वरूप वह हाथ बाहर नहीं निकाल पा रहा था. बन्दर का हाथ फंसा देखकर बन्दर पकड़ने वाला ख़ुशी-ख़ुशी आया और बन्दर को ले गया.

   यदि बन्दर ने मूँगफलियों को छोड़ दिया होता तो वह बच गया होता. परन्तु मूँगफलियों के प्रति लालच व अनुराग ने उसे ऐसा करने नहीं दिया जिसके कारण वह फँस गया और अंततः बन्दर पकड़ने वाले द्वारा पकड़े जाने पर अत्यंत दुखी हुआ.

    सारांश :

    आदि शंकर हमसे हमारे जीवन में समझ व जागरूकता लाने को कहते हैं; प्रेम व अनासक्ति विकसित करने को कहते हैं. धन कमाना निस्संदेह ही आवश्यक है परन्तु उसे उचित ढ़ंग से कमाना चाहिए और इस प्रकार कमाए धन से हमें संतुष्ट रहना चाहिए. मनुष्य को भ्रान्ति, माया व धन के प्रति मोह का त्याग करना चाहिए. मनुष्य जितना ज्यादा आसक्त रहेगा और वस्तुओं पर अपनी पकड़ ढीली करने से इंकार करता रहेगा; उतना ही वह बन्दर की तरह जाल में फंसा रहेगा.

   कहा जाता है, “सभी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त साधन हैं परन्तु सभी की लालसा के लिए नहीं.” लालच मनुष्य को अनुचित माध्यम से उपार्जन करने के लिए विवश करती है और ज़रूरतमंद लोगों की मदद के लिए धन से अलग नहीं होने देती है. जब धन प्रेम, ईमानदारी व सच्चाई से कमाया जाता है तब वह अधिक संतोषप्रद होता है. इसलिए शंकर नसीहत देते हैं; अरे मूर्ख मन! अनासक्ति की भावना का विकास करो, उचित रूप से जीवन व्यतीत करो और गोविन्द की तलाश करो.

   ऐसा केवल धन के लिए ही नहीं बल्कि रिश्तेदारी के लिए भी सत्य है. कई माता-पिता अपने बच्चों से इतने सम्बद्ध रहते हैं कि वह अपने ही बच्चों, जिन्हें वह प्रेम करते हैं, की प्रगति और संवृद्धि का गला घोंट देते हैं. आसक्ति उन्हें अँधा कर देती है. एक बार बच्चे के बड़ा हो जाने पर माता-पिता को उन्हें छोड़ देना चाहिए. माता-पिता को बच्चों से हमेशा प्रेम अवश्य करना चाहिए लेकिन  मददगार रहते हुए ज़रुरत पड़ने पर बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए. ऐसा होने से बच्चों व माता-पिता का रिश्ता ख़ूबसूरत बनता है. दोनों में पारस्परिक सम्मान व प्रेम की भावना क़ायम रहती है और रिश्ते अत्यधिक प्रेम व अधिपत्य के बोझ तले दबते नहीं हैं.  

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

   अनुवादक-अर्चना 

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