अकबर और सूफी संत 

    akbar3

       एक महान सूफी फ़क़ीर (एक मुस्लिम सन्यासी जो पूरी तरह से भिक्षा पर जीता है) ने एक बार सम्राट अकबर से कुछ सहायता की इच्छा रखी. अकबर मुग़ल साम्राज्य के तीसरे सम्राट थे और उन्होंने भारत पर १५५६ से १६०५ तक शासन किया था. 

       वह संत अकबर से मिलने राजमहल गया. जब वह राजभवन पहुँचा, उस समय अकबर पूजा कर रहे थे. अतः फ़क़ीर धैर्यपूर्वक राजा की पूजा समाप्त होने का इंतज़ार करने लगा. फ़क़ीर ने देखा कि अकबर अपने हाथ आसमान की तरफ उठाकर प्रार्थना कर रहे थे तथा ईश्वर से और अधिक दौलत व राजकीय सत्ता के लिए निवेदन कर रहे थे. पूजा समाप्त होने के बाद जब अकबर खड़े हुए तब उन्होंने फ़क़ीर को कमरे से बाहर जाते देखा. अकबर तेज़ी से दौड़े और फ़क़ीर के चरणों में गिरकर उसके वहाँ आने का उद्देश्य पूछा. 

akbar2

       फ़क़ीर बोला, “मैं आपसे कुछ माँगने आया था परन्तु जब मैंने आपको ईश्वर से माँगते देखा तो मैं अचरज में पड़ गया कि एक याचक दूसरे भिखारी को भला क्या दे सकता है. मैं एक भिक्षु हूँ, एक फ़क़ीर, पर आप तो मुझ से भी बड़े भिखारी हैं. मैं केवल भोजन व सांसारिक वस्तुओं के लिए भीख माँगता हूँ. परन्तु आप तो विशालतर चीज़ें जैसे दौलत व कीर्ति के लिए भीख माँगते हैं. आखिरकार हम दोनों ही भिक्षुक हैं. आपसे मदद माँगने के बजाय मैं सीधे ईश्वर से सहायता की याचना करूँगा.”

  अकबर समझ गए और उन्हें अहसास हुआ कि सम्राट होने के बावजूद वह कितने गरीब व असुरक्षित थे.

     सारांश:

   आदि शंकर हमसे प्रश्न करते हैं: हम किस चीज़ की भीख माँगते हैं? हमारी याचना मूर्खतापूर्ण हो सकती है.

     शंकर कहते हैं- मूर्ख- मूढ़मते; अगर भक्ति की गहराई में हम संतृप्ति नहीं ढूँढ़ सकते तो ऐसी भक्ति अर्थहीन है. क्या हमारी भक्ति प्रभु से आदान-प्रदान व्यवस्था का प्रसारण है?

akbar1

    आदि शंकर चाहते हैं कि हम अपेक्षा रहित भक्ति विकसित करें. भक्ति वह प्रेम है जो सत्य का मार्ग दिखाती है. एक सच्चा भक्त यह जानता है और ऐसा अनुभव भी करता है कि मूर्खतापूर्ण मनोकामना से रहित भक्ति अपने आप में निर्भयता है. संसार की बाहरी वस्तुएँ हमारी सुरक्षा नहीं करती हैं; केवल सच्ची भक्ति ही हमारा संरक्षण करती है. 

    यद्यपि संसार में रहकर भौतिक ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता है; परन्तु इसके साथ-साथ ज़रुरत व लालच में अंतर जानने के लिए सच्ची भक्ति बहुत आवश्यक है वरना जीवनभर और अपने अंतिम क्षणों में भी यह हमारी असुरक्षा और अप्रसन्नता का कारण बन जाती है.  

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

  अनुवादक- अर्चना 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s