नन्हे मार्ग पर चलना

       

     आदर्श: प्रेम

    उप आदर्श: सहानुभूति, अनुकम्पा, शुद्ध इरादा 

     एक व्यक्ति ने एक बार स्वप्न में देखा कि वह स्वर्गलोक के द्वार पर खड़ा है. अपने सपने में उसने विविध जीवात्माएं देखीं जो सुनहरे द्वार की ओर जा रही थीं और स्वर्गलोक में प्रवेश होने की अनुमति माँग रही थीं.

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      सुनहरे द्वार पर खटखटाने वाली पहली जीवात्मा एक ज्ञानी पंडित की थी. “मुझे अंदर आने दो” ,पंडित ने स्वर्गलोक के प्रवेशद्वार पर पहरा दे रहे देवदूत से कहा. “दिन-रात पावन शास्त्रों का अध्ययन करने के फलस्वरूप मैंने स्वर्गलोक में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त किया है.”   

      देवदूत बोला, “रूको! हम अपने भौतिक अभिलेखों को देखकर इस बात की जाँच करेंगे कि तुमने शास्त्रों का अध्ययन प्रभु की भक्ति में किया है या सामाजिक सराहना व प्रशंसा के लिए.”

     द्वार पर अगली आत्मा एक धार्मिक पुरुष की थी. “मुझे अंदर आने दो, “उसने देवदूत से कहा. “मैंने कई निराहार व्रत किए हैं.”

     देवदूत बोला, “रूको! हम पहले छानबीन करेंगे कि तुम्हारी मंशा कितनी पवित्र थी.”

    फिर एक बहुत ही साधारण सा व्यक्ति आया और विनम्रता से बोला, “क्या मुझे अंदर आने की अनुमति मिल सकती है?”

    देवदूत ने उससे पूछा, “बताओ तुमने अपनी ज़िन्दगी के साथ क्या किया है.”

    हिचकिचाते हुए वह व्यक्ति बोला, “मैंने अपनी रोटी के कुछ टुकड़े प्रतिदिन एक भ्राता के साथ बाँटे हैं, जो लंगड़ा था और अपनी जीविका कमाने में असमर्थ था. मैं उसका घर साफ़ करता था और हर रोज़ उसके पानी का जग भरता था. मैं भगवान् से प्रार्थना करता था, “प्रिय प्रभु, मुझे उन लोगों का सेवक बनाइए जो पीड़ित व दुखी हैं.”

    देवदूत उस व्यक्ति से बोला, “नश्वर जीवों में तुम सबसे भाग्यवान हो. अपने नन्हे मार्ग पर चलकर तुमने अमरत्व हासिल किया है. स्वर्गलोक के द्वार तुम्हारे लिए खुले हैं.”

      सीख:

     दरिद्र व ज़रूरतमंदों की मदद करना, प्रभु के योग्य अधिकारी होने के समान है. मानव सेवा माधव सेवा है. गरीब व ज़रूरतमंद में प्रभु को देखो.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

      अनुवादक- अर्चना 

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