पदचिन्हों की प्रार्थना 

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       आदर्श: प्रेम

   उप आदर्श: विश्वास, प्रभु की इनायत 

    एक रात मैंने एक सपना देखा…….मैंने देखा कि समुद्रतट के किनारे मैं प्रभु के साथ टहल रहा था और आसमान में हर तरफ मेरे जीवनकाल की विभिन्न घटनाएँ प्रदर्शित हो रही थीं. प्रत्येक घटना के दौरान मैंने रेत पर पदचिन्हों के दो जोड़े देखे : जिसमें से एक मेरा था और दूसरा प्रभु का. foot4जब मेरे जीवन की अंतिम घटना प्रसारित हो रही थी, मैंने मुड़कर रेत पर पड़े पदचिन्हों को देखा. मैंने पाया कि मेरे जीवन की राह में कई बार पदचिन्हों का केवल एक ही जोड़ा था. पदचिन्हों के एक जोड़ों को गौर से देखने पर मुझे अहसास हुआ कि ऐसा मेरे जीवन के सबसे अधिक दुखद व उदासीन समय में था. पदचिन्हों का एक जोड़ा देखकर मैं बहुत परेशान था और मैंने इस विषय में प्रभु से प्रश्न किया. 

 “प्रभु, आपने कहा था कि एक बार जब मैं आपका अनुसरण करने का निश्चय करूँगा तब आप सदा मेरे साथ रहेंगें;  परन्तु मेरे जीवन की सबसे अधिक कष्टप्रद परिस्थितियों में मैंने पदचिन्हों का केवल एक ही जोड़ा देखा है. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि जब मुझे आपकी सबसे अधिक ज़रुरत थी, आपने मेरा साथ क्यों छोड़ दिया.”

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   प्रभु ने उत्तर दिया, “मेरे प्रियतम व अनमोल बच्चे. मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हारे मुसीबत व आपत्ति के समय में मैं कभी भी तुम्हारा साथ नहीं छोडूँगा. तुमने जब-जब पदचिन्हों का एक जोड़ा देखा है तभी वह समय था जब मैंने तुम्हें अपने पास उठाया हुआ था.”

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     सीख:

    भगवान् के प्रति आस्था, प्रेम व निष्ठा रखने से वह कभी भी हमारा त्याग नहीं करते हैं. वह हमारी परेशानियाँ पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं करते परन्तु कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए पर्याप्त साहस व सहारा अवश्य देते हैं. वह हमारा मार्गदर्शन करते हैं और दुःख व आपत्ति के समय में हमें सँभालते हैं.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

    अनुवादक- अर्चना    

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