गाँव वाला और एक सुखी व्यक्ति 

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     आदर्श: शांति 

    उप आदर्श: मन को शांत करना

     एक घाटी के छोटे से गाँव में एक व्यक्ति रहता था जो सदा खुश रहता था और सब के प्रति दयालु व सहानुभूतिशील रहता था. वह हमेशा मुस्कुराता रहता था और जब भी ज़रुरत होती थी सदा विनम्र व उत्साहपूर्वक शब्द बोलता था. उससे मिलने के बाद सभी खुश हो जाते थे. लोगों को उस पर भरोसा था और सभी उसे अपना विशेष मित्र समझते थे. 

    एक ग्राम वासी इस व्यक्ति के हमेशा खुश रहने के रहस्य को जानना चाहता था. वह हैरान था कि कैसे इस व्यक्ति के मन में किसी के भी प्रति द्वेष नहीं था और वह सदा प्रसन्नचित्त रहता था.

    एक बार यह जिज्ञासु व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को राह चलते मिल गया और उससे पूछा, “हमारे आसपास अधिकतर लोग स्वार्थी व असंतुष्ट हैं. तुम्हारी तरह वह हर समय मुस्कुराते नहीं हैं; और न ही तुम्हारी तरह वह मेहरबान व मददगार हैं. इसका क्या कारण है?”   

   उसने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “जब तुम अपने अंदर शांति स्थापित करते हो, तुम समस्त विश्व के साथ शान्ति कायम कर सकते हो. अगर तुम अपनी अंतरात्मा को पहचान सकते हो, तुम सबके भीतर की आत्मा को भी पहचान लोगे और तब सबके प्रति दयालु व विनम्र होना तुम्हें स्वाभाविक प्रतीत होगा. यदि तुम्हारे विचार तुम्हारे नियंत्रण में हैं तो तुम प्रबल व सुदृढ़ बनोगे. तुम्हारा व्यक्तित्व एक रोबोट के समान है जो कुछ नियत कार्य करने के लिए योजनाबद्ध होता है. तुम्हारे विचार व स्वभाव साधन हैं जो तुम्हारे व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. इनसे स्वयं को स्वाधीन करने पर तुम्हारे भीतर की अच्छाई व ख़ुशी प्रकट होगी.”

    अपने साथी की बात सुनकर ग्रामवासी शोक प्रकट करते हुए बोला, “पर उसके लिए बहुत सारा कार्य करना पड़ेगा. हमें अच्छी व अनुकूल आदतें विकसित करनी पड़ेंगी. ध्यान केंद्रित करने तथा विचारों को नियंत्रित करने की क्षमता सुदृढ़ करनी होगी. सफल होने के लिए कार्य कठिन व अनंत हैं. बहुत सारी बाधाएं पार करनी पड़ेंगी. यह कोई सरल कार्य नहीं है.”  

    “कठिनाइयों के बारे में मत सोचो वरना तुम सब कुछ वैसा ही देखोगे और उसी प्रकार से अनुभव करोगे. अपनी भावनाओं व विचारों को शांत करो और इसी शान्ति की अवस्था में स्थिर रहने की चेष्टा करो. तुम केवल निश्चल रहो और अपने विचारों को स्वयं पर हावी मत होने दो.”

   “मुझे बस इतना ही करना है? ” ग्रामीण ने पूछा. 

   “अपने विचारों पर विशेष निगरानी रखो और ध्यान दो कि वह कैसे आते और जाते हैं. इससे उत्पन्न शांति में स्थिर रहो. शुरूआत में शांति के पल संक्षिप्त होंगे पर समय के साथ यह पल लम्बे समय तक बरकरार रहेंगे. यह शान्ति शक्ति, सामर्थ्य, करुणा और प्रेम है. समय के साथ तुम्हें अपनी और सर्वव्यापी शक्ति में एकता का अहसास होगा और यह तुम्हें एक अलग ही दृष्टिकोण से काम करने का रास्ता दिखाएगा. यह नया पहलू स्वार्थी व संकुचित अहम् का नहीं होगा बल्कि चेतना का होगा. ”

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   ग्रामवासी बोला, “मैं तुम्हारा कथन याद रखने की कोशिश करूँगा. पर मैं एक और बात को लेकर उत्सुक हूँ. ऐसा प्रतीत होता है कि तुम परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते हो. तुम्हारे पास सबके लिए विनम्र वचन हैं और तुम सदा सहायक रहते हो. लोग तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और तुम्हारी अच्छाई का कभी शोषण नहीं करते हैं.”  

     “ज़रूरी नहीं है कि अच्छा व हितैषी होना कमज़ोरी का संकेत है. एक अच्छे व्यक्ति होने के साथ तुम सशक्त भी बन सकते हो. लोग तुम्हारी भीतरी शक्ति महसूस कर लेते हैं और इस कारण तुम पर हावी नहीं होते हैं. जब तुम सशक्त व भीतर से शांत होते हो, तुम दूसरों की मदद करते हो क्योंकि तुम सहायता करना चाहते हो और मदद करने की सक्षमता रखते हो. तुम निर्बलता से नहीं बल्कि शक्ति के फलस्वरूप काम करते हो. अच्छाई दुर्बलता का प्रतीक नहीं है जैसा कि कुछ लोगों की ग़लतफहमी है. ताकत व क्षमता से साथ भी अच्छाई  ज़ाहिर की जा सकती है.”

  “तुम्हारे उपदेश व स्पष्टीकरण के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद” , ग्रामीण बोला और खुश व संतोष होकर घर लौट गया.

   सीख:

    हमें स्वयं में विश्वास रखना चाहिए और सही कार्य काने के लिए भीतरी शक्ति व आस्था विकसित करनी चाहिए. मन की शान्ति के फलस्वरूप अन्य आदर्श जैसे प्रेम व धार्मिकता भी प्रदर्शित होते हैं.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना 

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