ध्यान रखने वाला बेटा

      son

       आदर्श: उचित आचरण 

   उप आदर्श: सम्मान, प्रेम 

    एक बेटा अपनी बूढ़ी माँ को एक शाम खाने के लिए रेस्टोरेंट ले गया. माँ बुज़ुर्ग व कमज़ोर थी और इस कारण खाना खाते समय उससे खाना उसके कपड़ों पर गिर गया. अन्य भोजन करने वाले लोग उसे घृणापूर्ण निगाहों से देखने लगे पर पुत्र शांत था.

    माँ ने जब खाना ख़त्म कर लिया तब बेटा बिलकुल भी लज्जित नहीं था.वह माँ को धीरे से शौचघर ले गया, उसके कपड़ों से खाने के कण पोंछे, दाग साफ़ किए, उसके बाल ठीक किए और उसे चश्मा ठीक से पहनाया. जब माँ और बेटा शौचघर से बाहर निकले तो समस्त रेस्टोरेंट उन्हें अचूक ख़ामोशी से देख रहा था. वहाँ मौजूद सभी लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि इस प्रकार खुले आम कोई स्वयं को कैसे लज्जित कर सकता है.

 पुत्र ने बिल का भुगतान किया और माँ के साथ बाहर जाने लगा. 

 तभी भोजन करने वालों में से एक वृद्ध पुरुष ने बेटे को बुलाया और उससे पूछा, “तुम्हें नहीं लगता कि तुम कुछ छोड़कर जा रहे हो?”

   पुत्र ने उत्तर दिया, “नहीं महाशय! ”

  वृद्ध पुरुष ने प्रत्त्युतर दिया, “हाँ, तुमने छोड़ा है. तुमने प्रत्येक पुत्र के लिए एक सीख और हर माँ के लिए उम्मीद छोड़ी है.”

   रेस्टोरेंट में सन्नाटा छा गया.

    सीख:

  जब हमारे माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं तब हमें उन्हें भूलना नहीं चाहिए. हमें उनके रूप व व्यवहार को लेकर कभी भी शर्मिंदा नहीं होना चाहिए. हमें हमारे माता-पिता, खासतौर से माँ, के समान कोई भी और निस्स्वार्थ भाव से प्यार नहीं कर सकता है. हमें सदा उनके प्रति कृतार्थ रहना चाहिए और उन्हें प्रेम व सम्मान देना चाहिए.

son1

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

  अनुवादक- अर्चना    

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s