गुरु का प्रिय 

                guru

        आदर्श: उचित आचरण

    उप आदर्श: सकारात्मकता, प्रभु को समर्पण 

     एक समय किसी जंगल में अंगिरस नामक एक महान ऋषि रहते थे. उनके बहुत सारे शिष्य थे. उन सभी ने ऋषि के ज्ञान व विवेक से काफी लाभ उठाया था. ऋषि के शिष्यों में कुछ शिष्य ऐसे थे जो दूसरों की अपेक्षा अधिक सक्षम थे और अपने गुरु की सीख का ध्यानपूर्वक अनुसरण करते थे. अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण अन्य शिष्य उनका सम्मान करते थे. 

     परन्तु कुछ मूर्ख शिष्य अपने प्रतिभावान साथियों से धीरे-धीरे ईर्ष्या करने लगे. हालांकि अपने गुरु की शिक्षा को मंद गति से सीखने के लिए वह स्वयं ज़िम्मेवार थे परन्तु वह अपने गुरु की निष्पक्षता पर संदेह करने लगे. उन्हें ऐसा लगने लगा कि गुरुजी अपने प्रतिभावान शिष्यों को गुप्त रूप से विशेष शिक्षा प्रदान कर रहे थे. 

     एक दिन जब गुरुजी अकेले थे तब यह मंदबुद्धि शिष्यों का गुट उनके पास गया और बोला, “गुरुजी! हमें ऐसा लगता है कि आप हमारे प्रति अन्यायी हैं. हमारी समझ से आप अपने ज्ञान का सम्पूर्ण लाभ केवल कुछ चुनिंदा शिष्यों को ही देते हैं. इस प्रकार के विशेषाधिकार आप हमें भी क्यों नहीं दे सकते?”

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     इस प्रकार के शब्द सुनकर गुरु कुछ अचंभित थे पर उन्होंने धीरतापूर्वक उत्तर दिया, “मैंने हमेशा तुम सब के साथ एक समान व्यवहार किया है और कभी किसी के प्रति कोई पक्षपात नहीं किया है. यदि तुममें से कुछ शीघ्र प्रगति करते हो तो उसका एकमात्र कारण मेरी शिक्षाओं पर ध्यानपूर्वक अमल करना है. तुम्हें पहलकदमी करने से किसने रोका है?” 

   परन्तु शिष्य अपने गुरु की बात से सहमत नहीं थे. अतः कुछ देर सोचने के बाद गुरु बोले, “ठीक है, तुममें से जिन्हें शिकायत है, मैं उन पर विशेष ध्यान दूँगा पर एक शर्त पर. मैं तुम्हें एक सामान्य सी सरल परीक्षा दूँगा और तुम्हें उसमें उत्तीर्ण होना होगा. तुम्हारी परीक्षा यह है कि पास के गाँव में, जहाँ तुम अक्सर जाते हो, जाकर एक अच्छा व्यक्ति मेरे पास लेकर आओ.”

     शिकायत करने वाले शिष्य बहुत खुश थे कि इतनी सरल सी परीक्षा का इनाम इतना अमित होगा. उन्होंने तुरंत अपने गुट का प्रतिनिधि चुना जिसने पूरे जोश व उत्साह के साथ खोज शुरू कर दी. गुट के सभी शिष्यों को पूरा विश्वास था कि उनका प्रतिनिधि अवश्य ही एक अच्छे व्यक्ति को ढूँढ निकालेगा. परन्तु दुर्भाग्यवश वह जहाँ भी गया और जिससे भी मिला, सभी ने कोई न कोई अपराध या कुकर्म किया हुआ था. लम्बी व निरर्थक खोज के बाद, पूर्णतय निराश होकर वह अपने गुट व गुरु के पास वापस लौटा और हताशपूर्ण स्वर में बोला, “गुरुजी, यह बताते हुए मुझे बहुत खेद हो रहा है कि पूरे गाँव में एक भी अच्छा व्यक्ति नहीं है. सभी ने बुरा कर्म, अपराध या अनैतिक काम किया हुआ है. समस्त गाँव बुरे व्यक्तियों से भरा हुआ है.”

   “ओह! ऐसी बात है?” गुरु ने नकली खेद करते हुए कहा. “अब मैं उस गाँव में दूसरे गुट से एक शिष्य को भेजता हूँ जिससे तुम्हें शिकवा है.”

   गुरु ने दूसरे गुट के एक शिष्य को बुलाया और बोले, “निकट के जिस गाँव में तुम्हारा यह साथी गया था, क्या तुम वहाँ जाकर अपने साथ एक बुरा व्यक्ति ला सकते हो?”

    शिष्य बोला, “गुरुजी, आपके आशीर्वाद से मैं कोशिश करूँगा.” ऐसा कहकर वह वहाँ से चला गया. 

    शिकायत करने वाले शिष्य एक बार पुनः चकित थे और गुरुजी से बोले, “इस बार भी आपने हमारे साथ बेइंसाफी की है. वह गाँव बुरे व्यक्तियों से भरा हुआ है अतः आपका वह शिष्य निस्संदेह अनेकों बुरे व्यक्ति लेकर आएगा.”  

    गुरु ने सभी शिष्यों को धीरज रखने का सुझाव दिया.

    कुछ समय के बाद जब अन्य गुट का शिष्य भी खाली हाथ लौटकर आया तो शिकायत करने वाला गुट बहुत ही हैरान व चकित हुआ. शिष्य ने गुरु को प्रणाम किया और बोला, “गुरुजी! आपको निराश करने के लिए माफ़ी चाहता हूँ. मैंने समूचा गाँव ढूँढा पर मुझे एक भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला.”

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   अपने साथी की उक्ति सुनकर शिकायत करने वाला गुट खूब ज़ोर से हँसा. 

   पर दूसरे गुट के शिष्य ने अपने कथन की व्याख्या करते हुए कहा, “गाँव के प्रत्येक वासी ने कोई न कोई अच्छा कार्य अवश्य किया है. मेरी असफलता के लिए मुझे क्षमा कीजिए.” ऐसा कहकर उसने गुरु की अनुमति ली और वहाँ से चला गया. 

   शिष्य के जाने के बाद गुरु अपने स्तंभित व चकित शिकायत करने वाले शिष्यों से बोले, “मेरे प्रिय भक्तों! हमारा विवेक अच्छा व बुरा, सही व गलत, सकारात्मक व नकारात्मक में भेद करने की क्षमता रखता है. जब हम हर चीज़ में अच्छाई की चिंगारी देखते हैं तब हमारे विवेक का और अधिक विकास होता है. इसके विपरीत दूसरों में खोट देखने पर हमारा विवेक मुरझा जाता है. 

     सीख: 

   यह संसार खुशी व दुःख का मिश्रण है. जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमारे विवेक पर निर्भर करता है. जीवन में सकारात्मक प्रवृत्ति रखने वाले लोग शीघ्र प्रगति करते हैं और नकारात्मक प्रवृत्ति रखने वाले, यदि अग्रसर होते हैं तो, बहुत ही धीमी गति से होते हैं. गुरु के लिए सभी निकट व प्रिय हैं. यदि शिष्य स्वयं को गुरु से दूर पाता है तो उसमें दोष शिष्य का ही है. 

   “तुम जितना स्वयं को और मुझे एक समझोगे, तुम्हारा विकास भी उतना ही होगा. तुम्हारे सारे कर्म इसी मूलभूत समझ के अनुरूप होने चाहिए.”

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना   

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