हमारे बनाए खाने पर हमारे विचार प्रभाव डालते हैं

food1

   आदर्श: धार्मिकता 

  उप आदर्श: विचारों में शुद्धता 

   मैसूर राज्य में मलूर नामक स्थान पर एक धार्मिक ब्राह्मण रहता था जो एक महान विद्वान् था. उसकी पत्नी भी उसी के समान धार्मिक थी. वह सदा पूजा और जप-ध्यान के लिए तत्पर रहता था और अपने सच्चरित्र के लिए दूर-दूर तक प्रख्यात था. एक दिन नित्यानंद नामक संयासी उसके दरवाज़े पर भिक्षा माँगने आए.

food4

संयासी को अपने घर देखकर ब्राह्मण अत्यंत खुश हुआ. उसने संयासी को अपने घर अगले दिन भोजन करने का आमंत्रण दिया ताकि वह अपने अतिथि-सत्कार से उसका सम्मान कर सके. संयासी के स्वागत के लिए ब्राह्मण ने अपने घर के दरवाज़ों पर हरे रंग की तोरण लगाई और अन्य विस्तृत व्यवस्था की. परन्तु आखिरी समय में किसी कारणवश उसकी पत्नी अपने माननीय अतिथि के लिए खाना बनाने में समर्थ थी. एक पड़ोसी महिला ने स्वेच्छा से ब्राह्मण के घर खाना बनाने में अपनी मदद पेश की. ब्राह्मण की पत्नी ख़ुशी-ख़ुशी पड़ोसी को अपने घर लेकर आई और रसोईघर से परिचित कराया.

food2food3.png

    अगले दिन सब कुछ भली भाँती निबट गया और सभी भोजन की व्यवस्थाओं से प्रसन्न और संतुष्ट थे. केवल, किसी कारणवश भोजन के दौरान संयासी अपनी प्लेट के पास रखे चांदी के कटोरे को चुराने की अत्यधिक तीव्र इच्छा के शिकार हो गए. अपनी सर्वश्रेष्ठ सचेत कोशिशों के बावजूद वह बुरा भाव नित्यानंदजी पर हावी हो गया और कटोरे को अपनी पोशाक में छुपाकर वह झटपट घर लौट आए. अपनी इस हरकत के बाद संयासी रात भर सो नहीं पाए क्योंकि उनकी अंतरात्मा उन्हें लगातार कोस रही थी. संयासी को लगा कि उन्होंने अपने गुरु का अपमान किया है और उन सभी ऋषिओं का निरादर किया है जिनका उन्होंने, मन्त्र उच्चारण करते समय, आह्वान किया था. वह तब तक बेचैन रहे जब तक कि उन्होंने ब्राह्मण के घर वापस जाकर, उसके पैरों में गिरकर और आँखों में पश्चाताप के आँसू लेकर चांदी का कटोरा वापस नहीं कर दिया. 

food5

   सभी हैरान थे कि नित्यानंद जैसा महात्मा इतना नीचे कैसे गिर सकता था. किसी ने सुझाव दिया कि संभवतः यह दोष खाना बनाने वाले व्यक्ति के माध्यम से भोजन में संचारित हुआ होगा. तत्पश्चात खाना बनाने वाली पड़ोसी की जीवनी का विवरण किया गया और लोगों ने पाया कि वह एक अदम्य चोर थी. अतिसूक्ष्म संपर्क द्वारा उस महिला की चोरी करने की प्रवृत्ति ने उसके पकाये खाने को प्रभावित किया था. इसी कारण साधकों को उपदेश दिया जाता है कि एक निश्चित अवस्था पर पहुँचने तक उन्हें फल व कंद पर ही जीवन निर्वाह करना चाहिए.

     सीख:

   ऐसा कहा जाता है कि जब भोजन प्रेम व अनुकूल विचारों से बनाया जाता है तब वह गुणकारी होता है और स्वाद में सर्वश्रेष्ठ होता है.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s