पंचकोष

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      आदर्श:      शाश्वत सत्य 

   उप आदर्श: पवित्रता, शुद्धता 

    कई वर्ष पूर्व जब गुरुकुल प्रणाली प्रचलित थी उस समय भृगु नाम का एक व्यक्ति था. एक योग्य गुरु की देखरेख में कई वर्षों तक विद्या अर्जित करने के बाद वह घर लौटा. घर वापस लौटने पर उसका खूब धूमधाम से स्वागत हुआ. इस सबके बाद उसके पिता, वरुण, ने उससे पूछा, “तुम्हारा मूलभूत सत्य क्या है?”  

   कुछ समय सोचने के बाद पुत्र बोला,”क्षमा कीजिए, पिताजी, मेरे गुरु ने यह कभी नहीं सिखाया.”

   इस पर पिता बोले, “यदि तुम मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकते तो तुम्हारी शिक्षा अधूरी है.”

   स्तब्ध भृगु बोला, “मुझे क्या करना चाहिए? मैं अपनी शिक्षा कैसे सम्पूर्ण कर सकता हूँ, पिताजी? ”

   वरुण धीरता से बोले, “तपस्या! शिक्षा प्राप्त करने का यह सर्वश्रेष्ठ तरीका है. जंगल जाकर तपस्या करो, प्रिय पुत्र. तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा.”

     जंगल में कुछ समय तपस्या करने के बाद पुत्र ने सोचा कि उसे उत्तर मिल गया है. अतः अपने पिता के पास वापस लौटकर उसने कहा, “पिताजी, मेरा शरीर मूलभूत सत्य है- अन्नमय कोष. अगर शरीर स्वस्थ है और सभी अंग ठीक से काम कर रहे हैं तो कुछ भी और सब कुछ संभव है. रोगग्रस्त शरीर से मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूँ.”

     पुत्र का उत्तर सुनकर पिता बहुत हताश हुए और उससे अपनी निराशा व्यक्त करते हैं.

     उचित उत्तर की तलाश में पुत्र फिर से जंगल जाकर तपस्या करता है.

    कई वर्षों तक तपस्या करने के बाद भृगु घर वापस लौटता है. “पिताजी, मैं बिल्कुल गलत था. एक शरीर मात्र से मैं क्या कर सकता हूँ? शरीर में मुझे प्राण भी चाहिए. शरीर में शक्ति के प्रवाह के लिए प्राण का होना अनिवार्य है. अतः यह प्राणमय कोष           है जो महत्वपूर्ण है.”

    पिता पुनः निराश होते हैं. “नहीं पुत्र, वापस जाओ और इस बार मुझे सही उत्तर लाकर दो, ” वरुण बोले.

   और अधिक कठोर तपस्या के बाद भृगु एक बार फिर वापस लौटता है और पिता से कहता है, “पिताजी, मैं गलत था. केवल प्राण ही महत्वपूर्ण नहीं हैं. सदा उचित मानसिक स्थिति का होना भी आवश्यक है. मेरा मस्तिष्क इतना प्रशिक्षित होना चाहिए कि मैं स्वयं को सदा एक संतुलित व्यक्ति बनाए रख सकूँ. यह मनोमय कोष है. 

   वरुण ने उदास भाव से कहा, “पुत्र, तुम्हें नहीं लगता कि अब समय आ गया है कि तुम सही उत्तर लेकर आओ.”  

  भृगु ने एक बार फिर से तपस्या की और कदाचित सही उत्तर लेकर प्रसन्नतापूर्वक वापस लौटा. 

   “पिताजी, पिताजी, अंततः मैंने आपके प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ निकाला. मुझमें मौलिक सत्य यह है कि मुझे सही व गलत से परिचित होना चाहिए. मुझे इस बात की जानकारी अवश्य होनी चाहिए. यह विज्ञानमय कोष है. मैं सही हूँ न, पिताजी?” भृगु ने व्यग्रता से पूछा. 

    “नहीं” , पिता ने स्पष्ट रूप से कहा. “तुम्हें चार अवसर देने के बाद भी हर बार गलत उत्तर सुनकर मैं बहुत निराश हूँ. तुम इसे भूल जाओ; और इंतज़ार करो. एक दिन शायद तुम्हें स्वयं ही सही उत्तर का आभास होगा.”

   “नहीं पिताजी, मुझे एक आखिरी मौका दीजिए. जितना आपको सही उत्तर जानना है उतनी ही मुझे भी सही उत्तर जानने की इच्छा है. कृपया मुझे एक और अवसर की अनुमति दे दीजिए.” 

   स्पष्टतः इस बार पिता को अपने पुत्र की वापसी के लिए ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ा. पुत्र को अपने पिता की अपेक्षा से अधिक समय लग रहा था. भृगु को जंगल में गए दस वर्ष से भी अधिक हो चुके थे और पिता को अब पुत्र की सलामती को लेकर चिंता हो रही थी. पुत्र की खोज में वरुण जंगल की ओर निकल पड़े. जंगल में पुत्र की खोज के दौरान उन्होंने देखा कि एक उज्जवल रोशनी चारों दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी. वरुण रोशनी की दिशा में चलने लगे और कुछ दूर चलने के बाद उस स्थान पर पहुँचे जहाँ से रोशनी आ रही थी. वहाँ का दृश्य देखकर वरुण मिश्रित भावनाओं से घिर गए. एक ही समय में वह उल्लसित, विस्मित, उदास, आनंदित, प्रमुदित, गर्वित व हैरान थे. उन्होंने पाया कि एक व्यक्ति पद्मासन में बैठा हुआ था और उसके हाथ ध्यान मुद्रा में थे. वह रोशनी वास्तव में उसके दैवी शरीर से उत्पन्न हो रही थी. उसका तेजस हज़ारों सूर्यों के बराबर था. वह निःसंदेह संसार का सबसे अधिक संतुष्ट व्यक्ति था. उसपर एक नज़र ही किसी भी व्यक्ति को हर्ष, आनंद व संतोष से भर देने के लिए काफ़ी थी. यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि भृगु था जो अपने पिता के प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ने के लिए तपस्या करने निकला था. पुत्र को इस अवस्था में देखकर वरुण ने धीरे से अपनी आँखें पोंछीं, अपने पुत्र को पूर्ण आदर के साथ झुककर प्रणाम किया और घर वापस लौट आए.

      उन्हें ठीक मालूम था कि उनके पुत्र ने उत्तर समझ लिया था. उन्हें पता था कि भृगु उत्तर में इतना मगन था कि वह अपने पिता के पास वापस लौटकर उन्हें मौलिक सत्य के बारे में बताना भूल गया था. उसने आनंदमय कोष पर निपुणता प्राप्त कर ली थी. उसने समझ लिया था कि पहले चार कोष कितने मिथ्या व कमजोर थे और आनंदमय कोष कितना यथार्थ था. उसने समाधि स्थिति सिद्ध कर ली थी. वह सम्पूर्ण आनंद में, परमानंद में संयुक्त था.   

     सीख:

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    अन्नमय कोष: यह पाँचों कोषों में सबसे भौतिक व अंतरतम कोष है. हम जो भोजन करते हैं वह इस कोष का पोषण करता है. गुणकारी प्राकृतिक आहार व यौगिक साधना के कारण ही हमारा शरीर स्वस्थ व निरोग रहता है.

    प्राणमय कोष: यह द्वितीय कोष है और अन्नमय कोष से अधिक बड़ा व सूक्ष्म है. जो वायु हम शरीर में लेते हैं और शरीर से बाहर छोड़ते हैं वह शक्ति का स्त्रोत है. इस कोष की तंदरुस्ती भी स्वस्थ शरीर का भाग है. विकसित प्राणमय कोष के कारण ही शरीर में शक्ति का प्रवाह ठीक रहता है. 

   मनोमय कोष: इस कोष में हमारे मन के भावात्मक व बोधात्मक पहलू शामिल हैं. हमारे विचार इस कोष का आहार हैं. सुविकसित मनस सकारात्मक सोचविचार व निश्चयात्मक शक्ति का प्रतीक है.

     विज्ञानमय कोष: यह कोष सचेत अवस्था में बुद्धिमत्ता को दर्शाता है. यह कोष सही व गलत, अस्थायी व शाश्वत, निर्णय लेने की योग्यता, सत्य व मिथ्या, पीड़ा व ख़ुशी में भेद करने के सामर्थ्य से बना है.

     आनंदमय कोष: सभी कोषों में आनंदमय कोष सबसे अधिक बड़ा, सबसे बाहरी और सबसे अधिक सूक्ष्म है. इसकी व्याख्या करना या इसे समझना सबसे अधिक कठिन है. यह स्वाभाविक आनंद व हर्ष की अवस्था है. यह कोष अनुभवातीत शरीर है. आनंद स्वयं ब्रह्मा का अवतरण है. वह परमानन्द का अपरिमित स्त्रोत है. केवल इसी अवस्था में साधक परमात्मा से पूर्णतया सम्बद्ध रहता है. उसे कोई भी चीज़/ परिस्थिति उदास नहीं कर सकती और केवल इसी में उसकी ख़ुशी संयुक्त होती है. इस अवस्था में साधक अंतरिक्ष व समय जैसी मिथ्या धारणा से सीमित नहीं रहता है.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

     अनुवादक- अर्चना  

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