आलोचना के प्रति सही मनोभाव 

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      आदर्श: उचित आचरण 

  उप आदर्श: सही नज़रिया

  हज़रत मुहम्मद का अली नामक एक शिष्य था. हज़रत मुहम्मद के अन्य शिष्य अक्सर अली की आलोचना करते थे पर अली धीरता ali3से बर्दाश्त करता था. एक दिन अपने मालिक की उपस्थिति में दूसरों ने अली की निंदा की; काफी समय तक धैर्ययुक्त व सहनशील रहने के बाद आख़िरकार अली अपने प्रतिरक्षा के लिए खड़ा हुआ. अली के ऐसा करते ही, हज़रत मुहम्मद तुरंत वहाँ से चले गए. अली ने मालिक का अनुगमन किया और उनसे पूछा, “मालिक, जब दूसरों ने मेरी आलोचना करनी आरम्भ की तब आप वहाँ से चले क्यों आए? आपने ने मेरा समर्थन क्यों नहीं किया?”

  हज़रत बोले, “मैंने देखा कि जब तक तुम मौन थे तब तक तुम्हारे पीछे १० फरिश्ते खड़े थे और तुम्हारी रक्षा कर रहे थे; लेकिन जैसे ही तुमने अपनी वक़ालत करनी शुरू की, उसी क्षण फरिश्ते लुप्त हो गए और मैं भी वहाँ से चला आया.” 

  सीख:

    यह ज़रूरी नहीं है कि फरिश्ते मानव शरीर में हों. फरिश्ते आनंद, धैर्य, सहनशीलता तथा क्षमा के रूप में भी विद्यमान हो सकते हैं. जब हम पलट कर हमला करते हैं तब हम प्रतिशोध व द्वेष जैसे नकारात्मक स्वभाव का प्रदर्शन करते हैं. ऐसा विचार सही नहीं है कि जो अपनी प्रतिरक्षा करते हैं वह ही सशक्त होते हैं. यदि हमारा लक्ष्य शांत जीवन व्यतीत करना या भगवान् की खोज करना है तो दूसरों द्वारा निंदा किए जाने पर हमें उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए. हमें दूसरों की त्रुटियों में संलग्न नहीं होना चाहिए. हम स्वयं में परिवर्तन लाकर अपने उदाहरण से दूसरों में बदलाव ला सकते हैं. हमें हिदायत तभी देनी चाहिए जब हमसे सलाह माँगी जाए. और वह उपदेश दूसरों के प्रति प्रेम से आना चाहिए… वरना हमें दूसरों की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

  अनुवादक- अर्चना   

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