मछुआरा जिसने धर्मात्मा होने का ढोंग किया

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: बदलाव

एक अँधेरी रात एक मछुआरा किसी के निजी बगीचे में चुपके से घुस गया. बगीचे में एक तालाब था जो मछलियों से भरा हुआ था. घर में अँधेरा देखकर मछुआरा बहुत खुश हुआ और सभी को सोता हुआ सोचकर उसने तालाब से कुछ मछलियॉँ पकड़ने का निश्चय किया.

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परन्तु जाल के पानी में गिरने की आवाज़ से घर के मालिक की नींद टूट गई. मालिक बोला, “तुमने सुना? शायद कोई हमारी मछली चुरा रहा है.”fish3

मालिक ने अपने नौकरों को जाँच कर पता लगाने का आदेश दिया. मछुआरा असमंजस में था. घबड़ाहट में स्वयं से बोला, “यह तो इसी तरफ आ रहे हैं? जल्द ही यहाँ आकर मुझे मारेंगे. मैं क्या करूँ?”

अपने जाल को झाड़ियों के नीचे छिपाकर वह भागने लगा. पर वहाँ से बचने का कोई रास्ता नहीं था. हताश होकर छिपने की जगह ढूँढ़ते हुए, उसे अचानक सुलगती हुआ आग दिखी जो शायद किसी धर्मात्मा ने वहाँ छोड़ी थी.

आग को देखकर मछुआरे के मन में तुरंत एक विचार आया और उसने सोचा, “मेरी तक़दीर मुझपर इससे अधिक मेहरबान नहीं हो सकती थी.” उसने फटाफट अपनी पगड़ी उतारी और अपनी बाँहों व माथे पर राख लगा ली. फिर आग के समक्ष बैठकर वह समाधि में मग्न किसी धर्मात्मा का ढोंग करने लगा.

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नौकर अचानक उस स्थान पर पहुँचे पर उसे कोई धर्मात्मा समझकर बिना कुछ कहे ही वहाँ से चले गए.
घर के मालिक ने नौकरों से पूछा, “क्या हुआ? तुम्हें चोर मिला?”

नौकरों ने उत्तर दिया, “नहीं सरकार! वह भाग गया. लेकिन बगीचे में हमें एक धर्मात्मा ध्यानस्थ मिले.”

मेरे बगीचे में धर्मात्मा! “मैं कितना भाग्यशाली हूँ. मुझे अभी उनके पास ले चलो” , मालिक बोला.

नौकर अपने मालिक को उस स्थान पर ले गए जहाँ मछुआरा तपस्या करने का ढोंग कर रहा था. उसके नज़दीक पहुँचने पर मालिक ने सबसे शांत रहने को कहा ताकि उस महान साधु की तपस्या में विघ्न न पड़े.
तपस्या करने का ढोंग कर रहे मछुआरे ने सोचा, “मैंने इन सबको मूर्ख बना दिया… यहाँ तक कि घर के मालिक को भी.”

अंततः मालिक और उसके नौकर वहाँ से चले गए. मछुआरे ने रात भर वहीं चुपचाप बैठकर सवेरे वहाँ से बचकर निकलने का निश्चय किया.
सवेरे जैसे ही वह जाने के लिए उठा तभी उसे एक युवा दम्पति अपने नवजात शिशु के साथ उस तरफ आते दिखे.fish7

मछुआरे को देखकर वह बोले, “हे महात्मा! आपके बारे में सुनकर हम आपका आशीर्वाद लेने आए हैं. कृपया हमारे बच्चे को आशीर्वाद दीजिए.”
नकली धर्मात्मा बोला, “भगवान् तुम्हारा भला करें.”

उस दम्पति के जाते ही मछुआरे ने लोगों का एक बड़ा झुंड अपनी ओर आते देखा. लोग उसका आशीर्वाद लेने आ रहे थे ओर उनके हाथ में नाना प्रकार का चढ़ावा था- जैसे कि फूल, मिठाई ओर चांदी की थाली भी.

लोगों का सम्मान व श्रद्धा देखकर मछुआरा द्रवित हो गया तथा उसने और ढोंग न करने का निश्चय किया. उस क्षण से वह वास्तव में भगवान् का भक्त बन गया. उसने सदा के लिए चोरी छोड़ दी और अपना शेष जीवन पूजा व ध्यान में व्यतीत किया.

सीख:
इस कहानी के चोर के समान अक्सर परिस्तिथियाँ हमें स्वयं में बदलाव लाने के लिए विवश करती हैं. प्रारम्भ में हम ढोंग करते हैं और कुछ समय तक मिथ्या जीवन जीने पर हम शीघ्र ही उस साँचे में स्वयं को ढाल लेते हैं.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

 

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