श्री आदि शंकर के तीन अपराध

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: शाश्वत सत्य; मनसा, वाचा और कर्मणा में सामंजस्य

श्री श्री शंकर एक बार अपने शिष्यों के साथ काशी के श्री विश्वनाथ मंदिर पहुँचे. गंगा में स्नान करने के बाद वह सीधे मंदिर गए और भगवान् विश्वनाथ के समक्ष अपने तीन अपराधों के लिए क्षमादान की प्रार्थना करने लगे. उनके शिष्य चकित थे और अचरज में थे कि उनके आचार्य अपने किन अपराधों के लिए प्रायश्चित कर रहे होंगे.

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अपने आचार्य के तीन अपराधों को जानने की अभिलाषा से एक शिष्य ने श्री श्री शंकर से उन अपराधों के बारे में पूछा. श्री श्री शंकर ने उसे सविस्तार समझाया, “यद्यपि मेरा मानना है कि परम तत्व सर्वव्याप्त हैं और मैंने अपनी कई रचनाओं में ऐसा अभिव्यक्त भी किया है, पर फिर भी उनके दर्शन करने के लिए मैं काशी नगर आया हूँ मानो वह केवल काशी नगर में ही विद्यमान हैं. मैंने अपने कथन से भिन्न आचरण करने का अपराध किया है. यह मेरा पहला अपराध है.”

“तैत्तिरिय उपनिषद् में कहा गया है ‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह:’ अर्थात जहाँ से वाणी लौट आती है और जिसे समझने में मन असमर्थ है. यद्यपि मैं जानता था कि परम तत्व विवेचन व शब्दों से परे हैं पर फिर भी ‘श्री काशी विश्वनाथ अष्टकम’ में मैंने adi4शब्दों द्वारा उनकी व्याख्या करने की चेष्टा की है. एक बार पुनः मैंने अपने उपदेश पर अमल न करने का अपराध किया है. यह मेरा दूसरा अपराध है.”

“अब तीसरा अपराध- अपने ‘निर्वाण षट्कम’ में मैंने स्पष्ट लिखा है; न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम न मंत्रो न तीर्थं न वेदाः न यज्ञा:, अहं भोजनं नैव भौज्यं न भोक्ता चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम : मैं पुण्य, पाप, सुख व दुःख से विलग हूँ. मुझे न तो पवित्र मन्त्रों की आवश्यकता है, न ही तीर्थयात्रा की. मुझे उपनिषदों, संस्कारों या यज्ञ की भी आवश्यकता नहीं है. न मैं भोजन हूँ, न ही भोग का अनुभव और न ही भोक्ता हूँ. मैं शुद्ध चेतना हूँ, अनादि शिव हूँ. पर इन सब के बावजूद मैं यहाँ प्रभु के सामने खड़ा होकर अपने अपराधों के प्रायश्चित की प्रार्थना कर रहा हूँ. यह मेरा तीसरा अपराध है.”

 

सीख:

श्री श्री शंकर के जीवन की यह उपकथा हमारे विचारों, शब्दों व कार्यों में सामंजस्य की महत्ता प्रकाशित करती है. यदि हममें परम तत्व को हासिल करने की उत्सुकता है तो हमें मनसा, वाचा और कर्मणा में तालमेल लाना ही होगा. हमारे विचार कितने भी नेक क्यों न हों परन्तु संसार हमारे प्रदर्शन को महत्त्व देता है. लेकिन हमारा प्रदर्शन कितना भी अच्छा क्यों न हो, परम तत्व हमारे विचारों को महत्त्व देते हैं. कहा जाता है, मनस एकम, वाचस एकम, कर्मण एकम महात्मनं, मनस अन्यथा, वाचस अन्यथा, कर्मण अन्यथा दुरात्मनं. हमें अपने जीवन में मनसा वाचा कर्मणा के सम्पूर्ण तालमेल का निरंतर अभ्यास करना चाहिए.

 

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

 

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