एक मरते हुए व्यक्ति की चार पत्नियाँ

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: आध्यात्मिक रूप से सशक्त होना, अपनी वास्तविकता का अहसास होना

एक व्यक्ति की चार पत्नियाँ थीं. वह अपनी चौथी पत्नी से सबसे अधिक प्रेम करता था और उसके लिए सबसे अच्छी पोशाक खरीदता था. अपनी चौथी पत्नी के लिए वह सबसे सुन्दर और मनमोहक आभूषण खरीदता था और अपना सारा समय उसे रिझाने में व्यतीत करता था. कुल मिलाकर उसकी पत्नी उससे प्रेम करती थी और वह अपनी पत्नी से प्यार करता था.

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वह अपनी तीसरी पत्नी से भी प्रेम करता था. तीसरी पत्नी भी उसे प्रिय थी और वह उसकी भी हर इच्छा पूरी करता था. यह तीसरी पत्नी उसकी ज़िन्दगी नियंत्रित करती थी.

वह अपनी दूसरी पत्नी से भी प्रेम करता था. उसपर उसे पूरा विश्वास था और वह उससे अपनी हर व्यक्तिगत चीज़ के बारे में बात करता था. अपने जीवन के विषय में वह सदा अपनी दूसरी पत्नी से ही सलाह करता था.

लेकिन किसी कारणवश उसे अपनी पहली पत्नी से अनुराग नहीं था. इसके बावजूद उसकी पहली पत्नी उसकी मदद के लिए सदा उपस्थित रहती थी, वह बहुत सुशील थी और अपनी पति को खुश रखने की हर संभव कोशिश करती थी.

एक दिन वह व्यक्ति बहुत बीमार पड़ गया और उसे अहसास हुआ कि उसका अंत निकट है. उसने अपनी चारों पत्नियों को बुलाया और बोला, “मेरी ख़ूबसूरत पत्नियों! मेरा अंत अब निकट है पर मैं अकेला नहीं मरना चाहता हूँ. तुम में से कौन मेरे साथ आने को तैयार है? ”

उसने अपनी चौथी पत्नी को आगे बुलाया और बोला, “तुम मुझे सबसे अधिक प्रिय हो. मैंने तुमसे हमेशा प्यार किया है और तुम्हें हर सर्वश्रेष्ठ वस्तु दी है. मेरी मृत्यु अब निश्चित है तो क्या तुम मेरे साथ आओगी? क्या तुम मेरा साथ दोगी?” पत्नी ने बिना सोचे झट से ‘नहीं’ कहा और पीछे मुड़कर चली गई. अपनी प्रियतम पत्नी का जवाब सुनकर उसका दिल टूट गया.

उदास मन से उसने अपनी तीसरी पत्नी को आगे बुलाया और बोला, “मेरा अंत निकट है, क्या तुम मेरे साथ चलोगी?” इस पर तीसरी पत्नी बोली, “बिलकुल नहीं. तुम्हारे जाते ही, मैं किसी और के साथ चली जाऊँगी.” फिर वह भी पीछे मुड़कर चली गई.

इसके बाद अपनी दूसरी पत्नी को बुलाकर उसने एक बार पुनः वही प्रश्न दोहराया. दूसरी पत्नी बोली, “मुझे दुःख है कि आपका अंत निकट है पर मैं केवल शमशान तक ही आपके साथ आ सकती हूँ. वहाँ तक मैं आपके साथ रहूँगी.” फिर पीछे मुड़कर वह भी अपनी जगह पर जाकर खड़ी हो गई.

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तभी पीछे से एक आवाज़ आई, “मैं आपके साथ आऊँगी.” उसने अपनी पहली पत्नी की ओर देखा और दुखी मन से बोला, “मेरी प्रियतमा, मैंने तुम्हारी ओर कभी ध्यान नहीं दिया, तुम कितनी कमज़ोर दिखती हो. अब जब मेरे जीवन का अंत आ गया है, मुझे अफ़सोस है कि मैं पहले समझ नहीं पाया कि तुम मुझे हर किसी से अधिक प्रेम करती हो. मुझे इस बात का बहुत खेद है कि मैंने हर समय तुम्हारी उपेक्षा की है.” ऐसा कहकर उस व्यक्ति का देहांत हो गया.

इस कहानी में चौथी पत्नी शरीर व उसकी तृष्णा का प्रतीक है जिसे मृत्यु के पश्चात हम खो देते हैँ. तीसरी पत्नी धन-दौलत का प्रतीक है जो हमारे शरीर छोड़ने पर दूसरों को मिलती है. दूसरी पत्नी हमारा परिवार व मित्र हैँ जो केवल शमशान घाट तक ही हमारे साथ आ सकते हैँ. पहली पत्नी जीवात्मा को दर्शाता है जो अप्रत्यक्ष होते हुए भी सदा हमारे साथ होती है. यद्यपि हमारी जीवात्मा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व प्रिय है परन्तु फिर भी हम उस पर ध्यान नहीं देते हैँ और इस बात का अहसास हमें जीवनकाल के अंत में होता है.

सीख:
शाश्वत सत्य यह है कि हम ‘शरीर’ नहीं जीवात्मा हैँ, जो जन्म व मृत्यु के परे है. ज़िन्दगी भर हम उन सभी अनावश्यक चीज़ों को महत्त्व देते रहते हैं जो निरर्थक व अस्थायी हैं. हमें अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान देकर अपने जीवन को श्रेष्ठतर बनाने की चेष्ठा करनी चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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