भगवान् राम से पत्र

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: अनुकम्पा, सभी में भगवान् को देखना

शिवानी की डाक पेटी में आज एक ही पत्र था. उसने पत्र उठाया और उसे खोलने से पहले लिफ़ाफ़े पर एक नज़र घुमाई. आश्चर्यचकित शिवानी ने एक बार पुनः लिफ़ाफ़े को जाँचा. लिफ़ाफ़े पर कोई भी टिकट या डाक-घर की मुहर नहीं थी. उसपर केवल शिवानी का नाम व पता लिखा हुआ था.

शिवानी ने झटपट पत्र पढ़ा:

“प्रिय शिवानी: शनिवार की दोपहर मैं तुम्हारे मुहल्ले में आने वाला हूँ और मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ.

सप्रेम, भगवान् राम.”

शिवानी ने काँपते हुए हांथों से पत्र मेज़ पर रखा और सोचने लगी, “भगवान् मुझसे मिलने क्यों आना चाहते हैं? मैं तो बहुत ही साधारण से महिला हूँ. मेरे पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है.”

मन में इस प्रकार के विचार लिए वह अपनी रसोईघर की खाली अलमारियों के बारे में सोचने लगी.

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“हे भगवान्! मेरे पास तो आपको देने के लिए वास्तव में कुछ भी नहीं है. मुझे झटपट दुकान से कुछ खाने के लिए खरीदकर लाना होगा.”

उसने अपना बटुआ खोला और पैसे गिनने लगी- २० रूपए और ५० पैसे.

“चलो, कम से कम मैं डबल रोटी और सब्ज़ी खरीद सकती हूँ.”

शिवानी ने जल्दी से कोट पहना और दुकान के लिए निकल पड़ी. एक पाव रोटी, कुछ सब्ज़ियाँ और दूध का एक डिब्बा खरीदने के बाद उसके पास मात्र ३० पैसे ही शेष बचे थे. उसे सोमवार तक इन्हीं पैसों से काम चलाना था. फिर भी वह खुश थी. अपनी खरीदारी का सामान उसने हाथ में लिया और मंद-मंद मुस्कुराते हुए घर वापस जाने लगी.

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“अरे भद्र महिला, क्या तुम हमारी मदद कर सकती हो?”
शिवानी खाने की परियोजना में इतनी तल्लीन थी कि गली में सिमट कर बैठे दो व्यक्तियों पर इसका ध्यान ही नहीं गया. एक पुरुष और एक महिला गली के एक कोने में बैठे हुए थे और दोनों ने फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे.

“महोदया, मेरे पास नौकरी नहीं है. अपनी पत्नी के साथ मैं इसी गली में रहता हूँ. सर्दी का मौसम शुरू हो गया है और हम दोनों को बहुत भूख भी लगी हुई है. अगर आप हमारी मदद करेंगीं तो हम आपका बहुत आभार समझेंगें.”

शिवानी ने दोनों को ध्यान से देखा. दोनों मलिन थे और उनके पास से गन्दी बदबू आ रही थी. शिवानी को विश्वास था कि यदि वह पति-पत्नी चाहते तो किसी प्रकार का काम करके कुछ पैसे कमा सकते थे.

“भाईजी, मैं अवश्य ही आपकी मदद करना चाहती हूँ पर मैं स्वयं भी एक गरीब महिला हूँ. मेरे पास सिर्फ कुछ सब्ज़ियाँ, पावरोटी और दूध है. आज रात मेरे घर खाने पर एक महत्वपूर्ण अतिथि आने वाला है और यह खाना मैं उसी के लिए ले जा रही हूँ. ”

“कोई बात नहीं, बहनजी. मैं समझता हूँ. आपका फिर भी धन्यवाद.”

उस आदमी ने अपनी पत्नी के कन्धों पर हाथ रखा और दोनों अपनी गली की ओर लौटने लगे. दोनों को वापस जाते देख, शिवानी के हृदय में दर्द की एक लहर सी उठी. वह भाग कर उनके पास गई और उस व्यक्ति को अपना किराने का सामान सौंप दिया.

“धन्यवाद, बहनजी. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! हम तहे दिल से आपके आभारी हैं.”
उस व्यक्ति की पत्नी को भी धन्यवाद कहते सुन, शिवानी की निगाह उस पर पड़ी. वह महिला स्पष्ट रूप से काँप रही थी.

“मेरे पास एक और कोट है. यह लो, तुम इसे रख लो.”
शिवानी ने अपना कोट उतारा और उस महिला के कंधों पर डाल दिया. फिर वह मुस्कुराते हुए मुड़ी और घर वापस लौटने लगी….. अब उसके पास न तो कोट था और न ही अपने अतिथि को खिलाने के लिए खाना.

जब तक शिवानी अपने घर के सामने वाले दरवाज़े तक पहुँची, वह ठिठुर रही थी और बेहद चिंतित थी. स्वयं प्रभु राम उसके घर पधारने वाले थे और उसके पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं था.
दरवाज़े की चाभी निकालने के लिए जब वह अपना बटुआ टटोल रही थी तब उसकी निगाह डाक-पेटी में पड़े एक लिफ़ाफ़े पर पड़ी.
“बड़ी अजीब बात है. आम तौर पर डाकिया एक दिन में एक बार ही आता है.”

शिवानी ने डाक-पेटी में से लिफ़ाफ़ा निकला और उसे खोलकर पढ़ने लगी:
“प्रिय शिवानी: तुम्हें एक बार पुनः देखकर अच्छा लगा. आनंददायक खाने के लिए तुम्हारा शुक्रिया. उस ख़ूबसूरत कोट के लिए भी तुम्हारा धन्यवाद.
सप्रेम- भगवान् राम. “

यद्यपि हवा में ठंडक थी और शिवानी ने कोट नहीं पहना हुआ था पर फिर भी उसे ठंड महसूस नहीं हो रही थी. उसकी आँखें ख़ुशी के आँसू बहा रहीं थीं और भगवान् राम का पत्र लेकर वह स्तंभित खड़ी हुई थी.

सीख:

मानव सेवा माधव सेवा होती है. ईश्वर की सृष्टि में हमें सर्वत्र ईश्वर को देखने का प्रयास करना चाहिए, सबसे प्रेम करना चाहिए और अवसर मिलने पर सबकी सेवा करनी चाहिए.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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