कृष्ण के प्रति द्रौपदी की भक्ति- नाम स्मरण की ताकत

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आदर्श: प्रेम
उप आदर्श: अनुराग, श्रद्धा

द्रौपदी, पांडवों की पत्नी थी. भगवान् कृष्ण ने द्रौपदी को कई बार अपमान व निरादर से बचाया था. भगवान् कृष्ण की पत्नियाँ, सत्यभामा और रुक्मिणी, अक्सर अचंभित होती थीं कि भगवान् , द्रौपदी की इतनी मदद क्यों करते थे और उसपर इतना अनुग्रह क्यों बरसाते थे.

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उनकी शंका दूर करने के लिए एक दिन कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी से कहा कि वह दोनों उनके साथ द्रौपदी के घर चलें.

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जब वह द्रौपदी के घर पहुँचे तब द्रौपदी स्नान करने के पश्चात अपने बाल सँवार रही थी. कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी को आदेश दिया कि वह द्रौपदी को बाल बनाने में मदद करें. यद्यपि सत्यभामा और रुक्मिणी क्रुद्ध थीं पर फिर भी उन्होंने कृष्ण की आज्ञा का पालन किया. द्रौपदी के एक-एक बाल से ‘कृष्णा, कृष्णा’ का निरंतर गुणगान सुनकर दोनों को बहुत ही आश्चर्य हुआ और तब उन्हें अहसास हुआ कि द्रौपदी सही मायने में कृष्ण के अनुग्रह की अधिकारी थी. कृष्ण का नाम द्रौपदी के रोम-रोम में व्याप्त था. कृष्ण के लिए उसकी ललक और भक्ति तथा उनके प्रति प्रेम से उसका अस्तित्व पूरी तरह भरा हुआ था. अपने इस भक्त की दिली श्रद्धा को पुरस्कृत करने के लिए भगवान् कृष्ण बाध्य थे. नामजप की इस सहज साधना के माध्यम से द्रौपदी ने प्रभु के साथ निरंतर संसर्ग प्राप्त किया था.

सीख:

कलयुग में ईश्वर के नाम का सतत जाप सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक अभ्यास है. ईश्वर के नाम का निरंतर गुणगान प्रचुर अनुग्रह व प्रेम सुनिश्चित करता है. ईश्वर को प्राप्त करने का यह सबसे अच्छा तरीका है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक – अर्चना

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