श्री कृष्ण, अर्जुन और कबूतर की कहानी

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आदर्श: विश्वास
उप आदर्श : भरोसा

श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच घटित एक विख्यात उपकथा इस प्रकार से है:
“कृष्णा, मेरे लिए आपके शब्द मेरी आँखों के प्रमाण से अधिक विश्वसनीय हैं.”

श्री कृष्ण और अर्जुन एक बगीचे में घूम रहे थे जब आसमान में उन्हें एक पक्षी उड़ता दिखा.
पक्षी की ओर इशारा करते हुए श्री कृष्ण बोले,
“अर्जुन, वह पक्षी देख रहे हो…..क्या वह कबूतर है? ”

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“जी, मेरे प्रभु! वह निस्संदेह कबूतर है” ,अर्जुन ने उत्तर दिया.
“अरे रूको …..मेरा ऐसा सोचना है कि वह बाज है. देखो तो, क्या वह बाज नहीं है? “कृष्ण ने पूछा.

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“आप सही कह रहे हैं, कृष्ण. वह पक्षी निश्चित रूप से बाज ही है” ,अर्जुन बोला.
“अरे नहीं! वह बाज के समान प्रतीत नहीं हो रहा है” ,कृष्ण बोले. “वह अवश्य ही कौआ है.”
“निःसंदेह कृष्णा, वह कौआ ही है” ,अर्जुन ने उत्तर दिया.

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अर्जुन की बात सुनकर कृष्ण हँसते हैं और अर्जुन से झिड़ककर कहते हैं,
“अर्जुन, क्या तुम अंधे हो? तुम्हारी अपनी आँखें नहीं हैं, क्या? मैं जो भी कह रहा हूँ तुम उससे सहजता से सहमत होते जा रहे हो.”

अर्जुन बोला, “कृष्णा, मेरे लिए आपके शब्द मेरी आँखों के प्रमाण से कहीं अधिक विश्वसनीय हैं. आप जब कुछ कहते हैं तो उसे हकीकत में बदलने की ताकत रखते हैं- चाहे वह कौआ हो, कबूतर हो या बाज. अतः यदि आपने कहा है कि वह पक्षी कौआ है तो वह अवश्य कौआ ही होगा! ”

सीख:
इस कहानी का उद्धरण प्रायः विश्वास का दृष्टांत देने के लिए दिया जाता है. अपने गुरु व प्रभु पर हमें भी इसी प्रकार का विश्वास स्थापित करना चाहिए. श्री कृष्ण पर इस प्रकार के सम्पूर्ण व दृढ़ विश्वास के कारण ही अर्जुन अच्छाई और बुराई में हुए युद्ध को जीत पाया था.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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