परिस्थितियों को देखने का एक ख़ूबसूरत तरीका

 

    आदर्श : आशावाद
उप आदर्श: विचार में स्पष्टता

एक पिता एक पत्रिका पढ़ रहे थे और उनकी नन्ही बेटी समय-समय पर उनका ध्यान भंग कर रही थी. बेटी को व्यस्त रखने के लिए उन्होंने एक पृष्ठ फाड़ा जिस पर विश्व का नक्शा छपा हुआ था. पिता ने उस पृष्ठ को अनेकों छोटे-छोटे टुकड़ों में फाड़ा और अपनी बेटी से उन सभी टुकड़ों को जोड़कर दुबारा से नक्शा बनाने को कहा. कागज़ की पहेली सुलझाने वह नन्ही लड़की ख़ुशी-ख़ुशी भागकर अपने कमरे में गई.

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पिता को पूरा विश्वास था कि पहेली सुलझाने में बच्ची को पूरा दिन लग जाएगा. वह अपनी इस परियोजना से बेहद प्रसन्न थे और निश्चिन्त होकर पुनः पत्रिका पढ़ने लगे. परन्तु शीघ्र ही नन्ही बालिका पूर्णतया संकलित नक्शा लेकर वापस आ गई. आश्चर्यचकित पिता ने उससे पूछा कि उसने नक्शा इतनी जल्दी कैसे बना लिया. उनकी बेटी ने जवाब दिया, “ओह……पिताजी! कागज़ के दूसरी तरफ एक व्यक्ति का चेहरा था…..map3चेहरा परिपूर्ण करने के लिए मैंने टुकड़ों को जोड़ दिया और इस तरह नक्शा भी सही तरह से बन गया.” ऐसा कहकर पिता को हक्का-बक्का छोड़कर वह भागकर बाहर खेलने चली गई.

 

 

    सीख:
इस संसार में हम जो भी अनुभव करते हैं उनका सदैव एक दूसरा पहलू भी होता है. जब भी हम किसी चुनौती या पेचीदा परिस्थिति का सामना करते हैं तो हमें उसके दूसरे पहलू पर अवश्य ही ध्यान देना चाहिए….इससे हमें समस्या के समाधान का आसान तरीका नज़र आएगा.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक-अर्चना

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