हाथी और उसकी वृद्ध अंधी माँ

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आदर्श: उचित आचरण
उप आदर्श: प्रेम, अपने माता-पिता के प्रति सम्मान

बहुत समय पहले हिमालय की पहाड़ियों में कमल के तालाब के पास बुद्ध का जन्म एक हाथी के रूप में हुआ. वह सफ़ेद रंग का अत्यंत सुन्दर हाथी था जिसका चेहरा व पैर मूँगिया रंग के थे. उसकी सूँड़ चाँदी की डोर के समान चमकती थी.

वह हर जगह अपनी माँ के पीछे-पीछे जाता था. उसकी माँ सबसे ऊँचे पेड़ों से सबसे कोमल पत्ते और सबसे अधिक मीठे आम तोड़कर उसे देते हुए बोलती थी, “पहले तुम, फिर मैं.”

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उसकी माँ कमल के तालाब में सुगन्धित फूलों के बीच उसे नहलाती थी. गहरी सांस लेकर तालाब का पानी अपनी सूँड़ में भरकर वह अपने शिशु के सर और शरीर पर तब तक फुहारती थी जब तक कि वह साफ़ होकर चमकने न लगे. फिर अपनी सूँड़ में पानी भरकर शिशु भी निशाना साधकर अपनी माँ की आँखों के बीच में फुहारे के समान पानी छिड़कता था. जवाब में माँ भी अपने शिशु पर पानी की तेज़ धार छोड़ती थी. इस प्रकार दोनों अपनी-अपनी सूँड़ में पानी भरकर फुहार मारकर एक-दूसरे को गीला करते और प्रसन्नतापूर्वक समय व्यतीत करते थे. कुछ देर पानी से खेलने के बाद दोनों अपनी सूँड़ आपस में लपेटकर मिट्टी में बैठकर आराम करते थे.

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अक्सर दोपहर के समय शिशु हाथी की माँ जावाहफल के पेड़ की छाँव में आराम करती और अपने बच्चे को अन्य नन्हें हाथियों के साथ उछल-कूद करते और शोरगुल मचाते हुए खेलते देखती थी. समय के साथ-साथ नन्हा हाथी बड़ा होता रहा और जल्द ही अपने समूह का सबसे विशाल व शक्तिशाली युवक हाथी बन गया. जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया वैसे-वैसे उसकी माँ वृद्ध होती गई. माँ के दाँत पीले पड़कर टूट गए और उसकी आँखों की दृष्टि भी चली गई. युवा हाथी सबसे ऊँचे पेड़ों से कोमल पत्तियाँ व सबसे मीठे आम तोड़कर अपनी प्रिय वृद्ध अंधी माँ को देकर कहता था, “पहले तुम, फिर मैं.”

वह अपनी माँ को कमल के तालाब में मनमोहक फूलों के बीच ठन्डे पानी से नहलाता था. फिर तालाब का पानी अपनी सूँड़ में भरकर वह माँ के सर व शरीर पर तब तक छिड़कता था जब तक कि उसकी माँ बिल्कुल साफ़ न हो जाती. तत्पश्चात वह दोनों अपनी सूँड़ आपस में लपेटकर मिट्टी में बैठकर आराम करते थे. दोपहर के समय वह अपनी माँ की अगुवाई करता और उसे जावाहफल के पेड़ की छाँव में ले जाता था. फिर वह बाकी के हाथियों के साथ घूमने-फिरने निकल जाता था.

एक दिन शिकार के दौरान एक राजा की निगाह इस मनमोहक सफ़ेद हाथी पर पड़ी.
“कितना उत्कृष्ट हाथ है! इसे तो मेरे पास होना चाहिए ताकि मैं इसकी सवारी कर सकूँ !”
राजा ने हाथी को बंदी बना लिया और उसे शाही तबेले में भेज दिया. राजा ने हाथी को रेशम, रत्न तथा कमल के फूलों के हार से विभूषित किया. उसने हाथी को मीठी घास और रसीले आलूबुखारे दिए और उसकी नांद स्वच्छ पानी से भर दी.

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परन्तु युवा हाथी न कुछ खाता और न ही कुछ पीता. वह निरंतर रोता रहता और इस कारण धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगा. राजा बोला, “उत्कृष्ट हाथी, मैंने तुम्हें रेशम तथा रत्नों से सुसज्जित किया. मैं तुम्हें बेहतरीन खाना व शुद्ध पानी देता हूँ पर फिर भी तुम न तो खाना कहते हो और न ही पानी पीते हो. तुम्हें किस चीज़ से ख़ुशी मिलती है?” युवा हाथी बोला, “रेशम, रत्न, श्रेष्ठ खाना व स्वच्छ पानी से मुझे ख़ुशी नहीं मिलती है. मेरी वृद्ध व अंधी माँ जंगल में अकेली है और उसकी देखभाल करने के लिए कोई भी नहीं है. जब तक मैं अपनी माँ को कुछ खाने को नहीं दे देता तब तक मैं खाना व पानी ग्रहण नहीं करूँगा. इससे मेरी चाहे मृत्यु ही क्यों न हो जाए.”

राजा बोला, “ऐसी अनुकम्पा तो मैंने मनुष्यों में भी नहीं देखी है. इस युवा हाथी को ज़ंजीर में रखना उचित नहीं है.”
शाही तबेले से आज़ाद होते ही युवा हाथी अपनी माँ को ढूँढ़ने पहाड़ियों के पार भागा. उसे अपनी माँ कमल के तालाब के पास मिली. वह मिट्टी में लेती हुई थी क्योंकि वह अत्यंत कमज़ोर हो चुकी थी. माँ को देखकर युवक की आँखें भर आईं. उसने अपनी सूँड़ में पानी भरा और माँ के सर व शरीर पर पानी तब तक छिड़का जब तक कि वह पूर्ण रूप से साफ़ न हो गई.
“यह बारिश हो रही है या फिर मेरा पुत्र लौट आया है?, माँ ने पूछा.
“यह तुम्हारा अपना बेटा है. राजा ने मुझे छोड़ दिया है” , युवक बोला.
युवक ने जब माँ की आँखें धोईं तब चमत्कारपूर्ण ढ़ंग से उसकी माँ की दृष्टि ठीक हो गई और वह बोली, “जिस प्रकार अपने बेटे को देखकर मैं प्रसन्न हूँ उसी प्रकार राजा भी सदा खुश रहे!”

युवा हाथी ने झटपट पेड़ से कोमल पत्ते और मीठे आम तोड़े और माँ को देते हुए बोला, “पहले तुम, फिर मैं.”

सीख:

हमारे माता-पीता हमसे बिना शर्त के प्रेम करते हैं. हमें सिखाया गया है- माता, पिता, गुरु, दैवं. हमारे जीवन में माँ का स्थान सर्वोच्च होता है. हमें भी अपने माता-पिता से प्रेम करना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए विशेषकर तब जब उन्हें हमारे प्यार की सबसे अधिक ज़रुरत होती है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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