जब आंधी चलती है

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आदर्श: शान्ति
उप आदर्श: विश्वास

बहुत साल पहले अटलांटिक महासागर के तट पर एक किसान की ज़मीन थी. किसान को अपनी ज़मीन पर खेती-बाड़ी करने के लिए एक मज़दूर की ज़रुरत थी और इस कारण वह निरंतर विज्ञापन देता रहता था.storm2 परंतु उसके खेत अटलांटिक महासागर के तट पर होने के कारण कोई भी काम करने को तैयार नहीं होता था. सभी भयानक तूफानों से डरते थे जो अटलांटिक महासागर में प्रबल थे और इमारतों व फसलों को तहस-नहस कर देते थे.

जब किसान ने आवेदकों से नौकरी के लिए बातचीत करनी शुरू की तब उसे एक के बाद एक मायूसी का ही सामना करना पड़ा. अंततः एक नाटा, दुबला और मध्य आयु का व्यक्ति किसान के पास आया. किसान ने उससे पूछा, “क्या तुम एक अच्छे मजदूर हो?”

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उस मजदूर ने सबेरे से रात तक एक जुट होकर खेत पर कठिन मेहनत से काम किया और किसान उसके काम से बहुत खुश भी था. फिर एक रात समुद्र में ज़ोर से सांय-सांय करती हुई तेज़ हवा चलने लगी. हड़बड़ाकर किसान अपने बिस्तरे से निकला, झटपट लालटेन पकड़ी और मजदूर के निवास की ओर तेज़ी से दौड़ा. किसान ने मजदूर को झकझोर और चिल्लाकर बोला, “उठो! तूफ़ान आने वाला है. सारा सामान बाँधकर ठीक से रखो वरना सब कुछ उड़ जाएगा.”

मजदूर बिस्तर पर लेटा रहा और स्थिर व विश्वस्त आवाज़ में बोला, “नहीं साहब! मैंने आपसे से कहा था कि आंधी आने पर मैं सो सकता हूँ.”

मजदूर का जवाब सुनकर किसान को बहुत गुस्सा आया और उसकी बहुत इच्छा हुई कि मजदूर को नौकरी से निकाल दे. परंतु आने वाले तूफ़ान के बारे में सोचकर वह पहले उसकी तैयारी करने के लिए झटपट खेत की ओर भागा. खेत पहुँचकर किसान अचंभित था क्योंकि उसने देखा कि घास का सारा ढेर तिरपाल से भली भाँती ढका हुआ था. गायें बाड़े में थीं, मुर्गियों के बच्चे पिंजरों में थे और सारे दरवाज़े बंद थे. सारे किवाड़ कसकर बाँधे हुए थे.

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सभी कुछ इतनी अच्छी तरह से व्यवस्थित था कि किसी भी प्रकार की हानि की कोई गुंजाइश नहीं थी. तब किसान को अपने मजदूर की बात समझ में आई और वह भी आराम से सोने चला गया.

सीख:

जब हम आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होते हैं तब हमें किसी प्रकार का डर नहीं होता है. हमारी ज़िन्दगी में तूफ़ान आने पर क्या हम भी सो सकते हैं? हमारी मानसिक ताकत व सही रवैये की बुनियाद हमारा विश्वास है.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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