दूध की बाल्टी में मेंढक

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     आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: दृढ़ता

एक मेंढक एक खेत में इधर-उधर फुदक रहा था. इस दौरान उसे खेत में एक अनाजघर दिखा. मेंढक ने अनाजघर की छान-बीन करने का निर्णय किया. कुछ-कुछ लापरवाह व कुछ ज़्यादा ही उत्सुक होने के कारण इधर-उधर देखते हुए वह अचानक एक बाल्टी में गिर गया. बाल्टी ताज़े दूध से आधी भरी हुई थी.

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बाल्टी से बाहर निकलने की अथक चेष्टा के बावजूद सफल न होने पर उसे अहसास हुआ कि बाल्टी की सतह तक पहुँचना उसकी पहुँच से बाहर था क्योंकि दूध की बाल्टी काफी ऊँची थी और उसकी ढलान तीव्र थी. उसने अपने पीछे के पैरों को पूर्णरूप से फैलाया ताकि वह बाल्टी की सतह को छूकर स्वयं को ऊपर की ओर धकेल पाता. लेकिन बाल्टी काफ़ी गहरी थी और इस कारण मेंढक के पैर तह तक नहीं पहुँच पा रहे थे. मेंढक दृढ़ संकल्प था कि वह हार नहीं मानेगा और उसने अपना संघर्ष जारी रखा.

वह लगातार इधर-उधर पैर मारता रहा और छटपटाता रहा. अंततः उसके इस निरंतर मंथन से दूध मक्खन के एक बड़े टुकड़े में परिवर्तित हो गया. मक्खन का टुकड़ा ठोस होने के कारण मेंढक उस पर चढ़कर बाल्टी से बाहर निकल आया.

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सीख:

सतत प्रयत्न करने से सफलता अवश्य ही मिलती है. हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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