अपना अस्तित्व बनाए रखना

 

     आदर्श : सत्य
उप आदर्श: कृतार्थ, सही रवैया

एक राजा एक बगीचे में टहल रहा था और इस दौरान उसने कई कुम्हलाते और मुरझाते हुए वृक्ष, झाड़ियाँ और फूल देखे. ओक के वृक्ष ने कहा कि वह इसलिए मुरझा रहा था क्योंकि वह देवदार के वृक्ष के समान ऊँचा नहीं उग सकता था. देवदार के वृक्ष से पूछने पर राजा को ज्ञात हुआ कि देवदार इसलिए ढह रहा था क्योंकि वह अंगूर की बेल के समान अंगूर नहीं उपजा सकता था. इसी प्रकार अंगूर की बेल इस कारण कुम्हला रही थी क्योंकि वह एक गुलाब के समान खिल नहीं सकती थी.

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अंततः राजा को एक पौधा दिखा जो ताज़ा व दिलकश था और फल-फूल रहा था.

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पूछताछ करने पर राजा को निम्न उत्तर मिला:
यह तो बहुत ही प्राकृतिक सी घटना है. जब आपने मुझे बोया था तब आपको मुझसे आनंद की अपेक्षा थी. यदि आप ओक, अंगूर या गुलाब की इच्छा रखते तो आप उन पौधों को रोपते. इसलिए मेरा मानना है कि मैं जो हूँ उसके अतिरिक्त कुछ और नहीं बन सकता. और इस कारण मैं अपने विशिष्ट गुणों का विकास करने की भरपूर कोशिश करता हूँ.

सीख:
हमें अपना ध्यान स्वयं पर केंद्रित करना सीखना चाहिए. हम अपना व्यक्तित्व बदल नहीं सकते हैं. हमारे लिए किसी और की तरह बनना असंभव है. हमारा विकास और हमारी समृद्धि तभी होगी जब हम अपने व्यक्तित्व को स्वीकार करेंगें. यदि हम स्वयं से प्रसन्न नहीं होंगें तो हम कुम्हला सकते हैं. हम सभी में सामर्थ्य, योग्यता, कौशल व उद्देश्य है जिस कारण हमारा जन्म हुआ है. यदि हम इस तथ्य को स्वीकार कर लें और अपनी योग्यताओं का सर्वोत्तम प्रयोग करना सीख लें तो हम अवश्य ही प्रसन्नचित रहेंगें और दूसरों में भी खुशियाँ फैलाएंगें.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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