हर दिन एक उपहार है

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आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: रवैया

एक महिला ९२ वर्षीय वृद्ध, संतुलित, स्वाभिमानी और छोटे कद की थी. यद्यपि वह अंधी थी, फिर भी हर सुबह अपने बालों में कंघी करके, बखूबी पूरा श्रृंगार करके ८ बजे तक वह अच्छे तरीके से तैयार हो जाती थी. आज उसे नर्सिंग होम ले जाया जा रहा था.

उसके पति ने ७० साल तक उसका साथ निभाया था और हाल ही में उसकी मृत्यु हो गयी थी. इस कारण महिला को नर्सिंग होम ले जाना ज़रूरी हो गया था.

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नर्सिंग होम के प्रतीक्षाकक्ष में काफ़ी घंटों धैर्यपूर्वक इंतज़ार करने के बाद जब उसे सूचित किया गया कि उसका कमरा तैयार है तो वह बहुत ही प्यार से मुस्कुरायी.

जब वह अपने वॉकर की मदद से लिफ्ट की ओर जा रही थी, मैंने उसके छोटे से कमरे का सविस्तार मानसिक विवरण दिया. एक आठ वर्षीय बच्चे, जिसे हाल ही में एक पिल्ला उपहार में मिला हो, के समान उत्साहित होकर वह बोली, “मुझे बहुत पसंद है.”

“मिसेज जोंस, ज़रा रूकिये…..अभी तो आपने अपना कमरा देखा भी नहीं है.”

“उससे कोई अंतर नहीं पड़ता है,” उसने उत्तर दिया. “खुशी वह होती है जिसका निश्चय हम समय से पहले ही कर लेते हैं. मुझे अपना कमरा पसंद है या नहीं, यह कमरे की सजावट पर निर्भर नहीं करता है. यह मेरी मनोदशा पर आधारित है. मैंने यह पहले से ही निश्चय कर लिया था कि मैं अपने कमरे से प्रेम करूँगी. यह एक ऐसा संकल्प है जो मैं प्रतिदिन सुबह उठने पर करती हूँ. मेरे पास २ विकल्प हैं: सारा दिन बिस्तर पर लेटकर मैं अपने उन अंगों के बारे में सोचती रहूँ जो अब काम नहीं कर रहे हैं या फिर बिस्तर से बाहर निकलकर मेरे पास जो भी है उसके लिए आभारी रहूँ. प्रत्येक दिन एक सौगात है और जब तक मैं जीवित हूँ, मैं अपना सारा ध्यान हर नए दिन व समस्त सुखद यादों पर केंद्रित करूँगी जो मैंने अपने जीवन के इन दिनों के लिए ही संजोकर रखीं हैं.”

उसने मुझे समझाया, “वृद्धावस्था एक बैंक-खाते के समान होती है, तुम अपनी जमा पूँजी में से ही राशि निकालते हो. इसलिए तुम्हें मेरी सलाह रहेगी कि अपनी यादों के बैंक-खाते में ढेर सारी खुशियाँ जमा करो. मेरे बैंक में अपनी मधुर याद जमा करने के लिए तुम्हारा शुक्रिया. मैं तो अभी भी मोहक यादों का संचय कर रही हूँ.”

और फिर मुस्कुराते हुए वह महिला बोली:

“खुश रहने के पाँच सरल सिद्धांत सदा याद रखो:
१) अपने हृदय को द्वेष से मुक्त रखो
२) अपने दिमाग को परेशानियों से दूर रखो
३) सादा जीवन बसर करो
४) दूसरों को अधिक से अधिक दो
५) कम से कम अपेक्षा रखो.”
सीख:

सब कुछ हमारे रवैये पर निर्भर करता है. खुशी कभी भी बाहरी साधनों पर आश्रित नहीं होती है. किसी भी चीज़ के प्रति हमारा दृष्टिकोण व रवैया सबसे अधिक महत्व रखता है. स्वयं को हम खुद ही खुश रख सकते हैं. हमें इस सुन्दर सत्य को सीखकर एक खुशहाल जीवन व्यतीत करने का अभ्यास करना चाहिए.

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Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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