रस्सी

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आदर्श: विश्वास
उप आदर्श: पकड़ ढीली करना

एक पर्वतारोही की कहानी बताई जाती है जिसे अपने आनंद तथा दोस्तों को प्रभावित करने के लिए ऊँचे पहाड़ों की चढ़ाई करना अच्छा लगता था. सालों के प्रशिक्षण तथा तैयारी के बाद उसे यकीन था कि चढ़ाई कितनी भी कठिन क्यों न हो, वह संसार के किसी भी पर्वत का आरोहण कर सकता है.

यह घटना उस समय की है जब वह अपने ५ दोस्तों के साथ एक आरोहण यात्रा पर था. उसने निश्चय किया कि रात में दोस्तों के सो जाने पर वह अकेले ही शिखर की चढ़ाई पूरी करेगा और सबसे पहले शिखर पर पहुँचकर अपनी जीत का दावा करेगा.mt2 उस रात सभी के सो जाने पर उसने अपने आरोहण के कपड़े पहने और शिखर की ओर निकल पड़ा. संयोग से वह पूर्णिमा की रात थी और वह खुश था की चाँद की रोशनी से उसे मार्गदर्शन में सहायता मिलेगी.

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यद्यपि वह पूर्णतया सतर्क था और अपने सहारे व संतुलन के लिए रस्सी का इस्तेमाल कर रहा था पर फिर भी रात के समय अकेले चढ़ाई करना मूर्खता थी. आरम्भ में पूर्णिमा के चाँद का लाभ उठाकर उसने बहुत ही तीव्रता से प्रगति की. जैसे-जैसे वह शिखर के करीब पहुँच रहा था वह अत्यंत खुश था और उसका आत्मविश्वास तेज़ी से बढ़ रहा था. पर दुर्भाग्यवश अचानक पहाड़ के चारों ओर घने बादल बनने लगे और शीतकालीन तूफ़ान आने के कारण दृश्यता तेज़ी से कम होने लगी. तुरंत ही कुछ भी देख पाना असंभव हो गया और उसके आसपास घनिष्ट बादल फैल गए व गहरा कोहरा छा गया. इतनी दूर पहुँचकर उसके लिए वापस जाना नामुमकिन था अतः उसने चढ़ाई ज़ारी रखी – इस उम्मीद में कि शायद तूफ़ान जल्द ही टल जाएगा.

चूँकि हर तरफ गहरा अँधेरा था और पर्वतारोही संकरे पथ पर तिरछा आरोहण कर रहा था, अचानक से उसका संतुलन बिगड़ा और पहाड़ी के किनारे से वह फिसल गया. संयोगवश गिरने के बावजूद भी वह जीवित था हालांकि रस्सी के सहारे से वह हवा में झूल रहा था. घोर अंधकार होने के कारण उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. पहाड़ पर चढ़ाई करते समय उसने अपनी भारी वाली जैकेट अपनी पीठ पर लटकाए थैले पर हलके से बाँधी थी पर दुर्भाग्यवश गिरने के दौरान उसकी जैकेट खुलकर गिर गयी थी. धीरे-धीरे ठंडी तूफ़ानी हवा उसे अपने अंदर तक महसूस होने लगी. कठिन संघर्ष के बाद उसने स्वयं को गोले के आकार में समेटा पर मजबूत सहारे के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था. मायूस व निराश होकर वह चिल्लाया, “प्रिय प्रभु, कृपया मेरी मदद कीजिए.”

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अचानक पर्वतारोही को एक गंभीर आकाशवाणी सुनाई दी, “रस्सी को काट दो! ”
“क्या! ” पर्वतारोही ने तूफ़ानी हवा के शोर में ठीक से सुनने की कोशिश की.
एक बार पुनः उसे वही गंभीर आकाशवाणी सुनाई दी, “रस्सी को काट दो!”

इसके बाद केवल तेज़ तूफ़ानी हवा की ज़ोरदार आवाज़ ही सुनाई दे रही थी. आकाशवाणी सुनने के बाद भी वह रस्सी पकड़कर टंगा रहा और उम्मीद करता रहा कि शायद वह कुछ बंदोबस्त करके स्वयं को बचा पाएगा. चारों ओर घनघोर अँधेरा होने के कारण उसे अपनी वास्तविक परिस्थिति का बिल्कुल भी अनुमान नहीं था. इस कारण उसने निश्चय किया कि वह रस्सी से लटक कर ही सुबह होने का इंतज़ार करेगा.

अगले दिन उसके गुट के लोगों ने जब उसकी खोज की तो उसे मरा हुआ पाया. कठोर सर्दी के कारण उसका शरीर जम गया था. उसका मृत शरीर रस्सी से लटका हुआ था हालांकि वह एक विशाल चट्टान से मात्र ८ फ़ीट ही ऊपर था. अगर उसने रस्सी काट दी होती तो शायद किसी सुरक्षित स्थान पर गिरकर, आसपास की झाड़ियों से आग जलाकर स्वयं को रात की सर्दी से बचा पाता.

सीख:

इस दुखद और शायद कल्पित कहानी से हमें भगवान् में विश्वास रखने की सीख मिलती है. क्या हम भी किसी ‘रस्सी’ में अपनी सुरक्षा ढूँढ़ते हैं? या फिर अपने ज्ञान व नियंत्रण के बाहर हो रही जीवन की घटनाओं के आधार पर हम भगवान् पर विश्वास करने के लिए तैयार हैं.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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