घर का निर्माण

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     आदर्श : उचित आचरण
 उप आदर्श: सही प्रवृत्ति

एक वयोवृद्ध बढ़ई सेवामुक्त होने की तैयारी में था.house2 उसने अपने मालिक- ठेकेदार को अपनी योजना के बारे में बताया. उसने मालिक से कहा कि घर-बनाने का कारोबार छोड़कर वह अपनी पत्नी के साथ इत्मीनान से रहना चाहता है और अपने विस्तृत परिवार का आनंद उठाना चाहता है. यद्यपि उसे हर हफ्ते अपनी तनख्वाह के पैसों की कमी महसूस होगी पर फिर भी वह सेवामुक्त होना चाहता था.

ठेकेदार को दुख था कि उसका एक बेहतरीन कर्मचारी काम छोड़कर चला जाएगा. मालिक ने बढ़ई से पूछा यदि जाने से पहले, एक व्यक्तिगत उपकार के रूप में, वह एक आखिरी घर का निर्माण कर सकता था. बढ़ई सहमत हो गया और उसने घर बनाने का काम शुरू कर दिया.house4 बढ़ई ने काम तो शुरू कर दिया पर उसके व्यवहार से यह स्पष्ट था कि उसका काम करने का बिलकुल मन नहीं था. उसने घटिया कारीगरी का सहारा लेकर तुच्छ पदार्थों का प्रयोग किया. एक निष्ठावान कार्यकाल का इस प्रकार से अंत होना बेहद खेदजनक था.

जब बढ़ई ने अपना काम ख़त्म कर लिया तब उसका मालिक घर का निरीक्षण करने आया. और फिर बढ़ई को सामने वाले दरवाज़े की चाबी देते हुए बोला, “यह घर तुम्हारा है…..तुम्हारे लिए मेरा उपहार.”

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बढ़ई स्तंभित था.

कितनी शर्मनाक बात थी. यदि बढ़ई को पता होता कि वह अपने लिए घर बना रहा है तो वह उसे अलग ही ढ़ंग से बनाता.

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सीख :
हम हर रोज़ अपनी ज़िन्दगी का निर्माण करते हैं परंतु अक्सर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास नहीं करते हैं. हमें सदमा तब पहुँचता है जब हमें यह मालूम चलता है कि हमें अपने बनाए घर में ही रहना है. हम सोचते हैं कि ज़िन्दगी में दूसरा अवसर मिलने पर हम इसे अलग ढ़ंग से करेंगें पर दुर्भाग्यवश ऐसा होता नहीं है.

हमें जीवन एक बार मिलता है. हम अपने बढ़ई स्वयं हैं. हम प्रतिदिन कील ठोकते हैं, तख़्त लगाते हैं और दीवार का निर्माण करते हैं. हमारी प्रवृत्ति और वर्त्तमान में किए गए विकल्पों का चयन, हमारे भविष्यत ‘घर’ का निर्माण करते हैं. आगामी समय में हमें इसी ‘घर’ में रहना पड़ता है.

इस कारण हमें समझदारी से ‘घर’ का निर्माण करना चाहिए. हमें हर पल प्रत्येक कार्य में अपनी सर्वश्रेष्ठ चेष्ठा करनी चाहिए.

Source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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