वृद्ध व्यक्ति और उसका भगवान्

 

      आदर्श: सत्य
 उप आदर्श: ईमानदारी/ संतोष

यह कहानी श्रीमती सुधा मूर्ती की पुस्तक ‘वृद्ध व्यक्ति और उसका भगवान्‘ से ली गई है.

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कुछ वर्ष पूर्व मैं तमिलनाडु के तन्जावुर जिले की यात्रा कर रही थी. अँधेरा होने ही वाला था और बंगाल की खाड़ी से आने वाले तूफ़ान के कारण बहुत तेज़ बारिश हो रही थी. सड़कों पर लबालब पानी भरा हुआ था. rain3इसलिए मेरे गाड़ीवान ने एक गाँव के पास गाड़ी रोककर मुझसे कहा, “इस भयानक बारिश में हम किसी भी तरह आगे नहीं जा सकते. गाड़ी में बैठने के बजाय आप कहीं आश्रय क्यों नहीं देख लेतीं? ”

अनजान जगह में अपरिचित लोगों के बीच अकेले होने के कारण मैं ज़रा चिंतित थी. फिर भी मैंने छाता लिया और घनघोर बारिश में निकल पड़ी.rain4 बिना कुछ सोचे मैं एक छोटे से गाँव की ओर चल पड़ी जिसका नाम अब मुझे याद नहीं है. बिजली का वहाँ नामोनिशान नहीं था और घोर अंधकार व मूसलाधार बारिश में चलना अपने आप में एक चुनौती थी. दूर से मुझे एक मंदिर का सा आकार दिखाई दिया. मुझे लगा कि आश्रय के लिए वह आदर्श जगह होगी. बीच राह में बारिश और भी भयंकर रूप से पड़ने लगी और हवा अत्यधिक प्रबल होने के कारण मेरा छाता उड़ गया. इस कारण जब तक मैं मंदिर पहुँची, मैं पूरी तरह से भीगी हुई थी. मंदिर में प्रवेश होते ही मुझे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति की आवाज़ सुनाई दी. यद्यपि मुझे तमिल भाषा का ज़्यादा ज्ञान नहीं है पर फिर भी मैंने उस आवाज़ में अपने प्रति सहानुभूति को महसूस किया. विभिन्न यात्राओं के दौरान मैंने यह जाना है कि भाषा चाहे कोई भी हो, दिल से निकली आवाज़ सदा पहचानी जाती है.

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मंदिर के अंधेरे में ध्यान से देखने पर मुझे लगभग ८० वर्ष का एक बुज़ुर्ग आदमी दिखाई दिया. उसके साथ उसकी ही उम्र की एक औरत पारम्परिक सूती साड़ी पहने खड़ी हुई थी. महिला ने उससे कुछ कहा और फिर एक घिसा हुआ मगर साफ़ तौलिया लेकर मेरे पास आई. जब मैं अपना सर व चेहरा पोंछ रही थी तब मैंने देखा कि वह आदमी अंधा था. उनकी परिस्थिति देखकर इतना तो स्पष्ट था कि वे बहुत गरीब थे. भगवान् शिव का मंदिर, जहाँ अब मैं खड़ी हुई थी, बहुत ही सामान्य था और उसकी सजावट बहुत ही सादगी से की हुई थी.rain6 शिवलिंग पर बिल्वा पत्तों के अलावा और कुछ भी नहीं था. मंदिर में रोशनी वहाँ जल रहे एकमात्र दीये से आ रही थी. दीपक की अस्थिर रोशनी में मुझे अनंत शान्ति का अनुभव हुआ और मुझे भगवान् के साथ असीम आत्मीयता का अहसास हुआ.

अपनी टूटी-फूटी तमिल में मैंने उस आदमी से शाम की मंगल आरती करने का आग्रह किया और उसने बहुत ही प्रेम व श्रद्धा से आरती की. जब उसने आरती समाप्त की तो मैंने दक्षिणा के रूप में १०० रूपए का नोट थाली में रख दिया.

उसने १०० रूपए का नोट छूआ और कुछ व्याकुलता से अपना हाथ पीछे करते हुए विनम्रतापूर्वक बोला, “अम्मा, मेरी समझ से यह १० रूपए का नोट नहीं है. यहाँ १० रूपये से अधिक दान कोई नहीं देता है. आप जो कोई भी हों पर मंदिर में आपकी श्रद्धा महत्त्वपूर्ण है ना कि आपके पैसे. हमारे पूर्वजों ने भी कहा है कि हमें हमारे सामर्थ्य के अनुसार ही देना चाहिए. मेरे लिए आप यहाँ आने वाले अन्य सभी लोगों की तरह भगवान् शिव की भक्त हैं. कृपया यह पैसे वापस ले लीजिए.”

मैं बिलकुल अचंभित थी. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. मैंने उसकी पत्नी की ओर देखा- इस उम्मीद में कि वह उससे वाद-विवाद करके उसे पैसे वापस लेने के लिए राजी कर लेगी. पर वह चुपचाप खड़ी रही. कई परिवारों में अक्सर पत्नी अपने पति को लालच के लिए प्रोत्साहन देती है. पर यहाँ उसका विपरीत था. वह अपने पति के विचारों का समर्थन कर रही थी. बाहर बहुत ही तेज़ हवा चल रही थी और प्रचंड बारिश हो रही थी. अतः मैं उनके साथ बैठ गई और हमने अपने जीवन के बारे में बातें कीं. मैंने उन दोनों से उनके बारे में और गाँव के मंदिर के बारे में पूछा. मैंने उनसे यह भी पूछा कि वहाँ उनके देखभाल के लिए कौन था.

अंततः मैंने कहा, “आप दोनों वृद्ध हैं. आपके रोज़मर्रा की ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए आपकी कोई संतान भी नहीं है. वृद्धावस्था में हमें दवाइयों की सबसे अधिक ज़रुरत पड़ती है. यह गाँव ज़िले के किसी भी शहर से काफ़ी दूर है. इस कारण मैं आपको एक सलाह दे सकती हूँ? ”

उसी दौरान हमने वृद्धावस्था में निवृत्ति वेतन की योजना आरम्भ की थी. उनके साफ़ मगर घिसे हुए कपड़े देखकर मुझे लगा कि वह हमारी योजना के आदर्श उम्मीदवार होंगें.
मेरे सवाल पूछने पर पत्नी बोली, “बोलो, बेटा.”

“मैं आपको कुछ पैसे भेजूँगी. आप उन पैसों को डाकघर या एक राष्ट्रीयकृत बैंक में रखिए. उन पैसों से मिले ब्याज से आप अपनी मासिक ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं. यदि कभी चिकित्सीय आपातकाल आ जाए तो आप मूलधन का प्रयोग कर सकते हैं.”

मेरी बात सुनकर वृद्ध पुरुष मुस्कुराया और उसका चेहरा दीपक से भी अधिक उज्जवल हो गया.

“तुम हमसे काफ़ी छोटी प्रतीत होती हो. तुम अभी भी नासमझ हो. इस वयोवृद्ध उम्र में मुझे पैसों की क्या ज़रुरत है? भगवान् शिव को वैद्यनाथ भी कहते हैं. वह महावैद्य, उत्कृष्ट चिकित्सक हैं. rain7हमारे इस गाँव में बहुत सारे उदार लोग रहते हैं. मैं पूजा करता हूँ और इसके बदले में यहाँ के लोग मुझे चावल देते हैं. अगर हम दोनों में से कोई बीमार पड़ जाता है तो यहाँ का स्थानीय डॉक्टर हमें दवाई दे देता है. हमारी ज़रूरतें बहुत सीमित हैं. हम किसी अनजान व्यक्ति से क्यों पैसे लेंगें? अगर आपके कहेनुसार हम बैंक में पैसा रखेंगें और किसी को मालूम पड़ जाएगा तो वह हमें परेशान करेगा. इस बुढ़ापे में मैं इन सब झंझट में क्यों पड़ूँ? आप बहुत दयालु हैं जो दो अजनबी वृद्ध लोगों की सहायता करना चाहती हैं पर हम संतुष्ट हैं. हम जिस प्रकार से अब तक रहते आए हैं, हमें आगे भी उसी तरह रहने दीजिए. हमें और कुछ नहीं चाहिए.”

सीख:

ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास व निष्ठा और संतोष रखने से आनंद की प्राप्ति होती है. हमारी इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता है. अधूरी अपेक्षाओं से सदा दुःख ही मिलता है. अल्प इच्छायें तथा अधिक संतोष हमें प्रसन्नचित रखते हैं.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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