हाथी और रस्सी

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     आदर्श: आशावाद
उप आदर्श: अपनी शक्ति व सामर्थ्य को जानना

एक आदमी कुछ हाथियों के समूह के पास से गुजर रहा था. अचानक वह रुका और उसे यह देखकर बेहद हैरानी हुई कि इतने विशाल प्राणी अपने आगे के पाँव में केवल एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए थे. r3न कोई ज़ंजीर थी और न ही कोई कैदखाना. किसी भी समय वह इस बंधन को तोड़ सकते थे पर किसी कारणवश वे सभी एक साथ बंधे हुए थे.

उसने पास ही एक प्रशिक्षक को देखा और उससे जिज्ञासापूर्वक पूछा कि उन सभी पशुओं के एक साथ होने की क्या वजह थी और वे भागने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे थे. प्रशिक्षक ने कहा, “युवावस्था से ही जब हाथी आकार में छोटे होते हैं, हम उन्हें इसी रस्सी से बाँधकर रखते हैं.उस समय इन्हें नियंत्रण में r2रखने के लिए एक छोटी सी रस्सी भी पर्याप्त होती है. इस प्रकार हम इन्हें यह मानने के लिए प्रशिक्षित करते हैं कि यह रस्सी तोड़कर भाग नहीं सकते. समय के साथ इन्हें विश्वास हो जाता है कि रस्सी इन्हें बाँधकर रखती है और इस कारण यह भागने का प्रयास भी नहीं करते हैं.”

वह व्यक्ति आश्चर्यचकित था. यह जंतु किसी भी समय अपने बंधन से आज़ाद होने का सामर्थ्य रखते थे पर चूंकि इन्हें विश्वास था कि यह ऐसा नहीं कर सकते इसलिए यह ऐसा प्रयास भी नहीं करते.

सीख:

हाथियों की तरह हम भी अक्सर इसी धारणा पर दृढ़ रहते हैं कि हम कुछ भी नहीं कर सकते. केवल एक बार किसी कार्य में निष्फल हो जाने से हम अपना आत्मविश्वास खोने लगते हैं. हममें से कई इस कहानी को समझ सकते हैं क्योंकि जीवन में कभी न कभी हमने असफलता का अनुभव किया है. प्रायः असफल होने से हम यह मानने लगते हैं कि हम कुछ भी करने के योग्य नहीं हैं, हम इसे सच समझ लेते हैं और स्वयं को एक सीमित संसार में परिमित कर लेते हैं. परंतु अगर हम अपने जीवन की तथाकथित विफलताओं को मात्र प्रारम्भिक प्रयास समझें और सकारात्मक व सकेंद्रित रहकर अपने लक्ष्य की दिशा में परिश्रम जारी रखें तो हम अवश्य सफल होंगें.

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हमें स्वयं को छोटे से संसार में सीमित नहीं करना चाहिए. अगर हम अपनी मानसिक सीमाओं का विस्तार कर लें और अपने सामर्थ्य में दृढ़ विश्वास कर लें तो हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं.

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source: saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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