गाँधीजी की ईमानदारी की कहानी

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आदर्श: सत्य
उप आदर्श: ईमानदारी

मोहन बहुत ही शर्मीला लड़का था. स्कूल में छुट्टी की घंटी बजते ही वह अपनी किताबें इकट्ठी करके जल्दी से घर चला जाता था.gandhi2 बाकी के लड़के स्कूल के बाद गपशप करते थे. कुछ लड़के रास्ते में खेलने के लिए रूक जाते थे तो कुछ खाने-पीने के लिए. पर मोहन हमेशा सीधे घर ही जाता था. उसे डर था कि कहीं उसके सहपाठी उसे रोककर उसका मज़ाक न उड़ाएं.

एक दिन विद्यालयों के निरीक्षक, श्री गिल्स, मोहन के स्कूल आए. उन्होंने कक्षा में अंग्रेजी के पाँच शब्द पढ़े और सभी लड़कों से उन पाँचों शब्दों को लिखने के लिए कहा. मोहन ने चार शब्द सही लिख लिए पर पाँचवा शब्द वह ठीक से नहीं लिख पा रहा था. मोहन की दुविधा देखकर उसके अध्यापक ने निरीक्षक की पीठ के पीछे से उसे इशारा करते हुए कहा कि वह अपने साथ के लड़के की स्लेट से नक़ल कर ले. परंतु मोहन ने अपने अध्यापक के इशारों पर ध्यान नहीं दिया. अन्य सभी लड़कों ने पाँचों शब्द सही लिखे; मोहन ने केवल चार ही लिखे.

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निरीक्षक के जाने के बाद अध्यापक ने मोहन को डाँट लगाई. “मैंने तुमसे कहा था कि साथ वाले लड़के की नक़ल कर लो,” उन्होंने गुस्से से कहा. “तुम ठीक से नक़ल भी नहीं कर सकते? ” सभी लड़के हंस पड़े.

उस शाम जब मोहन घर लौटा तो वह उदास नहीं था. उसे मालूम था कि वह गलत नहीं था. उसे दुःख केवल इस बात का था कि उसके अध्यापक ने उसे नक़ल करने के लिए बढ़ावा दिया था.

    सीख:

ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है. धोखेबाज़ी व बेईमानी से हम जीवन में कभी सफल नहीं हो सकते. बचपन से ही बच्चों में सच बोलने की आदत डालनी चाहिए तथा ईमानदार बनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. जो निष्कपट होते हैं, वे शांत और खुश रहते हैं.

 

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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