अनमोल तलवार

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     आदर्श : अहिंसा
उप आदर्श : शांति

एक समय एक कीमती तलवार थी. यह तलवार एक प्रसिद्ध राजा की थी जो हर समय अपने महल में विभिन्न प्रदर्शनों तथा समारोह के आनंद में लीन रहता था. एक दिन इस राजा तथा उसके पड़ोसी देश के राजा में बहुत बड़ा झगड़ा छिड़ गया.k2 अंततः दोनों राजाओं ने युद्ध की घोषणा कर दी.

तलवार इस बात से काफी उत्तेजित थी कि वह पहली बार किसी वास्तविक लड़ाई में भाग ले पाएगी. वह सभी को अपनी बहादुरी व विशिष्टता दिखना चाहती थी. उसे विश्वास था इस लड़ाई के बाद वह पूरे साम्राज्य में विख्यात हो जाएगी. रणभूमि की ओर आगे बढ़ते हुए तलवार ने पहले से ही स्वयं को अनेक संघर्षों की विजेता मान लिया था. परन्तु जब वह तलवार अपनी सेना के साथ युद्धक्षेत्र पहुँची तो पहली लड़ाई समाप्त हो चुकी थी. अतः युद्ध के परिणाम तलवार के सामने थे. उसने युद्ध की जैसी कल्पना की थी और जो परिणाम उसके सामने था, उन दोनों में ज़रा भी समानता नहीं थी. सूर्य की रोशनी में चमकते हुए शस्त्र लिए सफलता का हर्ष मनाने के लिए वहाँ एक भी योद्धा नहीं था. k3वास्तव में हर तरफ छिन्न-भिन्न शस्त्र थे और भूखी प्यासी सेना थी. खाने के लिए मुश्किल से ही अन्न बचा था. बहुत सारे लोग बुरी तरह घायल थे और ज़मीन पर इधर-उधर अधमरे से पड़े हुए थे. सब कुछ धूल-मिट्टी से ढका हुआ था और दूर-दूर तक घिनौनी बदबू फैली हुई थी.

ऐसा निराशाजनक दृश्य देखकर तलवार को अहसास हुआ कि उसे युद्ध बिलकुल पसंद नहीं था. उसने निश्चय किया कि युद्ध में भाग लेने के बजाय वह खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेकर शान्ति से रहना अधिक पसंद करेगी. अतः युद्ध के अंतिम दिन से एक रात पहले तलवार लड़ाई रोकने का रास्ता सोचने लगी. इस दौरान अचानक तलवार को स्वयं में थरथराहट महसूस हुई. पहले तो तलवार में हलकी सी भनभनाहट थी लेकिन धीरे-धीरे यह आवाज़ तेज़ होने लगी. जल्द ही यह ध्वनि इतनी बढ़ गई कि वह कर्कश कोलाहल में बदल गई. अन्य सैनिकों की तलवारों तथा कवच ने राजा की तलवार से पूछा कि वह क्या कर रही थी. तलवार ने उनसे कहा, “मैं नहीं चाहती कि कल कोई युद्ध हो. मुझे युद्ध पसंद नहीं है.”

एक ने जवाब दिया, “युद्ध तो किसी तो भी पसंद नहीं है पर हम क्या कर सकते हैं?”

“तुम भी मेरी तरह थरथराना शुरू कर दो, “राजा की तलवार ने कहा. “अगर हम सब मिलकर शोर मचाएंगे तो सेना का कोई सिपाही सो नहीं पाएगा.”

राजा की तलवार की बात से प्रभावित होकर सभी अस्त्र-शस्त्र भनभनाने लगे जब तक की उनका शोर कान फाड़नेवाला न हो गया. कोलाहल इतना तेज़ था कि उसकी आवाज़ शत्रुओं के पड़ाव तक पहुँच रही थी. शत्रुओं के शस्त्र भी इस युद्ध से प्रसन्न नहीं थे अतः वह सब भी विरोध में शामिल हो गए.

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अगली सुबह जब युद्ध के शुरू होने का समय हुआ तब कोई भी सैनिक लड़ने को तैयार नहीं था. सभी बहुत थके हुए थे क्योंकि शस्त्रों के कोलाहल के कारण किसी को भी रात की नींद नसीब नहीं हुई थी. राजाओं और सेनापतियों ने युद्ध अगले दिन तक स्थगित करने का फैसला किया और उस दिन सबने दिनभर खूब आराम किया.

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परन्तु रात होने पर राजा की तलवार के नेतृत्व में एक बार फिर सभी शस्त्रों ने अपना शान्ति का नारा दोहराया जिसके परिणामस्वरूप कोई भी सैनिक रातभर सो नहीं पाया. युद्ध को एक बार फिर स्थगित करना पड़ा. ऐसा अगले ७ दिनों तक जारी रहा. सातवें दिन की शाम को दोनों सेनाओं के राजा एक साथ बातचीत करने के लिए मिले.k7शुरू में दोनों अपने पिछले झगड़े को लेकर क्रोधित थे पर कुछ समय साथ बैठने के बाद दोनों अपनी अशांत रातों, अपने सैनिकों के विस्मित चेहरों, रात और दिन का भ्रम तथा इस सब के द्वारा उत्पन्न दिलचस्प परिस्थितियों के बारे में बात करने लगे. जल्द ही दोनों २ दोस्तों की तरह इन नन्हीं कहानियों पर हँस रहे थे.

 

सौभाग्यवश दोनों राजाओं ने अपने पुराने झगड़े भूलाकर युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी. दोनों राजा अपने-अपने राष्ट्रों में दोहरी खुशी लेकर लौटे- उन्हें लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी और दोनों ने एक दूसरे की दोस्ती एक बार फिर से हासिल कर ली.k9 उस दिन के बाद से दोनों राजा अक्सर मिलकर अपने राजा होने के अनुभवों के बारे में चर्चा करते थे. आपस में दोस्ती होने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि जो चीज़ें उन्हें जोड़ती थीं वह उन्हें अलग करने वाली चीज़ों से कहीं अधिक थीं.

सीख:

सभी को शान्ति, खुशी और आनंद चाहिए है. समस्याओं का समाधान युद्ध नहीं है. अहिंसा शांति प्राप्त करने का एक प्रबल उपकरण है.

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source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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