एक दावेदार का रूपांतर

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     आदर्श : अहिंसा
उप आदर्श : सहनशीलता, क्षमाशील व प्रेम

संत एकनाथ भारत के महाराष्ट्र राज्य के एक प्रतिष्ठित महात्मा थे. एक बार उनके आश्रम के बाहर कुछ लोग ताश के पत्ते खेल रहा थे. उन दिनों में इस प्रकार की गतिविधियाँ बेरोज़गार लोगों में समय बिताने के लिए काफी प्रचलित थीं.

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यह घटना उस दिन की है जब समूह के एक खिलाड़ी के पत्ते उस दिन विशेषतः अनुकूल न होने के कारण, वह लगातार अपने पैसे हार रहा था.saint5 इस कारण वह बेचैन था और न केवल अपनी बदकिस्मती पर नाराज़ था बल्कि दूसरे खिलाड़ी, जो उससे बेहतर स्थिति में थे, उनके प्रति ईर्षयालु भी था. किसी भी अन्य हारे हुए खिलाड़ी के समान क्रोधित होना उसके लिए स्वाभाविक था. वह अन्य खिलाड़ियों से बात-बात पर बहस करने लगा और जल्द ही बहस लड़ाई में बदल गई.

किसी ने हारनेवाले को सलाह दी, “नाराज़ मत हो.”
हारनेवाले ने कठोरता से उत्तर दिया, ” ऐ! तुम्हें क्या लगता है? मैं क्या संत एकनाथ हूँ जो मुझे गुस्सा नहीं आएगा.”

उसके ऐसा बोलते ही झगड़े ने अलग ही मोड़ ले लिया.

समूह के एक अन्य व्यक्ति ने बीच में दखल देते हुए पूछा, “संत एकनाथ कोई दिव्य पुरुष हैं कि उन्हें गुस्सा नहीं आएगा? वह भी एक साधारण मनुष्य हैं. तुम मुझे ऐसा एक व्यक्ति दिखाओ जिसे गुस्सा न आता हो.”
किसी ने प्रश्नकर्ता का समर्थन करते हुए कहा, “शायद एकनाथ में कोई भावना या आत्म-सम्मान नहीं है. आत्म-सम्मान रखने वाले किसी भी व्यक्ति को गुस्सा आना स्वाभाविक है और वह हर परिस्थिति में शांत नहीं रह सकता.”

ताश खेलने वाले एक अन्य खिलाड़ी ने एकनाथ का साथ देते हुए कहा, “नहीं, एकनाथ कभी क्रोधित नहीं होते.”
“नहीं, यह सच नहीं है. ऐसा कोई मानव नहीं है जिसे गुस्सा न आता हो.”
“बिलकुल नहीं. मैं एकनाथ को जानता हूँ और मैंने उन्हें देखा भी है. वे कभी गुस्सा नहीं होते.”
“मैं कहता हूँ कि तुम गलत हो. उन्हें गुस्सा अवश्य आता है.”
“नहीं, बिलकुल नहीं.”

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इस समूह में सभी जुआरी थे. वाद-विवाद और चिल्लाने के अलावा और इनसे क्या उम्मीद कर सकते थे? उनकी बेतुकी बातचीत चलती रही.
“तुम शर्त में क्या लगाओगे? मैं एकनाथ को क्रोधित कर दूँगा.”
“तुम सर के बल खड़े होकर भी ऐसा नहीं कर सकते.”
“चलो ठीक है. तुम सब शर्त के १०० रूपए रखो. एकनाथ को क्रोधित करने की शर्त मैं स्वीकार करता हूँ. इस प्रकार जुए में हारे सारे पैसे मुझे वापस मिल जाएंगें.”

सब सहमत हो गए. अगले दिन योजना के अनुसार दावेदार एकनाथ के घर के बाहर जाकर खड़ा हो गया. बाकी के सभी लोग दूर खड़े होकर उसे देख रहे थे.
रोज़ की तरह सूर्यास्त के समय संत एकनाथ विट्ठल भगवान् के भजन गाते हुए घर से निकले. वह गोदावरी नदी पर नहाने व समर्पण के लिए जा रहे थे. नदी में स्नान के बाद उन्होंने अपनी नियमित प्रार्थना की और फिर घर लौटने लगे.
वह दावेदार जिसने एकनाथ को क्रोधित करने का दावा किया था, अपने मुँह में पान के पत्ते चबाकर एकनाथ के वहाँ से गुज़रने का इंतज़ार कर रहा था. जैसे ही एकनाथ अपने घर में घुसने लगे, दावेदार ने पान की लाल लार एकनाथ के मुँह पर थूक दी. कुछ पल के लिए एकनाथ स्तंभित खड़े रहे और फिर उन्होंने घूमकर देखा कि यह हरकत किसने की थी. पर बिना कुछ बोले वह दोबारा गोदावरी नदी पर गए और एक बार पुनः नहाकर वापस लौटे.saint3
इस बार फिर दावेदार ने अपनी हरकत दोहराई. परन्तु उसे बहुत हैरानी हुई जब एकनाथ ने केवल इतना ही बोला, “जय पांडुरंग, जय विट्ठल” और बिना किसी शिकायत के वापस नदी पर जाकर एक बार पुनः नहाकर आए.

देखने वाले सभी लोग अवाक थे कि ऐसा ३-४ बार होने के बावजूद भी, बिना कुछ बोले या मुँह बिचकाए, एकनाथ हर बार विट्ठल के नाम का उच्चारण करते हुए गोदावरी नदी पर स्नान करने गए. ऐसा बार-बार होने के बावजूद भी उनके चेहरे पर अप्रसन्नता, नाखुशी या क्रोध का नामोनिशान नहीं था.

संत एकनाथ का धैर्यपूर्ण व शांत स्वभाव देखकर समूह के सारे जुआरी तथा दावेदार जिसने ऐसी अश्लील हरकत की थी, एकनाथ के पास गए और उनके पैरों में गिरकर उनसे क्षमा की याचना करने लगे. एकनाथ ने सभी को गले लगाया. वह अपराधी व्यक्ति जिसने एकनाथ के चेहरे पर थूका था, ज़ोर- ज़ोर से रोते हुए बोला, “स्वामीजी, मैं मूर्ख हूँ. मैं ही वह पापी हूँ जिसने यह भयंकर भूल की है. कृपया मुझे माफ़ कर दीजिये.” संत एकनाथ के पैरों में गिरकर उसने संत के पैर ज़ोर से पकड़ लिए और दहाड़े मार-मारकर दोहराने लगा, “कृपया मुझे माफ़ कर दीजिये. कृपया मुझे माफ़ कर दीजिये.” उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे और वह अपने किए पर सच्चे दिल से शर्मिंदा था. एकनाथ ने अत्यन्त प्रेम से उसे उठाया और गले लगा लिया.

एकनाथ दूसरों से अलग थे. उन्होंने रोते हुए अपराधी से सप्रेम कहा, “मेरे बच्चे तुम धन्य हो. तुम रो क्यों रहे हो? तुमने कोई अपराध नहीं किया है. तुमने कोई पाप नहीं किया है. वास्तव में तुम एक पवित्र आत्मा हो. मुझे तो तुम्हारी पूजा करनी चाहिए क्योंकि तुमने आज मेरे लिए बहुत ही दुर्लभ अवसर उत्पन्न किया है. तुम्हें पता है आज एकादशी का पावन दिवस है. केवल तुम्हारे कारण मुझे माता गोदावरी पर ४ बार जाकर उनकी अर्चना करने का सौभाग्य प्राप्त हो पाया. सिर्फ तुम्हारे कारण मैं अपने प्रभु विट्ठल के नाम का बार-बार उच्चारण कर पाया. अतः मुझे तुम्हें धन्यवाद देना चाहिए. ऐसा कहकर एकनाथ ने पूर्ण सच्चाई से उस जुआरी को झुककर प्रणाम किया.

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इस घटना के बाद से अपने नियमित स्थान पर इकट्ठा होकर ताश या जुआ खेलने के बजाय वह समूह एकनाथ का शिष्य बन गया. संत एकनाथ से शिक्षा लेकर समूह के सभी सदस्य दीया जलाकर नाम संकीर्तन करने लगे.

      सीख:

क्षमा करना एक ईश्वरीय विशेषता है. अगर हम इस पावन विशिष्ट गुण का विकास कर लें तो अपने भीतर प्रेम व शान्ति का विकास कर हम स्वयं में बदलाव लाने के साथ-साथ दूसरों में परिवर्तन लाने का साधन भी बन सकते हैं.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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