ईमानदार ऑटोरिक्शा चालक

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आदर्श : सत्य
  उप आदर्श: ईमानदारी

उस रात बहुत ठण्ड थी और तेज़ हवा चल रही थी. मैं अपने दोस्त से एक लम्बे समय के बाद मिला था और इसलिए हम घंटों बातें करते रहे. हमें समय का ध्यान ही नहीं रहा और जब ध्यान आया तो रात के लगभग दस बजने वाले थे. हमने घर जाने के लिए ऑटोरिक्शा बुलाने का फैसला किया.

इतने में तेज़ बारिश शुरू हो गई. मौसम खराब होने के कारण हम जल्द से जल्द ऑटो लेकर घर जाना चाहते थे. परन्तु कोई भी ऑटो हमारे लिए रूकने को तैयार नहीं था, सिवाए एक ऑटो के. चालक ने हमसे पूछा कि हमें कहाँ जाना है और हमने उसे अपना ठिकाना बताया. भाड़े के बारे में कोई बात किए बिना ही उसने कहा, “कृपया अंदर आइए.” इतनी तेज़ बारिश में हमारे लिए रूकने के लिए हमने गाड़ीवान को धन्यवाद दिया.auto1

चूँकि मौसम बहुत ठंडा था, मैंने चालक से रास्ते में किसी भोजनालय या चाय की दुकान पर रूकने को कहा. हम गरम-गरम चाय पीना चाहते थे. चालक ने एक छोटे से भोजनालय पर ऑटो रोका.                    auto2

हमने चाय मँगवाई और वाहनचालक को भी हमारे साथ चाय पीने को कहा. पर उसने मना कर दिया. मैंने उससे एक बार फिर थोड़ा ज़ोर देकर कहा कि चाय पीने से उसे ताज़गी महसूस होगी. पर वाहनचालक ने एक बार पुनः विनम्रतापूर्वक मना कर दिया.
मेरे दोस्त ने पूछा, “क्या तुम इस दुकान की चाय पीना नहीं चाहते?”
चालक ने उत्तर दिया, “नहीं साहब, मुझे अभी चाय पीने का मन नहीं है.”
फिर मैंने उससे पूछा, “पर क्यों? चाय का एक प्याला पीने में तो कोई हर्ज़ नहीं है.”
चालक ने मुस्कुराकर कहा, “आपका धन्यवाद पर मुझे क्षमा कीजिए.”
मेरे दोस्त ने पूछा, “क्या तुम बाहर कभी खाते-पीते नहीं हो?”
चालक ने कहा, “नहीं!”

चालक की बात सुनकर मेरे दोस्त ने चिढ़कर पूछा, “ऐसा तो नहीं है कि तुम समझते हो कि हम तुम्हारे बराबर के नहीं हैं और इसलिए तुम हमारे साथ चाय पीना नहीं चाहते?”
चालक ने जवाब नहीं दिया और वह ख़ामोश रहा.
मैं चालक के व्यवहार पर बहुत हैरान था पर मैंने अपने दोस्त से उसे बाध्य न करने का आग्रह किया.

१५ मिनट बाद हम अपनी मंज़िल पर पहुँच गए. हमने भाड़ा अदा किया और वाहक ने हमें धन्यवाद दिया. मैं यह जानने के लिए बहुत उत्सुक था कि उसने चाय पीने से इंकार क्यों किया था. अतः मैंने उसे रोककर इस बारे में पूछा.

उसने कुछ देर सोचा और फिर बोला, “साहब, आज दोपहर एक दुर्घटना में मेरे बेटे का देहांत हुआ है. उसके अंतिम संस्कार के लिए मेरे पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं. इसलिए पर्याप्त पैसे कमा लेने तक मैंने पानी तक भी न पीने का प्रण लिया था. इसी कारण जब आपने मुझे चाय के लिए पूछा तब मुझे इंकार करना पड़ा था. मुझे गलत मत समझिएगा.”

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हम दोनों स्तंभित थे और हमने उसके बेटे के अंतिम संस्कार के लिए उसे और पैसे देने चाहे.
मैंने कहा, “कृपया यह रख लो.”
उसने विनम्रता से इंकार करते हुए कहा, “आपकी उदारता के लिए धन्यवाद, साहब. १-२ घंटों में अगर मुझे १-२ ग्राहक और मिल जाएंगें तो मैं अपनी ज़रुरत के पर्याप्त पैसे कमा लूँगा.” और वह वहाँ से चला गया.
तेज़ बारिश व देर रात होने के बावजूद उसने हमसे बहुत मामूली पैसे भाड़े में लिए. अगर वह चाहता तो हमसे दुगने या तिगुने पैसे भाड़े में माँग सकता था. अपनी कमज़ोर आर्थिक परिस्थिति और अपने गहन शोक के बावजूद उसने अपनी ईमानदारी बरकरार रखी और अपने कथन पर अटल रहा.

              सीख:
ईमानदारी सबसे श्रेष्ठ नीति है. किसी व्यक्ति का चरित्र कठिन परिस्थिति में ही निर्धारित होता है. सच्चाई व ईमानदारी के आदर्श हमारी प्रकृति बनने चाहिए. इससे हमें दूसरों के लिए सम्मान, भीतरी आनंद तथा शांति मिलेगी.

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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