भगवान कहाँ रहते हैं

आदर्श : सत्य
उप आदर्श: आत्म विश्लेषण

एक व्यक्ति भगवान को देखना चाहता था. वह बहुत सी तीर्थयात्राओं पर गया और उसने अनेकों धर्मग्रन्थ भी पढ़े पर फिर भी उसकी तलाश ज़ारी थी. भगवान की खोज में वह जगह-जगह भटकता रहा.god1

जाड़े की एक शाम उसने एक बूढ़ी औरत को आग रखने के स्थान पर लकड़ी के लट्ठों को हिलाते हुए देखा.god2 थोड़ी-थोड़ी देर में कोयले के गोले राख से ढक जाते थे. तब वह औरत कोयले को कुरेदनी से हिलाकर खिसकाती थी. उसके ऐसा करते ही लाल गर्म अंगारे साफ़ दिखाई पड़ते थे. उस व्यक्ति ने पाया कि हर बार राख हटाने पर आग पहले से अधिक उज्जवलता से जलती थी.

 

अगले दिन अपने पैरों को आराम देने के लिए वह व्यक्ति एक पेड़ के नीचे बैठा और उसने चमकते सूरज को देखा. उसने कहा, “अरे सूर्य ! तुम तो पूरे संसार पर निगाह रखते हो. god3 तुम्हें अवश्य मालूम होगा कि भगवान कहाँ रहते हैं. वह कहाँ छुपे हुए हैं? मैं उन्हें हर जगह ढूँढ़ चूका हूँ पर वह मुझे कहीं नहीं मिले. तभी एक बादल वहाँ से गुजरा और बादल से ढक जाने के कारण सूरज कुछ देर के लिए अदृश्य हो गया.god5 कुछ समय बाद जब सूरज के आगे से बादल हटा तो सूरज एक बार फिर चमका : स्पष्ट और उज्जवल. उस व्यक्ति ने गहरी सांस ली और स्वयं से बोला, “क्या मैं भगवान को कभी देख भी पाऊँगा? ”

फिर एक दिन वह व्यक्ति एक तालाब के पास से गुजरा. तालाब का ऊपरी तल हरी काई से ठसाठस भरा हुआ था.god6 कुछ गाँववासी तालाब को साफ़ करने में लगे हुए थे और उनके प्रयास से तालाब का पानी कुछ स्वच्छ दिख रहा था. उस व्यक्ति ने गाँववालों से पूछा, “तालाब के पानी में यह गन्दी काई किसने डाली? ” गाँववालों ने उत्तर दिया, “किसी ने नहीं. यह काई पानी के भीतर से अपने आप ही पनपती है. शायद यह पानी में ही होती है. इस कारण यदि पानी काफ़ी समय तक निश्चल रहता है तो काई फैलनी शुरू हो जाती है. हम लोग इसे साफ़ कर रहे हैं.god7 जल्द ही तालाब एक बार फिर से साफ़ व शुद्ध हो जाएगा. ”

उस व्यक्ति ने इन सभी बातों पर चिंतन किया. काई पानी के अंदर से आई थी. पर वह पानी की सतह पर इतने घनेपन से फैल गई थी कि गाँववालों को उसे शारीरिक रूप से हटाना पड़ा ताकि पानी दुबारा स्पष्ट हो सके.
बादल सूर्य की ऊष्मा से बने थे. परन्तु वे सूर्य को इस हद तक ढक पा रहे थे कि सूर्य की किरणें क्षणभर के लिए अदृश्य हो गईं थीं. जब तेज़ हवा ने बादलों को ढकेला तब सूर्य पुनः दिखाई दिया.
राख के बनने का कारण आग थी. परन्तु कुछ समय बाद राख भी आग को इतने घनेपन से ढक पा रही थी कि आग करीब-करीब बूझने को थी. जब राख को हिलाकर खसकाया गया तो आग पुनः उज्जवल हो गई.

इन सभी उदाहरणों में, पानी, सूर्य और आग पहले से ही उपस्थित थे. उनका नए सिरे से जन्म नहीं हुआ था. केवल थोड़ी सी मेहनत से उन्हें पुनः स्थापित करना था.
उसे जैसे ही यह अहसास हुआ, उसे सच्चाई स्पष्ट हुई और सब समझ में आ गया. उसकी बूढ़ी आँखों का मोतियाबिंद उसकी स्वयं की आँखों के भीतर से विकसित हुआ था नाकि कहीं बाहर से.

       सीख :

मनुष्य का जन्म ईश्वर से हुआ है. परन्तु मनुष्य स्वयं को संसार रुपी आवरण से ढक लेता है और उसे अपना स्त्रोत भूल जाता है. यदि इस आवरण से बाहर निकलकर हम अपने भीतर झाँकेंगें तो हम ईश्वर को पायेंगें.

god9

source: http://www.saibalsanskaar.wordpress.com

अनुवादक- अर्चना

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